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 दोस्तों आज की इस पोस्ट में हम समझने जा रहे है इलेक्ट्रिसिटी का ट्रांसमिशन और डिस्ट्रिब्यूशन कैसे होता है और कैसे बिजली हमारे घरों तक पहुंचती है। आप सभी जानते है कि सभी के घरों में विधुत सप्लाई आती है लेकिन यह नहीं जानते कि यह कैसे आती है और कैसे बनती है तो इस बारे आज हम इस पोस्ट में सब कुछ समझेंगे यानी के यहां पर आपको इलैक्ट्रिसिटी के ट्रांसमिशन और डिस्ट्रिब्यूशन का पूरा ज्ञान मिलेगा। बस आपको इस पोस्ट को शुरू से लेकर आखिर तक बड़ी ध्यान पूर्वक पढना है।



जनरली बिजली का उत्पादन 11 केवी पर किया जाता है यानी पावर प्लांट के अन्दर 11 kv पर इलैक्ट्रिसिटी बनकर तैयार होती है अब इस बिजली को यहां से घरों तक या औधौगिक क्षेत्र तक पहुंचाने के लिए कई सब स्टेशन, ट्रांसमिशन टावर और विधुत चालकों का प्रयोग किया जाता है इन सभी की मदद से ही हम बिजली का उपयोग अपने घरों में कर पाते है आइये इसके बारे में अच्छे से समझते हैं।


इलेक्ट्रिसिटी का ट्रांसमिशन 

विधुत शक्ति केन्द्रों के अन्दर जब बिजली बनकर तैयार हो जाती है तो इसे आगे भेजने के लिए स्टेप अप करना पड़ता है ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि अगर इलैक्ट्रिसिटी को 11 kv पर ही ट्रांसमिशन कर दिया जाये तो ट्रांसमिशन लाइन में लोस बहुत अधिक बढ़ जायेंगे क्योंकि इस वोल्टेज पर लाइन में करंट का मान बहुत अधिक होगा। यदि हमें इन लोसेस को कम करना है तो कंडक्टर का साइज बढाना पड़ेगा लेकिन अगर कंडक्टर का साइज बढायेगे तो इसका सीधा प्रभाव ट्रांसमिशन लाइन की कैपिटल कोस्ट पर पड़ता है जिससे प्रयोग किये जाने वाले चालकों की कोस्ट बढ़ जाती है और कंडक्टर का साइज बढ़ाने से चालकों का वजन भी बढ़ जाता है इसलिए विधुत का 11 केवी पर ट्रांसमिशन नहीं किया जाता है।

इसलिए इस 11 केवी को प्राइमरी ट्रांसमिशन सब स्टेशन पर वहां पर लगाये गए उच्चायी परिणामित्र (step up transformer) की मदद से 132 केवी, 220 केवी या 400 केवी में स्टेप अप कर दिया जाता है। अब यहां बिजली 400 केवी में बदल जाती है इतनी हाई वोल्टेज पर इलैक्ट्रिसिटी का ट्रांसमिशन इसलिए करते है क्योंकि जितनी अधिक वोल्टेज होती है करंट का मान उतना कम हो जाता है जिससे लाइन के अन्दर लोसेस बहुत कम हो जाते है यानी के जितनी पावर हम इनपुट में देते है उतनी ही हमें आउटपुट में मिल जाती है।

अब यह बिजली 400 केवी में बदलकर ट्रांसमिशन टावरों के द्वारा काफी लम्बी दूरी तय करके सेकेंडरी ट्रांसमिशन सब स्टेशन पर आती है जहा पर इस हाई वोल्टेज को 66 केवी या 33 केवी में स्टेप डाउन कर दिया जाता है


इलेक्ट्रिसिटी का डिस्ट्रिब्यूशन 

इसके बाद यह विधुत 66 केवी या 33 केवी में स्टेप डाउन होने के बाद प्राइमरी डिस्ट्रिब्यूशन सब स्टेशन पर पहुंचती है यहां इस सब स्टेशन पर अपचायी परिणामित्र (step down transformer) लगें होते है जो इस 66 या 33 केवी वोल्टेज को 11 केवी वोल्टेज में स्टेप डाउन कर देते है।

अब यह इलैक्ट्रिसिटी यहां से 11 केवी में स्टेप डाउन होकर हाई टेंशन डिस्ट्रिब्यूशन लाइन से होते हुए सेकेंडरी डिस्ट्रिब्यूशन सब स्टेशन तक आती है इस सब स्टेशन के अन्दर भी स्टेप डाउन डिस्ट्रिब्यूशन ट्रांसफॉर्मर होता है जो इस 11 केवी को 440 वोल्ट में स्टेप डाउन कर देता है। अब यहां से इस वोल्टेज को गांव या शहर कस्बे में रखें डिस्ट्रिब्यूशन ट्रांसफॉर्मर तक पहुंचाया जाता है जो इसे 220 वोल्ट में स्टेप डाउन कर देता है और यह वोल्टेज घरों तक पहुंचती है।

इसके बाद यह डिस्ट्रिब्यूशन ट्रांसफॉर्मर इस 440 वोल्ट को 220 वोल्ट में बदल देता है फिर वहां से यह 220 वोल्ट सीमेंट के पोल या लौहे के पोलो द्वारा घरों तक पहुंचती है फिर एक विधुत विभाग का कर्मचारी आकर जो आपके घर के नजदीक वाला पोल होता है उस पर से आपको एक बिजली का कनेक्शन दे देता है और आपके घर के बाहर एक बिजली का मीटर लगा देता है अब आप जितनी भी बिजली खर्च करते हो वो सब उस मीटर में काउंट होती रहती है इस प्रकार से इलेक्ट्रिसिटी का ट्रांसमिशन और डिस्ट्रिब्यूशन किया जाता है।



Er. Chand दिसंबर 05, 2021
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 Corona effect क्या होता है

जब भी आप किसी ट्रांसमिशन लाइन या ट्रांसमिशन टावर के पास से गुजरते होंगे तो आपको एक आवाज सुनाई दी होगी इस आवाज को हिजिंग साउण्ड कहते हैं इस आवाज के आने को ही corona effect कहा जाता है आज हम इस लेख के माध्यम से जानेंगे कि कोरोना इफैक्ट क्यों होता है और साथ ही साथ पावर सिस्टम का हमारा बहुत महत्वपूर्ण टोपिक इसमें पढ़ेंगे जैसे कोरोना क्या होता है, कोरोना का फोर्मेशन कैसा होता है और ये किन किन फैक्टर पर निर्भर करता है और corona effect के लाभ और हानियां क्या क्या है।

यह प्रश्र आपके इलैक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के इंटरव्यू के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इस टोपिक में से जितनी भी ट्रांसमिशन लाइन के प्रोजेक्ट वाली कम्पनियों होती है वो इस टोपिक में से ही अकसर प्रश्नो को पुछा करती है।

कोरोना इफैक्ट क्या होता है

इसे हम एक आसान सी भाषा में समझते है अगर ट्रांसमिशन लाइन में ऐसी घटना हों जिसमें आपको violet glow देखने को मिलें या फिर transmission line से हिजींग साउण्ड सुनाई दे तो इसी घटना को कोरोना इफैक्ट कहते हैं। 

Corona effect in electrical in hindi


अब आपके मन में एक सवाल आ रहा होगा कि कोरोना इफैक्ट क्यों होता है और कैसे होता है इसके बारे में आगे बताया गया है तो चलिए जान लेते है कि आखिर ये इफैक्ट क्यों होता है।

ट्रांसमिशन लाइन की जो तार होती है वह हवा में लटकी रहती है मतलब कि जो transmission line की कंडक्टर होती है उसके चारों ओर वातावरण में हवा रहती है। यहां पर यह एयर एक डाइलैक्टिक मिडियम की तरह व्यवहार करती है यानी के यह एक इंसुलेटर की भांति काम करती है। लेकिन प्रैक्टिकली जो ये वायु होती है वह परफैक्ट इंसुलेटर नहीं होती है क्योंकि हवा के अन्दर काफी सारी अल्ट्रा वायलेट किरणें मौजूद होती है जिसके कारण इसमें आयनित कण उपस्थित रहते है जैसे फ्री इलैक्ट्रोन, पोजिटिव आयन और न्यूट्रल मोलिक्यूल इसमें होते हैं।

इसी वजह से एयर एक परफेक्ट विधुत रोधी नहीं होती है वायु की डायलेक्ट्रीक स्ट्रैंथ नाॅर्मल दाब और ताप पर 30 kv/cm होती है यानी अगर एक सेंटीमीटर वायु में वोल्टेज 30 kv/cm से अधिक वोल्टेज पास होती है तो हवा आयनाइज्ड हों जाती है उसके अंदर से करंट बहने लगती है इसके एयर का ब्रेकडाउन कहते हैं।

जो हाई वोल्टेज की लाइन होती है उनके चारों ओर इलैक्ट्रिक फील्ड होता है इस फील्ड की वजह से कंडक्टर में पोटेंशियल ग्रेडिएंट की कंडीशन ऊत्पन्न हो जाती है। मान लीजिए एक 132kv की लाइन है तो हाई वोल्टेज होने के कारण कंडक्टर के आजू बाजू भी कुछ वोल्टेज होंगी, जैसे जैसे चालक से दूर जायेंगे वैसे वैसे वोल्टेज कम होती जायेगी, तो इस इस दूरी के हिसाब से वोल्टेज का कम होना ही पोटेंशियल ग्रेडिएंट कहलाता हैं।

मान लीजिए हमारे पास 132kv लाइन की दो कंडक्टर है जिनके चारों ओर इलैक्ट्रिक फील्ड है जिसकी वजह से पोटेंशियल ग्रेडिएंट की कंडीशन ऊत्पन्न होगी और लाइन के आजू बाजू हवा में फ्री इलैक्ट्रोन और आयन मौजूद होंगे जैसे ही इस हाई वोल्टेज लाइन में 132kv की सप्लाई आती है तो कंडक्टर के आस पास की एयर आयनाइज्ड हों जाती है यानी के जो हवा में फ्री इलैक्ट्रोन होते है वो आपस में टकराने लगते है और उनमें आर्क उत्पन्न हो जाती है (यही आर्क हमें वायलेट ग्लो के रूप में दिखाई देती है) और इसी के कारण हिजींग साउण्ड ऊत्पन्न हो जाता है और कंडक्टर में वाइर्ब्रेशन भी होने लगता है यह घटना बरसात के मौसम में अधिक देखने को मिलती हैं क्योंकि बारिस के दिनों में हवा में नमी की मात्रा बढ़ जाती है इसी कारण बरसात के दिनों में कोरोना इफैक्ट ज्यादा देखने को मिलता है।

Corona effect से संबंधित दो टर्म बहुत महत्वपूर्ण होते है जिनके बारे में जानना जरूरी होता है पहला होता है disruptive critical voltage यह वह न्यूनतम वोल्टेज होता है जिस पर कंडक्टर के आस पास की एयर आयनाइज्ड हों जाती है और दूसरा होता है visual critical voltage यह वह न्यूनतम वोल्टेज होता है जिस पर कोरोना इफैक्ट ग्लो करता है यानी ट्रांसमिशन लाइन के कंडक्टर की ओर देखने पर वाइलेट ग्लो दिखाई देने लगता है।

कोरोना इफैक्ट को प्रभावित करने वाले फैक्टर

• सप्लाई वोल्टेज

कोरोना का इफैक्ट 30kv से कम की ट्रांसमिशन लाइन में देखने को नहीं मिलता है यह प्रभाव 30kv से ऊपर की लाइनों में ही देखा जाता है क्योंकि जब सप्लाई वोल्टेज ट्रांसमिशन लाइन में तीस केवी से अधिक हो जाती है तो कंडक्टर के आस पास की एयर का ब्रेकडाउन हो जाता है जिससे चालक के आजू बाजू की वायु आयनाइज्ड हों जाती है अब जैसे जैसे वोल्टेज बढ़ती जाती है वैसे वैसे कोरोना इफैक्ट भी बढ़ता जाता है।

• सप्लाई आवृत्ति

ट्रांसमिशन लाइन में जो सप्लाई होती है उसकी आवृत्ति कोरोना लोस के समानुपाती होती है यानी के जितनी ज्यादा आवृत्ति को बढायेगे उतना ही अधिक transmission line के अन्दर corona effect ज्यादा होगा।

• चालकों के बीच की दूरी

सिरोपरी लाइनों में प्रयोग कियें जाने वाले चालकों के बीच की दूरी कोरोना इफैक्ट के व्यूत्क्रमानुपाती होती है इसका मतलब यह हुआ कि कंडक्टर के बीच में जितनी अधिक दूरी होगी कोरोना इफैक्ट उतना ही कम होगा और यदि चालकों के बीच दूरी कम रखी जायेगी तो corona effect भी उतना ही अधिक होगा।

वातावरण पर

कोरोना इफैक्ट वातावरण पर भी बहुत अधिक निर्भर करता है बरसात के मौसम में कोरोना इफैक्ट अधिक देखने को मिलता है जबकि गर्मी के दिनों में इसका प्रभाव कम दिखता है क्योंकि बारिश के मौसम में हवा में नमी ज्यादा होती है जिसकी वजह से वायु जल्दी आयनाइज्ड हों जाती है जिससे हिजींग साउण्ड अधिक सुनाई देता है। और गर्मी के मौसम में हवा में नमी की मात्रा कम होती है जिससे वायु कम आयनाइज्ड होती है जिससे हिजींग साउण्ड कम आती है।

कोरोना इफैक्ट की हानियां

• कोरोना की वजह से पावर लोस होता है जो कि हिट, लाइट, साउण्ड और गैस के रूप में व्यर्थ होती है और इसके कारण ट्रांसमिशन लाइन की क्षमता भी कम हो जाती है।

• कोरोना इफैक्ट की वजह से ओजोन गैस बनती है जिससे कंडक्टर पर कार्बन बनने लगता है और transmission line के चालक की life भी कम हो जाती है।

• ट्रांसमिशन लाइन में जो सप्लाई होती है वह एक शुद्ध ए सी सप्लाई होती है लेकिन कोरोना इफैक्ट के कारण इसमें अन साइनोसोडियल सिग्नल ऊत्पन्न हो जाते हैं।

Corona effect के लाभ

कोरोना इफैक्ट के कारण कंडक्टर के आस पास की एयर एक चालक की तरह काम करने लगती है जिससे कंडक्टर का क्षेत्रफल एक तरह से बढ़ जाता है। यदि कभी लाइन के अन्दर किसी कारणवश बहुत अधिक करंट बहने लगे तो उस कंडिशन में कंडक्टर खराब होने से या टूटने से बच जाता है। यह कोरोना इफैक्ट की एक अच्छी बात भी होती है।

कोरोना इफैक्ट को कम करने के तरीके

• ट्रांसमिशन लाइन में प्रयोग किये जाने वाले कंडक्टर का साइज बढ़ाकर इस प्रभाव को कम किया जा सकता है।

• transmission line में बंडल कंडक्टर का उपयोग करके भी कोरोना इफैक्ट को काफी हद तक नैग्लेट किया जा सकता है।

• corona effect को कम करने का एक तरीका और है इसे corona ring का प्रयोग करके भी कर कर सकते हैं।


Er. Chand नवंबर 27, 2021
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 विधुत उपकेंद्र क्या है

बिजली का उत्पादन 11 kv पर शक्ति केन्द्रों पर होता है। इस वोल्टेज पर विधुत ऊर्जा की अधिक लाॅस होने के कारण संचरण और वितरण नहीं किया जा सकता, इस विधुत को एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजने के लिए वोल्टेज को बढ़ाना पड़ता है और वितरण के लिए वोल्टेज को कम करके ही विधुत ऊर्जा का उपयोग किया जा सकता है। जिस स्थान पर विधुत ऊर्जा को बढ़ाने और घटाने का काम किया जाता है, उस स्थल को electric substation कहते हैं।

विधुत ऊर्जा का स्टेप अप और स्टेप डाउन करना ही उपकेंद्र का मुख्य काम होता है। इसके अतिरिक्त उपकेंद्रों पर बिजली का स्विचिंग, आवृत्ति में परिवर्तन, दिष्टकारी विधुत ऊर्जा को प्रत्यावर्ती ऊर्जा में परिवर्तन आदि कार्य भी किया जाता है। उधोगों में प्रयुक्त substation को औधौगिक उपकेन्द्र कहते हैं और इस जगह पर शक्ति गुणांक में भी सुधार किया जाता है।


वैधुत उपकेन्द्र, विधुत प्रदाय तन्त्र में वह स्थान है जहां विधुत ऊर्जा का रूपांतरण और नियंत्रण किया जाता है। विधुत प्रदाय कम्पनी सबसे पहले 11 kv, 33 kV या 66kv पर उच्च transmission substation को स्थापित करते है। 100kw से कम विधुत भार के उपभोक्ताओं के लिए अपचायी उपकेंद्रों द्वारा 440 वोल्ट पर वैधुत वितरित की जाती है। लेकिन 100kw से अधिक भार के लिए कम्पनी उपभोक्ता को 1.1kv या 6.6kv बिजली प्रदान करती है। और इस बिजली को नियंत्रित करने के लिए उपभोक्ता को खुद का 440 वोल्ट का उपकेन्द्र लगाना पड़ता है।

विधुत उपकेंद्र पर प्रयोग किएं जाने वाले उपकरण (Electric substation equipments)


• विधुत रोधक (Insulator) 

विधुत उपकेंद्र में इंसुलेटर धारा प्रवाहित चालकों और बस बारो को आधार प्रदान करते हैं और उन्हें वैधुत संचालन भागों से अलग रखते हैं। इंसुलेटर का निर्माण चीनी मिट्टी से किया जाता है, उपकेंद्र में बुसिंग या पोस्ट इंसुलेटर का इस्तेमाल किया जाता है। इनको 66kv या उससे कम वोल्टेज के लिए चट्टो में क्षैतिज या ऊर्ध्वाधर रूप में लगातें है।

• बस बार (Bus bar) 

Substation पर बस बार ठोस वृत्ताकार या आयताकार ताॅबे या एल्यूमीनियम चालक की होती है। कुछ विशेष परिस्थितियों में जहां बस बार को बहुत उच्च धारा वहन करनी पड़ती है और उच्च तापमान प्रभाव की सम्भावना होती है, वहां पर बस बार खोखली, वृत्ताकार या आयताकार ताम्र की भी होती है। इनके अलावा केबिलों के लिए विकृति बस बार भी प्रयोग की जाती है। bus bar का आकार उसकी धारा वहन क्षमता पर निर्भर करता है।

• पृथक्कारी स्विच (Isolate switch)

आइसोलेटर बिना भार पर परिपथ को उच्च वोल्टेज सप्लाई से विस्थापित करने के लिए प्रयोग किये जाते हैं। ये वायु विच्छेद होते है, उच्च वोल्टेज को नियंत्रित करने के लिए इन्हें मोटर की सहायता से परिचालित किया जाता है। 50kv से नीचे ये पृथक्कारी एकल ध्रुव होते है और 132kv या उससे उच्च वोल्टेज के लिए इन्हें समूह परिचालित बनाया जाता है।

• परिपथ वियोजक (Circuit breaker) 

उपकेन्दों पर सर्किट ब्रेकर को परिपथ की असाधारण स्थितियों को ध्यान में रखते हुए लगाया जाता है। ये उच्च वोल्टेज परिपथ में ओटोमेटिक और प्रसामान्य भार स्थिति में हस्त द्वारा संचालित होने चाहिए। 11केवी वोल्टेज के लिए तेल पूरित प्रकार का परिपथ वियोजक अपनाया जाता है।

• फ्यूज (Fuses) 

फ्यूज, ट्रांसफॉर्मर और लाइन को अधिभार से होने वाली हानि से बचाता है, लेकिन इनमें एक कमी यह है कि एक फ्यूज के उड़ने पर पद्वति अन्य दो फेजों पर काम करेंगी। फ्यूज की इस कमी को दूर करने के लिए उच्च वोल्टेज परिपथ में फ्यूज के साथ एक रक्षी रिले भी प्रयोग की जाती है। 

• परिणामित्र (Transformer) 

प्राइमरी संचारण के लिए डेल्टा-स्टार पावर transformer, सेकेंडरी संचारण के लिए स्टार-स्टार power transformer का उपयोग किया जाता है और प्राथमिक वितरण के लिए स्टार-डेल्टा शक्ति परिणामित्र और द्वितियक न्यून वोल्टेज के लिए डेल्टा स्टार वितरक ट्रांसफॉर्मर प्रयोग कियें जाते हैं। पावर स्टेशन पर परिणामित्र वोल्टेज को बढ़ाने के लिए और बाकी सभी स्थानों पर वोल्टेज को कम करने के लिए ट्रांसफॉर्मर स्थापित कियें जाते हैं और विशेष ध्यान यह रखा जाता है कि electric substation में परिणामित्र में कम से कम हानि हो। 

• रक्षी रिले (Protective Relay)  

विधुत दोष और अधिभार पर परिपथ के स्व एवं शीघ्र विच्छेदन के लिए और ट्रांसफॉर्मर की सुरक्षा के लिए विधुत उपकेंद्र पर परिपथ वियोजक के साथ रक्षी रिले इस्तेमाल की जाती है।

धारा ट्रांसफॉर्मर (Current transformer) 

सबस्टेशन पर मापन एवं संकेतक उपयन्त्रो और रक्षी रिले के साथ करंट ट्रांसफॉर्मर उपयोग किये जाते हैं, ये उच्च वोल्टेज परिपथ में मापन और संकेतक यन्त्रो के साथ साथ उन्हें high voltage से अलग करते है जिससे सभी उपयन्त्र सुरक्षित रहते हैं और substation पर काम करने वाले व्यक्तियों को हाई वोल्टेज से हानि होने की संभावना नहीं रहती।

• विभव परिणामित्र (Potential transformer) 

विभव परिणामित्र भी मापन और संकेतक उपकरणों के साथ प्रयोग में लाया जाता है इसकी सेकेंडरी साइड में यन्त्रों को लगाया जाता है। यह भी उच्च वोल्टेज से संयोजित उपयंत्रों को अलग रखता है।

विधुत उपकेंद्र के लिए स्थान का चयन करना (selection of site for an Electric substation) 

विधुत उपकेंद्र के लिए स्थान का चयन करने से पहले उसकी क्षमता, वोल्टेज और प्रकार पर भी ध्यान देना अनिवार्य होता है। प्राइमरी ट्रांसमिशन के लिए इलैक्ट्रिक सबस्टेशन विधुत पावर प्लांट के पास, जबकि प्राथमिक और द्वितियक डिस्ट्रिब्यूशन उपकेंद्र, विधुत भार प्लांट के पास होने चाहिए। 11केवी से अधिक वोल्टेज वाले सबस्टेशन हमेशा शहरी क्षेत्र से बाहर और 11केवी या उससे कम वोल्टेज के उपकेंद्र बस्ती के बाहर या अंदर भार केन्द्र को ध्यान में रखकर स्थापित किया जा सकता है। विधुत उपकेंद्र के स्थान के लिए निम्न बातों का ध्यान में रखना बहुत जरूरी है।

• विधुत भार (Electric weight) 

विधुत उपकेंद्र के चयन में सबसे महत्वपूर्ण गुणक भार है। भार केन्द्र पर सबस्टेशन को स्थापित करने का प्रयास किया जाता है, विशेष कर वितरण के लिए जहां की वितरक की लंबाई electric substation के स्थापन से प्रभावित होती है।

• भूमि के प्रकार और मूल्य के आधार पर

सबस्टेशन के लिए जगह ऐसी होनी चाहिए कि परिणामित्र के अधिक भार के कारण भूमि के धंसने की संभावना नहीं हों और हाई वोल्टेज लाइन के मार्ग में घना जंगल भी नहीं पड़ना चाहिए। वैसे भार केन्द्र के महत्व को ध्यान में रखते हुए भूमि के महत्व को ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता है।

• सबस्टेशन का प्रकार

High voltage उपकेन्दों को गांव या कस्बे से बाहर स्थापित किया जाता है जबकि मध्यम और न्यून वोल्टेज सब स्टेशनों को बस्ती के अन्दर ही लगाया जाता है। प्राथमिक संचारण उपकेंद्र, जनन केन्द्र के पास ही इंस्टाॅल किया जाता है।



Er. Chand नवंबर 12, 2021
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 हैलो फ्रेंड्स आज की पोस्ट में हम हम जानेंगे sf6 circuit breaker in hindi क्या होता है, कैसे काम करता है कहां पर इसकि उपयोग किया जाता है। इस सर्किट ब्रेकर का पूरा नाम सल्फर हेक्सा फ्लोराइड circuit breaker होता है। आगे हम इस सब के बारे बिस्तार से जानकारी प्राप्त करेंगे। बस आप पोस्ट में हमारा साथ देते रहिए।



इस सर्किट ब्रेकर को sf6 circuit breaker इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसमें sulfar hexa Floride गैस का उपयोग किया जाता है। इस गैस की आर्क बहुत अधिक होती है, जैसे ही सर्किट ब्रेकर के अन्दर आर्क उत्पन्न होता है तो ये उसे तुरंत ही बुझा देती है।


SF6 सर्किट ब्रेकर एक प्रकार का विद्युत उपकरण है। इसका उपयोग विद्युत परिपथों, विशेष रूप से सब स्टेशन और पावर जेनरेशन प्लांट में विद्युत परिपथों, अतिप्रवाह या अन्य खतरनाक विद्युत स्थितियों से बचाने के लिए SF6 सर्किट ब्रेकर का उपयोग किया जाता है क्योंकि यह अधिक लचीला होता है और इसमें अन्य प्रकार के सर्किट ब्रेकरों की तुलना में विद्युत सर्किट को तोड़ने की क्षमता अधिक होती है। SF6 सर्किट ब्रेकर का उपयोग औद्योगिक और वाणिज्यिक दोनों अनुप्रयोगों में किया जाता है। 


SF6 सर्किट ब्रेकर को विद्युत सर्किट को बाधित करने का एक सुरक्षित और विश्वसनीय साधन प्रदान करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। SF6 सर्किट ब्रेकर विद्युत वितरण प्रणालियों का एक अभिन्न अंग है और इसका उपयोग नए और मौजूदा बिजली वितरण प्रणालियों दोनों में किया जाता है। SF6 सर्किट ब्रेकर को किसी रखरखाव की आवश्यकता नहीं है और यह सबसे अधिक लागत प्रभावी और विश्वसनीय स्विचिंग डिवाइस है। अगर आपको sf6 circuit breaker in hindi या दूसरे सर्किट ब्रेकर के बारे में जानकारी चाहिए तो हमारी इस पोस्ट को भी देखें सर्किट ब्रेकर क्या है और कितने प्रकार के होते हैं


SF6 circuit breaker कैसे काम करता है



Sf6 सर्किट ब्रेकर एक विद्युत स्विच है। यह आमतौर पर विद्युत पैनल में पाया जाता है। शॉर्ट सर्किट होने पर यह एक विशिष्ट सर्किट (या सर्किट के समूह) में बिजली के प्रवाह को रोक देता है sf6 सर्किट ब्रेकर अन्य circuit breaker की अपेक्षा छोटा होता है। जैसे ही SF6 सर्किट ब्रेकर एक इलेक्ट्रिकल सर्किट को तोड़ता है, सर्किट कॉन्टैक्ट्स को ऐसी स्थिति में ले जाया जाता है जहां वे करंट का संचालन नहीं कर सकते। विद्युत परिपथ के अतिभारित होने या लंबे समय तक बिजली बाधित रहने पर भी संपर्कों की स्थिति समान रहती है। एक SF6 सर्किट ब्रेकर में, संपर्कों को एक कक्ष में सील कर दिया जाता है जो SF6 गैस से भरा होता है। जब सर्किट ब्रेकर द्वारा संपर्क खोले जाते हैं, तो SF6 गैस को कक्ष में छोड़ा जाता है और गैस फैलती है।, जहां संपर्कों के खुलने से SF6 गैस चैंबर में फैल जाती है और आर्क बुझ जाती है। ओर सर्किट में सप्लाई का जाना बन्द हो जाता है। 


सर्किट ब्रेकर आमतौर पर निम्नलिखित मामलों में उपयोग किया जाता है: एक सर्किट ओवरलोड हो गया है, एक सर्किट ट्रिप हो गया है, एक सर्किट विफल हो गया है, एक शॉर्ट सर्किट हुआ है, बिजली खो गई है और आपको पैनल को रीसेट करने की आवश्यकता है। लेकिन सर्किट अब खुला है, कोई बिजली नहीं चल रही है और आपको पैनल को रीसेट करना हो। तो इन सब जगह पर sf6 circuit breaker in hindi का प्रयोग किया जाता है।


इसका उपयोग विफलता के मामले में सर्किट को खोलने के लिए भी किया जाता है। एसएफ 6 आमतौर पर सर्किट के वोल्टेज का पता लगाने के लिए प्रयोग किया जाता है। सर्किट को शॉर्ट सर्किट से बचाने के लिए sf6 सर्किट ब्रेकर का उपयोग किया जा सकता है। यदि वोल्टेज रेटेड वोल्टेज से अधिक है तो एसएफ 6 सर्किट ब्रेकर सर्किट को खुल देता है। Sf6 में सर्किट वोल्टेज का पता लगाने और वोल्टेज रेटेड वोल्टेज से अधिक होने पर सर्किट को खोलने की क्षमता होती है। 


यदि सर्किट ब्रेकर का उपयोग केवल सर्किट को खोलने के लिए किया जा रहा है तो sf6 का उपयोग किया जाना चाहिए। यदि वोल्टेज रेटेड वोल्टेज से अधिक है और लोड उपयोग में नहीं है तो एसएफ 6 सर्किट ब्रेकर circuit को आसानी से ओपन कर देता है। यह एक मानक सर्किट ब्रेकर है, जिनका इस्तेमाल sub station, power generation plant, transmission line को कनैक्ट और डिस्कनेक्ट करने के लिए किया जाता है।


 sf6 सर्किट ब्रेकर आमतौर पर निम्नलिखित सर्किट में उपयोग किया जाता है। यह सर्किट में करंट को बाधित करने की क्षमता रखता है यदि करंट रेटेड मान से अधिक हो। sf6 सर्किट ब्रेकर का उपयोग सर्किट को शॉर्ट सर्किट से बचाने के लिए किया जाता है। Sf6 में वोल्टेज का पता लगाने की क्षमता होती है, जो एक सर्किट को आसानी से ब्रेक कर देता है। यदि वोल्टेज रेटेड वोल्टेज से अधिक है तो एसएफ 6 में सर्किट ब्रेकर करने की ताकत होती है। उम्मीद है कि आपको ये sf6 circuit breaker in hindi की जानकारी पसंद आ रही होगी।


sf6 circuit breaker के लाभ

• इस ब्रेकर का आकार दुसरे सर्किट ब्रेकर की तुलना में थोड़ा छोटा होता है। इसलिए इसको आसानी से लगाया और उतारा जा सकता है।

• इसके अन्दर सल्फर हेक्सा फ्लोराइड गैस का इस्तेमाल आर्क बुझाने में किया जाता है, जो कि एक अज्वलनशील गैस होती है जिसकी वजह से sf6 circuit breaker को कोई क्षति नहीं पहुंचती है।

• इसमें गैस को आर्क बुझाने के बाद दोबारा से प्रयोग में लाया जा सकता है, जिसका उपयोग फिर से आग को बुझाने में किया जा सकता है।

• sf6 circuit breaker के अन्दर विधुत धारा को रोकने या सहन करने की ताकत वायु सर्किट ब्रेकर से  1.5 गुणा अधिक होती है।

• यह एक ऐसा सर्किट ब्रेकर होता है जिसे कहीं भी आराम से रखा जा सकता है। इसलिए इसके रख रखाव में बहुत कम खर्चा आता है।

• और sf6 circuit breaker in hindi की सबसे बड़ी खुबी यह होती है कि यह कार्य करते समय बिल्कुल भी आवाज नहीं करता है इसलिए इसे एक सुगमता से काम करने वाला सर्किट ब्रेकर माना जाता है।

sf6 circuit breaker की हानियां


• इसमें गैस होने के कारण सीलिंग की दिक्कत आती है।

• sf6 सर्किट ब्रेकर में जो गैस यूज की जाती है उसके लीकेज होने का भी डर लगा रहता है।

• इस सर्किट ब्रेकर की सबसे बड़ी disadvantage यह होती है कि इनकी किमत दूसरे circuit breaker जैसे वायु सर्किट ब्रेकर, तेल सर्किट ब्रेकर और निर्वात सर्किट ब्रेकर से अधिक होती है।

इस प्यारी पोस्ट में जिसका शीर्षक है sf6 circuit breaker in hindi यहां पर हमने एस एफ 6 सर्किट ब्रेकर की चीजों को जाना है जैसे इसका उपयोग कहां किया जा रहा है, ये कैसे काम करता है और इसका लाभ, हानियां क्या है। अगर अब भी इस टोपिक में आपको कोई दिक्कत आ रही है तो हमें कमेंट करके बता सकते है।



Er. Chand अक्टूबर 22, 2021
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 बिजली कैसे बनायी जाती है

इस दौर में बिजली एक ऐसी जरूरत हो गई है कि इंसान खाने के बिना तो रह सकता है लेकिन बिजली के बिना नहीं रह सकता, इसकी ऐसी लत लग गई है जैसे मानो कि अगर बिजली नहीं है तो जिंदगी में भी कुछ नहीं रहा हो। दोस्तों आज हम बिजली कैसे बनती है यही समझेंगे और किन किन चीजों से इसे बनाया जाता है, इसका उपयोग कहां किया जा रहा है ये भी जानेंगे।

बिजली का उत्पादन

बिजली बनाने के लिए एक ए सी जेनरेटर या अल्टरनेटर का इस्तेमाल किया जाता है इसे किसी अन्य साधन से घूमाया जाता है जिसे आध चालक या टरबाइन कहते हैं। ये घूमाने वाला साधन अल्टरनेटर को धक्का लगाता है ऐसा करने से उसके अंदर गति पैदा हो जाती है और इस गति को जेनरेटर बिजली में बदल देता है और विधुत पैदा होना शुरू हो जाती है।


बिजली बनाने में प्रयुक्त उपकरण

बिजली को बनाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका ए सी जेनरेटर और आध चालक निभाता है विधुत का उत्पादन आज के इस टाइम में कई तरह से किया जा रहा है तो हर जगह पर भिन्न-भिन्न प्रकार के अल्टरनेटर और आध चालक को अपनाया जाता है जैसे, जहां भाप से विधुत जनन किया जाता है वहां पर एक स्टीम टर्बो अल्टरनेटर को इस्तेमाल किया जाता है और कुछ स्थानों पर जल से भी बिजली ऊत्पन्न की जाती है, उस जगह पानी टर्बो अल्टरनेटर को अपनाया जाता है। कुछ क्षेत्रो में बिजली कैसे बनती है नाभिकीय ऊर्जा और गैस से चलने वाले टर्बो अल्टरनेटरों से भी बनाई जा रही है।

विधुत जनन के स्त्रौत

बिजली जनन के लिए वे साधन जो बहुत पुराने समय से प्रयोग में लाये जा रहे है, conventional source कहलाते हैं। जैसे भाप वाला पावर स्टेशन, डीजल पावर हाउस और हाइड्रो पावर हाउस, हमारे हिन्दुस्तान में इन्ही पावर हाउस द्वारा सबसे अधिक मात्रा में विधुत का जनन किया जा रहा है इसमें सबसे ऊपर थर्मल पॉवर प्लांट आता है। लगभग 60 प्रतिशत विधुत इंडिया में इसी से बन रही है हमारे देश का सबसे पहला पानी से बिजली बनाने वाला प्लांट तारापुर में लगाया गया था।

बिजली को उत्पन्न करने के कुछ नयें साधन भी आयें है, जिन्हें non conventional source कहते हैं जैसे, wind, solar, small hydro project. ये बहुत कम मात्रा में विधुत का जनन करते है लेकिन इनका एक फायदा भी है इन्हें सिर्फ एक बार लगाकर ही पैसा खर्च होता है फिर इनकी चलने की किमत या विधुत बनाने की किमत बिल्कुल शून्य होती है। इनमें बिजली कैसे बनती है इसमें, हवा, सूर्य की किरणों और पानी के बहाव द्वारा बनाई जाती है।

बिजली का उपयोग

विधुत बनने के बाद हमारे तक आने में बहुत सी चीजों का इस्तेमाल किया जाता है बिजलीघर से विधुत को हाई वोल्टेज में बदलकर सिरोंपरी लाइन के द्वारा छोटे पावर स्टेशन तक पहुंचाया जाता है वहां से इसे कम वोल्टेज में परिवर्तित करके हमारे घरों के अन्दर लाया जाता है फिर जो बिजली घर के अंदर आती है उसका प्रयोग हिटर चलाने में, बल्ब जलाने में, विधुत मोटर, इंडक्शन चूल्हा, अपने मोबाइल फोन को चार्ज करने में, हवा खाने के लिए पंखों में, मुसाला पिसने के लिए ग्राइंडर में और भी बहुत सारी चीजों में बिजली का उपयोग करते हैं।
Er. Chand अक्टूबर 17, 2021
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          इलैक्ट्रिकल इंसुलेटर क्या होता है

इंसुलेटर ओवर हैड डिस्ट्रिब्यूशन और ट्रांसमिशन लाइन का वह कम्पोनेंट्स है जो लाइन कंडक्टर और पोल के बीच विधुतरोधक का काम करता है। और लाइन कंडक्टर और ग्राउंड के बीच बहने वाली लिकेज धारा को प्रोटेक्ट करता है एक अच्छे इंसुलेटर में निम्न गुण होना बहुत जरूरी होता है।

• उच्च यांत्रिक ऊर्जा

• उच्च इंसुलेशन प्रतिरोध

• उच्च डाइलैक्टिक ऊर्जा

• विधुतरोधी पदार्थ

 इलैक्ट्रिकल इंसुलेटर कितने प्रकार के होते हैं? (types of insulator) 

ओवरहैड डिस्ट्रिब्यूशन लाइन और ट्रांसमिशन में कई प्रकार के इंसुलेटर का उपयोग वोल्टेज रेटिंग के आधार पर अलग अलग इंसुलेटर का उपयोग किया जाता है। जैसे पीन टाइप इंसुलेटर, सस्पेनशन इंसुलेटर और शैकल इंसुलेटर और भी कई प्रकार के इंसुलेटर होते है जिनका प्रयोग हम ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन लाइन में करते है अब हम इन सब इंसुलेटर को एक एक करके विस्तार से निचे पढ़ेंगे।

        types of insulator in hindi


पीन इंसुलेटर (pin insulator) 

जैसा इसके नाम से पता चलता है कि इस इंसुलेटर को पोल के क्रास आर्म पर पीन की सहायता से बांधा जाता है इस इंसुलेटर के ऊपरी भाग में एक ग्रो बना रहता है जिसमें से एक चालक गुजराता है और इस चालक को एक वायर के द्वारा बांध दिया जाता है ताकि कंडक्टर ग्रो में फिक्स रहें।
इस इंसुलेटर को 33 के वी तक की लाइन में प्रयोग किया जाता है। इससे अधिक वोल्टेज पर प्रयोग करने के लिए इसका साइज बढ़ाना पड़ता है जिससे ये काफी भारी हो जाते है जो कि फायदेमंद नहीं है। इंसुलेटर के लिए यह जरूरी है कि वह मकैनिकल और इलैक्ट्रिकल भार सहन कर सके।

सशपेंशन टाइप इंसुलेटर (suspension type insulator)

33 के वी वोल्टेज लाइन से अधिक रेटिंग वाली लाइन के लिए पिन इंसुलेटर लाभदायक नहीं होते है 33 के वी वोल्टेज लाइन से अधिक रेटिंग पर सशपेंशन इंसुलेटर का उपयोग किया जाता है। सशपेंशन इंसुलेटर में पोर्शिलिन की डिस्क को सीरीज में कनैक्ट किया जाता है और एक स्ट्रींग बकी सेप में बनाया जाता है। इस स्ट्रिंग का एक एंड क्रास आर्म पर और दुसरा एंड कंडक्टर से कनैक्ट होता है। 
इसमें सामान्य एक डिस्क 11 के वी की वोल्टेज के लिए डिजाइन किया जाता है। डिस्क को सीरीज में जोड़ने से इसे हाई वोल्टेज पर आसानी से प्रयोग किया जा सकता है। 
सशपेंशन टाइप इंसुलेटर सामान्य ट्रांसमिशन लाइन में प्रयोग किये जाते है क्योंकि स्टील टाॅवर का ग्राउंड एरिया 12 मीटर से अधिक होता है। सशपेंशन टाइप इंसुलेटर को ऊर्ध्वाधर प्रयोग किया जाता है।

स्ट्रैन इंसुलेटर (strain insulator) 


जिन स्थानों पर लाइन का खत्म हो रही हो या लाइन को सार्प क्रव दिया जाना हो तब लाइन पर पड़ने वाला खिंचाव अधिक बढ़ जाता है इस खिंचाव को फलैक्सिबिलिटी के द्वारा ही कम किया जा सकता है इसलिए ऐसे स्थानों पर स्ट्रेन इंसुलेटर का उपयोग किया जाता है। 
लो वोल्टेज लाइन खिचांव के लिए शैकल इंसुलेटर का प्रयोग किया जाता है जबकि हाई वोल्टेज लाइन में खिंचाव के लिए सशपेंशन इंसुलेटर को ही क्षैतिज दिशा में प्रयोग करके स्ट्रेन इंसुलेटर बनाये जातें है। यदि खिंचाव काफी अधिक है तो तब दो स्ट्रींग को समांतर में प्रयोग करके स्ट्रेन इंसुलेटर बनाये जातें है।

सशपेंशन इंसुलेटर की स्ट्रींग इफीसियंसी (string efficiency of suspension insulator)

सशपेंशन इंसुलेटर में बहुत सी डिस्क सीरीज में जुड़ी रहती है और डिस्क का पोर्शिलीन वाला भाग दो धातु लिंक के द्वारा जुड़ा रहता है जिसके कारण सीरीज कैपेसिटेंस ऊत्पन्न होता है। ठीक इसी प्रकार डिस्क के मेंटल लिंक और पोल के बीच भी एक कैपेसिटेंस ऊत्पन्न होता है जिसे शंट कैपेसिटेंस कहते है।



Er. Chand सितंबर 24, 2021
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विधुत पोल क्या है

 विधुत के तारों को रोकने के लिए सपोर्ट के रूप में कई प्रकार के पोल का उपयोग किया जाता है जो कि ऊपर से जाने वाले तारों को धरती से एक निश्चित ऊंचाई पर रखते है इन पोलो के अन्दर निम्न गुण होना आवश्यक होता है जैसे इनके अन्दर अधिक भार सहन करने की ताकत होनी चाहिए और इन पोलो का भार कम होना चाहिए और इनके प्रयोग करने की आयु अधिक हो और इनको बनाने में कम खर्चा आना चाहिए और ये आसानी से उपलब्ध हो जायें। आवश्यकता के अनुसार इन्हे अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग पोलो का उपयोग किया जाता है अब हम विधुत पोल क्या है इन के अलग-अलग प्रकार के बारे में नीचे बिस्तार से पढ़ेंगे।

लकड़ी पोल (wooden pole) 

यह पोल साल या चीड़ की लकड़ी के बने होते है। इन पोलो को कम दूरी के लिए इस्तेमाल किया जाता है। ज्यादा उपयोग में लाये जाने वाले लकड़ी के खम्बें A और H प्रकार के होते है। इस तरह के आकार में इन्हें प्रयोग करने से इनकी ताकत और आयु बढ़ जाती है। इनको कम वोल्टेज के लिए ही प्रयोग किया जाता है इस प्रकार के पोलो को अधिकतम 10 के वी वोल्टेज के लिए उपयोग में लाया जा सकता है।
इनको लगाते समय इन्हें जमीन के अंदर डालते समय पेंट किया जाता है और दिमक का तेल भी उसी समय डाल दिया जाता है जिससे लकड़ी पर दिमक न लगे। इन खम्बों की सबसे बड़ी कमी यह होती है कि इनकी यांत्रिक ऊर्जा कम होती है।

स्टील पोल (steel pole) 

स्टील पोल लकड़ी के खम्बों से काफी ज्यादा बड़े होते है और इनकी तार को वहन करने की ताकत भी लकड़ी के खम्बों से बहुत अधिक होती है। स्टील के खम्बों को अधिक दूरी के लिए बड़े खम्बों का प्रयोग किया जाता है और कम दूरी के लिए छोटे स्टील के खम्बों का उपयोग किया जाता है। ज्यादातर इन खम्बों का इस्तेमाल विधुत सप्लाई के डिस्ट्रिब्यूशन में किया जाता है। और इनकी आयु बढ़ाने के लिए इन्हें गैल्वनाइजिंग स्टील का बनाया जाता है। और इन्हे जंग से बचाने के लिए पेंट कर दिया जाता है। जिससे इनकी आयु बढ़ जाती है।

आर सी सी पोल (RCC pole) 

आधुनिक युग में सबसे अधिक उपयोग में लाये जाने वाले और सबसे चलनशील पोल आर सी सी पोल ही होते है। इनका सबसे बड़ा लाभ इनकी यांत्रिक ताकत, सबसे ज्यादा आयु है। यह देखने में भी अच्छे लगते है और इनकी मेंटिनेंस भी न के बराबर होती है। और ये पोल स्टील और लकड़ी के खम्बों की तुलना में अधिक विधुत रोधी होते है। 
लेकिन इनकी सबसे बड़ी कमी इन्हें तैयार करने में बहुत ज्यादा खर्चा होता है और ये बहुत ज्यादा भारी होतें है। इसलिए इन्हें उसी स्थान पर बनाया जाता है जहां लगाना होता है।

स्टील टाॅवर (steel towers)

लकड़ी के खम्बें, स्टील के खम्बें और आर सी सी पोल ये सभी डिस्ट्रिब्यूशन लाइन में प्रयोग होने वाले पोल होते है। जिन्हें लगभग 11 के वी की लाइन तक उपयोग किया जाता है। इससे अधिक वोल्टेज और ट्रांसमिशन लाइन के लिए स्टील टाॅवर बनायें जाते है। इनकी यांत्रिक ऊर्जा बहुत अधिक और इनकी आयु भी बहुत अधिक होती है। और इन्हे इस प्रकार से बनाया जाता है कि यह खराब से खराब मौसम में भी खड़े रह सकें और इन्हे बहुत अधिक दूरी के लिए उपयोग में लाया जाता है। 
इन टाॅवर के निचले हिस्से को मजबूत निव के साथ जमीन में गाड़ दिया जाता है इन्हें बनाने के लिए एक निश्चित विमा की स्टील की एंगल जिग जैग आकार में जोड़ी जाती है। इन टाॅवर पर लगाये गये क्रास आर्म सिंगल सर्किट और डबल सर्किट के अनुसार बनाये जातें है। इस टाॅवर के टाॅप पर एक ग्राउंड वायर लगाई जाती है जो कि टाॅवर के फूट पर अर्थ की जाती है यह तार टाॅवर को आसमानी बिजली से चलने से बचाती है।

इस लेख को पढ़कर आप जान गए होंगे कि विधुत पोल क्या है और ये कितने प्रकार के होते है, यह जानकारी आपको अच्छी लगी है तो आप इसे अपने दोस्तों के साथ भी शेयर कर सकते है और हमें कमेंट करके अपना अनुभव भी बता सकते है। उम्मीद करता हूं कि आपको नीचे वाली पोस्ट भी ज़रूर पसंद आयेगी उसे भी एक बार जरूर पढ़ें।
Er. Chand सितंबर 22, 2021
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 टैरिफ क्या होता है

सर्विस प्रोवाइडर कंज्यूमर से जिस रेट से चार्ज करते है उसे टैरिफ कहते है। टैरिफ को निर्धारित करने के निम्न फैक्टर होते है। जैसे पावर स्टेशन पर इलैक्ट्रिकल एनर्जी जैनरेशन पर होने वाले खर्च की सीमा, ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन में लगाई गई किमत पर, आपरेशन और मेंटिनेंस में प्रयोग होने वाले उपकरणों के खर्च की सीमा पर इन्ही सभी फैक्टरों को ध्यान में रखते हुए टैरिफ निर्धारित किया जाता है। इस निर्धारण के आधार पर टैरिफ को कई भागों में बांटा गया है।

सिम्पल टैरिफ (simple tarrif)

जब खर्च की गई विधुत ऊर्जा को एक निश्चित दय से चार्ज किया जाता है तो उसे सिम्पल टैरिफ कहते है। खर्च की जाने वाली टोटल एनर्जी को एनर्जी मीटर की हेल्प से काउंट किया जाता है और कोंस्टेंट रेट की रिडिगं से गुणा करके टैरिफ बनाया जाता है। इस टैरिफ की सबसे बड़ी कमी यह है कि यह अलग-अलग प्रकार के कंज्यूमर से अलग-अलग चार्ज नहीं करता है और इसमें कोस्ट पर यूनिट भी अधिक पढ़ती है

फ्लैट रेट टैरिफ (Flat rate tarrif)

इस टैरिफ के द्वारा अलग-अलग कंज्यूमर क़ अलग-अलग पर यूनिट रेट से चार्ज किया जाता है। इस टैरिफ के द्वारा पहले कंज्यूमर को अलग-अलग कैटेगरी में बांंटा जाता है और फिर अलग-अलग रेट से चार्ज किया जाता है।
जैसे कम भार वाले कंज्यूमर के लिए अलग रेट रखा जाता है और अधिक भार वाले कंज्यूमर के लिए अलग रेट रखा जाता है।
इस टैरिफ की सबसे बड़ी कमी यह है कि इसमें अलग-अलग भार के लिए अलग-अलग मीटर लगाने पड़ते है। और इसमें चार्ज करने की रेट टोटल इलैक्ट्रिकल यूनिट पर निर्भर नहीं करती है।

टू पार्ट टैरिफ (Two part tarrif) 

इस टैरिफ के द्वारा कंज्यूमर से अधिकतम मांग और खर्च की गई ऊर्जा के अनुसार चार्ज किया जाता है। इस टैरिफ को दो भागों में बांट दिया जाता है जिसमें एक फिक्स चार्ज और दुसरा रनिंग चार्ज होता है।

थ्री पार्ट टैरिफ (Three part tarrif) 

थ्री पार्ट टैरिफ टू पार्ट टैरिफ का ही ए मोडिफाई वर्जन है जिसमें अधिकतम मांग और खर्च यूनिट के साथ एक फिक्स चार्ज भी जोड़ दिया जाता है। यह फिक्स चार्ज सैकेंडरी डिस्ट्रिब्यूशन की मैंटिनेंस और लैबर कोस्ट के रूप में लिये जाते है।

अधिकतम मांग टैरिफ (maximum demand tarrif) 

यह टैरिफ भी टू पार्ट टैरिफ के समान होता है इसमें अन्तर सिर्फ इतना होता है कि इस टैरिफ में अधिकतम मांग को मैक्सिमम डिमांड इंडिकेटर की मदद से मापकर तब चार्ज किया जाता है। यह टैरिफ प्लान बड़े कंज्यूमर के लिए प्रयोग किया जाता है।

ब्लोक रेट टैरिफ (Block rate tarrif) 

ब्लोक रेट टैरिफ में टोटल यूनिट को अलग-अलग ब्लोक में बांटा जाता है और हर ब्लोक का चार्ज रेट अलग होता है। जैसे पहली 100 यूनिट का चार्ज रेट 2 रुपए/यूनिट और अगली 101 यूनिट से 300 यूनिट के चार्जिंग रेट 2.5 रुपए/यूनिट और 301 यूनिट से अधिक यूनिट के लिए चार्जिंग रेट 3 रुपए/यूनिट किये जाये तो तब यह टैरिफ प्लान ब्लोक रेट टैरिफ में आता है। यह प्लान इलैक्ट्रिकल एनर्जी सेविंग को प्रोत्साहित करता है।
Er. Chand सितंबर 21, 2021
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  power plant questions and answer in hindi


अगर आप इलैक्ट्रिकल जेई  सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे हो तो आपने लिए ये power plant questions प्रश्र उत्तर बहुत ही महत्वपूर्ण होने वाले है यहां पर में आपको पावर प्लांट से संबंधित सभी महत्वपूर्ण प्रशन उत्तर के बारे में नीचे बिस्तार से लिख रहा हूं इन्हे पढ़कर आप पावर प्लांट विषय में अच्छे नंबर ला सकते है। तो चलिए शुरू करते है

• ऐसा कौन-सा बाॅयलर है जो निम्न और मध्यम दाब दोनों की श्रेणी में आता है :

 काकरन बाॅयलर

• स्टार्लिग बाॅयलर दाब के अनुसार किस श्रेणी में आते हैं :

मध्यम

• काकरन बाॅयलर की अधिकतम क्षमता हो सकती है :

3600 kg/hour

• स्टार्लिग बाॅयलर की क्षमता कितनी होती है :

50 टन/घंटा

• उच्च स्तर के कोयलें में कैलोरी होती है :

7000-8000 किलों कैलोरी

• एक किलो यूरेनियम से कितनी ऊष्मा प्राप्त होती है :

2×10 की पावर 10 (किलो कैलोरी)

• मोडरेटर हेतु उपयुक्त पदार्थ होता है :

भारी जल, ग्रेफाइट,बेरेलियम

• ऐसी कौन-सी टरबाइन है जिसे जल शीर्ष के आधार पर निम्न और मध्यम के लिए उपयोगी है :

फ्रेंसिस टरबाइन

• निम्न शीर्ष प्लांल में जल का शीर्ष होता है।

45 मीटर

• मध्यम शीर्ष प्लांट में जल का शीर्ष होता है :

45-300 मीटर तक

• केप्लान टरबाइन की गति होती है :

300-1000 rpm

• फ्रांसिस टरबाइन में जल छोडा जाता है :

मध्यम शीर्ष से

• केप्लान टरबाइन में जल छोडा जाता है :

उच्च शीर्ष से

• फ्रांसिस टरबाइन की गति होती है :

60-300 rpm

• पेल्टन टरबाइन की गति होती है :

10-60 rpm

• पेल्टन किस प्रकार की टरबाइन है :

आवेगी टरबाइन

• फ्रांसिस टरबाइन किस प्रकार की टरबाइन है :

प्रतिक्रया टरबाइन

• केप्लान किस प्रकार की टरबाइन है :

प्रतिक्रया टरबाइन

• आवेगी टरबाइन वायु मंडल में होता है :

खुला

• केप्लान टरबाइन की संरचना किसके समान होती है :

फ्रांसिस टरबाइन

• सामान्य स्तर के कोयलें में ऊष्मा होती है :

6440 किलो कैलोरी

• किस प्लांट में सबसे अधिक देख रेख की आवश्यकता होती है :

स्टीम पावर प्लांट

• व्यवसायिक लोड का पावर फैक्टर होता है :

25-30%

• केप्लान टरबाइन की क्षमता होती है :

90%

• छोटे छोटे कणों में टूटा हुआ कोयला होता है :

पुल्वेराइज्ड कोयला

• थर्मल पॉवर प्लांट की क्षमता कब बढ़ेगी :

भाप का दाब उच्च होने पर

• थर्मल पॉवर प्लांट में भण्डार से बाॅयलर तक कोयला ले जाया जाता है :

V-बेल्ट के द्वारा (कन्वेयर बेल्ट)

• पावर प्लांट में कोयले का दहन और शक्ति उत्पादन किस चक्र के आधार पर किया जाता है :

रेकाइन चक्र

• न्यूक्लियर पावर प्लांट की क्षमता, थर्मल पॉवर प्लांट की तुलना में होती है :

अधिक

नाभिकीय पावर प्लांट में डयूटिरियम आॅक्साइड का उपयोग होता है :

मन्दक के रूप में

• रियेक्टर में ऊत्सर्जित रेडियोधर्मी विकिरण को रोकने हेतु उपयुक्त युक्ति है :

विकिरण शील्ड

• नाभिकीय रिएक्टर में विकिरण शील्ड को स्टील का बनाया जाता है।

• स्टीम पाॅवर प्लांट की रनिंग कोस्ट डीज़ल पावर प्लांट से कम होती है।

• हाइड्रो पावर प्लांट की रनिंग कोस्ट सबसे कम होती है।

• स्थिर शक्ति पर ली गई धारा इकाई शक्ति गुणांक पर न्यूनतम होगी।

• पनडुब्बी में विधुत शक्ति का स्रोत बैटरी होता है।

• डीजल पावर प्लांट का प्रचालन मूल्य (रनिंग कोस्ट) सबसे ज्यादा होता है।

• डीजल इंजन की तुलना में पेट्रोल इंजन की तापीय क्षमता कम होती है।

• किसी प्लांट के लोड फैक्टर का मान अधिक होने से उत्पादित यूनिट की किमत कम हो जाती है।

• उत्पादित यूनिट प्रति वर्ष- औसत लोड×एक वर्ष में घंटों की संख्या

• एक थर्मल पॉवर प्लांट की सम्पूर्ण क्षमता 30 प्रतिशत होती है।

• यदि प्राकृतिक यूरेनियम को ईंधन की भांति प्रयोग किया जाये तब मन्दक के रूप में (D2O) भारी जल का प्रयोग किया जाता है।

• थर्मल पॉवर प्लांट में सबसे अधिक बाॅयलर की देख रेख की आवश्यकता होती है।

• हाइड्रोलिक टरबाइन के साथ जुड़े अल्टरनेटर में ध्रुवों की संख्या सबसे अधिक होती है।

• भारत में सबसे अधिक विधुत ऊर्जा थर्मल पॉवर प्लांट के द्वारा उत्पन्न की जाती है।

• इकनोमाइजर से हम गर्म करते है, फीड वाटर को

• डीजल पावर प्लांट का उपयोग सामान्यतः किसकी भांति प्रयोग किया जाता है, पीक लोड स्टेशन

• किसी परिपथ द्वारा जितनी कम रियेक्टिव पावर ली जाती है उसका पावर फैक्टर उतना ही उत्तम होगा।

• पानी के जहाज में विधुत शक्ति उत्पन्न करने के लिए डीजल इंजन प्लांट का उपयोग किया जाता है।

• पेल्टन व्हील क्या है, यह एक उच्च शीर्ष टरबाइन है।

• सुपर हिटर का काम होता है, यह टरबाइन से आने वाली भाप के तापमान को और अधिक बढ़ा देता है।

• टरबाइन की गति को गवर्नर के द्वारा नियंत्रित किया जाता है।

• ऊर्जा का कामर्शियल सोर्स सोलर, हवा और बायो गैस है।

• हाइड्रो पावर प्लांट में डैम से पानी को टरबाइन तक पहुंचाया जाता है, पेन स्टोक के माध्यम से

• पेन स्टोक को किस पदार्थ द्वारा बनाया जाता है, हाई स्टील मटेरियल का

• तापीय शक्ति संयंत्र की क्षमता उच्च दाबिय भाप का प्रयोग करने से बढ़ती है।

• बाॅयलय थर्मल पावर प्लांट का एक मुख्य भाग होता है जिसमें पानी को भाप में बदला जाता है।

• स्टीम पाॅवर प्लांट में रनिंग कोस्ट एक स्थिर मूल्य होता है।

• सबसे अच्छा कोयला एंथ्रासाइट होता है क्योंकि इसका कैलोरीफिक मान सबसे अधिक होता है।

• कोयलें को पीसकर चूर्ण के रूप में प्रयोग करने से बायलय की क्षमता बढ़ जाती है, कोयला आसानी से और पूर्ण रूप में जलता है, कम हवा की आवश्यकता पड़ती है।

• दुनिया में सबसे अधिक बिजली थर्मल पॉवर प्लांट से बनायी जाती है और कोयले का उपयोग थर्मल पॉवर प्लांट में पानी को गर्म करके वाष्प में परिवर्तित करने के लिए किया जाता है।

• विधुत स्थैतिक प्रेसिपिटेटर, थर्मल पॉवर प्लांट में चिमनी के सबसे ऊपर लगा होता है यह धुएं के साथ आने वाले धुल कण और राख को धुंए से अलग करने के लिए प्रयोग किया जाता है।

• एक थर्मल पॉवर प्लांट में ईंधन को पूरी तरह से जलाने के लिए हवा का उचित संचलन भी जरूरी होता है ईंधन को जलाने के लिए यह हवा ड्राफ्ट फैन की मदद से प्रदान की जाती है।

• सुपर हिटर का प्रयोग फीड के पानी को गर्म करने के लिए और भांप से नमी को दूर करने के लिए किया जाता है।

• पेल्टन व्हील एक उच्च शीर्ष टरबाइन है यह अक्षिय प्रवाह आवेगी टरबाइन होता है। इसका उपयोग ऐसे स्थान पर किया जाता है जहां जल की अपेक्षाकृत कम मात्रा उच्च शीर्ष पर उपलब्ध हो।

• जलाशय में पानी के स्तर को उपयोगी सीमा तक बनायें रखने के लिए उमड़ मार।मार्ग (spilway) का प्रयोग किया जाता है। और सर्ज टैंक (surg tank) का प्रयोग पैन स्टोक (pen stock) में गति और दाब की स्थिरता बनायें रखने और जलावरोध प्रभाव को कम करने में मददगार होता है। पैन स्टोक, सर्ज टैंक और प्राइम मूवर के बीच लगा होता है।

• गवर्नर टरबाइन की गति को नियंत्रित करता है जब अल्टरनेटर पर भार बदलता है तो अल्टरनेटर की गति एक समान बनी रहनी चाहिए। अल्टरनेटर की गति को एक समान रखने के लिए टरबाइन के साथ एक गवर्नर का उपयोग किया जाता है। जिससे अल्टरनेटर की गति सभी भारो पर एक समान बनी रहें। 

• हाइड्रो पावर प्लांट में सबसे कम प्रदूषण ऊत्पन्न होता है। और इस पावर प्लांट की रनिंग कोस्ट शून्य के बराबर होती है।

• प्रतिक्रया टरबाइन में जब पानी ड्राफ्ट ट्यूब में प्रवेश करता है तो उसकी गतिज ऊर्जा बहुत अधिक होती है।

• इकोनोमाइजर का कार्य पानी को बाॅयलर में भेजने से पहले गर्म हो करना होता है ऐसा करने से बाॅयलर की ऊष्मा क्षमता में वृद्धि होती है। और इसमें पानी को गर्म करने के लिए बाॅयलर से निकलने वाली व्यर्थ गैसों का प्रयोग किया जाता है।

• कप्लान टरबाइन एक प्रतिक्रया टरबाइन है और इस टरबाइन में पानी ब्लेड से अक्षिय रूप में टकराता है।

• भारत में प्रथम नाभिकीय पावर प्लांट तारापुर में बना है।

गैस टरबाइन प्लांट की कैपिटल कोस्ट समान क्षमता वाले स्टीम पाॅवर प्लांट से कम होती है।

आशा करता हूं कि आपको मेरी ये पोस्ट अच्छी लगी होंगी और आप इस पोस्ट से power plant questions के सभी प्रशनो के आपको उत्तर भी मिल गये होगें पोस्ट अच्छी लगी हो तो कमेंट और शेयर जरुर किजिए। 



Er. Chand सितंबर 17, 2021
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 हैलो दोस्तो आज हम इस पोस्ट में बात करेंगे thermal power plant in hindi में बिजली कैसे बनती है। और इसमें ऊर्जा को यांत्रिक रूप से विधुत रूप में कैसे बदला जाता है। ओर कौन कौन से उपकरण के द्वारा इस काम को अंजाम दिया जाता है तो आज में आपको इन सब के बारे में अच्छे से समझाऊंगा तो आप सब बनें रहिए हमारी इस पोस्ट पर तो सबसे पहले यह जान लेते है कि पाॅवर प्लांट आखिर होता क्या है।

पाॅवर प्लांट एक ऐसा स्थान होता है जहां पर ऊर्जा को एक रूप से दूसरे रूप में बदला जाता है। यह बहुत सारी जगह में फैला होता है इसके अन्दर बहुत सारी मशींने लगी होती है जैसे टरबाइन, बाॅयलर,सुपर हिटर, भट्टियां, अल्टरनेटर,हिटर और काफी सारी मशीनें इसके अन्दर लगीं होती है। उस जगह को पाॅवर प्लांट कहते है। ऊर्जा एक ऐसी चीज होती है जिसको न तो ऊत्पन्न किया जा सकता है और न ही इसको खत्म किया जा सकता है ऊर्जा को सिर्फ और सिर्फ एक रूप से दूसरे रूप में बदला जा सकता है। थर्मल पॉवर प्लांट में भी ऊर्जा को सिर्फ एक रूप से दूसरे रूप में बदला जाता है तो अब thermal power plant kya hota hai के बारे में जान लेते है।

थर्मल पॉवर प्लांट क्या होता है ( thermal power plant in hindi )

थर्मल पॉवर प्लांट एक ऐसा पाॅवर प्लांट होता है जहां पर यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता है तो ऐसे पाॅवर प्लांट को थर्मल पॉवर प्लांट कहते है। इसे स्टीम पाॅवर प्लांट भी कहते है क्योंकि इसमें टरबाइन को स्टीम के द्वारा ही घुमाया जाता है। 

थर्मल पॉवर प्लांट में पानी को गर्म करके भाप ऊत्पन्न की जाती है इस भाप को पूरी तेजी के साथ टरबाइन में छोड़ा जाता है जिससे टरबाइन की पंखुड़ियां घूमने लगती है टरबाइन की साफ्ट से अल्टरनेटर जुडा रहता है जिससे टरबाइन की पंखुड़ियां घूमने पर अल्टरनेटर भी घूमने लगता है तो इस से टरबाइन की यांत्रिक ऊर्जा को अल्टरनेटर के द्वारा विधुत ऊर्जा में परिवर्तित कर दिया जाता है
इस पूरी प्रक्रिया में काफी सारे उपकरणों का इस्तेमाल किया जाता है जिनके बारे में हम विस्तार से निचे पढ़ेंगे।

वाटर रिजर्वायर

 पानी thermal power plant का मुख्य स्रौत होता है। क्योंकि पानी से ही भांप बनती है और थर्मल पॉवर प्लांट में भाप से ही बिजली बनती है। थर्मल पॉवर प्लांट में जिस जगह पानी को स्टोर करके रखा जाता है। उस जगह को वाटर रिजर्वायर कहते है। वाटर रिजर्वायर के अन्दर पानी को साफ करने के लिए मशीनें लगी रहती है ताकि बाॅयलर के अन्दर साफ पानी पहुंचे और पानी जल्दी से भाप में बदल जाये।

कन्वेयर बेल्ट

यह एक लौहे की बनी बेल्ट होती है जो कोयलें को क्रशर तक लाने का काम करती है। थर्मल पावर प्लांट पर कोयला माल गाड़ी में भर कर आता है माल गाड़ी से कोयलें को कन्वेयर बेल्ट के द्वारा क्रशर तक पहुंचाया जाता है।

  क्रशर

कोयला थर्मल पॉवर प्लांट के अन्दर बड़े बड़े टूकडों के रूप में आता है अगर कोयलें को टूकडों के रूप में ही जला दिया जाये तो कोयला पूरी तरह से जल नहीं पाता है जिससे कोयलें की पूरी ऊर्जा का उपयोग नहीं हो पाता है।तो इसलिए इन कोयलें के टुकड़ों को क्रशर में डालकर बारीक महीन पावडर बनाया जाता है जिससे कोयलें का फैलाव अच्छी तरह से हो जाता है और कोयला पूरी तरह से जलता है।

ईंधन(feul)

 thermal power plant in hindi में उपयोग किया जाने वाला ईंधन कोयला होता है कोयलें को भट्टी में जलाकर ही बाॅयलर के अन्दर का पानी गर्म होकर भाप बनने लगता है। यह भाप टरबाइन को घूमाने का काम करती है जिससे अल्टरनेटर घूमने लगता है और बिजली बनने लगती है। इस प्रकार कोयला बिजली बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। दुनिया भर में कोयला कई प्रकार का पाया जाता है। इसलिए एक अच्छे कोयले का चयन करना बहुत जरूरी होता है। जिस कोयलें में कार्बन की मात्रा अधिक होती है उसे सबसे अच्छा कोयला माना जाता है। 

कोयला प्रकृति में कई चार प्रकार क पाया जाता है, एंथ्रासाइट,बिटूमिनश, लिग्नाइट और पीट इन चार रूपों में कोयला पाया जाता है। इनमें सबसे अच्छा कोयला एंथ्रासाइट होता है इसमें कार्बन की मात्रा लगभग 87 प्रतिशत होती है इसके बाद बिटूमिनश दूसरे नंबर पर आता है, इसमें कार्बन की मात्रा 70 से 80 प्रतिशत होती है। तिसरे नंबर पर लिग्नाइट कोयला आता है, इसमें कार्बन की मात्रा 60 से 70 प्रतिशत होती है। और चौथे नंबर पर पीट कोयला आता है ये सबसे खराब कोयला माना जाता है, इसमें कार्बन की मात्रा 50 से 60 प्रतिशत होती है। इसलिए इस कोयला का उपयोग कर किया जाता है
भारत में सबसे अधिक लिग्नाइट कोयले का उपयोग किया जाता है क्योंकि ये भारत में कोयलें की खानों से सबसे ज्यादा मात्रा में निकलता है।
एक किलो कोयलें को जलाने पर 5000 किलों कैलोरी ऊष्मा निकलती है।
इस प्रकार कोयला थर्मल पॉवर प्लांट से बिजली बनाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है

एयर प्री हिटर

ईंधन को जलाने के लिए हवा की आवश्यकता पड़ती है तो इस एयर प्री हिटर के माध्यम से हवा को गर्म करके बर्नर में छोड़ा जाता है जिससे ईंधन में आसानी से आग लग जाती है। 

इक्नोमाॅइजर (Economiser) 

पानी को बाॅयलर में डालने से पहले गर्म किया जाता है जिससे बाॅयलर में गर्म पानी पहुंच सकें। तो बाॅयलर में जाने से पहले पानी को जिस चीज में गर्म किया जाता है उसे इक्नोमाॅइजर कहते है। इसमें पानी गर्म करने के लिए गैस ईंधन का प्रयोग किया जाता है।

बाॅयलर(Boiler)

बाॅयलर स्टील या सिमेंट का बना हुआ एक बहुत बड़ा टैंक होता है जिसके अन्दर पानी की भाप बनाई जाती है। बाॅयलर के अन्दर पानी को भाप में बदलने के लिए 300 डिग्री सेल्सियस तक का तापमान ऊत्पन्न किया जाता है। बाॅयलय के अन्दर 300 डिग्री सेल्सियस का तापमान कोयलें को जलाकर ऊत्पन्न करते है thermal power plant in hindi में दो प्रकार के बाॅयलय उपयोग किये जाते है
• फायर ट्यूब बाॅयलर
• वाटर ट्यूब बाॅयलर

सुपर हिटर (super heater)

सुपर हिटर का काम यह होता है -- बाॅयलर में बनने वाली भाप में कुछ नमी होती है अगर इस नमी वाली भाप को टरबाइन में डाला जाएगा तो टरबाइन के अन्दर के उपकरण जंग लगकर जल्दी खराब हो जाएंगे तो जंग से बचाने के लिए इस नमी वाली भाप को पहले सुपर हिटर के द्वारा और अधिक गर्म किया जाता है जिससे भाप की नमी खत्म हो जाती है और इसके साथ साथ सुपर हिटर भाप की गति भी बढा देता है। सुपर हिटर के अन्दर का तापमान 500 डिग्री सेल्सियस तक होता है।

कन्डेंशर (condansor)

कन्डेंशर एक ऐसा उपकरण होता है जो भाप को दुबारा से पानी बनाने में मदद करता है। कन्डेंशर इस पूरी प्रक्रिया को कुछ ऐसे अंजाम देता है, सुपर हिटर से भाप टरबाइन में जाती है जिससे टरबाइन के ब्लेड घूमने लगते है फिर यह भाप टरबाइन से निकलकर सीधा कन्डेंशर में जाती है और कन्डेंशर इस भाप को फिर से पानी बना देता है। ये पानी फिर से बाॅयलर में डाला जाता है बाॅयलर इस पानी को फिर से भाप बना देता है और ये प्रक्रिया ऐसे ही चलती रहती है।

वाटर फीड पम्प (water feed pump)

बाॅयलर में पानी भाप में बदलने लगता है तो बाॅयलर के अन्दर पानी की कमी होने लगती है। पानी की कमी को पूरा करने के लिए एक पम्प लगाया जाता है। इस पम्प को वाटर फीड पम्प कहते है। यह पम्प, कन्डेंशर के द्वारा जिस भाप को दुबारा पानी में बदला जाता है उस पानी को बाॅयलर में लें जाने का काम करता है।

इलैक्ट्रो स्टेटिक प्रिपिसीटेटर

यह बाहर निकलने वाली गैसों से डैस्ट और गन्दगी को अपने अन्दर शौंख लेता है। ताकि जो गैस वातावरण में जाएं उसके द्वारा किसी को कोई नुक्सान न पहुंचे।

इंड्यूज डाफ्ट फैन

यह एक पंखा होता है जो बाॅयलर में बनने वाली गैसों को तेजी से खींचकर चिमनी के द्वारा बाहर निकाल देता है। ताकि बाॅयलर को किसी प्रकार की कोई दिक्कत न आए। यदि बाॅयलर के अन्दर इस फैन का प्रयोग न किया जाए तो बाॅयलर के अन्दर गैस ज्यादा इकट्ठा हो जाती है और बाॅयलर के फटने का खतरा बन जाता है

 टरबाइन

thermal power plant in hindi के अन्दर एक स्टीम टरबाइन का उपयोग किया जाता है। जो भाप की गतिज ऊर्जा को रोटेशनल यांत्रिक ऊर्जा में बदलता है। टरबाइन के अन्दर एक रोटर होता है जिस पर अर्ध कटोरी आकार के ब्लेड लगें होते है। ब्लेडों को अर्ध कटोरी आकार का इसलिए बनाया जाता है जैसे ही ब्लेडों पर भाप आकर टकराये तो ब्लेड घूमना चालू कर दें। टरबाइन के रोटर की साफ्ट से अल्टरनेटर जुडा होता है जैसे ही टरबाइन का रोटर घूमता है अल्टरनेटर भी घूमने लगता है और थर्मल पॉवर प्लांट में बिजली बनाना चालू हो जाती है।


टरबाइन कई प्रकार के होते है इनकी संरचना को हैंड और डिसचार्ज को ध्यान में रखकर बनाया जाता है

• पेल्टन टरबाइन का हैंड हाई और डिसचार्ज लो होता है।
• फ्रांसिस टरबाइन का हैंड मिडियम और डिसचार्ज भी मिडियम होता है।
• कप्लान टरबाइन का हैंड लो और डिसचार्ज हाई होता है।

अल्टरनेटर या एसी जेनरेटर

अल्टरनेटर साफ्ट के द्वारा टरबाइन से जुड़ा होता है। यह एक थ्री फेज सिंक्रोनस जेनरेटर होता है। जब टरबाइन घूमने लगता है तो अल्टरनेटर भी घूमने लगता है। जिससे अल्टरनेटर में एक प्रेरित विधुत वाहक बल उत्पन्न हो जाता है। ये विधुत वाहक बल ही बिजली होती है। इस बिजली को ट्रांसफॉर्मर और ट्रांसमिशन लाइन के द्वारा हमारे घरों तक पहुंचाया जाता है।

थर्मल पॉवर प्लांट के लाभ

thermal power plant in hindi को लगाने में इसकी शुरुआती किमत दूसरे पाॅवर प्लांटो की तुलना में काफी कम होती है।
• थर्मल पॉवर प्लांट को लगाने में दूसरे पाॅवर प्लांटो की तुलना में कम जमीन की जरूरत होती है।
• थर्मल पॉवर प्लांट में ईंधन के रूप में कोयला प्रयोग किया जाता है। कोयला दूसरे ईंधन की तुलना में सस्ता होता है इसलिए इसकी बिजली उत्पादन किमत कम होती है।
• थर्मल पॉवर प्लांट में अगर कोई खराबी आ जाये तो उसे आसानी से ठीक किया जा सकता है।

थर्मल पॉवर प्लांट की हानि

• इस पाॅवर प्लांट में ईंधन के रूप में कोयला प्रयोग किया जाता है जिसकी वजह से वातावरण में प्रदूषण ज्यादा फैलता है।
• थर्मल पॉवर प्लांट में कोयले का उपयोग होने से इसकी दक्षता काफी कम हो जाता है।



Er. Chand अगस्त 06, 2021
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              आइसोलेटर(Isolator)

आइसोलेटर विधुत का एक ऐसा साधन है जो बिना विधुत भार वाले उच्च वोल्टेज के विधुत सर्किटो को खोलने और बन्द करने का काम करता है । आइसोलेटर एक डिस्कनेक्टिगं स्विच कहलाता हैं । इसका प्रयोग लोड करन्ट की अनुपस्थिति में यानी बिना लोड पर उच्च वोल्टेज की विधुत शक्ति लाइन को चालु करने या बन्द करने के लिए किया जाता हैं । इसमें आर्क बुझाने का कोई साधन भी नहीं होता हैं लेकिन जो पाॅवर आइसोलेटर होते हैं उन्हें लोड पर भी चालू किया जा सकता हैं । और इनमें आर्क बुझाने की व्यवस्था भी होती हैं ।

 आइसोलेटर या डिस्कनेक्टिगं स्विच को बिना लोड (no load) पर चालु किया जाता हैं । इसकी कोई निर्धारित धारा ब्रेकिगं क्षमता नहीं होती हैं ।हम लोड करन्ट को ब्रेक करने के लिए आइसोलेटर का प्रयोग नहीं करते हैं । आइसोलेटर का प्रयोग स्विचगियर संस्थापन में बस के किसी भाग में सप्लाई किये हुए वोल्टेज की रोकथाम के लिए किया जाता हैं । आइसोलेटर में रिले कुण्डली नहीं होती हैं आइसोलेटर सामान्य या असामान्य अवस्था में बन्द या खोले जा सकते हैं ।


            आइसोलेटर (Isolator) के प्रकार


उपयोग स्थल के आधार पर आइसोलेटर दो प्रकार के होते हैं

(1) अंतः प्रारुपि आइसोलेटर (Indoor type Isolator ) 

इस आइसोलेटर में स्थिर और चल सम्पर्क होते हैं स्थिर सम्पर्क के अगले भाग में चल सम्पर्क के प्लग टाइप अगले भाग के आकार का एक छिद्र बना होता हैं । आइसोलेटिगं अवस्था में इस छिद्र का मुंह एक सटर द्वारा बन्द रहता हैं चल सम्पर्क का अगला भाग एक प्लग टाइप होता है

Indoor type Isolator 3-pole या 4-pole isolator होते हैं ।



(2) बाह्मा प्रारुपि आइसोलेटर ( Out door type Isolator )

इन आइसोलेटर को दो वर्गों में, सिंगल पोल और टिॢपल पोल में वर्गीकृत किये जाते हैं । टिॢपल पोल आइसोलेटर को समूह प्रचालित बनाया जाता हैं । इनका प्रचालन विधुत मोटर और हस्त से आवश्यकता अनुसार किया जाता है जबकि सिंगल पोल आइसोलेटर हाथ से चलने वाले ही होते हैं और केवल 50Kv तक ही उपयोग में लाये जाते हैं । 50Kv से ऊपर सभी वोल्टेजो पर 3-pole आइसोलेटर ही उपयोग किये जाते हैं ।

इसे भी देखें : सर्किट ब्रेकर क्या होता है

आइसोलेटर के कुछ आवश्यक काम

(1) यह बिना ओवर हिटिंग किये,ओवर लोड करन्ट को अपने माध्यम से प्रवाहित करता हैं ।

(2) यह निम्न प्रेरण धाराओं को रोकता है ।

(3) यह टर्मिनल और शाॅर्ट लाइन फाल्टो को रोकता है ।

(4) इसकी संरचना और सर्किट आसान होता हैं ।

(5) यह बिना लोड पर सामान्य स्थितियों में प्रचालित होता हैं ।

(6) इसमें सम्पर्क माध्यम केवल वायु होता हैं ।

(7) इनका आकार छोटा होता हैं ।

(8) यह वेट में हल्के होते हैं ।

(9) इनकी लाइफ कम होती हैं 

(10) इनकी मरम्मत कम होती हैं ।

(11) इनकी अनुरक्षण किमत कम होती हैं ।


Er. Chand जुलाई 04, 2021
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सर्किट ब्रेकर क्या होता है

परिपथ वियोजक (Circuit Breaker) एक यांत्रिक (mechanical) स्विचिग यन्त्र है,जो सामान्य परिपथ परिस्थितियों में धारा को बनाने,वहन करने और वियोजक करने की क्षमता रखता है ।यह असामान्य परिस्थितियों में भी परिपथ को बनाने, कुछ समय तक परिपथ धारा वहन करने और प्रदोष आने के समय परिपथ को वियोजित (break) करके धारा को वहन होने से रोकने का कार्य करता हैं ।

Circuit Breaker एक protection device हैं। जब परिपथ में किसी दोष (fault) के कारण धारा बढ़ जाती है तो circuit breaker परिपथ को तोड़ (break) देता है जिससे हमारे घरों में लगें सभी उपकरण जलने से बच जाते है या खराब होने से बच जाते हैं। तो इस तरह circuit breaker एक protection device का काम करता हैं ।

जो वैधुतरोधी (insulating) माध्यम जिसके द्वारा परिपथ में धारा वहन को रोका जाता है उस परिपथ वियोजक के आगे उपसर्ग लगाकर परिपथ वियोजक के नाम निर्धारित किये जाते हैं । जैसा कि

(1)  तेल परिपथ वियोजक (oil circuit breaker),
(2) वायु परिपथ वियोजक (air circuit breaker), 
(3) SF6 परिपथ वियोजक (SF6 circuit breaker), 
(4) वात्य परिपथ वियोजक (Air blast circuit breaker), 
(5) निर्वात परिपथ वियोजक (vacuum circuit breaker)

विधुत शक्ति प्रणाली में कई प्रकार के उपकरण जैसाकि शक्ति परिणामित्र ( power transformer ), जनित्र (generator), एवं पोपक ( Feeders ) आदि महगे होते हैं । इनका सही रख रखाव आवश्यक है, उसके लिए परिपथ में स्वचालित परिपथ वियोजक की आवश्यकता होती हैं । इसे परिपथ के श्रेणी क्रम में लगाया जाता हैं ।परिपथ के साथ संयोजित महगे उपकरणों को जलने से बचाने के लिए प्रदोष आने के समय यह परिपथ को वियोजित करता है। सर्किट ब्रेकर क्या होता है

     परिपथ वियोजको का वर्गीकरण

परिपथ वियोजको का वर्गीकरण अलग अलग मापदंडों जैसाकि वोल्टता, स्थिति की स्थापना, उनके बाहरी विशेषताएं, प्रतारोधी माध्यम के आधार पर किया जाता हैं ।

(a) वोल्टेज के आधार पर

 (1) कम वोल्टता परिपथ वियोजक(1 kv से कम)  (Low voltage circuit breaker)

(2) मध्यम वोल्टता परिपथ वियोजक(1kv से 52kv)  (Medium voltage circuit breaker)

(3) उच्च वोल्टता परिपथ वियोजक(66kv से 220kv)  (High voltage circuit breaker)

(4) अधिक वोल्टता परिपथ वियोजक ( Extra high circuit breaker )


(b) माध्यम के अनुसार
(1) SF6 परिपथ वियोजक ( SF6 circuit breaker )
(2) वायु नियोजन परिपथ वियोजक
(3) वात्या परिपथ वियोजक
(4) तेल परिपथ वियोजक
(5) नार्वात परिपथ वियोजक

(c) स्थिति के अनुसार
(1) अन्तद्वारीय परिपथ वियोजक (Indoor circuit breaker)
(2) बाह्माद्वारीय परिपथ वियोजक (Outdoor circuit breaker)

(d) प्रचालन प्रणाली के अनुसार
(1) स्वचल पुनर्योजी परिपथ वियोजक (Automatic reclose circuit breaker)
(2) स्वचल परिपथ वियोजक (Automatic circuit breaker)
(3) अस्वचल पुनर्योजी परिपथ वियोजक (Non-auto reclose circuit breaker)

परिपथ वियोजको की संरचना
इस भाग में हम विभिन्न प्रकार के परिपथ वियोजको की संरचना,उपयोगीता और कार्य प्रणाली का अध्यन करेंगे ।

(1) तेल परिपथ वियोजक (oil circuit breaker )

ये पुराने तरह के परिपथ वियोजक है जो कि तेल के आर्क शमन माध्यम के रूप में काम में लेता है । परिपथ वियोजक के सम्पर्क तेल द्वारा अलग किये जाते हैं ।
इसमें दो प्रकार के परिपथ वियोजक आते हैं..

(a) अधिकतम या थोक तेल परिपथ वियोजक (maximum or Bulk oil circuit breaker)

(b) न्यूनतम मात्रा तेल परिपथ वियोजक ( minimum quantity oil circuit breaker )

(a) अधिकतम या थोक तेल परिपथ वियोजक (Maximum or Bulk oil circuit breaker )

इसमें एक मजबूत घना टैंक होता हैं जिसमें एक स्तर तक तेल और तेल के ऊपर हवा भरी होती है । दोनों चल और अचल सम्पर्क तेल में डूबे रहते हैं जैसे ही सम्पर्क अलग होते हैं दोनों सम्पर्को के बीच आर्क उत्पन्न होता है जो ऊष्मा उत्पन्न करता है । इस उष्मा में 5000 डिग्री सेल्सियस तक तापमान उत्पन्न होता है वह तेल को गैसों जैसेकि हाइड्रोजन में बदलता है जिसमें कुछ मात्रा में मीथेन, ईथालीन और एसिटिलीन होती है ।
चल सम्पर्क के हटते ही आर्क लंबाई बढ़ती है और तापमान कम होने पर गैस बनने की मात्रा धीमी हो जाती है । जब चल सम्पर्क और अचल सम्पर्क के मध्य की दूरी एक निर्धारित मान तक पहुंचती है तब शून्य धारा बिन्दु पर पहुंचती हैं 

     दुगुना वियोजक तेल परिपथ वियोजक

 ( Double break oil circuit breaker )

यहां पर दो अचल सम्पर्क टर्मिनल बुशिंग के साथ लगे होते हैं जो कि सामान्य परिस्थितियों में चल कुण्डली के साथ सम्पर्क बनाते हैं चल सम्पर्क के साथ जुड़ा लीवर क्रेक की सहायता से चलाया जाता है सर्किट ब्रेकर क्या होता है

जब दो सम्पर्क अलग होते हैं तो दो आर्क बनते हैं । इस श्रेणी में दो वियोजक होते हैं । यह तेज आर्क लंबाई प्राप्त कर सकता हैं । जिसके कारण तेज चल सम्पर्क की आवश्यकता नहीं रहती है परन्तु यह आर्क के एक्रास असमान वोल्टता वितरण उत्पन्न करता है । इसके अलावा असमान अशं में सम्पूर्ण इन्टृप्टिंग ड्यूटी बनाता है एक वियोजक इन्टृप्टिंग ड्यूटी का 70-80 प्रतिशत लेता है ।

Bulk Oil circuit breaker के लाभ (Advantage of Bulk oil circuit breaker )

(1) आर्क ऊर्जा तेल को सोख (absorb) लेता है ।

(2) तेल के गर्म होने पर जो गैस बनती हैं उनकी शीतलन क्षमता अच्छी होती है ।

(3) तेल एक प्रतिरोधी (insulator) का कार्य करता हैं ।

तेल द्वारा बनाई गई शीतलन सतह आर्क के पास होती हैं ।

Bulk Oil circuit breaker की हानियां (Disadvantage of Bulk oil circuit breaker )

(1) इन वियोजको (breakers) का लम्बा एवं अस्थिर आर्क समय होता हैं ।

(2) ये वियोजक तेज गति का इन्टृप्शन (intruption) नहीं कर पाते हैं ।

(3) इसमें आर्क की लंबाई को रोकने के लिए विशेष नियन्त्रण नहीं होता हैं 

Bulk Oil circuit breaker के अनुप्रयोग (Application)
ये 150 MVA क्षमता के साथ आते हैं और 11 Kv से कम क्षमता की अनुप्रयोगों के काम में लिए जाते हैं ।

(2) न्यूनतम तेल परिपथ वियोजक (Minimum oil circuit breakers)

अधिक तेल वाले परिपथ वियोजक में जलने का खतरा अधिक रहता है । इसलिए कम तेल वाले परिपथ वियोजक बनाये गये । तेल को दो कामों में लिया जाता है एक तो ये आर्क रोकने के माध्यम में काम आता है दुसरा इसे पृथक्करण के लिए काम में लिया जाता हैं । परन्तु 90% तेल पृथक्करण में काम आता है और 10% आर्क रोकने के काम में आता है सर्किट ब्रेकर क्या होता है

एक कम तेल परिपथ वियोजक को एक छोटे कन्टेनर में तेल भरकर केवल आर्क रोकने के लिए काम में लिया जाता हैं ।

वायु वियोजन परिपथ वियोजक ( Air break circuit breaker )

इस परिपथ में वातावरण के वायु दाब को आर्क बुझाने का माध्यम बनाया जाता हैं । उच्च प्रतिरोध व्यवधान के सिध्दांत को काम में लिया जाता हैं । आर्क रनर के द्वारा आर्क की लंबाई बढ़ाया जाता हैं । जिससे प्रतिरोध इस प्रकार बढता है कि आर्क के एक्रास वोल्टता पात सप्लाई वोल्टेज से अधिक हो जाता है और आर्क समाप्त हो जाता है ।

Advantages

(1) यह तेज गति के परिपथ के काम में आते हैं ।
(2) इनमें तेल नहीं होने के कारण जलने का भय नहीं रहता हैं 
(3) इनकी किमत कम होती हैं ।
(4) ये 11Kv से 1100Kv तक की वोल्टेज पर कार्य कर सकते हैं ।

Disadvantages

(1) इनके लिए वायु संकुचन की आवश्यकता होती हैं ।
(2) अति वोल्टेज की सम्भावना टरन्ट चोपिगं (current choping) के कारण बनी रहती हैं ।

(4) निर्वात परिपथ वियोजक ( Vacuum circuit breaker ) 

इसमें निर्वात आर्क बुझाने का माध्यम होता हैं । इसकी प्रतिरोधी क्षमता सबसे अधिक होती है यह सबसे अच्छा आर्क बुझाने का माध्यम है ।
यदि हम यह मानते हैं कि निर्वात में परिपथ के सम्पर्क खुले रहते हैं तो व्यवधान पहले शून्य धारा पर आ जाता हैं । जब निर्वात में सम्पर्क खुलते हैं तब धातु के सीरो पर आर्क उत्पन्न होता हैं । सर्किट ब्रेकर क्या होता है
एक उच्च स्पोट धारा घनत्व के कारण उत्पन्न होता है व सम्पर्क अलग होते हैं । आयन और इलैक्ट्रोन वियोजक की सतह पर उत्पन्न होते हैं और यह आर्क रिस्टाकिगं को रोकता है यह एक या एक से अधिक निर्वात व्यवधान भाग प्रति पोल रखता है । 

निर्वात परिपथ वियोजक की संरचना
इसमें निर्वात चैम्बर होता है जोकि चल, अचल चैम्बर और आर्क शील्ड से जुडा होता है । चल चैम्बर स्टील के बेलोश से जुडा होता है जो नियन्त्रण इकाई द्वारा नियंत्रित किया जाता हैं । सम्पर्को को बड़ी डिस्क आकृति से बनाया जाता हैं । डिस्क को सममित रुप से ऐसे बनाया जाता है जिससे दो सम्पर्क एक दूसरे से अलग कार्य कर सके । इस कारण आर्क सरलता से घूम सकता है बाहरी आवरण कांच का होता है यह कांच का आवरण निर्वात पुरी तरह बनाए रखता है ।लीकेज को बचाने के लिए पुरा चैम्बर शील किया जाता हैं ।

धातु की वाष्प जो सम्पर्क के सिरों से निकलती है आर्किगं के समय इन सिरों पर जम जाती हैं । और प्रतिरोधो से अलग रहती हैं ।
डाइकापर मैग्निशियम, डाइसीजियम कापर, और कापर बिस्मत मेटल व निर्वात परिपथ वियोजक में उपयुक्त रहते हैं ।

Advantages

(1) ये बिना आवाज के कार्य करते हैं ।
(2) इसमें ब्लास्ट की आवश्यकता नहीं होती हैं ।
(3) इसमें डाइलेक्टीक क्षमता बढ़ने की संभावना ज्यादा होती हैं ।
(4) इनकी उम्र लंबी होती हैं ।

Disadvantages

(1) काॅच के आवरण के कारण इनका रख रखाव सावधानीपूर्वक करना पड़ता हैं ।

अनुप्रयोग (Applications) 

ये  आउटडोर एप्लिकेशन में 22Kv से 66Kv तक वोल्टेज के काम में आते हैं । सिंगल इंट्रूप्शन वैक्यूम सर्किट ब्रेकर बहुत अधिक उपयोग में लिए जाते हैं सर्किट ब्रेकर क्या होता है।

(5) सल्फर हेक्सा फ्लोराइड ( sulphur hexa fluoride-SF6 ) सर्किट ब्रेकर

इसमें शुद्ध सल्फर हेक्सा फ्लोराइड गैस काम में ली जाती हैं । इसकी डाइलेक्टिॢक और आर्क बुझाने की क्षमता बहुत अधिक होती हैं । SF6 एक विधुत ऋणात्मक गैस होती है यह इलैक्ट्रोन को सोखने की क्षमता रखती है । यह गैस 9 डिग्री सेल्सियस तापमान तक गैसिय अवस्था में रहती है । इसका घनत्व हवा में पांच गुणा होता है यह अज्वलनशील, विषहीन और गंधहीन गैस होती हैं ।
सर्किट ब्रेकर के सम्पर्क गैस प्रवाहित होने पर उच्च दाब के कारण खुलते व बन्द होते है और आर्क उत्पन्न करता है । इलैक्ट्रोन को गैस सोख लेती हैं । जिससे इलैक्ट्रोन की कमी के कारण प्रतिरोधकता बढ़ती है और आर्क बुझ जाती हैं ।

कई प्रकार के सल्फर हेक्सा फ्लोराइड सर्किट ब्रेकर बनाये गये है जो 36 से 760Kv तक कार्य करते हैं ।

Advantages

(1) इसका आकार अन्य सर्किट ब्रेकर के अनुपात में छोटा होता हैं ।
(2) सल्फर हेक्सा फ्लोराइड एक अज्वलनशील और स्थिर गैस है ।
(3) सल्फर हेक्सा फ्लोराइड गैस को पुनः काम में लिया जा सकता हैं ।
(4) इसकी धारा वहन क्षमता वायु वियोजक से 1.5 गुना ज्यादा होती हैं ।
(5) इसके रख रखाव की लागत बहुत कम आती हैं ।
(6) यह सर्किट ब्रेकर बिना आवाज के कार्य करते हैं ।

Disadvantages
(1) इनमें सिलिगं की समस्या आती हैं ।
(2) गैस के लीकेज की सम्भावना बनी रहती हैं ।
(3) इनमें नमी का दबाव बहुत हानिकारक होता हैं ।
(4) इनकी किमत बहुत अधिक होती हैं ।

अनुप्रयोग ( Applications )

यह 60KA तक धारा और 50-80Kv तक वोल्टेज को रोक सकते हैं । इन्हें 115 से 500Kv वोल्टेज और शक्ति दर 10MVA से 20MVA तक काम में लिया जाता हैं ।

दोस्तों हमने यहां पर सर्किट ब्रेकर क्या होता है और ये कितने प्रकार का होता है यह जाना है i hope के आप सब को मैरी ये पोस्ट अच्छी लगी होंगी। इसके बारे में अपने सुझाव के लिए एक कमेंट जरुर करे।

Er. Chand जुलाई 02, 2021
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                   फाल्ट क्या होता है

फाल्ट को शुद्ध हिन्दी में प्रदोष कहा जाता है।फाल्ट का मतलब एक विधुत उपकरण के विधुत परिपथ में आये उस दोष से है जिसके कारण धारा का प्रवाह अपने निशचित मार्ग से हट जाना होता हैं ।
किसी विधुत परिपथ में यदि तार या तारो का समूह टूटकर अलग हो जाता हैं या भूमि से टकरा जाये या तारो का समूह आपस में जुडकर short circuit हो जाने के कारण परिपथ अनियमित अवस्था में आ जाये तो उस परिपथ में प्रदोष ( fault ) आ जाता हैं ।


वैधुत प्रदोष (fault ) के प्रकार

वैधुत प्रणाली में दोष दो प्रकार के होते हैं

(1) आंतरिक वैधुत प्रदोष ( Internal Electrical Fault ) 

ऐसा fault जो वैधुत मशीनों के अन्दर लगें उपकरणों, मशीनों आदि के आंतरिक भागों में उत्पन्न होता हैं उसे आंतरिक वैधुत प्रदोष कहते है । ये प्रदोष सामान्यतः दिखाई नही देते हैं ।

(2) बाह्मा वैधुत प्रदोष ( External Electrical Fault ) 

इस प्रकार के प्रदोष वैधुत प्रणाली में प्रयुक्त होने वाले उपकरणों एवं मशीनों के बाह्मा भागों में आते हैं इन्हें बाहरी प्रदोष कहते है । ये प्रदोष आंखों से दिखाई देते हैं । 


वैधुत प्रणाली के प्रदोषो का वर्गिकरण

वैधुत शक्ति प्रणाली में आने वाले वैधुत प्रदोषो को निम्न प्रकार से विभाजित किया गया है 

                              Faults

(1) वैधुत प्रदोष।                      
स्थाई प्रदोष (permanent fault)
अस्थाई प्रदोष (Temporary fault)

(2) यांत्रिक प्रदोष ।

स्थाई प्रदोष (permanent fault )


ऐसा प्रदोष जो वैधुत शक्ति प्रणाली में लम्बे समय तक रहता है और उसे हटाना पड़ता है । ऐसे प्रदोष को स्थाई प्रदोष कहते हैं ।
स्थाई प्रदोष दो प्रकार के होते हैं ।

सममित प्रदोष (symmetrical fault )
असममित प्रदोष ( Asymmetrical fault )

सममित प्रदोष (symmetrical fault )


इस प्रदोष के कारण सभी तारो में धारा का मान एक जैसा रहता है । उसे सममित प्रदोष कहते हैं ।
इसमें निम्न प्रदोष आते हैं ।

(1) त्रिकला लघु पथ प्रदोष (3-phase short circuit fault )
(2) त्रिकला खुला पथ प्रदोष (3-phase open circuit fault )
(3) त्रिकला भू-दोष ( 3-phase earth fault )
(4) त्रिकला कोरोना क्षरण प्रदोष ( 3-phase corona leakage fault )
(5) त्रिकला अतिभार प्रदोष (3-phase over load fault)
 

असममित प्रदोष ( Asymmetrical fault )


ऐसे प्रदोष जिसमें वैधुत शक्ति प्रणाली के सभी तारो में धारा का मान अलग अलग होता है । उसे असममित प्रदोष कहते है । इसमें निम्न प्रदोष आते हैं ।

(1) एकल कला भू दोष ( 1-phase earth fault )
(2) एकल कला खुला पथ प्रदोष ( 1-phase open circuit fault )
(3) द्विकला भू दोष ( 2-phase earth fault )
(4) द्विकला खुला पथ प्रदोष ( 2-phase open circuit fault )
(5) द्विकला लघु पथ प्रदोष ( 2-phase short circuit fault )
(6) त्रिकला असंतुलित अतिभार प्रदोष ( 3-phase unbalance over load fault )

अस्थाई प्रदोष ( Temporary fault ) 

ऐसा प्रदोष जो तारो में कुछ समय तक रहता है अर्थात कुछ समय बाद अपने आप ही हट जाता हैं । ऐसे प्रदोष को अस्थाई प्रदोष कहते हैं । जैसे कि आंधी के समय हवा के कारण तार आपस में टकराते हैं । और बाद में खुद ही हट जाते है ।


प्रदोष के स्त्रोत ( Sources of Faults )


जब किसी विधुत शक्ति प्रणाली में विधुत प्रदोष आता है तो उसकी चर राशियों जैसे कि विधुत दाब, धारा प्रवाह आदि में अनियमितता आ जाती हैं । जिससे विधुत प्रदोष होने पर पता चलता है । विधुत प्रदोष होने के कई कारण होते हैं । परन्तु विधुत प्रदोषो के स्त्रोतो को विभिन्न प्रकारों में विभाजित किया जा सकता हैं ।

(1) यांत्रिक क्षति ( mechanical Injury )

विधुत संचरण तारो में यह प्रदोष तेज चलने वाली हवाओं या वृक्षों या दिवारो के उन तारों पर गिरने से उनमें होने वाली क्षति के कारण हो सकता है । इस कारण संवाहक के टूटने या विसंवाहक ( insulator ) के कार्य नहीं करने से हों सकता हैं । इस कारण परिपथ जल सकते हैं ।


Er. Chand जुलाई 01, 2021
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