दो बल्ब B1 व B2, 500। वोल्ट के सोर्स के साथ सीरीज में कनैक्टेड है। बल्ब B1 की रेटिंग 220v/100w और बल्ब B2 की रेटिंग 330v/100w है तो बताइए कि इन दोनों बल्बों में से कौन-सा बल्ब अधिक प्रकाश देगा यानी ज्यादा ग्लो करेगा।

basis electrical question

चलिए इस प्रशन को हल करते है और पता लगाते है इन दोनों में से कौन सा बल्ब ज्यादा रोशनी देता है। हम जानते है कि सीरीज सर्किट में विधुत धारा का मान समान रहता है यानी दोनों बल्ब में धारा का मान एक समान रहेगा तो इसलिए सीरीज सर्किट में पावर निकालने के लिए P = i2R वाले सूत्र का प्रयोग करेंगे। इस सूत्र से हमें पता चल रहा है कि पावर, प्रतिरोध के समानुपाती है यानी अगर प्रतिरोध बढ़ेगा तो पावर भी बढ़ेगी और यदि प्रतिरोध कम होगा तो पावर भी कम होंगी। तो इस सूत्र से यह निष्कर्ष निकलता है कि दोनों बल्ब में से जिस बल्ब का प्रतिरोध ज्यादा होगा वहीं बल्ब अधिक प्रकाश देगा। ऐसा इसलिए होगा क्योंकि जिसका भी प्रतिरोध ज्यादा होगा वो पावर भी ज्यादा कंज्यूम करेगा इसलिए वह ज्यादा रोशनी देगा।

अब बात आती है इनका प्रतिरोध निकालेंगे कैसे तो चलिए इनका प्रतिरोध भी निकाल लेते है। पहले हम B1 बल्ब का प्रतिरोध निकालतें है इस बल्ब की रेटिंग हमें पहले ही दी गई है वोल्टेज रेटिंग इसकी 220 वोल्ट है और पावर रेटिंग इसकी 100 वाट है। इसका प्रतिरोध निकालने के लिए हम पावर का P = V2/R वाले सूत्र का उपयोग करेंगे तो इस सूत्र में हम पावर और वोल्टेज का मान रखकर प्रतिरोध का मान निकाल लेंगे। R = 220×220/100 इसे हल करने पर R = 484 ओम प्राप्त होता है तो B1 बल्ब का प्रतिरोध तो हमने निकाल लिया अब दूसरे का निकालते हैं।

B2 बल्ब का प्रतिरोध निकालने के लिए हमें पहले ही परिपथ में इसकी रेटिंग दी गई है इसकी वोल्टेज 330 वोल्ट और पावर 100 वाट दी है। इसका प्रतिरोध भी उसी सूत्र से निकालेंगे। इस सूत्र वोल्टेज और पावर का मान रखने पर R = 330×330/100 इसे हल करने पर हमे R = 1089 ओम प्राप्त होता है यानी इस बल्ब का प्रतिरोध 1089 ओम है। 

दोनों बल्ब के प्रतिरोध का मान हमने निकाल लिया है और अब हम आसानी से बता सकते है कि कौन सा बल्ब ज्यादा रोशनी देगा। B1 बल्ब के प्रतिरोध का मान 484 ओम और B2 बल्ब के प्रतिरोध का मान 1089 ओम है। इससे पता चलता है कि B2 बल्ब का प्रतिरोध, B1 बल्ब के प्रतिरोध से अधिक है। इसलिए B2 बल्ब अधिक प्रकाश देगा और अपने अंदर अधिक पावर कंज्यूम करेगा।

बल्ब के प्रशन करते समय बहुत से छात्र गलती कर बैठते है उन्हें पता नहीं होता कि कौन से परिपथ में पावर का कौनसा सूत्र लगता है इसको याद रखने का एक आसान तरीका है बस आपको यह याद रखना है कि यदि बल्ब सीरीज में कनैक्टेड है तो आप जानते है कि सीरीज में करंट सेम होती है तो आपको पावर का वही सूत्र लगाना है जिसमें करंट आती हों तभी आप प्रशन को सही हल कर पाओगे और पता लगा पाओगे की कौन सा बल्ब ज्यादा रोशनी देगा।



Er. Chand दिसंबर 14, 2021
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 जैसा कि आपको इस पोस्ट के टाइटल को ही पढ़कर पता चल गया होगा कि आज हम किस विषय पर बात करने वाले है। जी हां दोस्तों आज हम डी सी मोटर कैसे काम करती है इस टोपिक पर बात करेंगे और डी सी मोटर के अन्दर जितने भी मेन पार्ट होते है वो कैसे काम करते है उन सभी के कार्य के बारे में जानेंगे तो चलिए शुरू करते है इस महत्वपूर्ण जानकारी को।


डी सी मोटर कैसे काम करती है

तो सबसे पहले जान लेते है डी सी मोटर का काम क्या होता है चाहे कोई भी मोटर हो ए सी या फिर डी सी सभी मोटर सेम काम होता है इलैक्ट्रिकल ऐनर्जी को मकैनिकल ऐनर्जी में कन्वर्ट करना। मकैनिकल ऐनर्जी का मतलब होता है किसी भी चीज का चलना या घूमना यानी जो चीज घूमने लगती है या फिर चलने लगती है उसी को हम उसकी यांत्रिक ऊर्जा कहते है इसी प्रकार जब मोटर को इलैक्ट्रिकल ऐनर्जी दी जाती है तो मोटर घूमने लगती है और मोटर की साफ्ट से किसी मशींन को जोड़ देते है इस प्रकार यह विधुत ऊर्जा मैकेनिकल ऐनर्जी में कन्वर्ट होकर मोटर की साफ्ट के द्वारा मशींन को इनपुट के रूप में दी जाती है।

अब बात करते है इसके कार्य सिद्धान्त की तो डी सी मोटर एक तरह से आकर्षण और प्रतिकर्षण के सिध्दांत पर कार्य करती है देखिए इसमें होता क्या है मोटर का जो ऊपर वाला भाग होता है उसे योक कहते है ठीक इसके निचे स्टेटर होता है जिसपर फील्ड वाइंडिंग की जाती है इसलिए इसमें ऊत्पन्न होने वाले फ्लक्स को फिल्ड फ्लक्स कहते है स्टेटर में जो फील्ड बनता है वह फिक्स होता है यानी यह एक पर्मानैंट मेग्नेट की तरह कार्य करता है इस फोटो में मोटर का जो भाग दिखाया गया है उसे स्टेटर कहते है साधारण भाषा में इस ढांचे को फील्ड बोलते हैं।

DC Motor kaise kam karti hai

इस फील्ड यानी स्टेटर के अन्दर रोटर को डाला जाता है रोटर पर आर्मेचर वाइंडिंग की होती है जैसे ही हम डी सी मोटर के आर्मेचर में सप्लाई देते है तो इसमें एक मैगनेटिक फ्लक्स बनता है यह फिल्ड स्टेटर के मैगनेटिक फील्ड के आकर्षण या प्रतिकर्षण करता है जिसके कारण डी सी मोटर घूमने लगती है।
एग्जाम की दृष्टि से अगर देखें तो इससे काफी सारे महत्वपूर्ण प्रशन बनते है जैसे की आपसे पूछा जा सकता है कि डी सी मोटर मे कौन सा नियम लागू होता है डी सी मोटर में फ्लेमिंग के बायें हाथ का नियम जिसे लैफ्ट हैंड रुल कहते है लागू होता है और डी सी जेनरेटर के अन्दर फ्लैमिंग राइट हैंड रुल लागू होता है।

DC Motor kaise kam karti hai

दोस्तों आपको फोटो में जो डी सी मोटर का पार्ट दिखाया गया है उसे आर्मेचर कहते है और इसे ही रोटर कहते है। इस पर आप लोगों को काफी सारे कंम्पोनेंट लगें दिखाई दे रहे होंगे जिनके बारे में हम जानेंगे।

आपकों इसके राइट साइड वाले हिस्से पर जो चीज लगी दिखाई दे रही है उसे बियरिंग कहते है अगर में आज से कुछ साल पहले की बात करु तो उस समय बियरिंग के स्थान पर बुस का उपयोग किया जाता था। लेकिन आज कल सभी डी सी मोटर के अन्दर बियरिंग कि ही प्रयोग किया जाता है। 

बियरिंग के बाद इस आर्मेचर पर जो चीज लगी है उसे कम्यूटेटर कहते है बहुत सारे लोगों एक कंफ्यूजन होता है कि कम्यूटेटर ए सी सप्लाई को डी सी सप्लाई में बदलता है या फिर डी सी को ए सी में कन्वर्ट करता है तो आपको में बता दूं के यह दोनों काम करता है। लेकिन अगर बात करें हम डी सी मोटर की तो इसमें यह डी सी सप्लाई को ए सी सप्लाई में कन्वर्ट करता है और जेनरेटर के अन्दर यह ए सी को डी सी में कन्वर्ट करता है यानी मोटर के अन्दर कम्यूटेटर एक इन्वर्टर की तरह और जेनरेटर के अन्दर एक रेक्टिफायर की तरह कार्य करता है। 

आपको इस चित्र में कम्यूटेटर के ऊपर कुछ लाइनें कटी दिखाई दे रही होगी इन्हें कम्यूटेटर सेगमेंट कहा जाता है इन सेगमेंट का काम ही डी सी को ए सी बनाना होता है जितने ज्यादा कम्यूटेटर में सिग्मेंट कटे होते है उतनी ही अच्छी हमें ए सी सप्लाई मिलती है।

कम्यूटेटर को हार्ड ड्राउन काॅपर का बनाया जाता है क्योंकि इससे कार्बन ब्रस टच रहते है अगर इसे खाली काॅपर का बना दें तो यह जल्दी ही घीस जायेगा जिससे कम्यूटेटर सेगमेंट को जल्दी जल्दी बदलना पड़ेगा इसलिए इसे हार्ड ड्राउन काॅपर का बनाया जाता है क्योंकि इससे बनें कम्यूटेटर सेगमेंट जल्दी नहीं घिसते है और इन सेगमेंट में हल्का सा गैप होता है जिसमें माइका इंसुलेशन को लगाया जाता है ताकि ये पूरे तरीके से इंसुलेटेड रहे और अच्छे से वर्क करें। कम्यूटेटर सेगमेंट को जिस चीज के ऊपर लगाया जाता है उसे बैकेलाइट कहते है।

अब बात करते है इसके आर्मेचर की इसको बनाने के लिए पतली पतली सीलीकाॅन स्टील की पत्तियों का उपयोग किया जाता है इसको पतली पत्ति से बनाने का मेन मकसद यह होता है क्योंकि इसमें कुछ लोसेस होते है जैसे हिस्टेरिसिस और एडी करंट लोस इन्हें कम करने के लिए ही आर्मेचर को सिलिकॉन स्टील की पतली पत्तियों को वार्निश करके बनाया जाता है। कम्यूटेटर के ऊपर स्लोट कटे होते है जिनमें वाइंडिंग को डालकर ऊपर से इंसुलेटिंग मटेरियल कागज या माइका की बारिक पत्तियों को लगा दिया जाता है ताकि वाइंडिंग बाहर न निकले और अन्दर अच्छे से फिक्स रहें।



Er. Chand दिसंबर 11, 2021
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 हैलो एवरी वन स्वागत है आप सब का हमारे इलैक्ट्रिकल टिप्स ब्लोग में आज का हमारा टोपिक है थ्री फेज सिंक्रोनस मोटर का बेसिक सिध्दांत क्या होता है। इस मोटर का सिध्दांत सेम डी सी मोटर के समान ही होता है लेकिन इनमें फर्क सिर्फ इतना होता है डी सी मोटर में हम डी सी सप्लाई का प्रयोग करते है और सिंक्रोनस मोटर में हम ए सी सप्लाई का इस्तेमाल करते है। सिंक्रोनस मोटर दो प्रकार की होती है एक सिंगल फेज सिंक्रोनस मोटर और दूसरी थ्री फेज सिंक्रोनस मोटर। सिंगल फेज सिंक्रोनस मोटर स्पेशल मशींन मोटर में आती है इसलिए हम यहां सिर्फ थ्री फेज सिंक्रोनस मोटर के बारे में पढ़ेंगे।


थ्री फेज सिंक्रोनस मोटर क्या होती है

थ्री फेज सिंक्रोनस मोटर एक ऐसी मोटर होती है जो सिर्फ सिंक्रोनस स्पीड पर ही चलती है इसलिए इस मोटर को सिंक्रोनस मोटर नाम दिया गया है। इस मोटर के अन्दर दूसरी मोटरों की तरह दो मेन पार्ट होते है एक होता है स्टेटर यह मशीन का स्थिर रहने वाला भाग होता है जो एक स्थान पर रूका रहता है इसे शुद्ध हिंदी में स्थाता कहते है। दूसरा भाग मेन भाग रोटर होता है जैसा कि हमने दूसरी मोटरों में भी पढ़ा है रोटर मशीन का एक घूमने वाला भाग होता है जो मोटर के अन्दर रोटेट करता है।

इस मोटर के स्टेटर पर थ्री फेज वाइंडिंग होती है जो एक दूसरे से 120 डिग्री इलैक्ट्रिकली अपार्ट होती है चूंकि यह एक सिंक्रोनस मोटर है इसलिए यह सिंक्रोनस स्पीड पर ही रन करती है जिसकी गति Ns = 120f/p सूत्र द्वारा निकाली जा सकती है इस सूत्र में Ns का मतलब है सिंक्रोनस स्पीड, f का मतलब है सप्लाई फ्रिक्वेंसी और p मोटर को डिजाइन करते वक्त उसके रोटर पर बनाये गयें पोलो की संख्या होती है। इस सूत्र का उपयोग करके थ्री फेज सिंक्रोनस मोटर की सिंक्रोनस स्पीड को आसानी से निकाला जा सकता है।

इस मोटर के स्टेटर में थ्री फेज वाइंडिंग में थ्री फेज सप्लाई दी जाती है इसकी तीनों वाइंडिंग से एक एक फेज कनैक्ट हो जाता है इसके रोटर को परमानेंट मैगनेट बनाना होता है ताकि रोटर स्टेटर के मैगनेटिक फील्ड के साथ लोक होकर सिंक्रोनस स्पीड पर रोटेट करें। इसलिए मोटर की साफ्ट पर एक डी सी शंट जेनरेटर को परमानेंटली लगा दिया जाता है और इससे थ्री फेज सिंक्रोनस मोटर के रोटर की वाइंडिंग को सप्लाई दी जाती है ताकी वह एक स्थायी चुंबक की तरह व्यवहार करें और मोटर सिंक्रोनस स्पीड पर रन करने लगें।

थ्री फेज सिंक्रोनस मोटर का बेसिक सिध्दांत

Three phase Synchronous motor basic concepts


जैसा इस फोटो में दिखाया गया है इसी के बेस पर हम थ्री फेज सिंक्रोनस मोटर के बेसिक सिध्दांत को समझेंगे।
मान लीजिए यह हमारा एक स्टेटर है बेसिकली स्टेटर को हम एक वृत से दर्शातें है यह मोटर का एक स्थिर भाग होता है और इसके ऊपर थ्री फेज वाइंडिंग की जाती है। इन वाइंडिंग के तीन पोइंट होते है जिनमें सप्लाई कनैक्ट की जाती है और इनके बीच में एक सैलियंट पोल रोटर होता है। अब देखिए इस मोटर में होता क्या है जैसे ही हम स्टेटर की थ्री फेज वाइंडिंग को थ्री फेज सप्लाई देते है तो इस मोटर के स्टेटर में एक थ्री फेज रोटेटिंग मेग्नेटिक फील्ड ऊत्पन्न हो जाता है जो सिंक्रोनस स्पीड पर रोटेट करता है। अब इस स्टेटर के अन्दर हमारा रोटर होता है जो एक पर्मानैंट मेग्नेट की तरह वर्क करता है। तो इसके बाद होता क्या है रोटर के जिस पोल पर नाॅर्थ पोल बनता है वह स्टेटर के मैगनेटिक फील्ड के साउथ पोल के साथ मैगनेटिक लोकिंग बना लेता है और इसी प्रकार रोटर का साउथ पोल स्टेटर के मैगनेटिक फील्ड के नार्थ पोल के साथ मैगनेटिक लोकिंग बना लेता है इस तरह से रोटर भी सिंक्रोनस स्पीड पर घूमने लगता है इसी कारण इस मोटर को सिंक्रोनस मोटर कहते हैं।

रोटर को परमानेंट मैगनेट कैसे बनाते है

जैसा कि हमने अभी देखा है कि सिंक्रोनस मोटर में रोटर एक स्थायी चुंबक की तरह व्यवहार करता है तो अब हम यह देखेंगे कि इसको परमानेंट मैगनेट कैसे बनाते है सबसे पहले किसी भी लौहे की छड़ को चुंबक बनाने के लिए उस पर तांबे के तार की वाइंडिंग लपेटी जाती है और उसमें करंट को प्रवाहित किया जाता है जिससे वह छड़ विधुत चुंबक बन जाती है तो इस मोटर के रोटर को परमानेंट मैगनेट बनाने के लिए हम क्या करते है। इसके रोटर की वाइंडिंग को एक डी सी शंट जेनरेटर से जोड़ देते है जिससे वाइंडिंग में एक करंट फ्लो होने लगती है और रोटर के एक पोल प नाॅर्थ और दूसरे पर साउथ पोल बनता है डी सी सप्लाई होने के कारण यह पोल चेंज नहीं होते है यानी जिस तरह रोटर पर साउथ पोल बनता है वह साउथ ही रहता है और जिस तरह नाॅर्थ पोल बनता है वह नाॅर्थ ही रहता है इस प्रकार थ्री फेज सिंक्रोनस मोटर में रोटर एक परमानेंट मैगनेट बन जाता है।

थ्री फेज सिंक्रोनस मोटर की स्टार्टिंग

थ्री फेज सिंक्रोनस मोटर के रोटर की वाइंडिंग से एक डी सी शंट जेनरेटर जुड़ा रहता है अब जैसे ही स्टेटर में थ्री फेज सप्लाई दी जाती है तो स्टेटर में एक थ्री फेज रोटेटिंग मेग्नेटिक फील्ड इंड्यूज हो जाता है लेकिन स्टार्टिंग में रोटर रुका हुआ होता है जिसके कारण रोटर वाइंडिंग से कनैक्ट जेनरेटर में भी कोई वोल्टेज नहीं बनती है तो इस मोटर को सेल्फ स्टाॅर्ट बनाने के लिए इसकेे अन्दर एक अलग से स्कारल केज बार इंसर्ट की जाती है। जिससे यह मोटर एक इंडक्शन मोटर की तरह सेल्फ स्टाॅर्ट होती है लेकिन इंडक्शन मोटर कभी भी सिंक्रोनस स्पीड पर नहीं चलती है यह सिंक्रोनस गति से थोड़ी कम गति पर चलती है तो देखते है कि कैसे यह मोटर सिंक्रोनस स्पीड पर घूमती है।

तो देखिए क्या होता है जैसे ही इसकी स्टेटर वाइंडिंग में सप्लाई दी जाती है उसमें मैगनेटिक फील्ड बनता है अब फैराडे लाॅ के द्वारा जो हमने स्काइरल केज बार इंसर्ट की थी उनमें एक इ एम एफ इंड्यूज होता है जिससे केज बार में भी एक मैगनेटिक फील्ड बन जाता है जिसकी दिशा स्टेटर फील्ड की ओर होती है इस तरह से रोटर भी घूमने लगता है और उससे जुड़ा जेनरेटर भी घूमने लगता है इसके घूमते ही इसमें एक वोल्टेज उत्पन्न हो जाती है जिसके कारण रोटर वाइंडिंग में एक करंट फ्लो होती है और रोटर एक परमानेंट मैगनेट बन जाता है इस तरह रोटर, स्टेटर के मैगनेटिक फील्ड से मैगनेटिक लोकिंग करके सिंक्रोनस स्पीड पर घूमने लगता है।




Er. Chand दिसंबर 08, 2021
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 दोस्तों आज की इस पोस्ट में हम समझने जा रहे है इलेक्ट्रिसिटी का ट्रांसमिशन और डिस्ट्रिब्यूशन कैसे होता है और कैसे बिजली हमारे घरों तक पहुंचती है। आप सभी जानते है कि सभी के घरों में विधुत सप्लाई आती है लेकिन यह नहीं जानते कि यह कैसे आती है और कैसे बनती है तो इस बारे आज हम इस पोस्ट में सब कुछ समझेंगे यानी के यहां पर आपको इलैक्ट्रिसिटी के ट्रांसमिशन और डिस्ट्रिब्यूशन का पूरा ज्ञान मिलेगा। बस आपको इस पोस्ट को शुरू से लेकर आखिर तक बड़ी ध्यान पूर्वक पढना है।



जनरली बिजली का उत्पादन 11 केवी पर किया जाता है यानी पावर प्लांट के अन्दर 11 kv पर इलैक्ट्रिसिटी बनकर तैयार होती है अब इस बिजली को यहां से घरों तक या औधौगिक क्षेत्र तक पहुंचाने के लिए कई सब स्टेशन, ट्रांसमिशन टावर और विधुत चालकों का प्रयोग किया जाता है इन सभी की मदद से ही हम बिजली का उपयोग अपने घरों में कर पाते है आइये इसके बारे में अच्छे से समझते हैं।


इलेक्ट्रिसिटी का ट्रांसमिशन 

विधुत शक्ति केन्द्रों के अन्दर जब बिजली बनकर तैयार हो जाती है तो इसे आगे भेजने के लिए स्टेप अप करना पड़ता है ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि अगर इलैक्ट्रिसिटी को 11 kv पर ही ट्रांसमिशन कर दिया जाये तो ट्रांसमिशन लाइन में लोस बहुत अधिक बढ़ जायेंगे क्योंकि इस वोल्टेज पर लाइन में करंट का मान बहुत अधिक होगा। यदि हमें इन लोसेस को कम करना है तो कंडक्टर का साइज बढाना पड़ेगा लेकिन अगर कंडक्टर का साइज बढायेगे तो इसका सीधा प्रभाव ट्रांसमिशन लाइन की कैपिटल कोस्ट पर पड़ता है जिससे प्रयोग किये जाने वाले चालकों की कोस्ट बढ़ जाती है और कंडक्टर का साइज बढ़ाने से चालकों का वजन भी बढ़ जाता है इसलिए विधुत का 11 केवी पर ट्रांसमिशन नहीं किया जाता है।

इसलिए इस 11 केवी को प्राइमरी ट्रांसमिशन सब स्टेशन पर वहां पर लगाये गए उच्चायी परिणामित्र (step up transformer) की मदद से 132 केवी, 220 केवी या 400 केवी में स्टेप अप कर दिया जाता है। अब यहां बिजली 400 केवी में बदल जाती है इतनी हाई वोल्टेज पर इलैक्ट्रिसिटी का ट्रांसमिशन इसलिए करते है क्योंकि जितनी अधिक वोल्टेज होती है करंट का मान उतना कम हो जाता है जिससे लाइन के अन्दर लोसेस बहुत कम हो जाते है यानी के जितनी पावर हम इनपुट में देते है उतनी ही हमें आउटपुट में मिल जाती है।

अब यह बिजली 400 केवी में बदलकर ट्रांसमिशन टावरों के द्वारा काफी लम्बी दूरी तय करके सेकेंडरी ट्रांसमिशन सब स्टेशन पर आती है जहा पर इस हाई वोल्टेज को 66 केवी या 33 केवी में स्टेप डाउन कर दिया जाता है


इलेक्ट्रिसिटी का डिस्ट्रिब्यूशन 

इसके बाद यह विधुत 66 केवी या 33 केवी में स्टेप डाउन होने के बाद प्राइमरी डिस्ट्रिब्यूशन सब स्टेशन पर पहुंचती है यहां इस सब स्टेशन पर अपचायी परिणामित्र (step down transformer) लगें होते है जो इस 66 या 33 केवी वोल्टेज को 11 केवी वोल्टेज में स्टेप डाउन कर देते है।

अब यह इलैक्ट्रिसिटी यहां से 11 केवी में स्टेप डाउन होकर हाई टेंशन डिस्ट्रिब्यूशन लाइन से होते हुए सेकेंडरी डिस्ट्रिब्यूशन सब स्टेशन तक आती है इस सब स्टेशन के अन्दर भी स्टेप डाउन डिस्ट्रिब्यूशन ट्रांसफॉर्मर होता है जो इस 11 केवी को 440 वोल्ट में स्टेप डाउन कर देता है। अब यहां से इस वोल्टेज को गांव या शहर कस्बे में रखें डिस्ट्रिब्यूशन ट्रांसफॉर्मर तक पहुंचाया जाता है जो इसे 220 वोल्ट में स्टेप डाउन कर देता है और यह वोल्टेज घरों तक पहुंचती है।

इसके बाद यह डिस्ट्रिब्यूशन ट्रांसफॉर्मर इस 440 वोल्ट को 220 वोल्ट में बदल देता है फिर वहां से यह 220 वोल्ट सीमेंट के पोल या लौहे के पोलो द्वारा घरों तक पहुंचती है फिर एक विधुत विभाग का कर्मचारी आकर जो आपके घर के नजदीक वाला पोल होता है उस पर से आपको एक बिजली का कनेक्शन दे देता है और आपके घर के बाहर एक बिजली का मीटर लगा देता है अब आप जितनी भी बिजली खर्च करते हो वो सब उस मीटर में काउंट होती रहती है इस प्रकार से इलेक्ट्रिसिटी का ट्रांसमिशन और डिस्ट्रिब्यूशन किया जाता है।



Er. Chand दिसंबर 05, 2021
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 हैलो दोस्तो आज की इस पोस्ट में हम जानेंगे कि MCB और RCCB क्या होता है और mcb or rccb me difference क्या है mcb का प्रयोग कहा किया जाता है और RCCB को किस जगह पर इस्तेमाल में लाया जाता है। इन दोनों का काम क्या होता है और किन किन चीजों से ये प्रोटेक्शन प्रदान करती है। इंटरव्यू के अन्दर भी आपसे इस पर प्रश्र पूछा जा सकता है कि mcb और rccb में क्या अंतर होता है तो इसे समझने के लिए आप इस पोस्ट बड़ी ही ध्यान पूर्वक पढ़िए तभी आप इन दोनों ही प्रोटेक्शन डिवाइस के बारे में अच्छे से समझ पायेंगे तो चलिए शुरू करते है आज के इस बहुत ही प्यारे टोपिक को।


mcb or rccb me difference


MCB क्या होता है

सबसे पहले हम mcb के बारे में बात करेंगे कि MCB क्या होता है। इस प्रोटेक्शन डिवाइस का पूरा नाम miniature circuit breaker होता है और यह केवल ओर केवल ओवर लोड और शाॅर्ट सर्किट पर ही सुरक्षा प्रदान करती है इसके अलावा यह ओर किसी चीज पर प्रोटेक्शन नहीं देती है।

चलिए इसको एक उदाहरण के द्वारा समझते है पहले ओवर लोड से प्रोटेक्शन कैसे करता है उसको समझते है। मान लीजिए आपके घर में एक 10 एम्पीयर रेटिंग की mcb लगी हुई है। यदि इसमें करंट 10 एम्पीयर तक फ्लो हो रहा है तब तक तो कोई चिंता की बात नहीं होती है लेकिन यदि किसी कारण इसमें करंट का मान दस एम्पीयर से थोडा भी ज्यादा हो जाता है यानी के 10.5 या 11 एम्पीयर हो जाता है तो आपके घर में लगी यह mcb तुरंत ही trip कर जाती है जिससे घर के अंदर लगें उपकरण और इलैक्ट्रिकल वायरिंग सुरक्षित बच जाती है तो इस तरह से एक MCB ओवर लोड से सुरक्षा प्रदान करती हैं।

अब शाॅर्ट सर्किट से प्रोटेक्शन कैसे करती है यह समझते है। मान लीजिए आपके घर में विधुत सप्लाई आ रही है और इसमें mcb लगा हुआ है इसमें से दो वायर आते है जो आगे विधुत बल्ब या विधुत मोटर तक जातें है। जिनमें से एक तार फेज का होता है और दूसरा न्यूट्रल का होता है। यदि किसी कारण इनमें से एक तार टूट कर दूसरे तार से मिल जाये यानी फेज वाला वायर टूटकर न्यूट्रल वायर से टच हो जाये तो दोनों तारों में शाॅर्ट सर्किट होने के कारण mcb तुरंत ही trip कर जाती है तो इस प्रकार यह शाॅर्ट सर्किट से भी सुरक्षा प्रदान करती हैं।

RCCB क्या होता है

इस सुरक्षा यंत्र का पूरा नाम residual current circuit breaker होता है। इसके अन्दर हमे काफी सारी सुविधाएं मिल जाती है जो कि mcb के अन्दर नहीं पाई जाती है इसका मुख्य कार्य परिपथ में विधुत धारा का बैलेंस जब बिगड़ जाता है तो उस कंडिशन में परिपथ को सप्लाई से पृथक करना होता है आसान से शब्दों में इसे ऐसे कह सकते है कि rccb का काम सर्किट में करंट को बैलेंस करना होता है।

चलिए इसको भी एक उदाहरण के द्वारा समझते है। मान लीजिए आपके पूरे घर में rccb लगा हुआ है आपका एक छोटा पांच या आठ साल का बच्चा है जिसने घर में लगें विधुत बोर्ड के सोकेट में उंगली दे दी है और उस सोकेट का स्विच भी ओन कंडिशन में है तो उस समय क्या होगा ? आपके घर की rccb तुरंत ही ट्रिप कर जायेंगी और आपका बच्चा करंट लगने से बच जायेगा। तो इस प्रकार से यह सुरक्षा प्रदान करती है। इसलिए इस प्रोटेक्शन डिवाइस को लगवाना बहुत जरूरी होता है क्योंकि बच्चों को पता नहीं होता है यदि किसी कारण वह कोई बिजली का तार पकड़ लेते है या फिर किसी विधुत बोर्ड के सोकेट में अपनी उंगली डाल देते है तो rccb उसे करंट लगने से पहले ही बचा लेगी इस तरह से आप और आपके बच्चे बिजली से सुरक्षित रहेंगे।

MCB और RCCB में अंतर

दोस्तों जैसा हमने अभी ऊपर जाना है कि mcb सिर्फ दो चीजों से सुरक्षा प्रदान करती है एक तो over load और दूसरा short circuit यानी के जब परिपथ में ओवर लोड की कंडीशन आयेगी या कहीं पर आपस में दो तारों में शाॅर्ट सर्किट हुआ हो तो इनसे ही यह प्रोटेक्शन करती है। और rccb एक ऐसी प्रोटेक्शन डिवाइस होती है जब परिपथ में करंट अनियंत्रित हो रहा हो यानी के जितना करंट फेज से आ रहा है उतना ही अगर हमें न्यूट्रल पर नहीं मिल रहा है तो उस समय यह सर्किट से सप्लाई को अलग कर देती है। यही mcb और rccb में अंतर होता है।
Er. Chand दिसंबर 02, 2021
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 हैलो फ्रेंड्स स्वागत है आपका मेरे इस ब्लोग साइट electricalengineering1994.blogspot.com पर दोस्तों आज का हमारा टोपिक है electrical je kaise bane मतलब how to become a electrical junior engineer. जेई का पद ग्रुप सी की पोस्ट में आता है जो की एक सरकारी नौकरी होती है। बहुत से स्टूडेंट्स का सपना होता है कि वे एक इंजीनियर बनें लेकिन अगर आप इंजिनियर न बनकर जूनियर इंजीनियर ही बन जाते है यह भी बहुत बड़ी बात है। ऐसा में इसलिए कह रहा हूं क्योंकि जेई की पोस्ट भी काफी माननिय होती है। 
दोस्तों इस पोस्ट में electrical je kaise bane इससेे रिलेटेड बहुत सी बातें यहां जानेंगे जैसे 
• इलैक्ट्रिकल जेई क्या होता है।
• जेई कौन बन सकता है।
• जेई का कार्य क्या होता है।
• क्विलिफिकेशन क्या होनी चाहिए।
• एग्जाम कौन-सा देना होता है।
• उम्र सीमा कितनी होती है।
• सिलेबस क्या होता है।
• इलैक्ट्रिकल जेई का स्कोप कितना है।
• ज्वाइनिंग कहा मिलती है।
• सैलरी कितनी मिलती है।

electrical je kaise bane

जेई क्या होता है

JE का पूरा नाम junior engineer होता है जिसे हिंदी में कनिष्ठ अभियंता कहते हैं। जैसा इसके नाम से ही पता चलता है कि यह एक इंजीनियर का पद है यानी तकनीकी कार्य का सम्पादन इन्ही के द्वारा होता है। जेई अपने अण्डर रखने वाला डाटा अपने सीनियर को फोरवर्ड करते हैं। जेई क्या होता है इसे आप साधारण भाषा में इस तरह भी समझ सकते है कि किसी भी डिपार्टमेंट का वह पोस्ट होता है जो टेक्निकली मदद करते हुए उस विभाग के कार्यों को आगे ले जाता है।

• इलैक्ट्रिकल जेई कौन बन सकता है

इलैक्ट्रिकल जेई वे स्टूडेंट्स बन सकते है जिन्होने इलैक्ट्रिकल इंजीनियरिंग का डिप्लोमा कोर्स किया हों आपके मन में एक सवाल आ रहा होगा कि इंजीनियरिंग की कौनसी डिग्री या डिप्लोमा कोर्स करके जेई बन सकते है तो चलिए आप को इसके बारे में भी बता देते है वे सभी छात्र और छात्राएं जेई बन सकते है जिन्होने किसी भी ब्रांच से डिप्लोमा इंजीनियरिंग की हों।

• जेई का कार्य क्या होता है

जेई एक पोस्ट होती है जिसके नाम के आगे भलें ही जूनियर शब्द लगा हो परन्तु इसका काम बहुत बड़ा और जिम्मेदारी भरा होता है। जेई जिस विभाग में भी होते है ये उस विभाग एक मजबूत हिस्सा होते है ठीक उसी प्रकार जैसे इंसान के शरीर को खड़ा रखने में रीड की हड्डी की जो मेन भुमिका होती है उसी प्रकार किसी भी विभाग को ऊंचाइयों तक पहुंचाने में एक जेई की भूमिका होती है। इनका कार्य खास और बहुत महत्वपूर्ण होता है ये सार्वजनिक कार्यों और परियोजनाओं को योजना बनाने से संबंधित डिजाइन और निर्माण करने का काम करते हैं। जब ये किसी विभाग में ज्वाइन करते है तो इनके कन्धो पर उस विभाग के सेक्शन का रिसपोन्ससिब्लिटी होता है जिसके तहत ये अपने अण्डर काम कर रहे कर्मियों द्वारा किए गए कार्य का सुपर विजन करते है और आगे के काम का पालन कैसे हो उसका सैटलमेंट भी करते हैं।

• इलैक्ट्रिकल जेई बनने के लिए क्वालिफिकेशन क्या हों

इलैक्ट्रिकल जेई बनने के लिए किसी सरकारी पाॅलिटेक्निक काॅलेज या फिर किसी प्राइवेट पाॅली टेक्निक काॅलेज से इलैक्ट्रिकल में डिप्लोमा होना अनिवार्य होता है अगर आप जेई बनना चाहते है तो आपके पास इलैक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा का सर्टिफिकेट होना जरूरी है तभी आप एक जूनियर इंजीनियर बन सकते है

• इलैक्ट्रिकल जेई बनने के लिए एग्जाम कौन-सा देना होगा

दोस्तों जेई एक ऐसी पोस्ट है जिसकी वैकेंसी हर विभाग में देखने को मिलती है इसकी सेंट्रल लेवल और स्टेट लेवल पर बहुत सी भर्तियां निकलती है। हर डिपार्टमेंट अपने स्तर के अनुसार je की वेकेंसी निकालता है जिसकी परिक्षा को पास करके उस विभाग में जेई बन सकते हैं। इलैक्ट्रिकल जेई बनने के लिए पूरे भारत में काफी सारी परिक्षायें कराई जाती है जैसे रेलवे के अन्दर RRB डिपार्टमेंट द्वारा जेई की परीक्षा कराई जाती है और SSC डिपार्टमेंट द्वारा ssc je की वेकेंसी निकलती है। राज्यों के अनुसार भी इलैक्ट्रिकल जूनियर इंजीनियर की भर्ती निकाली जाती है।

• उम्र सीमा कितनी होती है

SSC के द्वारा जेई की जो परीक्षा ली जाती है उसमें उम्र की सीमा कम से कम 18 साल और अधिकतम 32 साल रखी गई है इसके अलावा sc/st के अन्तर्गत आने वाले उम्मीदवारों को उम्र की सीमा में 5 साल की छूट मिलती है और OBC केंडिडेट को 3 साल की छूट मिलती है और PwD वाले केंडिडेट को 10 से 15 साल की छूट मिलती है। 

• सिलेबस क्या होता है

किसी भी एग्जाम को पास करने के लिए उसके सिलेबस को अच्छी तरह से पढ़ना बहुत जरूरी होता है क्योंकि इसको पढ़कर ही आप एग्जाम को क्वालिफाई कर पाओगे। सिलेबस की जानकारी देने से पहले आपको बता दूं कि जेई की परीक्षा हर डिपार्टमेंट अपने स्तर पर कराता है इसलिए हो सकता है एक दूसरे विभाग के सिलेबस में थोड़ा बहुत अन्तर हों। यहां पर में आपको ssc द्वारा लिये जाने वाले एग्जाम का सिलेबस बता रहा हूं।
SSC जेई की परीक्षा दो भागों में कराता है जिसमें CBT-1 और CBT-2 के दो पेपर होते है पेपर वन में जनरल रिजनिंग, जनरल अवेयरनेस और जनरल इलैक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के प्रश्न होते है टोटल 200 नम्बर का पेपर होता है जिनको करने के लिए 2 घंटे का समय मिलता है। सेकेण्ड पेपर में आपकी इलैक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के पूरे सिलेबस में से प्रश्नो को पूछा जाता है।

• इलैक्ट्रिकल जेई का स्कोप कितना है

यह एक ऐसा फील्ड है जिसके अन्दर स्कोप की अपार संभावनाएं है हकीकत यह भी है कि जितना कोम्पेटिशन दूसरे क्षेत्रो में है इसमें नहीं है। क्योंकि जेई की जितनी भी वेकेंसी निकलती है उसमें हर कोई अप्लाई नहीं कर सकता इसमें वही स्टूडेंट्स अप्लाई कर सकते हैं जिन्होंने इलैक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की हों यानी इस फील्ड में जाॅब की पूरी गारंटी रहती हैं।

• इलैक्ट्रिकल जेई को सैलरी कितनी मिलती है

SSC के माध्यम से जो छात्र जेई की पोस्ट पर ज्वाइन करते है उनको 40 हजार रुपए स्टार्टिंग में मिलते है इसके बाद साल के हिसाब से इनकी सैलरी बढ़ती जाती है और इसके साथ जेई को महंगाई भत्ता मतलब DA, चिकित्सा भत्ता, मकान भत्ता और वाहन भत्ता के साथ अन्य विशेष भत्ते भी मिलते हैं।

दोस्तों आज की इस पोस्ट में बस इतना ही उम्मीद है कि आपको यह जानकारी पसंद आई होगी अगर आपको हमारी यह electrical je kaise bane की जानकारी अच्छी लगी है तो हमें कमेंट करके जरूर बताइए और साथ ही साथ इसे अपने इलैक्ट्रिकल दोस्तों के साथ शेयर करना ना भूले।

Er. Chand नवंबर 30, 2021
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 Corona effect क्या होता है

जब भी आप किसी ट्रांसमिशन लाइन या ट्रांसमिशन टावर के पास से गुजरते होंगे तो आपको एक आवाज सुनाई दी होगी इस आवाज को हिजिंग साउण्ड कहते हैं इस आवाज के आने को ही corona effect कहा जाता है आज हम इस लेख के माध्यम से जानेंगे कि कोरोना इफैक्ट क्यों होता है और साथ ही साथ पावर सिस्टम का हमारा बहुत महत्वपूर्ण टोपिक इसमें पढ़ेंगे जैसे कोरोना क्या होता है, कोरोना का फोर्मेशन कैसा होता है और ये किन किन फैक्टर पर निर्भर करता है और corona effect के लाभ और हानियां क्या क्या है।

यह प्रश्र आपके इलैक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के इंटरव्यू के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इस टोपिक में से जितनी भी ट्रांसमिशन लाइन के प्रोजेक्ट वाली कम्पनियों होती है वो इस टोपिक में से ही अकसर प्रश्नो को पुछा करती है।

कोरोना इफैक्ट क्या होता है

इसे हम एक आसान सी भाषा में समझते है अगर ट्रांसमिशन लाइन में ऐसी घटना हों जिसमें आपको violet glow देखने को मिलें या फिर transmission line से हिजींग साउण्ड सुनाई दे तो इसी घटना को कोरोना इफैक्ट कहते हैं। 

Corona effect in electrical in hindi


अब आपके मन में एक सवाल आ रहा होगा कि कोरोना इफैक्ट क्यों होता है और कैसे होता है इसके बारे में आगे बताया गया है तो चलिए जान लेते है कि आखिर ये इफैक्ट क्यों होता है।

ट्रांसमिशन लाइन की जो तार होती है वह हवा में लटकी रहती है मतलब कि जो transmission line की कंडक्टर होती है उसके चारों ओर वातावरण में हवा रहती है। यहां पर यह एयर एक डाइलैक्टिक मिडियम की तरह व्यवहार करती है यानी के यह एक इंसुलेटर की भांति काम करती है। लेकिन प्रैक्टिकली जो ये वायु होती है वह परफैक्ट इंसुलेटर नहीं होती है क्योंकि हवा के अन्दर काफी सारी अल्ट्रा वायलेट किरणें मौजूद होती है जिसके कारण इसमें आयनित कण उपस्थित रहते है जैसे फ्री इलैक्ट्रोन, पोजिटिव आयन और न्यूट्रल मोलिक्यूल इसमें होते हैं।

इसी वजह से एयर एक परफेक्ट विधुत रोधी नहीं होती है वायु की डायलेक्ट्रीक स्ट्रैंथ नाॅर्मल दाब और ताप पर 30 kv/cm होती है यानी अगर एक सेंटीमीटर वायु में वोल्टेज 30 kv/cm से अधिक वोल्टेज पास होती है तो हवा आयनाइज्ड हों जाती है उसके अंदर से करंट बहने लगती है इसके एयर का ब्रेकडाउन कहते हैं।

जो हाई वोल्टेज की लाइन होती है उनके चारों ओर इलैक्ट्रिक फील्ड होता है इस फील्ड की वजह से कंडक्टर में पोटेंशियल ग्रेडिएंट की कंडीशन ऊत्पन्न हो जाती है। मान लीजिए एक 132kv की लाइन है तो हाई वोल्टेज होने के कारण कंडक्टर के आजू बाजू भी कुछ वोल्टेज होंगी, जैसे जैसे चालक से दूर जायेंगे वैसे वैसे वोल्टेज कम होती जायेगी, तो इस इस दूरी के हिसाब से वोल्टेज का कम होना ही पोटेंशियल ग्रेडिएंट कहलाता हैं।

मान लीजिए हमारे पास 132kv लाइन की दो कंडक्टर है जिनके चारों ओर इलैक्ट्रिक फील्ड है जिसकी वजह से पोटेंशियल ग्रेडिएंट की कंडीशन ऊत्पन्न होगी और लाइन के आजू बाजू हवा में फ्री इलैक्ट्रोन और आयन मौजूद होंगे जैसे ही इस हाई वोल्टेज लाइन में 132kv की सप्लाई आती है तो कंडक्टर के आस पास की एयर आयनाइज्ड हों जाती है यानी के जो हवा में फ्री इलैक्ट्रोन होते है वो आपस में टकराने लगते है और उनमें आर्क उत्पन्न हो जाती है (यही आर्क हमें वायलेट ग्लो के रूप में दिखाई देती है) और इसी के कारण हिजींग साउण्ड ऊत्पन्न हो जाता है और कंडक्टर में वाइर्ब्रेशन भी होने लगता है यह घटना बरसात के मौसम में अधिक देखने को मिलती हैं क्योंकि बारिस के दिनों में हवा में नमी की मात्रा बढ़ जाती है इसी कारण बरसात के दिनों में कोरोना इफैक्ट ज्यादा देखने को मिलता है।

Corona effect से संबंधित दो टर्म बहुत महत्वपूर्ण होते है जिनके बारे में जानना जरूरी होता है पहला होता है disruptive critical voltage यह वह न्यूनतम वोल्टेज होता है जिस पर कंडक्टर के आस पास की एयर आयनाइज्ड हों जाती है और दूसरा होता है visual critical voltage यह वह न्यूनतम वोल्टेज होता है जिस पर कोरोना इफैक्ट ग्लो करता है यानी ट्रांसमिशन लाइन के कंडक्टर की ओर देखने पर वाइलेट ग्लो दिखाई देने लगता है।

कोरोना इफैक्ट को प्रभावित करने वाले फैक्टर

• सप्लाई वोल्टेज

कोरोना का इफैक्ट 30kv से कम की ट्रांसमिशन लाइन में देखने को नहीं मिलता है यह प्रभाव 30kv से ऊपर की लाइनों में ही देखा जाता है क्योंकि जब सप्लाई वोल्टेज ट्रांसमिशन लाइन में तीस केवी से अधिक हो जाती है तो कंडक्टर के आस पास की एयर का ब्रेकडाउन हो जाता है जिससे चालक के आजू बाजू की वायु आयनाइज्ड हों जाती है अब जैसे जैसे वोल्टेज बढ़ती जाती है वैसे वैसे कोरोना इफैक्ट भी बढ़ता जाता है।

• सप्लाई आवृत्ति

ट्रांसमिशन लाइन में जो सप्लाई होती है उसकी आवृत्ति कोरोना लोस के समानुपाती होती है यानी के जितनी ज्यादा आवृत्ति को बढायेगे उतना ही अधिक transmission line के अन्दर corona effect ज्यादा होगा।

• चालकों के बीच की दूरी

सिरोपरी लाइनों में प्रयोग कियें जाने वाले चालकों के बीच की दूरी कोरोना इफैक्ट के व्यूत्क्रमानुपाती होती है इसका मतलब यह हुआ कि कंडक्टर के बीच में जितनी अधिक दूरी होगी कोरोना इफैक्ट उतना ही कम होगा और यदि चालकों के बीच दूरी कम रखी जायेगी तो corona effect भी उतना ही अधिक होगा।

वातावरण पर

कोरोना इफैक्ट वातावरण पर भी बहुत अधिक निर्भर करता है बरसात के मौसम में कोरोना इफैक्ट अधिक देखने को मिलता है जबकि गर्मी के दिनों में इसका प्रभाव कम दिखता है क्योंकि बारिश के मौसम में हवा में नमी ज्यादा होती है जिसकी वजह से वायु जल्दी आयनाइज्ड हों जाती है जिससे हिजींग साउण्ड अधिक सुनाई देता है। और गर्मी के मौसम में हवा में नमी की मात्रा कम होती है जिससे वायु कम आयनाइज्ड होती है जिससे हिजींग साउण्ड कम आती है।

कोरोना इफैक्ट की हानियां

• कोरोना की वजह से पावर लोस होता है जो कि हिट, लाइट, साउण्ड और गैस के रूप में व्यर्थ होती है और इसके कारण ट्रांसमिशन लाइन की क्षमता भी कम हो जाती है।

• कोरोना इफैक्ट की वजह से ओजोन गैस बनती है जिससे कंडक्टर पर कार्बन बनने लगता है और transmission line के चालक की life भी कम हो जाती है।

• ट्रांसमिशन लाइन में जो सप्लाई होती है वह एक शुद्ध ए सी सप्लाई होती है लेकिन कोरोना इफैक्ट के कारण इसमें अन साइनोसोडियल सिग्नल ऊत्पन्न हो जाते हैं।

Corona effect के लाभ

कोरोना इफैक्ट के कारण कंडक्टर के आस पास की एयर एक चालक की तरह काम करने लगती है जिससे कंडक्टर का क्षेत्रफल एक तरह से बढ़ जाता है। यदि कभी लाइन के अन्दर किसी कारणवश बहुत अधिक करंट बहने लगे तो उस कंडिशन में कंडक्टर खराब होने से या टूटने से बच जाता है। यह कोरोना इफैक्ट की एक अच्छी बात भी होती है।

कोरोना इफैक्ट को कम करने के तरीके

• ट्रांसमिशन लाइन में प्रयोग किये जाने वाले कंडक्टर का साइज बढ़ाकर इस प्रभाव को कम किया जा सकता है।

• transmission line में बंडल कंडक्टर का उपयोग करके भी कोरोना इफैक्ट को काफी हद तक नैग्लेट किया जा सकता है।

• corona effect को कम करने का एक तरीका और है इसे corona ring का प्रयोग करके भी कर कर सकते हैं।


Er. Chand नवंबर 27, 2021
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 On grid solar system क्या होता है

जब सोलर प्लांट पावर ग्रीड या ट्रांसफॉर्मर से आने वाली विधुत सप्लाई से जुड़ा हो तो ऐसे सिस्टम को on grid solar system कहते हैं। इसे और दूसरे नाम से भी जाना जाता है जैसे ग्रीड टाइड सोलर सिस्टम इस नाम से भी इसको जानते हैं।
हैलो फ्रेंड्स आज हम इसी के बारे में बात करेंगे कि ओन ग्रीड सोलर सिस्टम क्या होता है यह कैसे काम करता है और इस सिस्टम को लगाने से पहले हमें किन किन बातों का ध्यान रखना होता है और इस सोलर सिस्टम के क्या क्या लाभ और हानियां है। अगर आप भी on grid solar system लगवाना चाहते है तो आपको कुछ बातों का ध्यान जरूर रखना चाहिए।

अगर आप ओन ग्रीड सोलर सिस्टम लगवा रहे है यह तभी काम करेगा जब आपके घर का पावर सप्लाई किसी ग्रीड या परिणामित्र से जुडा हों। कहने का मतलब यह है कि अगर आपके घर में विधुत सप्लाई नहीं आ रही है तब आप इस सोलर सिस्टम को नहीं लगवा सकते हैं। यह सिस्टम तभी फायदेमंद होता है जब आपके क्षेत्र में बिजली सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक आती हों। इस सिस्टम को तभी लगवाना चाहिए जब आप बिजली बिल को कम करना चाहते हों।

On grid solar system कैसे काम करता है

जब सूर्य की किरणें सोलर पैनल पर गिरती है तो इन किरणों के सोलर प्लेट पर गिरने से डी सी सप्लाई जेनरेट होती है लेकिन हमारे घरों में जितने भी उपकरण लगें होते है जैसे बल्ब, फैन, कूलर, एयर कंडीशनर, फ्रिजर, हिटर और वाशींग मशींन ये सब ए सी सप्लाई के द्वारा चलते हैं। तो हमें एक ऐसा डिवाइस चाहिए होता है जो इस डी सी सप्लाई को ए सी सप्लाई में कन्वर्ट कर दें। इसके लिए एक इन्वर्टर लगाया जाता है इसमें जिस इंवर्टर का प्रयोग करते है उसे ग्रीड टाइड इंवर्टर कहते हैं। सोलर पैनल से आने वाली डी सी सप्लाई को ये इंवर्टर ए सी सप्लाई में बदल देता है और ये सप्लाई आगे लगें स्विच बोर्ड में जाती है जहां पर सेफ्टी यन्त्र जैसे सर्किट ब्रेकर वगैरा लगें होते हैं।
On grid solar system kya hai


यहां से सप्लाई दो भागों में बट जाती है। एक लाइन यहां से सप्लाई की घरों में लगे लोड की ओर जाती है और दूसरी लाइन सप्लाई की नैट मीटर से होते हुए ग्रीड की ओर जाती है। नैट मीटर के दो काम होते है पहला जो घरों के कनैक्शन होते है वह किसी न किसी ग्रीड की सप्लाई से कनैक्ट होता है तो यह नैट मीटर उस ग्रीड की घरों में कितनी बिजली खर्च होती है उसका हिसाब रखता है और दूसरा सोलर पैनल के द्वारा बनने वाली कितनी बिजली ग्रीड को सप्लाई की जा रही है उसका भी रिकॉर्ड रखता है।

On grid solar system के लाभ

• इस सोलर सिस्टम को लगवाने का सबसे बड़ा फायदा यह हो जाता है कि जो हमारा महिने का बिजली का बिल आता है वह कम हो जाता है। क्योंकि इस सिस्टम में सप्लाई को जेनरेट भी करते हैं और साथ ही साथ ग्रीड को सप्लाई भी करते हैं।

• जैसा कि हम जानते है कि इस सोलर सिस्टम में बैटरी का प्रयोग नहीं होता है जिसके कारण इस प्लांट की मरम्मत करना आसान हो जाता है।

• इस सोलर पैनल की लगवाने की किमत भी बहुत कम होती है ओफ ग्रीड सोलर सिस्टम और हाई ग्रीड सोलर सिस्टम की तुलना में।

ओन ग्रीड सोलर सिस्टम की हानियां

• हमें पता है कि on grid solar system सीधे ही ग्रीड से कनैक्ट होता है। यदि किसी कारणवश ग्रीड से आपके घर में कोई विधुत सप्लाई नहीं आ रही है तो उस कंडिशन में यह सोलर सिस्टम काम नहीं करता है चाहे आपके सोलर पैनल पर सूर्य की कितनी भी अच्छी किरणें क्यों न गिर रही हों।

• इस प्लांट में किसी भी तरह की बैटरी का इस्तेमाल नहीं करते है जिसके कारण इसमें कोई बैकअप नहीं होता है। यही इस सिस्टम की सबसे बड़ी खामियां होती हैं।

Er. Chand नवंबर 25, 2021
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 transformer ki maintenance 

पावर ग्रीड और सब स्टेशन के अन्दर बड़े बड़े परिणामित्र लगें होते है। सब स्टेशन में सभी उपकरणों में ट्रांसफॉर्मर सबसे महंगा यन्त्र होता है इसलिए इसकी देखभाल करना बहुत ही महत्वपूर्ण हो जाता है। आज हम इस लेख में transformer ki maintenance के बारे में ही जानेंगे।
ट्रांसफॉर्मर की मरम्मत करने के काफी सारे शेड्यूल होते है जैसे घंटों के बेस पर मेंटिनेंस करना, रोजाना के बेस पर, महिने के बेस पर, तीन महीने के बेस पर, अर्ध वार्षिक बेसिस पर और वार्षिक बेसिस पर इन सभी शेड्यूल के बेसिक पर transformer ki maintenance की जाती है। नीचे इन सभी शेड्यूल के बारे में विस्तार से जानकारी प्राप्त करेंगे कि कैसे इन शेड्यूल में ट्रांसफॉर्मर की मरम्मत की जाती है।

transformer ki maintenance


• घंटों के बेसिस पर (hourly basis)

पावर ग्रीड या सब स्टेशन के अन्दर जो ओपरेटर होते है वो हर एक घंटे बाद परिणामित्र की निम्न चीजों की देख रेख करते है और उन सभी अपने रजिस्टर में लिखते है। जैसे ट्रांसफॉर्मर की प्राइमरी साइड में कितना भार जुड़ा हुआ है और transformer की आउटपुट वोल्टेज को चैक करते है। तिसरी चीज इस शेड्यूल में तेल का तापमान चैक करते है।

इसे भी पढ़ें : Transformer kya hota hai in hindi

• रोजाना बेसिस पर (daily basis) 

इस शेड्यूल में सबसे पहले यह चैक करते है कि ट्रांसफॉर्मर टैंक से कहीं तेल तो नहीं निकल रहा है यदि टैंक से कहीं को तेल का रिसाव होता है तो इसे जल्दी ही ठीक किया जाता है। फिर इसमें परिणामित्र की काॅयल का ताप देखा जाता है कि वह नाॅर्मल है या नहीं। इसका पता ट्रांसफॉर्मर के मार्सिलिंग बाॅक्स में दो चीजों को देखने से पता चलता है। पहला है वाइंडिंग टेम्प्रेचर इंडिकेटर और दूसरा है ओयल टेम्प्रेचर इंडिकेटर इन दोनों इंडिकेटर की मदद से वाइंडिंग और तेल के तापमान पता चल जाता है। तिसरी चीज इस शेड्यूल में कंजर्वेटर टैंक में तेल का लेवल चैक किया जाता है और चौथी चीज बुसिंग में ओयल का स्तर चेक करते है फिर इसी के हिसाब से transformer ki maintenance की जाती है।

• महिने वार (monthly basis) 

इस शेड्यूल में सबसे पहले ट्रांसफॉर्मर की ब्रिदर को चैक करते है। ब्रिदर कंजर्वेटर टैंक से कनेक्ट होती है इसमें सबसे नीचे के हिस्से में तेल के लेवल को चैक किया जाता है। ब्रिदर के ऊपरी हिस्से में निले रंग का सिलिका जेल भरा होता है इसका काम तेल से नमी को निकालना होता है। जब इसका रंग गुलाबी हो जाता है तो ये खराब हो जाता है इसकी नमी को ऐब्जोर्ब करने की ताकत खतम हो जाती है। ब्रिदर के अन्दर फिर दुसरा सिलिका जेल डाला जाता है या इसको अधिक तापमान पर गर्म करके दोबारा से प्रयोग में लाया जा सकता है। दूसरी चीज इसमें बुकोल्ज रिले में ओयल के लेवल को चैक करते है।

• तीन महीने पर (three month basis) 

हर तीन महीने बाद ट्रांसफॉर्मर की बुसिंग को चैक करना होता है क्योंकि इनमें गंदगी धूल मिट्टी के कण बैठ जाते है जिसकी वजह से बुसिंग की विधुतरोधी ताकत कम हो जाती है और इनका ब्रेकडाउन होने का खतरा बढ़ जाता है इसलिए बुसिंग की हर तीन महीने बाद मरम्मत करना जरूरी होता है।
दूसरी चीज इस शेड्यूल में transformer oil की टेस्टिंग की जाती है जिसे ओयल ब्रेकडाउन वोल्टेज टेस्ट कहते हैं। और हर तीन महीने बाद जितने भी बड़े परिणामित्र होते है उनके अन्दर जो कूलिंग फैन लगें होते है जो मैन्यूवली और ओटोमेटिक दोनों तरिके से काम करते हैं। यह फैन transformer की वाइंडिंग को ठंडा करने का काम करते है इसलिए इनकी काम करने की पर्फोमेंस को भी चैक किया जाता है।

• अर्ध वार्षिक बेसिस पर (half yearly basis) 

हर छं महिने बाद ट्रांसफॉर्मर ओयल की सम्पूर्ण टेस्टिंग की जाती है जिसमें तेल में मोजूद अम्लता को चैक किया जाता है क्योंकि यदि तेल अधिक अम्लीय होगा तो तेल में जल जल्दु मील जाता है फिर इसमें तेल में मोजूद sludge content को देखते है क्योंकि यह ओयल को जल्दी ठण्डा नहीं होने देते है इसी प्रकार से और भी बहुत सी तेल की टेस्टिंग की जाती है।

• वार्षिक बेसिस पर (yearly basis)

transformer ki maintenance के इस शेड्यूल में ग्रीड या सब स्टेशन में जो ट्रांसफॉर्मर होते है उसकी पूरी तरह से मेंटिनेंस की जाती है। जिसके लिए सब स्टेशन को कुछ घंटों के लिए शड डाउन किया जाता है। इसमें बुकोल्ज रिले के मैकेनिकल फंक्शन को चैक किया जाता है देखा जाता है कि इसके ट्रिपिंग और अलार्म कोन्टैक्ट अच्छे से काम कर रहे है या नहीं। और इस शेड्यूल में परिणामित्र का मार्सिंग बाॅक्स और उसमें लगें इंडिकेटर को अच्छे से साफ किया जाता है और दखा जाता है कि ये सही से चल रहे है या नहीं चल रहे। और कूलिंग फैन को भी चैक किया जाता है कि वे हिल तो नहीं रहें या फिर ज्यादा आवाज तो नहीं कर रहे और ट्रांसफॉर्मर का इंसुलेशन प्रतिरोध को भी चैक किया जाता है और परिणामित्र अर्थिंग भी चैक की जाती है और सबसे बाद में यदि transformer की बाॅडी की सर्फेश खराब हो गई है या उसका पेंट खराब हो गया हो तो उसकी बाॅडी पर दौबारा से पेंट किया जाता है।

तो यही था transformer ki maintenance का पूरा लेखा जोखा जो आपको इस छोटी सी जानकारी में मैंने बताया है उम्मीद करता हूं कि आप सब को यह पोस्ट अच्छी लगी होंगी। आप की तरह और भी आपके ऐसे इलैक्ट्रिकल मित्र होंगे जिन्हें ट्रांसफॉर्मर की मरम्मत के बारे में पता नहीं होगा तो आप इस पोस्ट को अपने उन मित्रो के साथ भी शेयर जरूर किजिए।
Er. Chand नवंबर 23, 2021
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 सड़क पर लगें ब्रेकरों द्वारा बिजली कैसे बनायी जाती है।

हैलो दोस्तो आज मैं आपको बिजली बनाने के नये स्त्रौत के बारे में बताने जा रहा हूं। तों इस खास स्त्रौत का नाम है सड़क पर लगें ब्रेकरों द्वारा बिजली कैसे बनयी जाती है। जी हां दोस्तों इस इलैक्ट्रिसिटी उत्पादन के नये स्त्रौत का आज बहुत देशों के अन्दर प्रयोग किया जा रहा है तो आज हम इसी तरिके के बारे में जानेंगे कि सड़क पर लगें ब्रेकरों द्वारा बिजली कैसे बनती जाती है।


यह एक बहुत ही आसान और किफायती तरिका है जिससे बिजली का उत्पादन किया जा सकता है। इस तरिके मैं सड़कों पर जहां ब्रेकर लगें होते है उनके स्थान पर घूमने वाले लौहे के पहिए लगा दिये जाते हैं और इन पहियों से जेनरेटर की साफ्ट को जोड़ दिया जाता है। जैसे ही इनके ऊपर से कार या बस गुजरती है तो ये घूमने लगते है इनके घूमने से जेनरेटर की साफ्ट भी घूमने लगती है इस प्रकार इस स्त्रौत के द्वारा विधुत बनने लगती है।

इस स्त्रौत का उपयोग ज्यादातर जहां पुल बने होते है वहां किया जाता है क्योंकि पुलों पर इस स्त्रौत के उपकरणों को लगाना आसान होता है। पुल पर इसे बिना किसी खुदाई के प्लेस किया जा सकता है और इसे ऐसी सड़कों पर लगाना अधिक फायदेमंद होता है जिन रास्तों पर वाहनों का आना जाना लगातार बना रहता है। क्योंकि जितने ज्यादा वाहन इन ब्रेकरों के ऊपर से गुजरते है बिजली का उत्पादन उतना ही अधिक होगा।

सड़कों पर ब्रेकरों द्वारा बिजली बनाने में एक बात का खास ख्याल रखा जाना चाहिए। इस स्त्रौत को हमेशा ऐसी सड़कों पर लगाना चाहिए जहां पर गाड़ीयां एक ही दिशा में चलती हों तभी इसके द्वारा बिजली का उत्पादन अच्छा होता है वरना दोनों और से चलने वाली सड़कों पर इससे बिजली बनाने में काफी कठिनाई आती है।

ब्रेकरों द्वारा बनी बिजली का उपयोग

इस स्त्रौत से विधुत का उत्पादन करना बहुत आसान होता है यह तो आपने जान लिया। लेकिन इस स्त्रौत से बिजली की पैदावार बहुत कम मात्रा में होती है इसलिए इसका उपयोग ज्यादा बड़े सैक्टरो में नहीं किया जा सकता है। इस विधुत की मात्रा कम होने के कारण इसका उपयोग, जहां इस स्त्रौत को लगाया जाता है वही पर रात के समय लाइटों को जलाने में किया जाता है।
Er. Chand नवंबर 21, 2021
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 सिंगल फेज इंडक्शन मोटर प्रश्र उतर

प्रशन-1 सिंगल फेज इंडक्शन मोटर का शक्ति गुणांक कम क्यों होता है ?

उत्तर- अधिक मेग्नैटायजिंग करंट के कारण, सिंगल फेज इंडक्शन मोटर का शक्ति गुणांक कम होता है।

प्र-2 थ्री फेज इंडक्शन मोटर की अपेक्षा, सिंगल फेज इंडक्शन मोटर चलते समय अधिक ध्वनि ऊत्पन्न क्यों करती है ?

उत्तर- सिंगल फेज की पल्सेटिंग सप्लाई वोल्टेज से ऊत्पन्न टाॅर्क द्वारा सतत स्थिर यांत्रिक शक्ति प्रदान करने के कारण, चलतें समय अधिक शोरगुल करती है।
थ्री फेज मोटर मे थ्री फेज घूर्णी चुम्बकीय क्षेत्र ऊत्पन्न होता है, जिससे लगातार एक समान बलाघूर्ण ऊत्पन्न होता है इसलिए यह चलते हुए कम आवाज करती है।

प्र-3 आप किसी विभक्त कला एकल कला प्रेरण मोटर के घूमने की दिशा को किस प्रकार परिवर्तित करेंगे या विपरीत करेंगे ?

एकल कला प्रेरण मोटर के स्टेटर पर स्थापित दोनों वाइंडिंगों (मुख्य वाइंडिंग या सहायक वाइंडिंग) में से किसी एक सिरों की ध्रुवता को आपस में बदलकर, मोटर के घूमने की दिशा परिवर्तित करेंगे।

प्र-4 क्या छादित चुम्बकीय ध्रुव प्ररूपि सिंगल फेज इंडक्शन मोटर के घूमने की दिशा को बदला जा सकता है ?

इस मोटर की दिशा को नहीं बदला जा सकता है क्योंकि इसमें इस प्रकार का कोई जुगाड नहीं होता है।

प्र-5 छादित पोल प्ररूपि इंडक्शन मोटर किस दिशा में घुमती है ?

यह मोटर छादित यानी शेडेड पोल से अन शेडेड पोल की ओर घूमती है।

प्र-6 सिंगल फेज इंडक्शन मोटर की कहां जरूरत होती है ?

इस मोटर की काफी सारी स्थानों पर जरूरत पड़ती है जैसे-
• जहां पर एक अश्व शक्ति से कम रेटिंग हो
• छोटे आकार के पोर्टेबल उपकरणों को चलाने में
• और जहां थ्री फेज सप्लाई उपलब्ध न हो।
• कुछ ऐसी जगहों पर भी जहां दक्षता का अधिक महत्व न हों।

प्र-7 उधौगों में कौनसी मोटर सबसे अधिक उपयोग की जाती है और क्यों ?

• आज के समय में पूरी दुनिया के अन्दर ए सी स्काइरल केज रोटर टाइप इंडक्शन मोटर सबसे ज्यादा प्रयोग की जाती है क्योंकि इसमें दूसरी मोटरों की अपेक्षा बहुत सारे अच्छे गुण होते हैं।
• इसकी संरचना बहुत ही आसान होती है।
• यह एक सेल्फ स्टाॅर्ट मोटर होती है।
• इसमें ऊत्पन्न बलाघूर्ण शुटेबल होता है।
• यह मोटर सर्पि वलय और ब्रश से मुक्त होती है।
• बाजार में आसानी से मिल जाती है।

प्र-8 आवासीय कार्यों में कौनसी मोटर सर्वाधिक प्रयोग की जाती है और क्यों ?

आजकल सम्पूर्ण विश्व के अन्दर घरेलू कामों में परमानेंट केपेसिटर सिंगल फेज इंडक्शन मोटर बहुत अधिक प्रयोग होती है क्योंकि इस मोटर के अन्दर काफी सारे शुभ गुण होते हैं।
• आकार में सुविधाजनक
• संरचना में सादी
• स्वचालित और स्वप्रवर्तित
• उच्च बलाघूर्ण वाली
• अनुरक्षण और मरम्मत किमत बहुत कम
• बाजार से कम किमत पर सुगमता से उपलब्ध
• स्लिप रिगं और ब्रश लेस

प्र-9 संधारित्र प्ररूपि सिंगल फेज इंडक्शन मोटर में विकसित टाॅर्क अधिक क्यों होता है ?

• चूंकि स्टेटर पर स्थापित मुख्य कुण्डलन की धारा और सहायक वाइंडिंग की धारा के बीच का कोण अधिक होता है, इसलिए मोटर में बनने वाला बलाघूर्ण भी अधिक होता है।

प्र-10 उच्च आरम्भिक बलाघूर्ण के कार्यों में रिपल्शन इंडक्शन मोटर की अपेक्षा, कैपेसिटर इंडक्शन मोटर को अधिक पसंद क्यों किया जाता है ?

• इसका मेन रिजन यह है कि संधारित्र इंडक्शन मोटर की अपेक्षा, रिपल्शन इंडक्शन मोटर की प्रारंभिक लागत अधिक साथ साथ इसकी अनुरक्षण और मरम्मत की लागत भी अधिक होती है, क्योंकि इस मोटर के अन्दर कम्यूटेटर और ब्रश होते है जिससे इसकी कीमत बढ़ जाती है। इसलिए रिपल्शन मोटर को कम और कैपेसिटर मोटर को अधिक पसंद किया जाता है।

प्र-11 सिंगल फेज इंडक्शन मोटर में सहायक वाइंडिंग का क्या काम होता है ?

इस वाइंडिंग का प्रमुख काम, मोटर की शुरुआत के समय में मुख्य वाइंडिंग के साथ मिलकर, रोटेटिंग मेग्नेटिक फील्ड ऊत्पन्न करना होता है ताकि रोटर पर बलाघूर्ण लागू हो सकें। जब मोटर की स्पीड सिंक्रोनस स्पीड की सत्तर प्रतिशत तक पहुंच जाती है, तब इस वाइंडिंग को अपकेन्द्री स्विच द्वारा अलग कर दिया जाता है।

प्र-12 क्या होगा यदि एकल कला प्रेरण मोटर में लगा अपकेन्द्री स्विच खुलने में असफल हो जायें ?

• ऐसा होने पर मोटर के स्टेटर पर लगी सहायक वाइंडिंग जलकर राख हो जायेंगी, क्योंकि इस वाइंडिंग की प्रतिबाधा बहुत कम होता है जिससे इसमें बहुत अधिक धारा बहेगी और ये जलकर नष्ट हो जाती है।

प्र-13 प्रतिरोध स्टार्ट स्पिलिट फेज इंडक्शन मोटर में विशेष कमी क्या है ?

इस मोटर में सहायक वाइंडिंग पतले तारों और कम टर्न की होती है यानी मेन वाइंडिंग की अपेक्षा इसका प्रतिरोध अधिक होता है, इसलिए इसमें धारा घनत्व उच्च होता है। जिसके कारण यह बहुत जल्दी गर्म हो जाती है। यदि यह मोटर स्टार्ट होने में पांच सेकेंड से ज्यादा समय लेती है, तो इस मोटर की आरम्भिक कुण्डलन या सहायक वाइंडिंग जल कर नष्ट हो जाती है।
सिंगल फेज इंडक्शन मोटर प्रश्र उतर

प्र-14 प्रतिरोध विभक्त कला प्ररूपि प्रेरण मोटर में उत्पन्न आरम्भिक बलाघूर्ण न्यून क्यों होता है ?

• चूंकि प्रतिरोध विभक्त कला इंडक्शन मोटर में स्टेटर पर स्थापित मुख्य कुण्डलन की धारा और सहायक वाइंडिंग की धारा के बीच का कोण बहुत कम होता है, इसलिए इस मोटर में ऊत्पन्न होने वाला स्टार्टिंग टाॅर्क भी कम होता है।

प्र-15 क्या विधुत सप्लाई सिरों की पोलैरिटी को परस्पर बदलकर किसी भी सिंगल फेज इंडक्शन मोटर के घूमने की दिशा को बदला जा सकता है ?

• नहीं बदला जा सकता, क्योंकि ऐसा करने से स्टेटर पर लगी दोनों वाइंडिंग के टर्मिनल की ध्रुवता बदल जाती है, जबकि मोटर के घूमने की दिशा को बदलने के लिए केवल दोनों में से एक कुण्डली के सिरों की ध्रुवता आपस में परिवर्तित होनी चाहिए।

प्र-16 स्थैतिक चुम्बकीय क्षेत्र, स्पन्दनीय चुंबकीय क्षेत्र और रोटेटिंग मेग्नेटिक फील्ड में क्या अंतर है ?

डी सी सप्लाई के कारण ऊत्पन्न होने वाला चुंबकीय क्षेत्र, स्थैतिक चुंबकीय क्षेत्र कहलाता है। इसमें वाइंडिंग के सिरों पर निर्मित पोलेरिटी एक समान रहती है। सिंगल फेज ए सी सप्लाई के द्वारा ऊत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र, पल्सेटिंग मैगनेटिक फील्ड कहलाता है इसमें वाइंडिंग के सिरों की ध्रुवता समय के साथ बदलती रहती है और थ्री फेज सप्लाई से ऊत्पन्न क्षेत्र, घूर्णी चुम्बकीय क्षेत्र होता है जो सिंक्रोनस स्पीड पर घूमता है जिसकी गति का पता लगाने के लिए निम्न सूत्र का उपयोग किया जाता है।
 
           Ns = 120f/p.  r.p.m



Er. Chand नवंबर 17, 2021
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 कैपेसिटर स्टार्ट इंडक्शन मोटर (capacitor start induction motor)

कैपेसिटर स्टार्ट इंडक्शन मोटर एक ऐसी मोटर होती है जिसमें प्रतिरोध के स्थान पर स्टेटर की स्टार्टिंग वाइंडिंग के श्रेणी में अपकेन्द्री स्विच के साथ स्टार्टिंग कैपेसिटर जुड़ा रहता है, इसलिए इसे कैपेसिटर स्टार्ट इंडक्शन मोटर कहते हैं। इस मोटर के स्टेटर के सहायक परिपथ में जुड़े आरम्भिक संधारित्र के कारण ही इसमें फेज विभाजन स्थापित होता है, जो मेन सर्किट की मेन वाइंडिंग करंट और सहायक सर्किट की स्टार्टिंग वाइंडिंग करंट में फेज डिफरेंस ऊत्पन्न कर देता है, जिससे मोटर में रोटेटिंग मेग्नेटिक फील्ड ऊत्पन्न हो जाता है, जो मोटर के रोटर पर आरम्भिक टाॅर्क लागू करता है और रोटर घूमने लगता है। तुरन्त बाद ही रोटर की गति के कारण, उत्पादित अपकेन्द्री बल से अपकेन्द्री स्विच प्रचालित होकर, स्टेटर के सहायक परिपथ को अलग कर देता है और मुख्य परिपथ ज्यों का त्यों कायम रहने के कारण मोटर लगातार चलती रहती है।
कैपेसिटर-स्टार्ट-इंडक्शन-मोटर


यदि कैपेसिटर स्टार्ट इंडक्शन मोटर में सेंट्रिफ्यूगल स्विच का उपयोग न किया जाए, तो सहायक परिपथ मोटर की घूमने की अवस्था में भी कनैक्ट रहेगा। ऐसी अवस्था में वह स्थायी संधारित्र प्ररूपि इंडक्शन मोटर कहलायेगी, जिसका प्रयोग आजकल छत के पंखों में होता है।

कैपेसिटर स्टार्ट इंडक्शन मोटर के सामान्य गुणधर्म

• साइज या क्षमता - 1/8 hp से 1 hp तक
• स्टाॅर्टिंग टाॅर्क - उच्च होता है
• आरम्भिक धारा - पूर्ण भार धारा की दो गुनी
• आरम्भिक अवस्था - सेल्फ स्टाॅर्ट
• गति या चाल - स्थिर यानी एक समान गति
• गति नियंत्रण - एक मात्र वोल्टेज नियंत्रण द्वारा
• शक्ति गुणांक - उच्च 0.7 से 0.9 तक, हमेशा पश्चगामी
• अनुरक्षण किमत - बहुत कम
कैपेसिटर स्टार्ट इंडक्शन मोटर का आरंभिक बलाघूर्ण प्रतिरोध स्टार्ट इंडक्शन मोटर की अपेक्षा लगभग 2.5 गुणा और फुल लोड टाॅर्क का 3.5 से 4.5 गुना होता है।

अनुप्रयोग -

औधौगिक क्षेत्र में इस मोटर का उपयोग सिंगल फेज ए सी वोल्टेज पर स्थिर गति, उच्च स्टार्टिंग टाॅर्क के छोटे कार्यों में होता है, जैसे गैसोलीन पम्प, स्माॅल एयर कम्प्रेसर्स, एयर कंडीशनर, फ्रिजर, वैक्यूम क्लीनर, कपड़े धोने की मशीन, पोर्टेबल हाॅयस्ट, स्टोकर्स, छत के पंखों में

कैपेसिटर स्टार्ट एंड रन इंडक्शन मोटर (capacitor start and run induction motor) 

कैपेसिटर स्टार्ट एंड रन इंडक्शन मोटर दो प्रकार की होती है, एक होती है डबल वैल्यू कैपेसिटर प्ररूपि प्रेरण मोटर और दूसरी होती है सिंगल वैल्यू कैपेसिटर प्ररूपि प्रेरण मोटर

(1) डबल वैल्यू कैपेसिटर प्ररूपि

यह स्थायी फेज विभक्त संधारित्र मोटर और संधारित्र स्टार्ट मोटर का संयोग है। इसमें एक कैपेसिटर Cr स्टेटर के सहायक परिपथ में हमेशा स्थायी रूप से मोटर की रनिंग कंडिशन में भी जुड़ा रहता है, इसलिए इसे रनिंग कैपेसिटर कहते हैं। दूसरा संधारित्र Cs मोटर की धावी अवस्था में अपकेन्द्री स्विच द्वारा स्थाता के सहायक परिपथ से अलग कर दिया जाता है, इसलिए इसे स्टार्टिग कैपेसिटर कहते हैं। यह मोटर उच्च शक्ति गुणांक, उच्च आरम्भिक बलाघूर्ण, उच्च रनिंग टाॅर्क, उच्च अतिभार क्षमता, हाई दक्षता, शांत प्रचालन आदि सभी गुणों से सम्पन्न होती है।


सिंगल वैल्यू कैपेसिटर प्ररूपि

यह मोटर डबल वैल्यू कैपेसिटर प्ररूपि इंडक्शन का ही एक संशोधित या विकसित रूप है। इसे परमानेंट स्पिलिट फेज कैपेसिटर मोटर या परमानेंट केपेसिटर मोटर भी कहते हैं। इसका ओवर ओल परफॉर्मेंस बहुत ही बढ़िया होता है इसलिए आजकल दुनिया भर में इस मोटर का उपयोग व्यापक रूप से हो रहा है।

कैपेसिटर स्टार्ट एंड रन मोटर के सामान्य गुणधर्म

• साइज या क्षमता - 1/8 hp से 1/4 hp या 1 hp
• आरम्भिक बलाघूर्ण - उच्च होता है
• आरम्भिक धारा - पूर्णभार धारा की दो गुनी
• ओपरेटिंग टाॅर्क - उच्च और शान्त प्रचालन
• स्पीड - कोंस्टेंट और ध्वनि रहित
• स्पीड कंट्रोल - ओनली वोल्टेज कंट्रोल द्वारा
• विपरित गति - स्टेटर की मुख्य या सहायक वाइंडिंग के सिरों की पोलेरिटी को आपस में चेंज करने से विपरित गति प्राप्त होती है।
• दक्षता - उच्च होती है
• अतिभार क्षमता - उच्च
• शक्ति गुणांक - अति उच्च 0.9 से 1 तक हमेशा पश्चगामी
• मेंटिनेंस कोस्ट - बहुत ही कम

इस मोटर के अनुप्रयोग

औधौगिक क्षेत्र में इस मोटर का प्रयोग, एकल कला प्रदायी वोल्टता पर परिवर्तन शील भार के अन्तर्गत स्थिर गति की आवश्यकता और उच्च आरम्भिक बलाघूर्ण के कार्यों में किया जाता है। इसके अलावा इस मोटर का उपयोग ऐसे कार्यों में भी किया जाता है, जहां पर वातावरण को शांत बनायें रखना आवश्यक होता है। जैसे लाइब्रेरी, दफ्तर, अस्पताल और प्रयोगशाला के पंखों में, कूलर, रिकॉर्डर प्लेयर, टेली प्रिन्टर्स, ग्राफिक इन्स्टूमेंटस, क्लोक और समय सम्बंधी यन्त्र आदि में भी किया जाता है।
Er. Chand नवंबर 15, 2021
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 विधुत उपकेंद्र क्या है

बिजली का उत्पादन 11 kv पर शक्ति केन्द्रों पर होता है। इस वोल्टेज पर विधुत ऊर्जा की अधिक लाॅस होने के कारण संचरण और वितरण नहीं किया जा सकता, इस विधुत को एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजने के लिए वोल्टेज को बढ़ाना पड़ता है और वितरण के लिए वोल्टेज को कम करके ही विधुत ऊर्जा का उपयोग किया जा सकता है। जिस स्थान पर विधुत ऊर्जा को बढ़ाने और घटाने का काम किया जाता है, उस स्थल को electric substation कहते हैं।

विधुत ऊर्जा का स्टेप अप और स्टेप डाउन करना ही उपकेंद्र का मुख्य काम होता है। इसके अतिरिक्त उपकेंद्रों पर बिजली का स्विचिंग, आवृत्ति में परिवर्तन, दिष्टकारी विधुत ऊर्जा को प्रत्यावर्ती ऊर्जा में परिवर्तन आदि कार्य भी किया जाता है। उधोगों में प्रयुक्त substation को औधौगिक उपकेन्द्र कहते हैं और इस जगह पर शक्ति गुणांक में भी सुधार किया जाता है।


वैधुत उपकेन्द्र, विधुत प्रदाय तन्त्र में वह स्थान है जहां विधुत ऊर्जा का रूपांतरण और नियंत्रण किया जाता है। विधुत प्रदाय कम्पनी सबसे पहले 11 kv, 33 kV या 66kv पर उच्च transmission substation को स्थापित करते है। 100kw से कम विधुत भार के उपभोक्ताओं के लिए अपचायी उपकेंद्रों द्वारा 440 वोल्ट पर वैधुत वितरित की जाती है। लेकिन 100kw से अधिक भार के लिए कम्पनी उपभोक्ता को 1.1kv या 6.6kv बिजली प्रदान करती है। और इस बिजली को नियंत्रित करने के लिए उपभोक्ता को खुद का 440 वोल्ट का उपकेन्द्र लगाना पड़ता है।

विधुत उपकेंद्र पर प्रयोग किएं जाने वाले उपकरण (Electric substation equipments)


• विधुत रोधक (Insulator) 

विधुत उपकेंद्र में इंसुलेटर धारा प्रवाहित चालकों और बस बारो को आधार प्रदान करते हैं और उन्हें वैधुत संचालन भागों से अलग रखते हैं। इंसुलेटर का निर्माण चीनी मिट्टी से किया जाता है, उपकेंद्र में बुसिंग या पोस्ट इंसुलेटर का इस्तेमाल किया जाता है। इनको 66kv या उससे कम वोल्टेज के लिए चट्टो में क्षैतिज या ऊर्ध्वाधर रूप में लगातें है।

• बस बार (Bus bar) 

Substation पर बस बार ठोस वृत्ताकार या आयताकार ताॅबे या एल्यूमीनियम चालक की होती है। कुछ विशेष परिस्थितियों में जहां बस बार को बहुत उच्च धारा वहन करनी पड़ती है और उच्च तापमान प्रभाव की सम्भावना होती है, वहां पर बस बार खोखली, वृत्ताकार या आयताकार ताम्र की भी होती है। इनके अलावा केबिलों के लिए विकृति बस बार भी प्रयोग की जाती है। bus bar का आकार उसकी धारा वहन क्षमता पर निर्भर करता है।

• पृथक्कारी स्विच (Isolate switch)

आइसोलेटर बिना भार पर परिपथ को उच्च वोल्टेज सप्लाई से विस्थापित करने के लिए प्रयोग किये जाते हैं। ये वायु विच्छेद होते है, उच्च वोल्टेज को नियंत्रित करने के लिए इन्हें मोटर की सहायता से परिचालित किया जाता है। 50kv से नीचे ये पृथक्कारी एकल ध्रुव होते है और 132kv या उससे उच्च वोल्टेज के लिए इन्हें समूह परिचालित बनाया जाता है।

• परिपथ वियोजक (Circuit breaker) 

उपकेन्दों पर सर्किट ब्रेकर को परिपथ की असाधारण स्थितियों को ध्यान में रखते हुए लगाया जाता है। ये उच्च वोल्टेज परिपथ में ओटोमेटिक और प्रसामान्य भार स्थिति में हस्त द्वारा संचालित होने चाहिए। 11केवी वोल्टेज के लिए तेल पूरित प्रकार का परिपथ वियोजक अपनाया जाता है।

• फ्यूज (Fuses) 

फ्यूज, ट्रांसफॉर्मर और लाइन को अधिभार से होने वाली हानि से बचाता है, लेकिन इनमें एक कमी यह है कि एक फ्यूज के उड़ने पर पद्वति अन्य दो फेजों पर काम करेंगी। फ्यूज की इस कमी को दूर करने के लिए उच्च वोल्टेज परिपथ में फ्यूज के साथ एक रक्षी रिले भी प्रयोग की जाती है। 

• परिणामित्र (Transformer) 

प्राइमरी संचारण के लिए डेल्टा-स्टार पावर transformer, सेकेंडरी संचारण के लिए स्टार-स्टार power transformer का उपयोग किया जाता है और प्राथमिक वितरण के लिए स्टार-डेल्टा शक्ति परिणामित्र और द्वितियक न्यून वोल्टेज के लिए डेल्टा स्टार वितरक ट्रांसफॉर्मर प्रयोग कियें जाते हैं। पावर स्टेशन पर परिणामित्र वोल्टेज को बढ़ाने के लिए और बाकी सभी स्थानों पर वोल्टेज को कम करने के लिए ट्रांसफॉर्मर स्थापित कियें जाते हैं और विशेष ध्यान यह रखा जाता है कि electric substation में परिणामित्र में कम से कम हानि हो। 

• रक्षी रिले (Protective Relay)  

विधुत दोष और अधिभार पर परिपथ के स्व एवं शीघ्र विच्छेदन के लिए और ट्रांसफॉर्मर की सुरक्षा के लिए विधुत उपकेंद्र पर परिपथ वियोजक के साथ रक्षी रिले इस्तेमाल की जाती है।

धारा ट्रांसफॉर्मर (Current transformer) 

सबस्टेशन पर मापन एवं संकेतक उपयन्त्रो और रक्षी रिले के साथ करंट ट्रांसफॉर्मर उपयोग किये जाते हैं, ये उच्च वोल्टेज परिपथ में मापन और संकेतक यन्त्रो के साथ साथ उन्हें high voltage से अलग करते है जिससे सभी उपयन्त्र सुरक्षित रहते हैं और substation पर काम करने वाले व्यक्तियों को हाई वोल्टेज से हानि होने की संभावना नहीं रहती।

• विभव परिणामित्र (Potential transformer) 

विभव परिणामित्र भी मापन और संकेतक उपकरणों के साथ प्रयोग में लाया जाता है इसकी सेकेंडरी साइड में यन्त्रों को लगाया जाता है। यह भी उच्च वोल्टेज से संयोजित उपयंत्रों को अलग रखता है।

विधुत उपकेंद्र के लिए स्थान का चयन करना (selection of site for an Electric substation) 

विधुत उपकेंद्र के लिए स्थान का चयन करने से पहले उसकी क्षमता, वोल्टेज और प्रकार पर भी ध्यान देना अनिवार्य होता है। प्राइमरी ट्रांसमिशन के लिए इलैक्ट्रिक सबस्टेशन विधुत पावर प्लांट के पास, जबकि प्राथमिक और द्वितियक डिस्ट्रिब्यूशन उपकेंद्र, विधुत भार प्लांट के पास होने चाहिए। 11केवी से अधिक वोल्टेज वाले सबस्टेशन हमेशा शहरी क्षेत्र से बाहर और 11केवी या उससे कम वोल्टेज के उपकेंद्र बस्ती के बाहर या अंदर भार केन्द्र को ध्यान में रखकर स्थापित किया जा सकता है। विधुत उपकेंद्र के स्थान के लिए निम्न बातों का ध्यान में रखना बहुत जरूरी है।

• विधुत भार (Electric weight) 

विधुत उपकेंद्र के चयन में सबसे महत्वपूर्ण गुणक भार है। भार केन्द्र पर सबस्टेशन को स्थापित करने का प्रयास किया जाता है, विशेष कर वितरण के लिए जहां की वितरक की लंबाई electric substation के स्थापन से प्रभावित होती है।

• भूमि के प्रकार और मूल्य के आधार पर

सबस्टेशन के लिए जगह ऐसी होनी चाहिए कि परिणामित्र के अधिक भार के कारण भूमि के धंसने की संभावना नहीं हों और हाई वोल्टेज लाइन के मार्ग में घना जंगल भी नहीं पड़ना चाहिए। वैसे भार केन्द्र के महत्व को ध्यान में रखते हुए भूमि के महत्व को ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता है।

• सबस्टेशन का प्रकार

High voltage उपकेन्दों को गांव या कस्बे से बाहर स्थापित किया जाता है जबकि मध्यम और न्यून वोल्टेज सब स्टेशनों को बस्ती के अन्दर ही लगाया जाता है। प्राथमिक संचारण उपकेंद्र, जनन केन्द्र के पास ही इंस्टाॅल किया जाता है।



Er. Chand नवंबर 12, 2021
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 रिलक्टाॅन्स मोटर ( Reluctance motor)

रिलक्टाॅन्स मोटर को प्रतिष्टम्भ मोटर भी कहते है, यह स्काइरल केज रोटर टाइप इंडक्शन मोटर का ही एक विकसित रूप है। जिसमें प्रतिष्टम्भ के सिध्दांत पर यांत्रिक टाॅर्क उत्पन्न होता है, इसलिए इसे प्रतिष्टम्भ मोटर का नाम दिया गया है। तो दोस्तों आज की पोस्ट reluctance motor in hindi यानी रिलक्टाॅन्स मोटर क्या है इससे रिलेटेड जानकारी को प्राप्त करेंगे।

reluctance-motor-in-hindi


निर्भार से पूर्ण भार की अवस्था में रिलक्टाॅन्स मोटर सिंक्रोनस गति पर चलती है, तब यह सिंक्रोनस रिलक्टाॅन्स मोटर कहलाती है। जब भार को बढ़ाया जाता है यानी अति भार की स्थिति में इसकी गति कुछ घट जाती है, उस समय यह मोटर इंडक्शन मोटर की तरह अंडर सिंक्रोनस गति पर ही चलती है इसलिए यह इंडक्शन रिलक्टैन्स मोटर कहलाती है।

जब किसी रिलैक्टेंस मोटर में स्टेटर पर बनने वाले इलैक्ट्रिकल पोलो की अपेक्षा, रोटर पर स्थापित सैलियंट पोलो की संख्या अधिक होती है, तो यह मोटर एक स्थिर औसत गति पर चलती है। यह गति, आभासी तुल्यकाली गति की सब गुणक होती है, इसलिए इस मोटर को सब सिंक्रोनस मोटर भी कह सकते है।

रिलक्टाॅन्स मोटर का कार्य सिद्धान्त ( working principle of reluctance motor in hindi )

रिलक्टाॅन्स मोटर एक स्काइरल केज रोटर टाइप इंडक्शन मोटर की तरह से स्टाॅर्ट होती है। जैसे जैसे इसकी गति तुल्यकाली गति के नजदीक पहुंचती जाती है; वैसे वैसे रोटर पर स्थापित सोफ्ट आयरन पोल की स्लिप कम होती चली जाती है। इस प्रचालन में एक स्थिति ऐसी भी आती है, रोटेटिंग मेग्नेटिक फील्ड और रोटर स्पीड में पारस्परिक अंतर इतना कम रह जाता है कि स्टेटर के पोल्स द्वारा रोटर के पोल्स चुम्बकित हों जातें है, तब रोटर स्टेटर के मैगनेटिक फील्ड के अनुदिश घुमने लगता है, इस अवस्था में रोटर सिंक्रोनस स्पीड पर घूमता है।


रिलैक्टैंस मोटर का स्टेटर

रिलैक्टैंस मोटर के स्टेटर की बनावट स्काइरल केज इंडक्शन मोटर के स्टेटर के समान ही निम्न तीन प्रकार की होती है।

(1) विभक्त कला प्ररूपि स्थाता, जिसके साथ एक सेंट्रीफ्यूगल स्विच लगा होता है।

(2) स्थायी संधारित्र प्ररूपि स्टेटर, इसमें सेंट्रीफ्यूगल स्विच का उपयोग नहीं किया जाता है।

(3) त्रिकला प्ररूपि स्टेटर, जिसका प्रयोग समाकलन अश्व शक्ति निर्धारणों वाली रिलक्टैंस मोटर में होता है।

रिलक्टैंस मोटर का रोटर या घूर्णक

सिंगल फेज फ्रेक्सनल हाॅर्स पावर वाली रिलक्टैंस मोटर में एक विशेष प्रकार के मैगनेटिक स्काइरल केज टाइप रोटर का उपयोग किया जाता है। इस विशेष प्रकार के रोटर को लौकिक स्काइरल केज रोटर में विशेष प्रकार के खाॅचें काटकर बनाया जाता है। इन खाॅचों को नर्म लौहे के वायु प्रक्षेपित ध्रुवों की तरह काम में लाया जाता है। इसकी संख्या स्टेटर पर बनने वाले इलैक्ट्रिक पोल की संख्या के बराबर होती है। इस प्रकार यह सारी व्यवस्था मोटर को सेल्फ स्टाॅर्ट उसी तरह बनाती है, जिस प्रकार पोल शू पर स्थापित डेम्पर वाइंडिंग, सिंक्रोनस मोटर को सेल्फ स्टाॅर्ट बनाती हैं।

रिलक्टैंस मोटर की विशेषताएं ( specialities of reluctance motor in hindi )

• क्षमता- आंशिक अश्व शक्ति
• बाह्मा खिंचाव बलाघूर्ण - 2 से 2.5 
• अन्त खिंचाव बलाघूर्ण - 0.9 से 1.2
• आरम्भिक अवस्था - सेल्फ स्टाॅर्ट
• गति नियंत्रण - परम स्थिर गति के कारण सम्भव नहीं है
• विपरित गति - इंडक्शन मोटर की तरह ही प्राप्त होती है
• शक्ति गुणांक - 0.6 से 0.8 न्यूनतम
• ताम्र हानियां - स्थिर तुल्यकाली गति के भार पर, रोटर में ताम्र हानियां शून्य होती है
• निर्गत - न्यून
• दक्षता - न्यून ( 70 से 80 ) प्रतिशत तक
• अनुरक्षण किमत - कम
• प्रतिस्टम्भ अनुपात - 3 से 6

रिलक्टैंस मोटर के अनुप्रयोग ( Application of reluctance motor in hindi )

रिलक्टैंस मोटर का उपयोग निम्न कार्यों में अधिक किया जाता है।
• न्यूक्लीयर रियेक्टर में नियंत्रण छड की स्थिति स्थापन के लिए
• टेक्सटाइल मशीनों को तुल्यकाली गति पर चलाने के लिए
• रेक्टिफायर, इनवर्टर यूनिटों की नियंत्रित स्विचन क्रिया द्वारा परिवर्तनीय आवृत्ति प्रदाय प्राप्त करने के लिए
• इस मोटर का उपयोग चालन की तरह स्थाति स्थापना, गति नियंत्रण और इन दोनों के संयोग के लिए होता है।
Er. Chand नवंबर 09, 2021
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 हिस्टेरिसिस मोटर क्या होती है

हिस्टेरिसिस मोटर एक विशेष प्रकार की सिंगल फेज, फ्रेक्शनल हाॅर्स पावर सिंक्रोनस मोटर होती है, जिसके लिए डी सी एक्साइटेशन की आवश्यकता नहीं होती है। इसमें मंदायन के सिध्दांत पर यांत्रिक बलाघूर्ण ऊत्पन्न होता है, इसकी प्रचालन अभिलक्षणे लगभग सिंक्रोनस मोटर के समान ही होती है, परन्तु इसकी संरचना स्पिलिट फेज स्काइरल केज इंडक्शन मोटर के समान होती है। इसे शैथिल्य मोटर के नाम से भी जाना जाता है। हिस्टेरिसिस मोटर क्या होती है इसके बारे में और भी बहुत कुछ हम इस पोस्ट में जानेंगे।

हिस्टेरिसिस मोटर का प्रचालन ( Operation of hysterisis motor )

दो शैडेड पोल टाइप हिस्टेरिसिस मोटर को नीचे चित्र में दिखाया गया है। इसके रोटर की संरचना, कोबाल्ट स्टील की बहुत सी चपटी चक्रिकाओं को शाफ्ट पर प्रेस्ड करके की गई है। इस रोटर ऐसेम्बली को पटलित लौह क्रोड से निर्मित स्टेटर के शैडेड पोलो के बीच में स्थापित किया जाता है।

हिस्टेरिसिस मोटर क्या होती है


स्टेटर के दोनों शैडेड पोलो द्वारा उत्पन्न रोटेटिंग मेग्नेटिक फील्ड के प्रभाव से रोटर सर्किट में विधुत धारा प्रवाहित होती है, जो मोटर को इंडक्शन मोटर की तरह स्टार्ट कर देती है। अब जैसे ही मोटर की गति बढ़ती है, वैसे ही डिस्क रोटर में अधिकाधिक हिस्टेरिसिस हानियां विकसित होने लगती है, जो सामान्य मोटर की अपेक्षा, अति उच्च शैथिल्य बलाघूर्ण ऊत्पन्न करते हैं।

रोटर की दो क्रोस बार्स की लंबाई की और न्यूनतम रिलक्टैंस पाथ कायम रहता है। रोटर में प्रेरित धारा प्रवाहित होने के कारण, इसमें क्रार्स बार्स अक्ष की और दो स्थायी चुंबकीय ध्रुवों का विकास होता है। कोबाल्ट स्टील की चुंबकीय धारण शक्ति अत्यधिक होती है, इसलिए इसके चुम्बकीय ध्रुव अधिक देर तक अवशिष्ट चुंबकत्व को धारण किए रहते हैं। इस प्रकार से बनें हुए चुंबकीय ध्रुव, तब स्टेटर के रोटेटिंग मेग्नेटिक फील्ड के साथ सिंक्रोनिज्म में लाॅक हो जाते हैं और मोटर, सिंक्रोनस मोटर की तरह कार्य करने लगती है। रोटर सर्किट लगातार हिस्टेरिसिस लाॅस के रूप में शक्ति को कंज्यूम करता रहता है और हमेशा उच शैथिल्य बलाघूर्ण कायम रहता है। इस प्रकार यह मोटर, अनियमित भार परिवर्तन की अवस्था में भी परम स्थिर गति कायम रख सकती है।

स्टेटर या स्थाता

हिस्टेरिसिस मोटर के स्टेटर की संरचना, स्पिलिट फेज इंडक्शन मोटर के स्टेटर के समान ही निम्न दो प्रकार की होती है, एक तो छादित ध्रुव प्ररूपि प्रकार का होता है और दूसरा स्थायी प्ररुपि प्रकार का स्टेटर होता है।

रोटर या घूर्णक

हिस्टेरिसिस मोटर के रोटर की संरचना लगभग स्पिलिट फेज इंडक्शन मोटर के स्काइरल केज रोटर के समान ही होती है, इसमें अन्तर केवल इतना होता है कि इसका रोटर कोर, न्यून विधुत लाॅस वाले एनल्ड सिलिकॉन स्टील लेमिनेशन के स्थान पर अधिक शैथिल्य हानियों वाले हार्डण्ड मेग्नेटिक स्टील या कोबाल्ट स्टील का बहुत छोटे आकार में बना होता है, जिसमें किसी भी प्रकार का कोई स्लोट, टीथ और वाइंडिंग नहीं होती है। इस प्रकार यह रोटर सादा, चिकना, लघु बेलनाकार होता है, जो स्टैंड स्टिल स्थिति में सिंक्रोनस गति तक एक समान टाॅर्क और ध्वनि रहित तुल्यकाली गति पर चलता है।

हिस्टेरिसिस मोटर की विशेषताएं ( Specialities of hysterisis motor )

• यह एक यांत्रिक और चुंबकीय कम्पनों से रहित मोटर है, इसलिए इसके प्रचालन में किसी भी प्रकार की ध्वनि ऊत्पन्न नहीं होती है।

हिस्टेरिसिस मोटर का रोटर- खाॅचे रहित, दाॅते रहित, कुण्डलन लैस, सीमित लघु आमाप, बहुत ही सादा, चिकना, मजबूत, टिकाऊ, बेलनाकार होता है।

• इसके टाॅर्क का मान, शुरुआत से लेकर सिंक्रोनस गति तक, उच्च और एक समान होता है।

• हिस्टेरिसिस मोटर केवल तुल्यकाली गति पर ही चलती यि घूमती है।

• इस मोटर के अन्दर ऊत्पन्न शैथिल्य टाॅर्क, इसके रोटर में होने वाली हिस्टेरिसिस हानियों के बराबर होता है।

• यह मोटर अनियमित भार परिवर्तन की अवस्था में भी परम स्थिर गति को ज्यो के त्यों कायम रखती है।

• विधुत घड़ियों में प्रयोग होने वाली हिस्टेरिसिस मोटर का इनपुट दो या तीन वाट और आउटपुट कुछ ही मिली वाट होता है।

• 1/7 hp hysterisis motor की दक्षता और निष्पादन या कार्य कौशल लगभग समान आकार की इंडक्शन मोटर के समान ही होता है।

हिस्टेरिसिस मोटर के अनुप्रयोग ( Application of hysterisis motor ) 

प्रस्तुत मोटर की स्टार्टिंग, बिना आवाज और शुद्ध स्थिर गति होने के कारण, इसका उपयोग ध्वनि उपकरणों में, इलैक्ट्रिक घड़ियों में बहुत ज्यादा होता है; जैसे टेप रिकार्डिंग, फोनोग्राफ, टेलीक्रोन, घरों में प्रयोग होने वाले विधुत घड़ियों आदि के प्रचालन में होता है।

तो हिस्टेरिसिस मोटर क्या होती है ये आज की इस पोस्ट में हमने जाना है। उम्मीद है कि आप सब को यह जानकारी अच्छी लगी होंगी, अगर अच्छी लगी है तो हमें कमेंट करके जरूर अवगत करें।
Er. Chand नवंबर 08, 2021
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Buchholz Relay क्या है

buchholz relay एक गैस के द्वारा शुरू होने वाला रिले है जो कि तेल डुबकी ट्रांसफॉर्मरों में लगाई जाती है। यह रिले transformer को हर तरह के फाल्ट से बचाने का काम करता है। यदि ट्रांसफॉर्मर में कोई छोटा फाल्ट आता है, तो buchholz relay घण्टी के द्वारा सूचित करता है और जब कोई गंभीर आन्तरिक दोष आ जाता है, तो यह रिले परिणामित्र को मेन सप्लाई से पृथक कर देता है। यह रिले परिणामित्र टैंक और कंजर्वेटर टैंक के बीच में लगाई जाती है इसका उपयोग 500 kvA से अधिक रेटिंग वाले तेल डूबकी transformer की प्रोटैक्शन के लिए किया जाता है। ब्कोल्ज रिले को pre fault relay और gas actuated रिले के नाम से भी जाना जाता है।

Buchholz relay की संरचना

buchholz रिले की बनावट कुछ ऐसी होती है, ये एक dome vessel की तरह दिखाई देती है जो कि मेन टैंक और कंजर्वेटर टैंक को जोड़ने वाले पाइप के बीच में लगाई जाती है। ब्कोल्ज रीलें को दो भागों में बांटा गया है जिसमें एक ऊपर का भाग होता है और एक निचला हिस्सा होता है।

ऊपरी हिस्सा इसमें एक मर्करी टाइप स्विच लगा होता है जो हिन्ज की तरह के फ्लैप पर लगा होता है ( यह स्विच जब ट्रांसफॉर्मर टैंक से तेल कंजर्वेटर में जाता है तो उसके रास्ते में लगा होता है। ) जब transformer में कोई मामूली दोष आता है तो यह अलारम सर्किट को बंद कर देता है।

निचला हिस्सा- यह भाग जब परिणामित्र में बहुत खतरनाक आंतरिक फाल्ट आता है, तो यह सर्किट ब्रेकर को ट्रिप कर देता है।

buchholz relay working in hindi (ब्कोल्ज रिले का कार्य सिद्धान्त)

ट्रांसफॉर्मर के अन्दर फाल्ट आने के कारण जो गर्मी या आर्क उत्पन्न होती है उसकी वजह से परिणिमित्र टैंक में उपस्थित तेल का विघटन होने लगता है। विघटन होने से जो उत्पाद बनता है उसमें सत्तर प्रतिशत से भी ज्यादा हाइड्रोजन होती है। हाइड्रोजन एक हल्की गैस होने के कारण ऊपर की ओर उड़ने लगती है और यह गैस कंजर्वेटर टैंक में जाने की कोशिश करती है और यह buchholz relay के ऊपरी हिस्से में फंस जाती है जिसके कारण ये हाइड्रोजन गैस रिले के अन्दर जाने लगती है। तेल का विघटन होने से तेल का स्तर कम होता जाता है और जो फ्लोट तेल के ऊपर तैर रहा होता है वो नीचे की ओर गिरने लगता है। ऐसा होने पर फ्लोट, जो मर्करी स्विच लगा होता है वह बंद हो जाता है और अलार्म बजने लगता है यह अलार्म परिपथ को बन्द कर देता है।
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Buchholz Relay Working


जब परिणामित्र में गंभीर शाॅर्ट सर्किट फाल्ट आता है तब टैंक का दबाव बढ़ने लगता है और यह दबाव कंजर्वेटर की ओर बढ़ता है। जब तेल इस दबाव के कारण कंजर्वेटर टैंक की ओर जाता है तब यह ब्कोल्ज रिले से गुजरता है, जिससे रिले पर लगी पत्तियां गैस के दबाव से दबने लगती है और इसके द्वारा दूसरा स्विच बंद हो जाता है, जिससे परिपथ वियोजक ट्रिप हो जाता है। इसके बाद जब तक यह फाल्ट ठीक नहीं होता है ट्रांसफॉर्मर को काम में नहीं लिया जाता है।

ब्कोल्ज रिले के लाभ

• buchholz relay transformer को सुरक्षित रखने का सबसे अच्छा और सरल माध्यम है।
• इस रिले के द्वारा छोटे फिल्ट का बहुत ही जल्दी पता लगा लिया जाता है।

Buchholz relay की हानियां

• यह रिले केवल तेल में डूबे हुए transformer जिनके साथ कंजर्वेटर टैंक लगा होता है, केवल उन्हीं की सुरक्षा के लिए काम आती है।
• यह केवल परिणामित्र में जहां तक तेल का स्तर होता है, वही तक दोष का पता लगा सकती है। इसलिए तारों को अलग से सुरक्षा प्रदान करनी पड़ती है।
• buchholz relay 500 kvA रेटिंग से ऊपर वाले परिणामित्र के लिए ही प्रयोग होती है। इससे कम रेटिंग वाले transformer के लिए इस रिले का उपयोग नहीं किया जाता है।

ब्कोल्ज रिले की सीमाएं

• मर्करी स्विच की सेटिंग अधिक संवेदनशील नहीं होनी चाहिए, वरना यह रिले किसी कंपन, यांत्रिक झटके या पक्षियों के बैठने से रिले का परिचालन रूक सकता है।
• यह रिले धीमी गति पर कार्य करता है। इसकि न्यूनतम परिचालन समय 0.1 सेकेण्ड और औसत परिचालन समय 0.2 सेकेण्ड है।

Er. Chand नवंबर 05, 2021
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 चुंबकन क्षेत्र (Magnetising field)

जब कोइ चुंबकीय पदार्थ किसी चुम्बकीय क्षेत्र में रखा जाता है तो वह चुंबकित हो जाता है अर्थात उसमें भी चुंबक का गुण आ जाता है। चुम्बकीय पदार्थों के इस प्रकार चुम्बकत्व ग्रहण करने की क्रिया को चुंबकन कहते हैं। इस चुंबकीय क्षेत्र को जिसके कारण पदार्थ में चुम्बकत्व का गुण आया है, चुंबकन क्षेत्र या चुम्बकीय प्रेरण कहते है। चुंबकन क्षेत्र भी एक चुंबकीय पदार्थों के गुण है आगे और इसके कुछ गुणों के बारे में विस्तार से पढ़ेंगे।

चुंबकन की क्रिया में चुंबकीय पदार्थों के सिरों की चुम्बकीय ध्रुवता चुम्बकन क्षेत्र की ध्रुवता के विपरित बनती है अर्थात् चुंबकन क्षेत्र में उत्तरी ध्रुव की ओर वाला चुंबकीय पदार्थ का सिरा दक्षिणी ध्रुव तथा क्षेत्र के दक्षिणी ध्रुव की ओर वाला सिरा उत्तरी ध्रुव पर बनता है। अतः चुम्बकित पदार्थ की चुम्बकीय बल रेखायें चुंबकन क्षेत्र की बल रेखाओं के विपरित दिशा में होती है। चुंबकीय पदार्थ की बल रेखाओं को प्रेरण बल उत्पन्न रेखायें कहते हैं।

किसी बिंदु पर चुम्बकन क्षेत्र की त्रिवता उस बल से मापी जाती है जो उस पर स्थित एकांक उत्तरी ध्रुव पर कार्य करता है। दूसरे शब्दों में चुंबकन क्षेत्र की त्रिवता उन बल रेखाओं की संख्या के बराबर होती है जो उस बिंदु पर स्थित एकांक क्षेत्रफल के लम्बवत गुजरती है। इसका CGS पद्ति में मात्रक आर्स्टेड या गौस होता है और MKS पद्ति में मात्रक वेबर/मीटर वर्ग होता है।

चुंबकीय फ्लक्स घनत्व (Magnetic flux density)

किसी चुम्बकीय क्षेत्र में चुंबकीय बल रेखाएं ही चुम्बकीय क्षेत्र की प्रतिक होती है। चुंबकन की क्रिया में दो चुम्बकीय क्षेत्र होते है अर्थात् दो प्रकार की बल रेखाएं होती हैं। एक तो चुंबकन क्षेत्र की बल रेखाएं और दूसरी चुम्बकित पदार्थ की बल रेखाएं। चुंबकन क्षेत्र की बल रेखाओं को अविरत रेखाओं द्वारा और चुंबकीय पदार्थ की बल रेखाओं को बिंदुदार रेखाओं द्वारा प्रर्दशित किया जाता है। पदार्थ के अन्दर किसी बिंदु पर परिणामी चुम्बकीय क्षेत्र की त्रिवता इन दोनों चुंबकीय क्षेत्र की तीव्रताओं के योग के बराबर होती है। इस परिणामी तीव्रति को ही चुंबकीय फ्लक्स घनत्व कहते हैं। इसको चुंबकीय प्रेरण का संख्यात्मक मान भी कहते है, इस राशि को B से व्यक्त किया जाता है, यह एक सदिश राशि है और इसका एस आई मात्रक वेबर प्रति मीटर वर्ग होता है।


चुंबकन की तीव्रता

किसी चुम्बकित पदार्थ की चुम्बकीय अवस्था का वर्णन जिस भौतिक राशि द्वारा किया जाता है, वह चुंबकन की तीव्रता कहलाती है। इसको I से प्रर्दशित करते है यह एक सदिश राशि है, इसका परिमाण प्रति एकांक आयतन चुंबकीय आघूर्ण के बराबर होता है।
चुम्बकित पदार्थ की चुम्बकीय अवस्था उसकी चुम्बकन तीव्रता से ज्ञात की जाती है। यदि किसी चुंबकीय पदार्थ को H तीव्रता वाले चुंबकन क्षेत्र में रखने पर प्रेरण द्वारा उसमें M चुंबकीय आघूर्ण उत्पन्न हो और पदार्थ का आयतन V हो तो चुंबकन तीव्रता

                    I = M / V

इसका मात्रक ऐम्पीयर प्रति मीटर होता है।

चुंबकीय प्रवृत्ति

किसी निश्चित शक्ति के चुंबकीय क्षेत्र में किसी चुम्बकीय पदार्थ को रखने पर उसमें ऊत्पन्न चुम्बकत्व की मात्रा जितनी अधिक होती है, उसकी चुंबकीय प्रवृत्ति उतनी ही अधिक कही जाती है। अतः चुम्बकीय प्रवृत्ति से तात्पर्य, पदार्थ द्वारा सरलता से चुम्बकत्व ग्रहण करने की क्षमता से हैं। किसी पदार्थ में ऊत्पन्न चुंबकन की तीव्रता I और चुंबकन क्षेत्र H के अनुपात को उस पदार्थ की चुम्बकीय प्रवृत्ति कहते हैं। नर्म लौहा स्टील की अपेक्षा अत्यंत सरलता से अधिक शक्ति का चुंबकन बनाया जा सकता है, जबकि दोनों पर कार्य कारी चुम्बकीय क्षेत्र बराबर हो। नर्म लौहे की चुंबकीय प्रवृत्ति स्टील से अधिक होती है।

चुंबकशीलता (Permeability) 

वायु की अपेक्षा लौहे या अन्य किसी चुंबकीय पदार्थ में से चुम्बकीय बल रेखाओं की संख्या जितनी अधिक गुजरती है उसकी चुंबकशीलता उतनी ही अधिक कही जाती है। अतः चुम्बकीय बल रेखाओं के लिए पदार्थ की चालकता से तात्पर्य ही उसकी चुंबकशीलता से होता है।
यदि किसी पदार्थ को चुंबकन क्षेत्र H में रखने पर उसमें चुम्बकीय फ्लक्स घनत्व B हो तो पदार्थ की चुंबकशीलता, B और H के अनुपात के बराबर होती है। इसे म्यू से दर्शाया जाता है।

दूसरे शब्दों में, किसी चुम्बकन क्षेत्र में रखें किसी पदार्थ के एकांक क्षेत्रफल से लम्बवत गुजरने वाली बल रेखाओं की संख्या B और पदार्थ की अनुपस्थिति में वायु के एकांक क्षेत्रफल से गुजरने वाली चुंबकीय बल रेखाओं की संख्या H के अनुपात को पदार्थ की चुंबकशीलता कहते हैं। नर्म लौहे की चुंबकशीलता बहुत अधिक होती है।

Er. Chand नवंबर 02, 2021
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 औधौगिक क्षेत्र में प्रयोग होने वाली विधुत मोटरें (Electric motors used in industries)


(1) खराद मशींन (Lathe machine) 

खराद मशींन को स्थिर गति वाली पिंजरा प्रेरण मोटर द्वारा चलायि जाता है। इन कार्यों के लिए 50 hp तक की मोटर बनाई जाती है। कभी कभी बहु गति वाली ए सी धारा की स्लिपरिंग प्रेरण मोटरें या ध्रुव परिवर्तित मोटरें तथा दिष्ट धारा शंट मोटरें या ध्रुव परिवर्तित चलाने के लिए प्रयोग की जाती है।


(2) प्लेनर (planer) 

प्लेनर में एक तल होता है जो कि प्लेटन से जुड़ा होता है, जो तल पर आगें पीछे चलता है। कार्य को प्लेटन से बांध दिया जाता है और कार्य शिकंजे में फंसे स्थिर टूल द्वारा समतल कियि जाता है। इसमें समंजनशील गति वाली प्रतिवर्ती मोटरें प्रयोग की जाती है। 

(3) पंच और शियरस (punch and shears) 

पंच और शियरस मशीनों में गतिपाल पहिया लगा होता है, जो कटिंग के समय ऊर्जा प्रदान करता है। इन मशीनों में ए सी मोटर उपयोग में लायी जाती है, जो ढलवां गत बलाघूर्ण अभिलक्षण रखती हों, ताकि मोटर की गति कम हो जायें जब उस पर उच्च भार पड़े। 

(4) मशींन टूल्स (machine tools) 

मशीन टूल के अन्तर्गत विधुत से चलने वाली मशीनें, बरमा मशींन और स्पेनर आदि आतें हैं। इनको चलाने के लिए उच्च गति वाली मोटरें गियर सहित प्रयोग में लायी जाती है। छोटी बरमा मशीनों और स्पेनर के साथ श्रेणी प्ररूपि सार्वत्रिक मोटर प्रयोग की जाती है, जो कि प्रत्यावर्ती धारा और दिष्ट धारा दोनों पर कार्य करती है। बड़े टूल्स के लिए दिष्ट धारा सप्लाई पर कम्पाउन्ड मोटरें और ए सी धारा के लिए पिंजरा प्रेरण मोटर उपयोग की जाती है।

(5) लिफ्ट (lift) 

लिफ्ट में प्रयोग की जाने वाली मोटर सरलता से प्रारम्भ और रुकनी चाहिए, इसके लिए मोटर का आर्मेचर हल्का और साधारण गति पर चलना चाहिए। लिफ्ट के लिए दिष्ट धारा कम्पाउन्ड मोटर, ए सी धारा स्लिप रिंग मोटर, प्रेरण प्रतिकर्षण मोटर और परिवर्ती गति वाली ए सी धारा की दिकपरिवर्तक मोटर अधिक उपयुक्त रहती है। 

(6) खनन उद्योग में (minning industries) 

खनन उद्योग में काम आने वाली मोटर पूरी तरह बंद घेरे वाली और ज्वालासह होनी चाहिए। इसमें 10 hp तक के लिए पिंजरा प्रारूपि प्रेरण मोटरें या डी सी मोटर प्रयोग में लायी जाती है। दिष्ट धारा मोटरों में गति नियंत्रण के लिए शंट क्षेत्र नियंत्रण विधि प्रयोग की जाती है और स्लिप रिगं मोटर के गीत नियंत्रण के लिए सोपानी विधि इस्तेमाल की जाती है।

(7) कपड़ा मिलों में (textile mills) 

कपड़ा मिलों में समूह चालन और अर्द्ध समूह चालन प्रयोग किया जाता है, जिसमें मोटर साफ्ट पर पुलिया लगी होती है जो अनेकों मशीनों को चलाती है। कपड़ा मिलों में उपयोग की जाने वाली मोटरें पूर्ण रूप से बन्द घेरें वाली होनी चाहिए, ताकि कपड़ों की फुन्जी आदि से मोटर सुरक्षित रहें। इसके साथ मोटर का विधुत रोधन नमी सह होना चाहिए ताकि सीलन से सुरक्षा हो सकें, क्योंकि कपड़ा मिलों में सीलन वातावरण होता है। कपड़ा मिलों में ए सी सप्लाई की थ्री फेज मोटरें प्रयोग की जाती है, क्योंकि इनकी गति सप्लाई आवृत्ति द्वारा नियंत्रित और स्थिर रहती है। कपड़ा मिलों में दिष्ट धारा मोटर प्रयोग करना उचित नहीं है क्योंकि इनकी गति सप्लाई वोल्टेज और गर्मी ज्यादा ऊत्पन्न होने पर परिवर्तित हो जाती है। इनमें प्रयुक्त होने वाली मशीनों की दक्षता और प्रारम्भन बहुत उच्च होना चाहिए।


Er. Chand नवंबर 01, 2021
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