Results for Physics 12th

 चुंबकन क्षेत्र (Magnetising field)

जब कोइ चुंबकीय पदार्थ किसी चुम्बकीय क्षेत्र में रखा जाता है तो वह चुंबकित हो जाता है अर्थात उसमें भी चुंबक का गुण आ जाता है। चुम्बकीय पदार्थों के इस प्रकार चुम्बकत्व ग्रहण करने की क्रिया को चुंबकन कहते हैं। इस चुंबकीय क्षेत्र को जिसके कारण पदार्थ में चुम्बकत्व का गुण आया है, चुंबकन क्षेत्र या चुम्बकीय प्रेरण कहते है। चुंबकन क्षेत्र भी एक चुंबकीय पदार्थों के गुण है आगे और इसके कुछ गुणों के बारे में विस्तार से पढ़ेंगे।

चुंबकन की क्रिया में चुंबकीय पदार्थों के सिरों की चुम्बकीय ध्रुवता चुम्बकन क्षेत्र की ध्रुवता के विपरित बनती है अर्थात् चुंबकन क्षेत्र में उत्तरी ध्रुव की ओर वाला चुंबकीय पदार्थ का सिरा दक्षिणी ध्रुव तथा क्षेत्र के दक्षिणी ध्रुव की ओर वाला सिरा उत्तरी ध्रुव पर बनता है। अतः चुम्बकित पदार्थ की चुम्बकीय बल रेखायें चुंबकन क्षेत्र की बल रेखाओं के विपरित दिशा में होती है। चुंबकीय पदार्थ की बल रेखाओं को प्रेरण बल उत्पन्न रेखायें कहते हैं।

किसी बिंदु पर चुम्बकन क्षेत्र की त्रिवता उस बल से मापी जाती है जो उस पर स्थित एकांक उत्तरी ध्रुव पर कार्य करता है। दूसरे शब्दों में चुंबकन क्षेत्र की त्रिवता उन बल रेखाओं की संख्या के बराबर होती है जो उस बिंदु पर स्थित एकांक क्षेत्रफल के लम्बवत गुजरती है। इसका CGS पद्ति में मात्रक आर्स्टेड या गौस होता है और MKS पद्ति में मात्रक वेबर/मीटर वर्ग होता है।

चुंबकीय फ्लक्स घनत्व (Magnetic flux density)

किसी चुम्बकीय क्षेत्र में चुंबकीय बल रेखाएं ही चुम्बकीय क्षेत्र की प्रतिक होती है। चुंबकन की क्रिया में दो चुम्बकीय क्षेत्र होते है अर्थात् दो प्रकार की बल रेखाएं होती हैं। एक तो चुंबकन क्षेत्र की बल रेखाएं और दूसरी चुम्बकित पदार्थ की बल रेखाएं। चुंबकन क्षेत्र की बल रेखाओं को अविरत रेखाओं द्वारा और चुंबकीय पदार्थ की बल रेखाओं को बिंदुदार रेखाओं द्वारा प्रर्दशित किया जाता है। पदार्थ के अन्दर किसी बिंदु पर परिणामी चुम्बकीय क्षेत्र की त्रिवता इन दोनों चुंबकीय क्षेत्र की तीव्रताओं के योग के बराबर होती है। इस परिणामी तीव्रति को ही चुंबकीय फ्लक्स घनत्व कहते हैं। इसको चुंबकीय प्रेरण का संख्यात्मक मान भी कहते है, इस राशि को B से व्यक्त किया जाता है, यह एक सदिश राशि है और इसका एस आई मात्रक वेबर प्रति मीटर वर्ग होता है।


चुंबकन की तीव्रता

किसी चुम्बकित पदार्थ की चुम्बकीय अवस्था का वर्णन जिस भौतिक राशि द्वारा किया जाता है, वह चुंबकन की तीव्रता कहलाती है। इसको I से प्रर्दशित करते है यह एक सदिश राशि है, इसका परिमाण प्रति एकांक आयतन चुंबकीय आघूर्ण के बराबर होता है।
चुम्बकित पदार्थ की चुम्बकीय अवस्था उसकी चुम्बकन तीव्रता से ज्ञात की जाती है। यदि किसी चुंबकीय पदार्थ को H तीव्रता वाले चुंबकन क्षेत्र में रखने पर प्रेरण द्वारा उसमें M चुंबकीय आघूर्ण उत्पन्न हो और पदार्थ का आयतन V हो तो चुंबकन तीव्रता

                    I = M / V

इसका मात्रक ऐम्पीयर प्रति मीटर होता है।

चुंबकीय प्रवृत्ति

किसी निश्चित शक्ति के चुंबकीय क्षेत्र में किसी चुम्बकीय पदार्थ को रखने पर उसमें ऊत्पन्न चुम्बकत्व की मात्रा जितनी अधिक होती है, उसकी चुंबकीय प्रवृत्ति उतनी ही अधिक कही जाती है। अतः चुम्बकीय प्रवृत्ति से तात्पर्य, पदार्थ द्वारा सरलता से चुम्बकत्व ग्रहण करने की क्षमता से हैं। किसी पदार्थ में ऊत्पन्न चुंबकन की तीव्रता I और चुंबकन क्षेत्र H के अनुपात को उस पदार्थ की चुम्बकीय प्रवृत्ति कहते हैं। नर्म लौहा स्टील की अपेक्षा अत्यंत सरलता से अधिक शक्ति का चुंबकन बनाया जा सकता है, जबकि दोनों पर कार्य कारी चुम्बकीय क्षेत्र बराबर हो। नर्म लौहे की चुंबकीय प्रवृत्ति स्टील से अधिक होती है।

चुंबकशीलता (Permeability) 

वायु की अपेक्षा लौहे या अन्य किसी चुंबकीय पदार्थ में से चुम्बकीय बल रेखाओं की संख्या जितनी अधिक गुजरती है उसकी चुंबकशीलता उतनी ही अधिक कही जाती है। अतः चुम्बकीय बल रेखाओं के लिए पदार्थ की चालकता से तात्पर्य ही उसकी चुंबकशीलता से होता है।
यदि किसी पदार्थ को चुंबकन क्षेत्र H में रखने पर उसमें चुम्बकीय फ्लक्स घनत्व B हो तो पदार्थ की चुंबकशीलता, B और H के अनुपात के बराबर होती है। इसे म्यू से दर्शाया जाता है।

दूसरे शब्दों में, किसी चुम्बकन क्षेत्र में रखें किसी पदार्थ के एकांक क्षेत्रफल से लम्बवत गुजरने वाली बल रेखाओं की संख्या B और पदार्थ की अनुपस्थिति में वायु के एकांक क्षेत्रफल से गुजरने वाली चुंबकीय बल रेखाओं की संख्या H के अनुपात को पदार्थ की चुंबकशीलता कहते हैं। नर्म लौहे की चुंबकशीलता बहुत अधिक होती है।

Er. Chand नवंबर 02, 2021
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 प्रत्यावर्ती धारा क्या है


आज की हमारी इस पोस्ट में हम पढ़ने वाले हैं, प्रत्यावर्ती धारा क्या होती है इसका वर्ग माध्य मूल मान, शिखर मान, आवर्त काल, आवृत्ति और प्रत्यावर्ती वोल्टेज के बारे में जानकारी हासिल करेंगे। अगर आप ac current in hindi से रिलेटेड ज्ञान प्राप्त करना चाहते है तो आप एक सही वेबसाइट और सही पोस्ट पर आये है। यहां पर आपको बहुत ही आसान तरीके से प्रत्यावर्ती धारा के बारे में समझाया जायेगा, जिससे आप इसको समझकर दूसरों को भी आसानी से समझा सकते हैं।तो सबसे पहले हम प्रत्यावर्ती धारा की परिभाषा को जान लेते है।


प्रत्यावर्ती धारा की परिभाषा


प्रत्यावर्ती धारा एक ऐसी धारा होती है जो समय के साथ अपने मान को आवर्त रूप से बदलतीं रहतीं हैं, और एक निश्चित समय अंतराल के बाद ( 360 डिग्री पूरा करने के बाद) दौबारा से अपने प्रारंभिक मान से चलना शुरू करती है, एसी धारा को प्रत्यावर्ती धारा कहते हैं।


प्रत्यावर्ती धारा का शिखर मान


ac current का एक चक्कर 360 डिग्री का होता है और इस एक चक्कर के अन्दर यह दो बार अपने अधिकतम मान पर पहुंचती है। पहले आधे cycle में इसका धनात्मक अधिकतम मान होता है और दूसरे आधे चक्र में इसका शिखर मान ऋणात्मक होता है। पहले आधे चक्र में शिखर मान 90 डिग्री पर प्राप्त होता है और दूसरे आधे चक्र में अधिकतम मान 270 डिग्री पर मिलता है इस प्रकार प्रत्यावर्ती धारा का हमे एक cycle में दो बार शिखर मान प्राप्त होता है।


प्रत्यावर्ती धारा का आवर्तकाल


प्रत्यावर्ती धारा एक चक्कर पूरा करने में जितना समय लेती है, उसे उसका आवर्त काल (time period) कहते हैं। इसको अंग्रेजी अक्षर कैपीटल T से प्रर्दशित किया जाता है और इसका मात्रक सेकेण्ड(sec) होता है।

प्रत्यावर्ती धारा या वोल्टेज का आवर्त काल (T)  = प्रत्यावर्ती धारा या वोल्टेज को एक चक्कर घूमने में लगा समय


     T = 2π/w 


    w = कोणीय वेग


क्योंकि प्रत्यावर्ती वोल्टेज का समीकरण V = Vm sin (wt) और प्रत्यावर्ती धारा समीकरण I = Im sin (wt) में t के स्थान पर (t+2π/w) रखने पर वोल्टेज और धारा में कोई बदलाव नहीं आता, अर्थात् प्रत्येक 2π/w समय के बाद दुबारा से पहला चक्र शुरू हो जाता है यही समय प्रत्यावर्ती धारा या वोल्टेज का आवर्त काल कहलाता है।


अब हम प्रत्यावर्ती धारा के आवर्त काल को एक कुण्डली की सहायता से समझेंगे। जितने समय में चुम्बकीय क्षेत्र में घूमती हुई कुण्डली एक चक्कर पूरा करती है, ठीक उतने ही समय में इस कुण्डली से जुड़े परिपथ में उत्पन्न विधुत वाहक बल और धारा पहले एक दिशा में शून्य से अधिकतम और अधिकतम से शून्य हो जाती है। फिर विपरित दिशा में शून्य से अधिकतम और अधिकतम से शून्य हो जाती है। यह प्रक्रिया प्रत्यावर्ती धारा का एक चक्कर कहलाती है।


प्रत्यावर्ती धारा की आवृत्ति


प्रत्यावर्ती धारा या वोल्टेज एक सेकेंड में जितने चक्कर पूरे करती है, उसे उसकी आवृत्ति कहते हैं। या फिर इसकी परिभाषा हम ऐसे भी दे सकते है कि प्रत्यावर्ती धारा के आवर्त काल के व्यूत्क्रमानुपाती को आवृत्ति कहते हैं। इसको अंग्रेजी अक्षर स्मोल f से प्रदर्शित किया जाता है और इसका मात्रक हर्टज(Hz) चक्कर प्रति सेकेण्ड होता है। यदि ac धारा या वोल्टेज का आवर्त काल T है तो, उसकी आवृत्ति


    f = 1/T

   

    f = w/2π


  w को प्रत्यावर्ती धारा या वोल्टेज की कोणीय आवृत्ति भी कहते है इसका मात्रक रेडियन प्रति सेकेण्ड होता है। 

घरेलू उपयोग में आने वाली प्रत्यावर्ती वोल्टेज या धारा की आवृत्ति 50 चक्कर प्रति सेकेण्ड या 50 हर्टज होती है और इसकी कोणीय आवृत्ति 314 रेडियन प्रति सेकेण्ड होती है।


प्रत्यावर्ती धारा का तात्क्षणिक मान


प्रत्यावर्ती धारा के समीकरण में किसी समय t पर जो धारा का मान होता है, उसे तात्क्षणिक मान कहते हैं। जैसे जैसे t का मान बदलता जाता है वैसे वैसे प्रत्यावर्ती धारा का तात्क्षणिक मान भी बदलता है। 


प्रत्यावर्ती धारा की वोल्टेज और धारा में कलान्तर


ac current circuit में वोल्टेज और धारा की आवृत्ति समान होती है, लेकिन यह जरूरी नहीं कि ये दोनों एक ही फेज में हो। यह देखा गया है कि जब परिपथ में वोल्टेज अधिक होती है तो धारा अधिक नहीं होती और उस समय हम कहते है कि दोनों के बीच कलान्तर है। इस कलान्तर का मान परिपथ की प्रकृति पर निर्भर करता है, कलान्तर इस बात पर निर्भर करता है कि परिपथ में ओमीय प्रतिरोध, प्रेरकत्व और धारिता में से कौन सा कारक मोजूद है या इनका कौन-सा संयोग उपस्थित है। कुछ परिपथों में वोल्टेज अधिकतम होने से पहले ही धारा का मान अधिकतम हो जाता है। तब यह कहा जाता है कि धारा, वोल्टेज से कला में अग्रगामी है या वोल्टेज, धारा से कला में पश्चगामी है। यह सब जानकारी हम ac current in hindi के बारे में प्राप्त कर रहे हैं।


औसत मान (avarage value) 


ac current in hindi प्रत्यावर्ती धारा पूरे एक चक्कर के अन्तर्गत पहले आधे चक्र में एक दिशा में और बचे हुए आधे चक्र में विपरित दिशा में प्रवाहित होकर अधिकतम मान को प्राप्त करती है। दोनों आधे भागों में परिवर्तन समान होता है, यानी पूरे एक चक्कर के लिए प्रत्यावर्ती धारा का औसत मान शून्य होता है, परन्तु किसी आधे चक्र के लिए इसका औसत मान शून्य नहीं होता। आधे चक्र के लिए औसत मान 2Im/π=0.637 Im होता है।


यही कारण है कि किसी चल कुण्डली धारामापी में प्रत्यावर्ती धारा प्रवाहित करने पर उसकी सुई में कोई भी हलचल नहीं होती। वास्तव में धारामापी की सुई को ac current के आधे चक्र में, बायी ओर को तथा अगले आधे चक्र में दायी ओर को धक्का लगना चाहिए। यदि धारा की आवृत्ति 50 चक्कर प्रति सेकेण्ड है तो सुई को एक सेकेंड में 100 बार बायी ओर से दायी ओर तथा दायी ओर से बायी ओर जाना होगा। सुई अपने जडत्व के कारण ऐसा नहीं कर सकती, इसलिए वह स्थिर ही बनी रहती है।


ac current in hindi का वर्ग माध्य मूल मान


प्रत्यावर्ती धारा के पूरे एक चक्कर के लिए धारा के वर्ग के औसत मान के वर्गमूल को, इसका वर्ग माध्य मूल मान कहते हैं। इसे Irms से प्रर्दशित किया जाता है।प्रत्यावर्ती धारा का वर्ग माध्य मूल मान दिष्ट धारा के उह मान के बराबर होता है जिससे किसी प्रतिरोध तार में एक सेकेंड में उतनी ही ऊष्मा ऊत्पन्न होती है जितनी ac current द्वारा उत्पन्न होती है। इसको धारा का प्रभावी मान या आभासी मान भी कहते है। 

ac current in hindi के समीकरण I = Im sin (wt) का वर्ग माध्य मूल मान Irms = Im/√2 होता है।


वर्ग माध्य मूल मान के प्रशन को हल कैसे करें- इसको हल करने के लिए सबसे पहले उस प्रशन का वर्ग करते है वर्ग करने पर जो मान प्राप्त होता है फिर उसका औसत मान निकालते हैं। अब जो मान हमे प्राप्त हुआ है इसका वर्गमूल करते है। इस तरह से हमें उस प्रशन का वर्ग माध्य मूल मान प्राप्त हो जाता है।







Er. Chand अक्टूबर 14, 2021
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 चोक coil क्या है

प्रत्यावर्ती धारा परिपथों में विधुत ऊर्जा खर्च हुए बिना, विधुत धारा को कम करने के लिए जिस साधन का उपयोग किया जाता है उसे चोक coil कहते हैं। दिष्ट धारा परिपथ में धारा को नियंत्रित करने के लिए प्रतिरोध का प्रयोग किया जाता है, जहां पर I2R ऊर्जा प्रति सेकेण्ड खर्च होती है। डी सी परिपथों में प्रतिरोध का उपयोग इसलिए किया जाता है क्योंकि डी सी के लिए हमारे पास और कोई साधन नहीं है। चोक coil क्या है आगे इसके बारे में और अच्छे से समझेंगे।

चोक coil की संरचना


चोक कुंडली का कार्य सिद्धांत


चोक coil को बनाने के लिए एक नर्म लौहे की क्रोड पर विधुतरोधी ताॅबे के तार को लपेटा जाता है। इन तारों को पास पास लपेटा जाता है और तार का क्षेत्रफल अधिक यानी के चोक कुण्डली बनाने के लिए एक मोटे तार का प्रयोग किया जाता है ताकि इसके अन्दर भंवर धारा हानि को कम किया जा सके। 
इस चोक coil का ओमीय प्रतिरोध लगभग शून्य रहता है और इसका प्रेरकत्व काफी उच्च रहता है। तारों के अन्दर जो नर्म लौहे की क्रोड होती है इसे आगे पीछे करने के लिए इसमें एक व्यवस्था की जाती है। हम यहां पढ़ रहे है कि चोक coil क्या है कुण्डली के भीतर लौहे की क्रोड को जितनी अधिक दूरी तक प्रविष्ट करा दी जाती है, कुण्डली का प्रेरकत्व और प्रतिबाधा उतनी ही अधिक हो जाती है। कुण्डली का प्रतिरोध नगन्य होने के कारण इसमें विधुत ऊर्जा का गर्मी के रूप में क्षय बहुत ही कम होता है।

चोक का क्या कार्य है

मैंने देखा है कि बहुत से लोग इंटरनेट पर जानना चाहते है कि चोक का क्या कार्य होता है तो चलिए जान लेते है इसका क्या काम होता है, चोक का काम प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में बहने वाली धारा को नियंत्रित करना है अर्थात् उसको आवश्यकता के अनुसार जब कम धारा की जरूरत हो तो कम कर देता है और जब अधिक धारा की आवश्यकता होती है तो धारा को बढ़ा देता है। उम्मीद है कि आप सब समझ गये होगें कि असल में इसका काम होता क्या है।

चोक coil का उपयोग

घरों में प्रयोग की जाने वाली ट्यूब लाइटों, फ्लोरसेंट ट्यूबों और रेडियो में चोक का उपयोग किया जाता है। ट्यूब लाईट में इसको धारा का मान करने के लिए लगाया जाता है, इसे केवल प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में ही प्रयोग किया जा सकता है, डी सी परिपथों में नहीं, क्योंकि दिष्ट धारा की आवृत्ति शून्य होती है, जिसके कारण चोक का प्रेरण प्रतिघात और इसका प्रतिरोध लगभग शून्य ही रहता है। इसलिए डी सी परिपथ में इसका उपयोग करने का कोई फायदा नहीं होता है।

चोक coil क्या है के कुछ महत्वपूर्ण बातें- व्यवहारिक रूप में चोक कुण्डली का ओमीय प्रतिरोध कभी भी शून्य नहीं होता है। क्योंकि प्रतिरोध शून्य केवल आदर्श कुण्डली का हो सकता है, लेकिन आदर्श कुण्डली बनाना सम्भव नहीं है आदर्श चीज सिर्फ एक खयाली पुलाव होती है। कुण्डली के इस सूक्ष्म प्रतिरोध के कारण विधुत ऊर्जा का कुछ हिस्सा ऊष्मा के रूप में व्यय हो जाता है और इसके अतिरिक्त कुछ ऊर्जा क्रोड की शैथिल्य हानि एवं भंवर धारा हानि के कारक भी नष्ट होती है। भंवर धारा हानि के कारण होने वाली हानियों को चोक की क्रोड को पटलित करके कम किया जाता है।

Er. Chand अक्टूबर 09, 2021
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 वाटहीन धारा क्या है

प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में जब ओमीय प्रतिरोध का मान शून्य होता है तो परिपथ में धारा तो प्रवाहित होती है परन्तु व्यय होने वाली औसत शक्ति शून्य होती है, यानी परिपथ में कोई भी ऊर्जा खर्च नहीं होती तो परिपथ में बहने वाली इस धारा को ही वाटहीन धारा कहते है।
जब किसी परिपथ में केवल प्रेरकत्व या संधारित्र है और प्रतिरोध का मान शून्य है तो धारा और वोल्टेज के बीच 90 डिग्री का कलान्तर होता है जिससे परिपथ का शक्ति गुणांक शून्य हो जाता है और सर्किट की पावर भी शून्य हो जाती है
Cos90 = 0
P = V rms × I rms Cos90 = 0
 
इसलिए इस सर्किट में बहने वाली धारा वाटहीन धारा होती है।

इस सिद्धांत का प्रयोग चोक कुण्डली में किया जाता है। शुद्ध प्रेरकत्व वाले प्रत्यावर्ती परिपथ के लिए तात्कालिक धारा I, वोल्टेज V और शक्ति P में वक्र को नीचे फोटो में दिखाया गया है। शक्ति समय वक्र समय अक्ष के सापेक्ष ठीक सममित आता है। इसका मतलब यह है कि एक चक्र के लिए परिपथ में व्यय औसत शक्ति शून्य होती है। एक चौथाई चक्र के दौरान प्रेरक विधुत स्त्रोत से ऊर्जा लेकर अपने अन्दर चुंबकीय क्षेत्र के रूप में संचित करता है, और अगले एक चौथाई चक्र के दौरान प्रेरक का चुंबकीय क्षेत्र शून्य हो जाता है यानी के प्रेरक स्त्रौत से ली गई ऊर्जा को वापस लोटा देता है। इस प्रकार प्रेरक विधुत स्त्रोत से कोई नेट ऊर्जा नहीं लेता है। 

शुद्ध धारिता वाले परिपथ में भी ऐसा ही होता है। संधारित्र एक चौथाई में जितनी ऊर्जा प्रत्यावर्ती स्त्रौत से विधुत क्षेत्र के रूप में लेता है। अगले एक चौथाई चक्र में वह उतनी ही ऊर्जा स्त्रौत को लोटा देता है और फिर अगले आधे चक्र में भी ऐसा ही होता है।
यही कारण है कि प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में धारा नियन्त्रण के लिए प्रेरकत्व और वोल्टेज नियन्त्रण के लिए धारिता को प्रयोग में लाया जाता है। इसके लिए प्रतिदिप्त नलिकाओं में चोक कुण्डली और पंखों में संधारित्र उपयोग में लाये जाते हैं। 
Er. Chand अक्टूबर 08, 2021
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 चुंबकत्व क्या होता है

आज से लगभग 470 साल पहले एशिया माइनर में मैग्नेशिया नामक स्थान पर एक गहरे भूरे व काले रंग का पत्थर पाया गया था, जिसमें लौहे के छोटे-छोटे टुकड़ों को अपनी ओर आकर्षित करने का गुण था। मैग्नेशिया में पाये जाने के कारण इसका नाम मैग्नेटाइट रखा गया। इसी नाम से आधुनिक शब्द मैग्नेट की यानी चुंबक की उत्पत्ति हुई। यह पत्थर लौहे खा आक्साइड होता है, जिसका सूत्र Fe3O4 है। चुंबकत्व क्या होता है- मैग्नेटाइट के इस गुण को जिसके कारण यह लौहे के छोटे-छोटे टुकड़ों को अपनी ओर आकर्षित करता है, चुंबकत्व कहते है। 

प्राकृतिक रूप में पाये जाने के कारण मैग्नेटाइट के टुकड़ों को, प्राकृतिक चुंबक कहते है। यदि किसी प्राकृतिक चुंबक को उसके गुरुत्व केन्द्र से बांधकर लटका दिया जाए, तो वह हमेशा उत्तर-दक्षिण दिशा में ही ठहरता है। इस चुंबक के अन्दर चुंबकत्व बहुत कम होता है। इसलिए यह लौहे के टुकड़ों को अपनी ओर कम आकर्षित करती है। इन्हें प्रायोगिक कार्यो के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाता है। इसके लिए कुछ धातुओं जैसे, लौहा, फौलाद, निकिल और एलनिको जैसी मिश्र धातु से बनायें गए शक्तिशाली चुंबक प्रयोग में लायी जाती है। इस तरह की चुंबक को कृत्रिम चुंबक कहते है। आवश्यकता के अनुसार इन चुंबकों को किसी भी आकार में बनाया जा सकता है। जैसे, दण्ड चुंबक, नाल चुंबक, चुंबकीय सुई जैसी आकृतियों में ढाला जा सकता है। जिन पदार्थों में कृत्रिम रूप से चुंबकत्व ऊत्पन्न किया जा सकता है, उन्हें चुंबकीय पदार्थ कहते है।

चुंबकत्व के गुण (properties of a magnet)


चुंबक चुम्बकीय पदार्थों को अपनी ओर खिंचता है-- जब कभी किसी दण्ड चुंबक को किसी चुम्बकीय पदार्थ के बुरादे या छीलन में डाला जाता है तो वे इस पर चिपक जाते है। चिपके हुए बुरादे की मात्रा चुंबक के सिरों पर अधिकतम और चुंबक के बीच वाले हिस्से पर कम होती है। इससे यह पता लगता है कि चुंबक के किनारों के आस पास चुंबकत्व सबसे अधिक होता है और बीच वाले हिस्से में चुंबकत्व सबसे कम होता है। चुंबक के दोनों किनारों को ध्रुव कहते है। 

• स्वतन्त्रतापूर्वक लटका हुआ चुंबक सदैव उत्तर-दक्षिण दिशा में ठहरता है

यदि किसी चुंबक को एक धागे से बांधकर इस प्रकार लटकाया जाए कि वह एक क्षैतिज तल में स्वतन्त्रतापूर्वक घूम सकें। तो यह चुंबक हमेशा उत्तर-दक्षिण दिशा में ही ठहरता है। यदि हम इसको इसकी सन्तुलन की अवस्था से थोडा घुमा दे तब भी यह वापस उसी दिशा में आ जाता है। तो इस चुंबक का जो किनारा उत्तर दिशा की ओर होता है, उसे उत्तरी ध्रुव और जो किनारा दक्षिण दिशा में ठहरता है, उसे दक्षिणी ध्रुव कहते है।इन ध्रुवों को N और S से व्यक्त किया जाता है।

चुंबक चुम्बकीय पदार्थों में प्रेरण द्वारा चुंबकत्व ऊत्पन्न कर देता है- 
यदि किसी शक्ति शाली चुंबक का कोई ध्रुव नर्म लौहे की छड़ के पास लाया जाता है तो वह छड़ खुद एक चुंबक बन जाती है। इस घटना को चुंबकीय प्रेरण कहते हैं। और छड़ के द्वारा चुंबकत्व प्राप्त करने की क्रिया, चुंबकन कहलाती है। छड़ के उस सिरें पर जो चुंबक के ध्रुव के समीप होता है, विजातीय ध्रुव बनता है, दूसरे सिरें पर सजातीय ध्रुव बनता है।

• दो चुंबकों के सजातीय ध्रुवों में परस्पर प्रतिकर्षण और विजातीय ध्रुवों में परस्पर आकर्षण होता है-

यदि हम किसी स्वतन्त्रतापूर्वक लटके चुंबक से उत्तरी ध्रुव के पास एक अन्य चुंबक का उत्तरी ध्रुव लाते हैं तो हम देखते है कि लटका हुआ चुंबक दूसरे चुंबक से दूर भागता है और यदि हम इस चुंबक के उत्तरी ध्रुव के पास, दूसरी चुंबक का दक्षिणी ध्रुव लाते है, तो हम देखते है कि लककी हुई चुंबक दूसरी चुंबक के नजदीक आती है। तो इससे हमें यह पता चलता है कि एक जैसे ध्रुव एक दूसरे को प्रतिकर्षित करते है और अलग-अलग ध्रुव एक दूसरे को आकर्षित करते है।

धारावाही परिनलिका का चुंबकीय व्यवहार

परिनलिका विधुतरोधी तार की बनी एक एक बेलनाकार कुण्डली होती है जिसका व्यास उसकी लंबाई की अपेक्षा बहुत छोटा होता है। प्रायौगिक रूप में इसे कार्ड बोर्ड या मोटे कागज की कम व्यास की लम्बी खोखली नली के ऊपर ताॅबे के विधुतरोधी तार के बहुत से फेरे पास पास लपेटकर बनाया जाता है। इस परिनलिका में किसी बाहरी स्त्रोत द्वारा विधुत धारा प्रवाहित करने पर इसके चारों ओर, अन्दर ओर बाहर के स्थान में चुंबकीय क्षेत्र ऊत्पन्न हो जाता है। जिससे यह एक दण्ड चुंबक की तरह व्यवहार करने लगती है। 
यहां पर हमने जाना है कि किसी चुंबक का चुंबकत्व क्या होता है और इसके गुण क्या क्या होते है और एक धारावाही परिनलिका में चुंबकीय क्षेत्र कैसे बनता है। इन सब के बारे में हमने इस पोस्ट में जाना है पोस्ट को पढ़ने के बाद अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर दिजियेगा।

Er. Chand अक्टूबर 07, 2021
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magnetic circuit questions and answers


 बारहवीं कक्षा की परिक्षाओं में पूछें जाने वाले चुंबकीय परिपथ से प्रशनों को यहां पर डिस्कश किया गया है। जितने भी अभी तक आपकी परिक्षा में magnetic circuit questions and answers पूछें गए है उन्ही में से कुछ महत्वपूर्ण प्रशन उत्तर को दिखाया गया है जो आपकी परिक्षा के लिए काफी फायदेमंद साबित होंगे

प्र-1 गतिशील आवेश उत्पन्न करता है :

(अ) केवल विधुत क्षेत्र
(ब) केवल चुम्बकीय क्षेत्र
(स) विधुत क्षेत्र और चुम्बकीय क्षेत्र दोनों
(द) विधुत क्षेत्र और चुम्बकीय क्षेत्र में से कोई नहीं
उत्तर-विधुत क्षेत्र और चुम्बकीय क्षेत्र दोनों

प्र-2 चुम्बकीय क्षेत्र की त्रिवता का मात्रक होता है : 

(अ) वेबर/मीटर
(ब) वेबर/मीटर वर्ग
(स) वेबर
(द) वेबर × मीटर
उत्तर-- वेबर/मीटर वर्ग

प्र-3 बाॅयो सेवर्ट के नियम अनुसार B और r में क्या सम्बन्ध है :

(अ) B समानुपाती r
(ब) B समानुपाती 1/r
(स) B समानुपाती r के वर्ग के
(द) B समानुपाती 1/r का वर्ग
उत्तर-- B समानुपाती 1/r का वर्ग

प्र-4 इनमें से कौन-सा चुम्बकीय क्षेत्र की त्रिवता का मात्रक नहीं है :

(अ) टेस्ला
(ब) वेबर/मीटर वर्ग
(स) न्यूटन/एम्पीयर-मीटर
(द) न्यूटन/ऐम्पीयर वर्ग
उत्तर-- न्यूटन/ऐम्पीयर वर्ग

प्र-5 एक समान चुम्बकीय क्षेत्र B में बल रेखाओं के समांतर एक इलैक्ट्रोन जिसका आवेश e है, वेग v से चलता है। तो इलैक्ट्रोन पर लगने वाला बल है :

(अ) evB
(ब) ev/B
(स) शून्य
(द) Bv/e
उत्तर-- शून्य

प्र-6 किसी एक समान चुम्बकीय क्षेत्र में एक इलैक्ट्रोन क्षेत्र के लम्बवत दिशा में प्रवेश करता है। तो इलैक्ट्रोन का पथ होगा : 

(अ) परवलयाकार
(ब) दीर्घवृत्ताकार
(स) वृत्ताकार
(द) सरल रेखा
उत्तर-- वृत्ताकार

प्र-7 क्षैतिज दिशा में v वेग से चलता हुआ एक इलैक्ट्रोन ऐसे स्थान में प्रवेश करता है जहां एक समान चुम्बकीय क्षेत्र ऊर्ध्वाधर दिशा में है। तो इस स्थान में इलैक्ट्रोन का पथ होगा :

(अ) क्षैतिज तल में एक वृत्त

(ब) ऊर्ध्वाधर तल में एक वृत्त

(स) क्षैतिज से 45 डिग्री कोण पर एक सरल रेखा

(द) क्षैतिज तल में एक परवलय

उत्तर-- क्षैतिज तल में एक वृत्त

प्र-8 एक इलैक्ट्रोन एक समान चुम्बकीय क्षेत्र B में क्षेत्र के लम्बवत v वेग से गमन करता है। अचानक चुम्बकीय क्षेत्र घटकर B/2 रह जाता है। तो पथ की प्रारंभिक त्रिज्या r का मान अब हो जायेगा : 

(अ) घटकर r/2
(ब) बढ़कर 2r
(स) बढ़कर 4r
(द) घटकर r/4
उत्तर-- बढ़कर 2r

प्र-9 यदि आवेशित कण का वेग दोगुना और चुम्बकीय क्षेत्र का मान आधा कर दिया जाए तो आवेशित कण के मार्ग की त्रिज्या हो जायेगी : 

(अ) 8 गुणी
(ब) 2 गुणी
(स) 4 गुणी
(द) 3 गुणी
उत्तर-- 4 गुणी

प्र-10 एक आवेशित कण चुम्बकीय क्षेत्र में क्षेत्र की दिशा से 30 डिग्री कोण पर प्रवेश करता है। कण का पथ होगा :

(अ) वृत्ताकार
(ब) कुण्डलीनीवत
(स) दीर्घवृत्ताकार
(द) सरल रेखा
उत्तर-- कुण्डलीनीवत

प्र-11 दो समांतर तारों में यदि धारा एक ही दिशा में बह रही हो तो वे एक दूसरे को आकर्षित करते है। क्योंकि :

(अ) उनके बीच विभवान्तर होता है
(ब) उनके बीच अन्योन्य प्रेरकत्व होता है
(स) उनके बीच वैधुत बल कार्य करता है
(द) उनके बीच चुम्बकीय बल कार्य करता है
उत्तर-- उनके बीच चुम्बकीय बल कार्य करता है

प्र-12 किसी चुम्बकीय क्षेत्र की त्रिवता की दिशा होती है :

(अ) चुम्बकीय क्षेत्र में गतिमान आवेशित कण पर कार्य करने वाले बल की दिशा में
(ब) चुम्बकीय क्षेत्र में गतिमान आवेशित कण पर कार्य करने वाले बल के लम्बवत
(स) चुम्बकीय क्षेत्र में वह दिशा जिसके अनुदिश गतिमान आवेश पर कोई बल कार्य नहीं करता है
(द) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-- चुम्बकीय क्षेत्र में वह दिशा जिसके अनुदिश गतिमान आवेश पर कोई बल कार्य नहीं करता है

प्र-13 जब किसी चुम्बकीय द्विध्रुव को एक समान चुम्बकीय क्षेत्र में रखा जाता है तो यह अनुभव करता है :

(अ) एक बल का परन्तु कोई बल-युग्म नहीं
(ब) एक बल-युग्म का परन्तु कोई बल नहीं
(स) एक बल और एक बल-युग्म का
(द) न बल और न बल-युग्म
उत्तर-- एक बल-युग्म का परन्तु कोई बल नहीं

प्र-14 चुम्बकीय आघूर्ण का मात्रक है :

(अ) न्यूटन/ऐम्पीयर मीटर
(ब) ऐम्पीयर मीटर वर्ग
(स) वेबर/मीटर वर्ग
(द) हेनरी
उत्तर-- (ब) ऐम्पीयर मीटर वर्ग

प्र-15 ध्रुव प्रबलता का मात्रक है :

(अ) ऐम्पीयर मीटर वर्ग
(ब) ऐम्पीयर मीटर
(स) ऐम्पीयर/मीटर
(द) ऐम्पीयर/मीटर वर्ग
उत्तर-- (ब) ऐम्पीयर-मीटर

प्र-16 चुम्बकीय याम्योत्तर और भौगोलिक याम्योत्तर के बीच के कोण को कहते है :

(अ) नति कोण
(ब) दिकपात कोण
(स) ध्रुवण कोण
(द) क्रान्तिक कोण
उत्तर-- (ब) दिकपात कोण

प्र-17 पृथ्वी के चुम्बकीय ध्रुवों पर नमन कोण (नति कोण) का मान है :

(अ) 45 
(ब) 30 
(स) 0 
(द) 90 
उत्तर-- (द) 90 

प्र-18 किसी स्थान पर पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र के क्षैतिज घटक और ऊर्ध्वाधर घटक बराबर है तो उस स्थान पर नति कोण क्या होगा :

(अ) 0
(ब) 45
(स) 60
(द) 90
उत्तर-- (ब) 45 

प्र-19 पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का ऊर्ध्वाधर घटक शून्य होता है :

(अ) चुम्बकीय ध्रुवों पर 
(ब) भौगोलिक ध्रुवों पर
(स) प्रत्येक स्थान पर
(द) चुम्बकीय निरक्ष पर 
उत्तर-- (द) चुम्बकीय निरक्ष पर 

प्र-20 पृथ्वीज्ञके चुम्बकीय क्षेत्र का क्षैतिज घटक शून्य होता है :

(अ) चुम्बकीय ध्रुवों पर
(ब) भौगोलिक ध्रुवों पर
(स) प्रत्येक स्थान पर
(द) चुम्बकिय निरक्ष पर
उत्तर-- (अ) चुम्बकीय ध्रुवों पर

प्र-21 दो चुम्बकीय बल रेखायें :

(अ) उदासीन बिन्दु पर एक दूसरे को काटती है
(ब) उत्तरी या दक्षिणी ध्रुव के निकट काटती है
(स) एक दूसरे को कभी नहीं काटती
(द) चुम्भक के मध्य में काटती है
उत्तर-- (स) एक दूसरे को कभी नहीं काटती

प्र-22 लौह चुम्बकीय पदार्थों के लिए आपेक्षिक चुम्बकशीलता होती है :

(अ) <1
(ब) =1
(स) >1
(द) >>1
उत्तर-- (द) >>1

प्र-23 अनुचुम्बकीय पदार्थों की चुम्बकशीलता का मान :

(अ) एक से कम 
(ब) कम लेकिन एक से अधिक
(स) एक
(द) एक से बहुत अधिक
उत्तर-- (ब) कम लेकिन एक से अधिक

प्र-24 प्रतिचुम्बकीय पदार्थों की चुम्बकशीलता :

(अ) एक से बहुत अधिक
(ब) एक 
(स) एक से कम 
(द) एक से थोडा अधिक
उत्तर-- (स) एक से कम

प्र-25 डोमेन किस पदार्थ से बनते है :

(अ) प्रतिचुम्बकीय
(ब) लौह चुम्बकीय
(स) अनुचुम्बकीय
(द) इनमें से सभी में
उत्तर-- (ब) लौह चुम्बकीय

प्र-26 विधुत चुम्बक बनाने के लिए सबसे उचित धातु है :

(अ) नर्म लौहा
(ब) स्टील
(स) ताॅबा
(द) निकेल
उत्तर-- (अ) नर्म लौहा

प्र-27 वह ताप जिससें नीचें चुम्बकीय पदार्थ लौह चुम्बकीय और उससे ऊपरज्ञताप पर अनुचुम्बकीय होता है :

(अ) उत्क्रमण ताप
(ब) केल्विन ताप
(स) क्यूरी ताप
(द) उदासीन ताप
उत्तर-- (स) क्यूरी ताप

प्र-28 उदासीन बिन्दुओं पर :

(अ) B>H
(ब) B<H
(स) B=H
(द) B=0
उत्तर-- (स) B=H

प्र-29 चुम्बकीय पारगम्यता का एस आई प्रणाली में मात्रक क्या होता है ?

न्यूटन/ऐम्पीयर वर्ग

प्र-30 किस भौतिक राशि का मात्रक न्यूटन/ऐम्पीयर-मीटर होता है ?

चुम्बकीय क्षेत्र का

प्र-31 चुम्बकीय क्षेत्र के मात्रक न्यूटन/ऐम्पीयर मीटर को बताने वाला मूल सूत्र लिखिए।

F = BiL
B = F/iL   न्यूटन/ऐम्पीयर मीटर

प्र-32 सदिश रूप में लाॅरेंज बल का सूत्र लिखिए।

F = q ( v × B ) 
इस सूत्र में v हमेशा पहले लिखेगें और B को बाद में क्योंकि सदिश में कभी भी (v×B) और (B×v) बराबर नहीं होते इसलिए (v×B) वाला ही सही हल माना जाएगा।
Er. Chand सितंबर 06, 2021
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 अर्धचालक पर तापमान का प्रभाव


अर्धचालक दो प्रकार के होते है जिसमें पहला प्रकार होता है आन्तरिक या निज अर्धचालक और दूसरा प्रकार होता है बाह्मा अर्धचालक, इसलिए दोनों प्रकार के अर्धचालक पर तापमान का प्रभाव अलग-अलग होता है। पहले हम बात करेंगे आन्तरिक अर्धचालक के प्रतिरोध पर तापमान बढ़ाने से क्या होता है।

सिलिकाॅन और जर्मेनियम आन्तरिक अर्धचालक होते है इनकी बाहरी कक्षा में चार इलैक्ट्रोन होते है जो बन्ध बनाने में व्यस्थ रहते है।परम शून्य ताप पर ये अर्धचालक एक विधुतरोधी की तरह व्यवहार करता है लेकिन जैसे ही इसका तापमान बढ़ाया जाता है तो सिलिकॉन या जर्मेनियम की बहारी कक्षा में जो चार इलैक्ट्रोन उपस्थित होते है उनके बीच के बन्ध टूट जाते है और ये इलैक्ट्रोन इधर उधर घूमने लगते है। अब यदि इस अर्धचालक के सिरों पर एक बैटरी को जोड़ दिया जाए तो इस अर्धचालक के अन्दर विधुत धारा प्रवाहित होने लगेंगीं। इससे हमें पता चलता है कि आन्तरिक अर्धचालक का प्रतिरोध तापमान बढ़ाने पर कम हो जाता है।

अब बात करेंगे हम बाह्मा अर्धचालक की बाह्मा अर्धचालक दो प्रकार के होते है n-प्रकार और p_प्रकार तो यहां पहले देखते है n-प्रकार के अर्धचालक पर तापमान का क्या प्रभाव पड़ता है।


n-type अर्धचालक

n-प्रकार के अर्धचालक को बनाने के लिए पांच संयोजकता वाला अपद्रव्य फास्फोरस, सिलिकॉन या जर्मेनियम में मिलातें है। फास्फोरस की बाहरी कक्षा में पांच इलैक्ट्रोन होते है जिनमें से चार इलैक्ट्रोन सिलिकॉन या जर्मेनियम के चार इलैक्ट्रोनों के साथ बन्ध बना लेते है और एक इलैक्ट्रोन बच जाता है और ये इधर उधर घूमता रहता है यानी के n-प्रकार अर्धचालक में पहले से फ्री इलैक्ट्रोन होते है और यह परम शून्य ताप पर भी एक चालक की तरह व्यवहार करता है। यदि इसका तापमान बढ़ाते है तो बन्ध बनाने वाले इलैक्ट्रोन भी फ्री हो जाते है जिससे फ्री इलैक्ट्रोनों की संख्या अधिक हो जाती है और ये इलैक्ट्रोन एक दूसरे से टकराने लगते है और इनके मार्ग में रुकावट पैदा हो जाती है जिससे विधुत धारा के मार्ग में भी रुकावट पैदा हो जाती है इसलिए इसका तापमान बढ़ाने पर प्रतिरोध बढ़ जाता है।


p-type अर्धचालक

p-प्रकार के अर्धचालक को बनाने के लिए तीन संयोजकता वाला अपद्रव्य एल्यूमीनियम, सिलिकॉन या जर्मेनियम में मिलातें है। एल्यूमिनियम की बाहरी कक्षा में तीन इलैक्ट्रोन होते है जो सिलिकॉन या जर्मेनियम के इलैक्ट्रोनों से बन्ध बना लेते है और कोई भी इलैक्ट्रोन फ्री नहीं होता है इसलिए यह परम शून्य ताप पर एक विधुतरोधी की तरह व्यवहार करता है और तापमान बढ़ाने पर इलैक्ट्रोनों के बन्ध टूट जाते है जिससे इसमें आसानी से विधुत धारा प्रवाहित होने लगती है, इसलिए इसका तापमान बढ़ाने पर प्रतिरोध कम हो जाता है।

इस लेख में हमने यह जाना है कि अर्धचालक पर तापमान का प्रभाव से क्या होता है उम्मीद करता हूं कि आप जान गए होंगे। पोस्ट अच्छी लगी है तो कमेंट करके जरूर बताइए और आपको और किसी टोपिक के बारे में जानकारी चाहिए तो आप कमेंट करके हमें बता सकते है।

Er. Chand सितंबर 04, 2021
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capecitor questions class 12 in hindi


 हैलो दोस्तो कैसे आप सब स्वागत है आपका आज के हमारे इस पोस्ट में जिसमें हम बात करने वाले है capecitor questions class 12 के बारे में, अगर आप कक्षा बारहवीं के विद्यार्थी हो तो ये प्रश्र उत्तर आपके लिए बहुत महत्वपूर्ण होने वाले, जोकि आपकी परिक्षा में सफलता दिलाने में बहुत मददगार साबित होंगे। एक बार आप इनको जरूर पढ़िए कहि ना कहीं ये आपके लिए फायदेमंद साबित जरूर होंगे।

प्र_1 परावैधुत से क्या तात्पर्य है ? सिलिकाॅन, माइका और कार्बन में से कौन परावैधुत है ?

परावैधुत वे अचालक पदार्थ होते है जिनमें विधुत प्रवाह बिना आवेशों की गति के संचरित होता है। माइका एक परावैधुत पदार्थ है।

प्र_2 किसी चालक की वैधुत धारिता से क्या तात्पर्य है ?

किसी चालक द्वारा विधुत आवेश को ग्रहण करने की क्षमता को उस चालक की विधुत धारिता कहते है। 

प्र_3 धारिता का मात्रक क्या होता है ?

धारिता का एस आई मात्रक फैरड होता है इसे F से प्रर्दशित किया जाता है।

प्र_4 फैरड की परिभाषा दिजिए या धारिता के एस आई मात्रक की परिभाषा दिजिए ?

यदि किसी चालक को एक कूलाॅम आवेश देने से उसके विभव में एक वोल्ट की वृद्धि हो जाये तो उसकी धारिता एक फैरड कहलाती है।

प्र_5 संधारित्र क्या है ?

यह एक ऐसी युक्ति है जो किसी चालक के आकार में परिवर्तन किये बिना उसकी धारिता बढ़ाने के प्रयोग में लायी जाती है। असल में यह एक ऊर्जा या आवेश को संग्रहित करने का साधन है। जिसके अन्दर दो चालक प्लेट होती है जिनमें परावैधुत पदार्थ भरा होता है।

प्र_6 संधारित्र की धारिता की परिभाषा दिजिए ?

किसी संधारित्र की धारिता इसकी मुख्य प्लेट को दिये गये आवेश और उसकी दोनों प्लेटों के बीच विभवान्तर के अनुपात के बराबर होती है।

प्र_7 किसी समांतर प्लेट संधारित्र की धारिता किन किन कारकों पर निर्भर करती है ?

(1) प्लेटों के क्षेत्रफल पर
(2) प्लेटों के बीच की दूरी पर
(3) प्लेटों के बीच उपस्थित परावैधुत पदार्थ पर

प्र_8 यदि संधारित्र की प्लेटों के बीच में कोई चालक धातु सम्पूर्ण स्थान में रख दीं जाये तो क्य होगा ?

यदि संधारित्र की प्लेटों के बीच सम्पूर्ण स्थान में कोई चालक धातु रख दीं जाये तो प्लेटों के विपरित आवेश मिलकर संधारित्र को निरावेशित कर देंगे।

प्र_9 एक समांतर प्लेट संधारित्र की प्लेटों के बीच किन्हीं दो बिन्दुओं पर विधुत क्षेत्र की त्रिवताओं में क्या अनुपात होगा ?

समांतर प्लेट संधारित्र की प्लेटों के बीच विधुत क्षेत्र एक समान होता है इसलिए प्लेटों के बीच किन्हीं दो बिन्दुओं पर विधुत क्षेत्र का अनुपात 1:1 होगा।

प्र_10 उस चालक का नाम बताइए जिसकी धारिता अनन्त होती है ?

पृथ्वी की धारिता अनन्त होती है।

प्र_11 किसी संधारित्र में परावैधुत का क्या कार्य होता है ?

परावैधुत संधारित्र की प्लेटों के बीच विधुत क्षेत्र की विपरित दिशा में ध्रुवित होकर प्लेटों के बीच विभवान्तर कम करके उसकी धारिता बढ़ाता है।

प्र_12 निर्वात या वायु की निरपेक्ष विधुतशीलता का एस आई मात्रक लिखिए ?

(कूलाॅम वर्ग/न्यूटन-मीटर वर्ग) इसका एक दूसरा मात्रक भी होता है जिसे (फैरड/मीटर) कहते है।
Er. Chand अगस्त 28, 2021
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कूलाॅम के नियम की खोज वर्ष 1785 में फ्रांसीसी वैज्ञानिक चार्ल्स आगास्टिन कूलाॅम (Charles Augustin Coulomb) ने अपने प्रायोगिक तथ्यों के आधार पर दो विधुत आवेशों के बीच कार्य करने वाले बल के सम्बन्ध में एक नियम स्थापित किया,जिसे कूलाॅम का नियम कहते है।

उन्होंने प्रयोग करते समय देखा कि दो विधुत आवेशों के बीच एक बल कार्य करता है,जिसे विधुत बल कहते है। यदि दोनों आवेश समान प्रकृति के है तो उनके बीच यह बल प्रतिकर्षण और यदि दोनों आवेश अलग-अलग प्रकृति के है तो उनके बीच में यह बल आकर्षण होता है। विधुत आवेश चाहें किसी भी माध्यम में हो उनके बीच यह बल हमेशा कार्य करता है।

          कूलाॅम का नियम

किन्हीं दो स्थिर बिन्दु आवेशों के बीच लगने वाला आकर्षण या प्रतिकर्षण विधुत बल दोनों आवेशों की मात्रा के गुणनफल के अनुक्रमानुपाती और उनके बीच की दूरी के वर्ग के व्यूत्क्रमानुपाती होता है। 
माना दो स्थिर आवेश q1 व q2 एक दूसरे से r दूरी पर स्थित है तो उनके बीच कार्य करने वाला विधुत बल
यहां पर E० को वायु या निर्वात की विधुतशीलता कहते है। इसको एप्साइलन जीरो पढ़ा जाता है। 
इसका मात्रक (कूलाॅम वर्ग/न्यूटन-मीटर वर्ग) होता है
यदि आवेशों के बीच में वायु या निर्वात के स्थान पर कोई दूसरा परावैधुत हो उनके बीच लगने वाला विधुत बल कम हो जाता है।

         कूलाॅम के नियम का महत्व

कूलाॅम का नियम बहुत कम दूरीयों (पिको मीटर) से लेकर बहुत अधिक दूरीयों (कई किलोमीटर) तक के प्रयोग किया जा सकता है। कूलाॅम के नियम से न केवल आवेशित वस्तुओं के बीच कार्य करने वाले विधुत बल का पता लगाया जाता है इससे उन बलो का भी मान निकाला जाता है जिनके कारण कक्षीय इलैक्ट्रोन नाभिक के साथ बॅधकर परमाणु की रचना करते है हमारे दैनिक जीवन में अनुभव किये जाने वाले अधीकतर बल भी विधुत बल ही होते है।


Er. Chand अगस्त 27, 2021
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 किसी विधुत आवेश या किसी विधुत आदेशों के समूह के चारों ओर का वह क्षेत्र जिसके अन्दर किसी दूसरे आवेशित कण को लाये जाने पर यदि यह कण इस क्षेत्र में एक आकर्षण बल या प्रतिकर्षण बल का एहसास करता है। तो ऐसा क्षेत्र विधुत क्षेत्र कहलाता है।

किसी भी कण को विधुत क्षेत्र में तभी कहां जा सकता है जब वह कण उस क्षेत्र में एक स्थार बल का एहसास करता है विधुत क्षेत्र का सबसे पहले वैज्ञानिक फैराडें ने पता लगाया था।

विधुत क्षेत्र की त्रिवता

विधुत क्षेत्र में किसी बिन्दु पर रखें परिक्षण आवेश पर लगने वाले विधुत बल और उस परिक्षण आवेश का अनुपात विधुत क्षेत्र की त्रिवता कहलाता है। विधुत क्षेत्र की त्रिवता को E से प्रदर्शित किया जाता है।

विधुत क्षेत्र की त्रिवता का सूत्र


माना विधुत क्षेत्र में किसी बिन्दु पर रखें परिक्षण आवेश q लगने वाला विधुत बल F है तो उस बिंदु पर विधुत क्षेत्र की त्रिवता
              E = F / q

विधुत बल एक सदिश राशि है इसलिए विधुत क्षेत्र की त्रिवता भी एक सदिश राशि होगी। जिस दिशा में विधुत बल लगता है वही विधुत क्षेत्र की त्रिवता की दिशा होती है या विधुत क्षेत्र में रखा धनावेश जिस दिशा में चलने का प्रयत्न करता है वह दिशा भी विधुत क्षेत्र की दिशा होती है।

विधुत क्षेत्र की त्रिवता का मात्रक

एस आई पद्धति में विधुत बल का मात्रक न्यूटन और आवेश का एस आई मात्रक कूलाॅम होता है इसी के आधार पर विधुत क्षेत्र की त्रिवता का मात्रक न्यूटन/कूलाॅम होता है।
विधुत क्षेत्र की त्रिवता का दूसरा एस आई मात्रक वोल्ट/मीटर भी होता है।

1 न्यूटन/कूलाॅम विधुत क्षेत्र की त्रिवता की परिभाषा

यदि किसी विधुत क्षेत्र में किसी बिन्दु पर रखें 1 कूलाॅम के परिक्षण आवेश पर 1 न्यूटन का बल लग रहा है तो उस बिंदु पर विधुत क्षेत्र की त्रिवता का मान 1 न्यूटन/ कूलाॅम होगा।
Er. Chand अगस्त 23, 2021
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 ओम के नियम का प्रयोग करके सिर्फ सरल और छोटे परिपथों में धारा और वोल्टेज निकाली जा सकती है ऐसे परिपथ जिनमें बहुत सारे प्रतिरोध और काफी सारे वोल्टेज सोर्स जुड़े होते है ऐसे परिपथों में ओम का नियम फैल हो जाता है और धारा और वोल्टेज निकाल नहीं पाता है। तो ऐसे परिपथों में धारा और वोल्टेज को निकालने के लिए वैज्ञानिक गुस्ताव राॅबर्ट किरचाॅफ ने सन् 1842 में दो नियम को स्थापित किया और तभी से इन नियमों को किरचाॅफ के नियम यानी Kirchhoff's laws कहां जाता है।

         किरचाॅफ का पहला नियम

किसी विधुत परिपथ में किसी भी सन्धि पर मिलने वाली सभी धाराओं का बिजगणितिय जोड़ शून्य होता है या दूसरे शब्दों में ऐसा भी कह सकते है। किसी सन्धि पर आने वाली धाराओं का जोड उस सन्धि से बाहर जाने वाली धाराओं के जोड़ के बराबर होता है।
किरचाॅफ के पहले नियम को धारा नियम और सन्धि नियम के नाम से भी जाना जाता है
किरचाॅफ के नियम को प्रयुक्त करते समय चिन्हों का ध्यान रखना बहुत जरूरी होता है। इसलिए सन्धि की और आने वाली धारा को धनात्मक (+) लेते है और सन्धि से बाहर जाने वाली धारा को ऋणात्मक (-) लेते है। 

मान लेते है हमारे पास पांच प्रतिरोध R1, R2, R3,R4 और R5 है जिनके सिरे सन्धि O पर जुड़े हुए है। जैसा इस फोटो में दिखाया गया है। और इनमें प्रवाहित विधुत धारा I1,I2,I3,I4 व I5 है। कुछ धारा सन्धि की ओर आ रही है और कुछ धारा सन्धि से बाहर की ओर जा रही है तो किरचाॅफ के पहले नियम के अनुसार


          +I1 + I2 - I3 + I4 - I5 = 0

           I1 + I2 + I4 = I3 + I5

इस नियम से यह पता चलता है कि यदि किसी परिपथ में स्थायी धारा प्रवाहित होती है तो परिपथ की किसी भी सन्धि पर न तो कोई आवेश ऊत्पन्न होता है और न ही वहां से कोई हटाया जा सकता है। इस प्रकार यह नियम आवेश संरक्षण के नियम को व्यक्त करता है।


     किरचाॅफ का दूसरा नियम

किसी विधुत परिपथ के बन्द पाश के विभिन्न खण्डों प्रवाहित होने वाली धारा और उसके प्रतिरोधों के गुणनफल का बिजगणितिय योग उस बन्द पाश में लगने वाले सभी वोल्टेज सोर्सो के विधुत वाहक बल के बिजगणितिय योग के बराबर होता है।
Kirchoff's laws के इस नियम में किसी प्रतिरोध के अनुदिश धारा की दिशा में चलने पर धारा और प्रतिरोध का गुणनफल धनात्मक लिया जाता है और धारा के विपरित दिशा में चलने पर धारा और प्रतिरोध का गुणनफल ऋणात्मक लिया जाता है।
किसी वोल्टेज सोर्स के अनुदिश ऋणात्मक सिरे से धनात्मक सिरे की और चलने पर विधुत वाहक बल धनात्मक लिया जाता है और धनात्मक से ऋणात्मक सिरे की और चलने पर विधुत वाहक बल ऋणात्मक लिया जाता है।

जैसा कि इस फोटो में दिखाया गया है एक विधुत परिपथ में दो सैलों को जिनके विधुत वाहक बल E1 और E2 है। इस परिपथ में तीन प्रतिरोध लगें हुए है जिनके मान R1, R2, R3 है। R1 व R2 में प्रवाहित होने वाली धारा I1 व I2 है। I1 विधुत धारा E1 सैल के द्वारा और I2 विधुत धारा E2 सैल के द्वारा प्रवाहित हो रही है।
प्रतिरोध R3 में धारा का मान (I1+I2) होगा। क्योंकि I1 व I2 धारा बिन्दु D की और आ रही है। इसलिए दोनों धारा किरचाॅफ के पहले नियम के अनुसार जुड़ जायेंगी।

बन्द पाश (1) के लिए किरचाॅफ का दूसरा नियम प्रयोग करने पर
               I1×R1 - I2×R2 = E1 - E2

इसी प्रकार बन्द पाश (2) के लिए किरचाॅफ का दूसरा नियम प्रयोग करने पर

              I2×R2 + ( I1 + I2 ) R3 = E2 

इस प्रकार इन दिनों समीकरणों को हल करने पर प्रतिरोधों में प्रवाहित धाराओं का मान ज्ञात कर लिया जाता है।

किरचाॅफ के दूसरे नियम को वोल्टेज नियम और लूप नियम से भी जाना जाता है। यह नियम ऊर्जा संरक्षण के नियम को व्यक्त करता है।

Er. Chand अगस्त 22, 2021
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 आज की इस पोस्ट में हम जानेंगे कि नोडल ऐनालेशिस क्या होता है। इसका प्रयोग क्यो किया जाता है और इसके द्वारा किस चीज को निकाला जाता है।

नोडल ऐनालेशिस के द्वारा  परिपथों के नोड का वोल्टेज निकाला जाता है। जिन परिपथों में ओम के नियम या किरचाॅफ के नियम से वोल्टेज नहीं निकलती है वहां पर नोडल ऐनालेशिस का प्रयोग करके उस परिपथ के नोड का वोल्टेज ज्ञात किया जाता है। 

या जिन परिपथों में बहुत सारे वोल्टेज सोर्स या करंट सोर्स लगें होते है और देखने में ये परिपथ बहुत कठिन दिखाई देते है तो ऐसे परिपथों में भी नोडल ऐनालेशिस के द्वारा ही नोड का वोल्टेज निकाला जाता है।

नोडल ऐनालेशिस को किसी भी परिपथ में अप्लाई करने से पहले कुछ बातों का ध्यान रखना बहुत जरूरी होता है। इन बातों को में आपको स्टेप बाई स्टेप निचे बता रहा हूं।

• स्टेप नम्बर एक

सबसे पहले जिस परिपथ को नोडल ऐनालेशिस से हल करना है उस परिपथ में नोड की संख्या देखेंगे कितनी है।

• स्टेप नम्बर दो

फिर उसमें से एक नोड को रिफरेंस मान लेते है यानी के उस नोड के वोल्टेज को शून्य (0V) मान लेते है। आपको ऐसे नोड के वोल्टेज को शून्य मानना है जिससे परिपथ हल करने में आसानी हो।

• स्टेप नम्बर तीन

परिपथ के जिस नोड का वोल्टेज निकल सकता है उसे निकाल लेते है और जिस नोड का वोल्टेज आसानी से नहीं निकलता उसे V1,V2 आदि मान लेंगे।

• स्टेप नम्बर चार

उसके बाद परिपथ में नोडल ऐनालेशिस अप्लाई करके V1,V2 आदि के मान निकाल लेते है।

तो इस तरह से नोडल ऐनालेशिस का प्रयोग करके नोड का वोल्टेज ज्ञात किया जाता है।


उम्मीद करता हूं कि आप सब समझ गये होगें कि कैसे नोडल ऐनालेशिस का प्रयोग करके नोड का वोल्टेज निकाला जाता है। अगर आपको यह पोस्ट अच्छी लगी है या आप का कोई सवाल है तो आप हमें कमेंट करके जरूर बताइए।



Er. Chand अगस्त 21, 2021
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                       प्रतिरोध क्या है               


किसी पदार्थ का वह गुण जो उसमें बहने  वाली धारा के रास्ते में रुकावट पैदा करता है उसे उस पदार्थ का प्रतिरोध (Resistance) कहते हैं। हर पदार्थ का प्रतिरोध अलग अलग होता है। जो उस पदार्थ की प्रकृति, लंबाई, क्षेत्रफल ओर पदार्थ के तापमान पर निर्भर करता है।
प्रतिरोध का S.I मात्रक ओम (ohm) होता है।
प्रतिरोध एक अदिश राशि होती है।
प्रतिरोध को अंग्रेजी अक्षर R से प्रदर्शित करते है।

 किसी चालक के सिरों पर लगने वाला विभवांतर V और उस चालक में बहने वाली विधुत धारा के अनुपात को उस चालक का प्रतिरोध कहते है।
          
                

                रेजिस्टेंस का फार्मूला

                         R = V / I


चालक के प्रतिरोध पर तापमान का प्रभाव

चालक का तापमान बढ़ाने पर बन्द (bond) टूटते हैं । जिसके कारण फ्री इलैक्ट्रोन की संख्या बढ़ जाती है और ये इलैक्ट्रोन एक दूसरे से टकराने लगते हैं । जिससे इनके पाथ में रुकावट आ जाती हैं । और चालक का प्रतिरोध बढ़ जाता हैं ।

चालक का प्रतिरोध तापमान बढ़ाने पर बढ़ता है और अर्धचालक का प्रतिरोध तापमान बढ़ाने पर कुछ का घटता है और कुछ अर्धचालक का प्रतिरोध बढ़ता हैं ।
अर्धचालक दो प्रकार के होते हैं

(1) अन्त: द्रविय अर्धचालक (सीलिकन, जर्मेनियम)

अन्त:द्रविय अर्धचालक का तापमान बढ़ाने पर इनका प्रतिरोध कम होता हैं क्योंकि इन अर्धचालको में पहले से फ्री इलैक्ट्रोन नहीं होते हैं ज़ीरो केल्विन या एब्सोल्यूट जीरो पर ये insulator की तरह व्यवहार करते हैं क्योंकि इनके इलैक्ट्रोन बन्द (bond) बनाने में वयस्थ रहते हैं । लेकिन जब हम इनका तापमान बढ़ते हैं तो ये इलैक्ट्रोन फ्री हो जाते हैं और इधर उधर घूमने लगते हैं इस कारण इनका प्रतिरोध कम हो जाता हैं ।


(2) ब्राहा: द्रविय अर्धचालक (n- प्रकार, p-प्रकार)

ब्राहा: द्रविय अर्धचालक  का तापमान बढ़ाने पर इनका प्रतिरोध बढ़ जाता है क्योंकि इन अर्धचालको में पहले से फ्री इलैक्ट्रोन होते हैं और जब हम इनका तापमान बढ़ाते हैं तो ये फ्री इलैक्ट्रोन एक दूसरे से टकराने लगते हैं जिससे इनके पाथ में रुकावट आ जाती है और इनका प्रतिरोध बढ़ जाता हैं ।

प्रतिरोध का श्रेणी क्रम में संयोजन

जब हम दो या दो से अधिक प्रतिरोधो का एक एक सिरा आपस में जोड़ते हैं और दुसरा सिरा किसी दूसरे प्रतिरोध के साथ जोड़ते हैं तो इस संयोजन को प्रतिरोध का श्रेणी क्रम संयोजन कहते हैं ।

                             R = R1 + R2 

(1) श्रेणी संयोजन में सप्लाई वोल्टेज सभी प्रतिरोध में बट (divide) जाती हैं

(2) जिस प्रतिरोध का मान सबसे अधिक होगा । उस प्रतिरोध के एक्रोस वोल्टेज सबसे अधिक होगी । 

(3) यदि R मान के n प्रतिरोध श्रेणी में जुड़े हों तो समतुल्य प्रतिरोध
             समतुल्य प्रतिरोध (Req) = nR       
होगा

(4) श्रेणी संयोजन में धारा सभी प्रतिरोध में एक समान (बराबर) रहती हैं ।

प्रतिरोध का समान्तर क्रम में संयोजन

यदि दो या दो से अधिक प्रतिरोधो के सिरे आपस में जुड़े हों तो ऐसे संयोजन को प्रतिरोधो का समान्तर क्रम संयोजन कहा जाता हैं । इस संयोजन में सभी प्रतिरोध में वोल्टेज समान रहती है और धारा सभी प्रतिरोध में अलग अलग होती हैं । 
                    R  =  R1 × R2 / R1 + R2 

यदि R मान के n प्रतिरोध समान्तर क्रम में जुड़े हैं तो उनका समतुल्य प्रतिरोध 

    समतुल्य प्रतिरोध (Req)  =  R / n

            प्रतिरोधकता (Resistivity)

 यदि किसी पदार्थ की लंबाई एक मीटर और क्षेत्रफल एक मीटर वर्ग हैं तो उस पदार्थ का प्रतिरोध उसकी प्रतिरोधकता कहलाती है। इसे विशिष्ट प्रतिरोध भी कहते हैं।

(1) प्रतिरोधकता लंबाई और क्षेत्रफल पर निर्भर नहीं करती हैं।

(2) प्रतिरोधकता पदार्थ की प्रकृति ओर तापमान पर निर्भर करती हैं।

                    प्रतिरोध की निर्भरता

 (1) किसी भी पदार्थ का प्रतिरोध उसकी लंबाई के बढ़ने पर बढ़ता है। यानि  प्रतिरोध पदार्थ की लंबाई के समानुपाती होता है।

(2) पदार्थ का क्षेत्रफल बढ़ने पर उसका प्रतिरोध कम हो जाता है। यानि प्रतिरोध पदार्थ के क्षेत्रफल के व्यूतक्रमानुपाती होता है।

(3) प्रतिरोध पदार्थ की प्रकृति पर भी निर्भर करता है।

(4) प्रतिरोध पदार्थ का तापमान बढ़ने पर बढ़ जाता है।


तार को खिंचने पर उसके प्रतिरोध पर क्या प्रभाव पड़ता है

जब किसी तार को खिंचकर उसकी लंबाई को n गुना बढ़ा दिया जाता है तो उसका क्षेत्रफल घटकर 1/n हो जाता है और तार का प्रतिरोध ( n  square) हो जाता है।
तो चलिए एक उदाहरण के द्वारा इसको समझते है।
मान लीजिए किसी तार की लंबाई (l) है, उसके अनुप्रस्त काट का क्षेत्रफल (A) है और उस तार का प्रतिरोध (R) है। अब इसकी लंबाई को खींचकर n गुना बढा दिया जाता है जिससे इसकी नई लंबाई (l' = nl) हो जाती है और इसका नया क्षेत्रफल (A' = A/n) हो जाता है तो इसके नये प्रतिरोध का मान

resistance meaning in hindi

resistance को को हिंदी में प्रतिरोध कहा जाता है यानी इसका मतलब होता है विरोध करना। मान लीजिए किसी वायर से करंट बह रही है तो उस तार कुछ न कुछ प्रतिरोध होगा जो इसके अन्दर से गुजरने वाली विधुत धारा का विरोध करेगा। असल में एक रेजिस्टेंस का काम धारा का appose करना ही होता है।

इस जानकारी के अन्दर हमने प्रतिरोध को जाना है और कहा कहा इसका उपयोग हो रहा है, किन किन चीजों का इस प्रभाव पड़ता है और किन चीजों पर यह निर्भर करता है। तो इस सब का ज्ञान हमने ग्रहण किया है। अगर आपको इस पोस्ट में कुछ भी अच्छा लगा हो हमें कमेंट करके जरूर बताइए।




Er. Chand जून 24, 2021
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