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 EMF kya hota hai

हैलो फ्रेंड्स आज हम बात करने वाले है emf kya hota hai emf का पूरा नाम electro motive force होता है। इसको हम कुछ इस तरह से समझते है, मान लीजिए हमारे पास एक काॅपर का तार है जिसके अन्दर बहुत सारे फ्री इलैक्ट्रोन होते है इनके ऊपर ऋणात्मक आवेश होता है। जैसे ही हम इस तार के सिरों को एक बैटरी से जोड़ते है तो इस तार के अन्दर फ्री इलैक्ट्रोन होंगे वो ऋण आवेश होने के कारण बैटरी के धन टर्मिनल की और चलना शुरू कर देते हैं। इन इलैक्ट्रोनों के चलने से तार में एक धारा बहने लगती है, इन इलैक्ट्रोनों को चलाने के लिए इनके ऊपर एक ऊर्जा लगती है जो बैटरी के द्वारा प्रदान की जाती है। यही ऊर्जा emf कहलाती है तो इस तरह हम इसको समझ सकते है आगे इसके बारे में और विस्तार से जानेंगे।



EMF की परिभाषा

emf को हिन्दी में विधुत वाहक बल कहां जाता है, इसकी परिभाषा ऐसे दी जा सकती है ' जब किसी परिपथ में कोई भार नहीं लगा होता है वो एक खुला परिपथ होता है तो इस परिपथ में लगी बैटरी की जो टर्मिनल वोल्टेज होती है, उसे emf या विधुत वाहक बल कहते हैं।

विधुत विधुत वाहक बल के प्रकार

किसी भी परिपथ में करंट फ्लो होने के लिए विभवांतर का होना जरूरी होता है, emf किसी भी सर्किट में दो प्रकार से ऊत्पन्न होता है। एक वो होता है जो मोटर ओर जेनरेटर के अन्दर उत्पन्न होता है ये दोनों ही घूमने वाली मशींने होती है जिनके अन्दर गतिकिय विधुत वाहक बल उत्पन्न होता है, जिसे dynamical induce emf कहां जाता है।

दूसरे प्रकार का emf वो होता है जो transformer के अन्दर ऊत्पन्न होता है यह एक ऐसी युक्ति होती है जिसके अन्दर कोई भी घूमने वाला भाग नहीं होता है इसलिए इसके अन्दर एक स्थिर वि वा बल ऊत्पन्न होता है, जिसे static induce emf कहते हैं। तो emf kya hota hai यह हम जान रहे हैं। अब इन दोनों को ओर अच्छे से समझेंगे।

गतिकिय प्रेरित विधुत वाहक बल 

जब एक चुंबक और लौहे की छड़ पर ताॅबे के तार लपेटकर बनाई गई काॅयल को आगे पीछे किया जाता है तो इसमें ऊत्पन्न फ्लक्स के मान में बदलाव होता है, जिसके कारण इस काॅयल के अन्दर एक emf ऊत्पन्न होता है तो इस प्रकार से ऊत्पन्न होने वाले इस एम एफ को गतिकिय प्रेरित विधुत वाहक बल कहते हैं।

स्थिर प्रेरित विधुत वाहक बल

जब दो कुण्डलियां एक दूसरे के पास पास रखी होती है और उनमें से एक के अन्दर प्रत्यावर्ती धारा प्रवाहित की जाती है तो उस काॅयल के फ्लक्स में लगातार परिवर्तन होता रहता है। यही फ्लक्स दूसरी कुण्डली से भी लिंक करता है जिससे उसमें भी emf ऊत्पन्न हो जाता है, क्योंकि यहां इ एम एफ ऊत्पन्न करने के लिए किसी भी प्रकार की कोई हलचल नहीं हुई है यानी के काॅयल को आगे पीछे नहीं किया गया है। इसलिए इस तरह से ऊत्पन्न होने वाले emf को स्थिर प्रेरित विधुत वाहक बल कहते हैं। यह भी काॅयल के अन्दर दो प्रकार से ऊत्पन्न होता है।

(1) स्वं प्रेरित emf

जब किसी कुंडली में ac current दी जाती है तो इसके फ्लक्स में change आने की वजह से एक वोल्टेज बनती है, क्योंकि यह इसी कुण्डली के कारण उत्पन्न हुआ है इसलिए इसे स्वं प्रेरित emf कहते हैं। अब आगे भी देखेंगे कि emf kya hota hai 

(2) अन्योन्य प्रेरित emf

किन्हीं पास पास रखी दो तांबे के तार से लिपटी कुण्डली, उनमें से किसी एक में करंट प्रवाहित कर देते है तो उसके अंदर flux change होने के कारण विधुत वाहक बल उत्पन्न हो जाता है और ये फ्लक्स दूसरी coil से भी लिंक होने के कारण उसमें भी एक emf induce हों जाता है, तो दूसरी कुण्डली में यह इ एम एफ पहली काॅयल के कारण उत्पन्न हो रहा है। इसलिए इसको अन्योन्य प्रेरित emf कहते हैं।

तो आज के इस लेख में आप लोगों ने जान लिया होगा कि emf kya hota hai और यह कितने प्रकार का होता है। इस विषय पर यहां मैंने काफी सरल भाषा का इस्तेमाल किया है, मैं आशा करता हूं कि आपको ये सब अच्छे से समझ में आया होगा। जानकारी अच्छी लगी है तो कमेंट जरुर करे।


Er. Chand अक्टूबर 20, 2021
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 अर्धचालक पर तापमान का प्रभाव


अर्धचालक दो प्रकार के होते है जिसमें पहला प्रकार होता है आन्तरिक या निज अर्धचालक और दूसरा प्रकार होता है बाह्मा अर्धचालक, इसलिए दोनों प्रकार के अर्धचालक पर तापमान का प्रभाव अलग-अलग होता है। पहले हम बात करेंगे आन्तरिक अर्धचालक के प्रतिरोध पर तापमान बढ़ाने से क्या होता है।

सिलिकाॅन और जर्मेनियम आन्तरिक अर्धचालक होते है इनकी बाहरी कक्षा में चार इलैक्ट्रोन होते है जो बन्ध बनाने में व्यस्थ रहते है।परम शून्य ताप पर ये अर्धचालक एक विधुतरोधी की तरह व्यवहार करता है लेकिन जैसे ही इसका तापमान बढ़ाया जाता है तो सिलिकॉन या जर्मेनियम की बहारी कक्षा में जो चार इलैक्ट्रोन उपस्थित होते है उनके बीच के बन्ध टूट जाते है और ये इलैक्ट्रोन इधर उधर घूमने लगते है। अब यदि इस अर्धचालक के सिरों पर एक बैटरी को जोड़ दिया जाए तो इस अर्धचालक के अन्दर विधुत धारा प्रवाहित होने लगेंगीं। इससे हमें पता चलता है कि आन्तरिक अर्धचालक का प्रतिरोध तापमान बढ़ाने पर कम हो जाता है।

अब बात करेंगे हम बाह्मा अर्धचालक की बाह्मा अर्धचालक दो प्रकार के होते है n-प्रकार और p_प्रकार तो यहां पहले देखते है n-प्रकार के अर्धचालक पर तापमान का क्या प्रभाव पड़ता है।


n-type अर्धचालक

n-प्रकार के अर्धचालक को बनाने के लिए पांच संयोजकता वाला अपद्रव्य फास्फोरस, सिलिकॉन या जर्मेनियम में मिलातें है। फास्फोरस की बाहरी कक्षा में पांच इलैक्ट्रोन होते है जिनमें से चार इलैक्ट्रोन सिलिकॉन या जर्मेनियम के चार इलैक्ट्रोनों के साथ बन्ध बना लेते है और एक इलैक्ट्रोन बच जाता है और ये इधर उधर घूमता रहता है यानी के n-प्रकार अर्धचालक में पहले से फ्री इलैक्ट्रोन होते है और यह परम शून्य ताप पर भी एक चालक की तरह व्यवहार करता है। यदि इसका तापमान बढ़ाते है तो बन्ध बनाने वाले इलैक्ट्रोन भी फ्री हो जाते है जिससे फ्री इलैक्ट्रोनों की संख्या अधिक हो जाती है और ये इलैक्ट्रोन एक दूसरे से टकराने लगते है और इनके मार्ग में रुकावट पैदा हो जाती है जिससे विधुत धारा के मार्ग में भी रुकावट पैदा हो जाती है इसलिए इसका तापमान बढ़ाने पर प्रतिरोध बढ़ जाता है।


p-type अर्धचालक

p-प्रकार के अर्धचालक को बनाने के लिए तीन संयोजकता वाला अपद्रव्य एल्यूमीनियम, सिलिकॉन या जर्मेनियम में मिलातें है। एल्यूमिनियम की बाहरी कक्षा में तीन इलैक्ट्रोन होते है जो सिलिकॉन या जर्मेनियम के इलैक्ट्रोनों से बन्ध बना लेते है और कोई भी इलैक्ट्रोन फ्री नहीं होता है इसलिए यह परम शून्य ताप पर एक विधुतरोधी की तरह व्यवहार करता है और तापमान बढ़ाने पर इलैक्ट्रोनों के बन्ध टूट जाते है जिससे इसमें आसानी से विधुत धारा प्रवाहित होने लगती है, इसलिए इसका तापमान बढ़ाने पर प्रतिरोध कम हो जाता है।

इस लेख में हमने यह जाना है कि अर्धचालक पर तापमान का प्रभाव से क्या होता है उम्मीद करता हूं कि आप जान गए होंगे। पोस्ट अच्छी लगी है तो कमेंट करके जरूर बताइए और आपको और किसी टोपिक के बारे में जानकारी चाहिए तो आप कमेंट करके हमें बता सकते है।

Er. Chand सितंबर 04, 2021
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 किसी विधुत आवेश या किसी विधुत आदेशों के समूह के चारों ओर का वह क्षेत्र जिसके अन्दर किसी दूसरे आवेशित कण को लाये जाने पर यदि यह कण इस क्षेत्र में एक आकर्षण बल या प्रतिकर्षण बल का एहसास करता है। तो ऐसा क्षेत्र विधुत क्षेत्र कहलाता है।

किसी भी कण को विधुत क्षेत्र में तभी कहां जा सकता है जब वह कण उस क्षेत्र में एक स्थार बल का एहसास करता है विधुत क्षेत्र का सबसे पहले वैज्ञानिक फैराडें ने पता लगाया था।

विधुत क्षेत्र की त्रिवता

विधुत क्षेत्र में किसी बिन्दु पर रखें परिक्षण आवेश पर लगने वाले विधुत बल और उस परिक्षण आवेश का अनुपात विधुत क्षेत्र की त्रिवता कहलाता है। विधुत क्षेत्र की त्रिवता को E से प्रदर्शित किया जाता है।

विधुत क्षेत्र की त्रिवता का सूत्र


माना विधुत क्षेत्र में किसी बिन्दु पर रखें परिक्षण आवेश q लगने वाला विधुत बल F है तो उस बिंदु पर विधुत क्षेत्र की त्रिवता
              E = F / q

विधुत बल एक सदिश राशि है इसलिए विधुत क्षेत्र की त्रिवता भी एक सदिश राशि होगी। जिस दिशा में विधुत बल लगता है वही विधुत क्षेत्र की त्रिवता की दिशा होती है या विधुत क्षेत्र में रखा धनावेश जिस दिशा में चलने का प्रयत्न करता है वह दिशा भी विधुत क्षेत्र की दिशा होती है।

विधुत क्षेत्र की त्रिवता का मात्रक

एस आई पद्धति में विधुत बल का मात्रक न्यूटन और आवेश का एस आई मात्रक कूलाॅम होता है इसी के आधार पर विधुत क्षेत्र की त्रिवता का मात्रक न्यूटन/कूलाॅम होता है।
विधुत क्षेत्र की त्रिवता का दूसरा एस आई मात्रक वोल्ट/मीटर भी होता है।

1 न्यूटन/कूलाॅम विधुत क्षेत्र की त्रिवता की परिभाषा

यदि किसी विधुत क्षेत्र में किसी बिन्दु पर रखें 1 कूलाॅम के परिक्षण आवेश पर 1 न्यूटन का बल लग रहा है तो उस बिंदु पर विधुत क्षेत्र की त्रिवता का मान 1 न्यूटन/ कूलाॅम होगा।
Er. Chand अगस्त 23, 2021
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 ओम के नियम का प्रयोग करके सिर्फ सरल और छोटे परिपथों में धारा और वोल्टेज निकाली जा सकती है ऐसे परिपथ जिनमें बहुत सारे प्रतिरोध और काफी सारे वोल्टेज सोर्स जुड़े होते है ऐसे परिपथों में ओम का नियम फैल हो जाता है और धारा और वोल्टेज निकाल नहीं पाता है। तो ऐसे परिपथों में धारा और वोल्टेज को निकालने के लिए वैज्ञानिक गुस्ताव राॅबर्ट किरचाॅफ ने सन् 1842 में दो नियम को स्थापित किया और तभी से इन नियमों को किरचाॅफ के नियम यानी Kirchhoff's laws कहां जाता है।

         किरचाॅफ का पहला नियम

किसी विधुत परिपथ में किसी भी सन्धि पर मिलने वाली सभी धाराओं का बिजगणितिय जोड़ शून्य होता है या दूसरे शब्दों में ऐसा भी कह सकते है। किसी सन्धि पर आने वाली धाराओं का जोड उस सन्धि से बाहर जाने वाली धाराओं के जोड़ के बराबर होता है।
किरचाॅफ के पहले नियम को धारा नियम और सन्धि नियम के नाम से भी जाना जाता है
किरचाॅफ के नियम को प्रयुक्त करते समय चिन्हों का ध्यान रखना बहुत जरूरी होता है। इसलिए सन्धि की और आने वाली धारा को धनात्मक (+) लेते है और सन्धि से बाहर जाने वाली धारा को ऋणात्मक (-) लेते है। 

मान लेते है हमारे पास पांच प्रतिरोध R1, R2, R3,R4 और R5 है जिनके सिरे सन्धि O पर जुड़े हुए है। जैसा इस फोटो में दिखाया गया है। और इनमें प्रवाहित विधुत धारा I1,I2,I3,I4 व I5 है। कुछ धारा सन्धि की ओर आ रही है और कुछ धारा सन्धि से बाहर की ओर जा रही है तो किरचाॅफ के पहले नियम के अनुसार


          +I1 + I2 - I3 + I4 - I5 = 0

           I1 + I2 + I4 = I3 + I5

इस नियम से यह पता चलता है कि यदि किसी परिपथ में स्थायी धारा प्रवाहित होती है तो परिपथ की किसी भी सन्धि पर न तो कोई आवेश ऊत्पन्न होता है और न ही वहां से कोई हटाया जा सकता है। इस प्रकार यह नियम आवेश संरक्षण के नियम को व्यक्त करता है।


     किरचाॅफ का दूसरा नियम

किसी विधुत परिपथ के बन्द पाश के विभिन्न खण्डों प्रवाहित होने वाली धारा और उसके प्रतिरोधों के गुणनफल का बिजगणितिय योग उस बन्द पाश में लगने वाले सभी वोल्टेज सोर्सो के विधुत वाहक बल के बिजगणितिय योग के बराबर होता है।
Kirchoff's laws के इस नियम में किसी प्रतिरोध के अनुदिश धारा की दिशा में चलने पर धारा और प्रतिरोध का गुणनफल धनात्मक लिया जाता है और धारा के विपरित दिशा में चलने पर धारा और प्रतिरोध का गुणनफल ऋणात्मक लिया जाता है।
किसी वोल्टेज सोर्स के अनुदिश ऋणात्मक सिरे से धनात्मक सिरे की और चलने पर विधुत वाहक बल धनात्मक लिया जाता है और धनात्मक से ऋणात्मक सिरे की और चलने पर विधुत वाहक बल ऋणात्मक लिया जाता है।

जैसा कि इस फोटो में दिखाया गया है एक विधुत परिपथ में दो सैलों को जिनके विधुत वाहक बल E1 और E2 है। इस परिपथ में तीन प्रतिरोध लगें हुए है जिनके मान R1, R2, R3 है। R1 व R2 में प्रवाहित होने वाली धारा I1 व I2 है। I1 विधुत धारा E1 सैल के द्वारा और I2 विधुत धारा E2 सैल के द्वारा प्रवाहित हो रही है।
प्रतिरोध R3 में धारा का मान (I1+I2) होगा। क्योंकि I1 व I2 धारा बिन्दु D की और आ रही है। इसलिए दोनों धारा किरचाॅफ के पहले नियम के अनुसार जुड़ जायेंगी।

बन्द पाश (1) के लिए किरचाॅफ का दूसरा नियम प्रयोग करने पर
               I1×R1 - I2×R2 = E1 - E2

इसी प्रकार बन्द पाश (2) के लिए किरचाॅफ का दूसरा नियम प्रयोग करने पर

              I2×R2 + ( I1 + I2 ) R3 = E2 

इस प्रकार इन दिनों समीकरणों को हल करने पर प्रतिरोधों में प्रवाहित धाराओं का मान ज्ञात कर लिया जाता है।

किरचाॅफ के दूसरे नियम को वोल्टेज नियम और लूप नियम से भी जाना जाता है। यह नियम ऊर्जा संरक्षण के नियम को व्यक्त करता है।

Er. Chand अगस्त 22, 2021
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 आज की इस पोस्ट में हम जानेंगे कि नोडल ऐनालेशिस क्या होता है। इसका प्रयोग क्यो किया जाता है और इसके द्वारा किस चीज को निकाला जाता है।

नोडल ऐनालेशिस के द्वारा  परिपथों के नोड का वोल्टेज निकाला जाता है। जिन परिपथों में ओम के नियम या किरचाॅफ के नियम से वोल्टेज नहीं निकलती है वहां पर नोडल ऐनालेशिस का प्रयोग करके उस परिपथ के नोड का वोल्टेज ज्ञात किया जाता है। 

या जिन परिपथों में बहुत सारे वोल्टेज सोर्स या करंट सोर्स लगें होते है और देखने में ये परिपथ बहुत कठिन दिखाई देते है तो ऐसे परिपथों में भी नोडल ऐनालेशिस के द्वारा ही नोड का वोल्टेज निकाला जाता है।

नोडल ऐनालेशिस को किसी भी परिपथ में अप्लाई करने से पहले कुछ बातों का ध्यान रखना बहुत जरूरी होता है। इन बातों को में आपको स्टेप बाई स्टेप निचे बता रहा हूं।

• स्टेप नम्बर एक

सबसे पहले जिस परिपथ को नोडल ऐनालेशिस से हल करना है उस परिपथ में नोड की संख्या देखेंगे कितनी है।

• स्टेप नम्बर दो

फिर उसमें से एक नोड को रिफरेंस मान लेते है यानी के उस नोड के वोल्टेज को शून्य (0V) मान लेते है। आपको ऐसे नोड के वोल्टेज को शून्य मानना है जिससे परिपथ हल करने में आसानी हो।

• स्टेप नम्बर तीन

परिपथ के जिस नोड का वोल्टेज निकल सकता है उसे निकाल लेते है और जिस नोड का वोल्टेज आसानी से नहीं निकलता उसे V1,V2 आदि मान लेंगे।

• स्टेप नम्बर चार

उसके बाद परिपथ में नोडल ऐनालेशिस अप्लाई करके V1,V2 आदि के मान निकाल लेते है।

तो इस तरह से नोडल ऐनालेशिस का प्रयोग करके नोड का वोल्टेज ज्ञात किया जाता है।


उम्मीद करता हूं कि आप सब समझ गये होगें कि कैसे नोडल ऐनालेशिस का प्रयोग करके नोड का वोल्टेज निकाला जाता है। अगर आपको यह पोस्ट अच्छी लगी है या आप का कोई सवाल है तो आप हमें कमेंट करके जरूर बताइए।



Er. Chand अगस्त 21, 2021
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विधुत सेल

यह ऐसी युक्ति है जो परिपथ में आवेश के प्रवाह को निरन्तर बनाये रखती है इसमें धातु की दो छडे एक द्रव (विधुत अपघटय, Electrolyte) में डूबी रहती है यह रासायनिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करती हैं एकांक आवेश को सेल सहित पुरे परिपथ में सेल द्वारा दी ऊर्जा को सेल का विधुत वाहक बल (Electromotive Force ) कहते हैं यह विधुत अपघटय की मात्रा, प्लेटो के बीच की दुरी पर निर्भर नहीं करता है।

परिपथ में q आवेश प्रवाहित होने में सेल द्वारा दी गई ऊर्जा यदि W जूल हैं तब

    विधुत वाहक बल  =   W/q         जूल/कूलाम


सेल द्वारा परिपथ में प्रवाहित धारा व विधुत वाहक बल सेल के अन्दर ऋणात्मक (nagitive) से धणात्मक (positive) इलैक्टौड की ओर होती हैं  

सेल के अन्दर धनावेश निम्न विभव (ऋण इलैक्टौड) से उच्च विभव (धन इलैक्टौड) की ओर प्रवाहित होता हैं

विधुत अपघटय विधुत धारा प्रवाह में प्रतिरोध लगाता है इसे आन्तरिक प्रतिरोध कहते हैं यह प्लैटौ के बीच की दूरी बढ़ाने पर , विधुत अपघटय की सान्द्रता बढ़ाने पर बढ़ता है और विधुत अपघटय में प्लेटो के डूबे क्षेत्रफल को बढ़ाने पर घटता है


निरावेशन (Discharging) के समय जब सेल धारा देती हैं तो प्लेटो के बीच विभवान्तर V , उसके वि० वा० बल (E) से कम होता हैं 


                       V = E - ir        .............(1)

जहां।         r = आन्तरिक प्रतिरोध
                  i = विधुत धारा
यदि परिपथ खुला है तो विधुत धारा शून्य (0) होगी तब

                   V = E 
यदि परिपथ में प्रतिरोध (R) है तो

                     V = i R          .................(2)
समीकरण (1) व (2) से....


                     iR = E - ir

                      E = i ( R + r )

                        i = E / R + r

सेल के आवेशन ( Charging ) के समय सेल के अन्दर धारा की दिशा धन प्लेट से ऋण प्लेट की ओर होगी और इस दिशा में V का मान E से अधिक होगा

                             V = E + i r

                       
Er. Chand जून 28, 2021
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                 विधुत विभव क्या होता है

 अनन्त (Infinite) से किसी इकाई धन आवेश को विधुत क्षेत्र के विपरित चलाने के लिए जितनी ऊर्जा (energy) की आवश्यकता होती है या जितना कार्य किया जाता है उसे उस बिंदु (point) का विधुत विभव (Electric potential) कहते हैं।

इसे V से प्रदर्शित करते हैं

इसका एस आई मात्रक वोल्ट होता हैं । 

विधुत विभव  =  कार्य  /  आवेश

           V  =  w  /  q        = Juele / culamb    

(1) यह एक अदिश राशि है

(2) विधुत विभव ऊर्जा का ही एक रूप है।

(3) अनन्त (Infinite) का मतलब जहां विधुत क्षेत्र शून्य होता है।

विभवान्तर ( potential difference )

किसी चालक के दो बिन्दुओं पर वोल्टेज के अन्तर को विभवान्तर कहते हैं । 
माना एक बिंदु की वोल्टेज Va और दुसरे बिन्दु की वोल्टेज Vb है तो उनके बीच विभवान्तर
किसी भी चालक मैं धारा प्रवाहित होने के लिए विभवान्तर का होना बहुत ही आवश्यक है क्योंकि अगर विभवान्तर नहीं होगा तो धारा प्रवाहित नहीं होगी । इसलिए विभवान्तर का होना आवश्यक है । 
माना किसी चालक का प्रतिरोध R हैं और उसके एक बिंदु का विभव Va और दुसरे बिन्दु का विभव Vb हैं तो उसमें प्रवाहित होने वाली धारा
होगी ।

किसी चालक में धारा प्रवाहित होने के लिए विभवान्तर (potential difference) का होना आवश्यक है ।



Er. Chand जून 26, 2021
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                       प्रतिरोध क्या है               


किसी पदार्थ का वह गुण जो उसमें बहने  वाली धारा के रास्ते में रुकावट पैदा करता है उसे उस पदार्थ का प्रतिरोध (Resistance) कहते हैं। हर पदार्थ का प्रतिरोध अलग अलग होता है। जो उस पदार्थ की प्रकृति, लंबाई, क्षेत्रफल ओर पदार्थ के तापमान पर निर्भर करता है।
प्रतिरोध का S.I मात्रक ओम (ohm) होता है।
प्रतिरोध एक अदिश राशि होती है।
प्रतिरोध को अंग्रेजी अक्षर R से प्रदर्शित करते है।

 किसी चालक के सिरों पर लगने वाला विभवांतर V और उस चालक में बहने वाली विधुत धारा के अनुपात को उस चालक का प्रतिरोध कहते है।
          
                

                रेजिस्टेंस का फार्मूला

                         R = V / I


चालक के प्रतिरोध पर तापमान का प्रभाव

चालक का तापमान बढ़ाने पर बन्द (bond) टूटते हैं । जिसके कारण फ्री इलैक्ट्रोन की संख्या बढ़ जाती है और ये इलैक्ट्रोन एक दूसरे से टकराने लगते हैं । जिससे इनके पाथ में रुकावट आ जाती हैं । और चालक का प्रतिरोध बढ़ जाता हैं ।

चालक का प्रतिरोध तापमान बढ़ाने पर बढ़ता है और अर्धचालक का प्रतिरोध तापमान बढ़ाने पर कुछ का घटता है और कुछ अर्धचालक का प्रतिरोध बढ़ता हैं ।
अर्धचालक दो प्रकार के होते हैं

(1) अन्त: द्रविय अर्धचालक (सीलिकन, जर्मेनियम)

अन्त:द्रविय अर्धचालक का तापमान बढ़ाने पर इनका प्रतिरोध कम होता हैं क्योंकि इन अर्धचालको में पहले से फ्री इलैक्ट्रोन नहीं होते हैं ज़ीरो केल्विन या एब्सोल्यूट जीरो पर ये insulator की तरह व्यवहार करते हैं क्योंकि इनके इलैक्ट्रोन बन्द (bond) बनाने में वयस्थ रहते हैं । लेकिन जब हम इनका तापमान बढ़ते हैं तो ये इलैक्ट्रोन फ्री हो जाते हैं और इधर उधर घूमने लगते हैं इस कारण इनका प्रतिरोध कम हो जाता हैं ।


(2) ब्राहा: द्रविय अर्धचालक (n- प्रकार, p-प्रकार)

ब्राहा: द्रविय अर्धचालक  का तापमान बढ़ाने पर इनका प्रतिरोध बढ़ जाता है क्योंकि इन अर्धचालको में पहले से फ्री इलैक्ट्रोन होते हैं और जब हम इनका तापमान बढ़ाते हैं तो ये फ्री इलैक्ट्रोन एक दूसरे से टकराने लगते हैं जिससे इनके पाथ में रुकावट आ जाती है और इनका प्रतिरोध बढ़ जाता हैं ।

प्रतिरोध का श्रेणी क्रम में संयोजन

जब हम दो या दो से अधिक प्रतिरोधो का एक एक सिरा आपस में जोड़ते हैं और दुसरा सिरा किसी दूसरे प्रतिरोध के साथ जोड़ते हैं तो इस संयोजन को प्रतिरोध का श्रेणी क्रम संयोजन कहते हैं ।

                             R = R1 + R2 

(1) श्रेणी संयोजन में सप्लाई वोल्टेज सभी प्रतिरोध में बट (divide) जाती हैं

(2) जिस प्रतिरोध का मान सबसे अधिक होगा । उस प्रतिरोध के एक्रोस वोल्टेज सबसे अधिक होगी । 

(3) यदि R मान के n प्रतिरोध श्रेणी में जुड़े हों तो समतुल्य प्रतिरोध
             समतुल्य प्रतिरोध (Req) = nR       
होगा

(4) श्रेणी संयोजन में धारा सभी प्रतिरोध में एक समान (बराबर) रहती हैं ।

प्रतिरोध का समान्तर क्रम में संयोजन

यदि दो या दो से अधिक प्रतिरोधो के सिरे आपस में जुड़े हों तो ऐसे संयोजन को प्रतिरोधो का समान्तर क्रम संयोजन कहा जाता हैं । इस संयोजन में सभी प्रतिरोध में वोल्टेज समान रहती है और धारा सभी प्रतिरोध में अलग अलग होती हैं । 
                    R  =  R1 × R2 / R1 + R2 

यदि R मान के n प्रतिरोध समान्तर क्रम में जुड़े हैं तो उनका समतुल्य प्रतिरोध 

    समतुल्य प्रतिरोध (Req)  =  R / n

            प्रतिरोधकता (Resistivity)

 यदि किसी पदार्थ की लंबाई एक मीटर और क्षेत्रफल एक मीटर वर्ग हैं तो उस पदार्थ का प्रतिरोध उसकी प्रतिरोधकता कहलाती है। इसे विशिष्ट प्रतिरोध भी कहते हैं।

(1) प्रतिरोधकता लंबाई और क्षेत्रफल पर निर्भर नहीं करती हैं।

(2) प्रतिरोधकता पदार्थ की प्रकृति ओर तापमान पर निर्भर करती हैं।

                    प्रतिरोध की निर्भरता

 (1) किसी भी पदार्थ का प्रतिरोध उसकी लंबाई के बढ़ने पर बढ़ता है। यानि  प्रतिरोध पदार्थ की लंबाई के समानुपाती होता है।

(2) पदार्थ का क्षेत्रफल बढ़ने पर उसका प्रतिरोध कम हो जाता है। यानि प्रतिरोध पदार्थ के क्षेत्रफल के व्यूतक्रमानुपाती होता है।

(3) प्रतिरोध पदार्थ की प्रकृति पर भी निर्भर करता है।

(4) प्रतिरोध पदार्थ का तापमान बढ़ने पर बढ़ जाता है।


तार को खिंचने पर उसके प्रतिरोध पर क्या प्रभाव पड़ता है

जब किसी तार को खिंचकर उसकी लंबाई को n गुना बढ़ा दिया जाता है तो उसका क्षेत्रफल घटकर 1/n हो जाता है और तार का प्रतिरोध ( n  square) हो जाता है।
तो चलिए एक उदाहरण के द्वारा इसको समझते है।
मान लीजिए किसी तार की लंबाई (l) है, उसके अनुप्रस्त काट का क्षेत्रफल (A) है और उस तार का प्रतिरोध (R) है। अब इसकी लंबाई को खींचकर n गुना बढा दिया जाता है जिससे इसकी नई लंबाई (l' = nl) हो जाती है और इसका नया क्षेत्रफल (A' = A/n) हो जाता है तो इसके नये प्रतिरोध का मान

resistance meaning in hindi

resistance को को हिंदी में प्रतिरोध कहा जाता है यानी इसका मतलब होता है विरोध करना। मान लीजिए किसी वायर से करंट बह रही है तो उस तार कुछ न कुछ प्रतिरोध होगा जो इसके अन्दर से गुजरने वाली विधुत धारा का विरोध करेगा। असल में एक रेजिस्टेंस का काम धारा का appose करना ही होता है।

इस जानकारी के अन्दर हमने प्रतिरोध को जाना है और कहा कहा इसका उपयोग हो रहा है, किन किन चीजों का इस प्रभाव पड़ता है और किन चीजों पर यह निर्भर करता है। तो इस सब का ज्ञान हमने ग्रहण किया है। अगर आपको इस पोस्ट में कुछ भी अच्छा लगा हो हमें कमेंट करके जरूर बताइए।




Er. Chand जून 24, 2021
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 ओम के नियम की खोज एक जर्मन वैज्ञानिक ने सन् 1826 में की थी। जिनका नाम डॉ जाॅर्ज साइमन ओम था। इस नियम का नाम उन्होंने अपने नाम पर ही रखा था। जिसे हम ohm's law in hindi भी कहते है।

वैज्ञानिक ओम ने अपने प्रयोग में एक तांबे का तार लिया उस तार के सिरों पर एक वोल्टेज स्रौत यानि बैटरी को जोड़ दिया। और उन्होंने देखा कि इस तांबे के तार में विधुत धारा बहने लगी है। फिर उन्होने इस तांबे के तार में बहने वाली विधुत धारा और तार के सिरों पर लगने वाले वोल्टेज के बीच एक संबंध को स्थापित किया। उन्होंने इस संबंध में कहा कि

                      ओम का नियम

जब हम किसी चालक की भौतिक अवस्था (तापमान,दाब, आयतन, लंबाई,क्षेत्रफल आदि) में कोई परिवर्तन न किया जाए तो इस चालक से बहने वाली विधुत धारा उस चालक के सिरों पर लगने वाले वोल्टेज के समानुपाती होती है।


                                  R=नियतांक

                                  I=धारा

                                 V=वोल्टेज

यहा पर R एक नियतांक होता है जिसे चालक का प्रतिरोध कहते हैं 

प्रतिरोध तांबे के तार का वह गुण होता है जो उस तार में बहने वाली विधुत धारा को बहने से रोकता है यानी उस धारा का विरोध करता है।

प्रतिरोध का एस आई मात्रक ओम होता है।

ओम के नियम में हमेशा धारा ही वोल्टेज के समानुपाती होती है। हम ऐसा नहीं कह सकते कि वोल्टेज धारा के समानुपाती हैं। क्योंकि हमें पता है कि किसी भी चालक में धारा प्रवाहित होने के लिए विभवान्तर का होना आवश्यक है इससे यह पता चलता है कि पहले वोल्टेज आया है फिर धारा तों इसलिए हम धारा को वोल्टेज के समानुपाती लेते हैं । 

ओम का नियम किन चीजों पर लागू होता है

ओम के नियम के अनुसार ओम का नियम उन्ही पदार्थ पर लागू होता है जो पदार्थ ओम के नियम का पालन करते है। या फिर जिन पदार्थों की V-I अभिलक्षण एक सीधी रेखा होती है। उन पदार्थों पर भी ओम का नियम लागू होता है। जितने भी चालक होते है सभी की V-I अभिलक्षण एक सीधी रेखा होती है। इसलिए सभी चालक ओम के नियम का पालन करते है। इसलिए सभी चालकों पर ओम का नियम लागू होता है।  और जितनी भी इलैक्ट्रोनिक युक्तियां होती है उन सभी की V-I अभिलक्षण एक सीधी रेखा नहीं होती है। इलैक्ट्रोनिक युक्तियां ओम के नियम का पालन नहीं करती है। इसलिए इन पर ओम का नियम लागू नहीं होता है

1.जो तत्व ओम के नियम का पालन करते हैं उन्हें रेखिय तत्त्व (linear elements) कहते हैं

2.जो तत्त्व ओम के नियम का पालन नहीं करते हैं उन्हें अरेखिय तत्त्व (non-linear elements) कहते हैं

3. सभी चालक रेखिय तत्त्व (linear elements) होते हैं

4. अरेखिय तत्त्व Diode,Transistor,BJT,JFET आदि होते हैं ।


इसे भी देखें : विधुत सेल क्या है

                

     चालक क्या होता है।

चालक उन पदार्थों को कहते है जिनके अन्दर से विधुत धारा आसानी से बहने लगती है। जैसे एक तांबे के तार में विधुत धारा आसानी से बहने लगती है। इससे यह पता चलता है कि धातुएं विधुत की चालक होती है। चांदी, तांबा, एल्यूमिनियम,सोना ये सब धातुएं विधुत की चालक है। 
सबसे तेज अपने अन्दर से विधुत को गुजारने वाला चालक चांदी होता है। इससे यह पता चलता है कि विधुत का सबसे अच्छा चालक चांदी है। जितने भी चालक होते है ohm's law in hindi का पालन करते है।

                     चालक की हानियां

जब चालक में विधुत धारा बहने लगती है तों चालक का तापमान बढ़ने लगता है। तापमान बढ़ने से चालक का प्रतिरोध बढ़ जाता है। जिससे बहने वाली धारा के मार्ग में रुकावट पैदा होती है। और चालक धारा को अपने अन्दर वहन करने लगता है।

                  अर्ध चालक क्या होता है

कुछ ऐसे पदार्थ भी होते है जो विधुत धारा को कभी तो अपने अन्दर से बहने देते है और कभी बहने नहीं देते तो ऐसे पदार्थों को अर्ध चालक कहते है। एक अर्ध चालक के अन्दर चालक और कुचालक दोनों के गुण होते है। सिलिकॉन और जर्मेनियम ये दोनों बहुत अधिक उपयोग में लाये जाने वाले अर्ध चालक है।

                   कुचालक क्या होता है

जो पदार्थ विधुत धारा को अपने अन्दर से बिल्कुल भी बहने नहीं देते ऐसे पदार्थों को विधुत का कुचालक कहते है। जैसे एक कांच का टुकडा अपने अन्दर से विधुत को बिल्कुल भी गुजरने नहीं देता है ‌‌‌‌तो इससे पता चलता है कि कांच विधुत का कुचालक है। कुचालक के अन्तर्गत कांच, लकड़ी,प्लास्टिक, रबड़ और भी बहुत से पदार्थ आते है।

                    कुचालक की हानियां

जब किसी वजह के कारण कुचालक का तापमान बढ़ जाता है तो तापमान बढ़ने के कारण इसका प्रतिरोध कम हो जाता है। और इसमें चालक के बहुत कम गुण आ जाते है। जिससे इसके अन्दर बहुत कम धारा बहने लगती है। 

        ओम के नियम की उत्पत्ति

हम जानते हैं कि।      
               i = neA Vd.      ........... ....(1)

जहां।         n = प्रति एकांक आयतन में इलैक्ट्रोन संख्या

                A = चालक का अनुप्रस्थ क्षेत्रफल

                Vd = अनुगमन वेग

                 e = इलैक्ट्रोन पर आवेश

चालक के प्रत्येक बिन्दु पर विधुत क्षेत्र की तिव्रता

                     E = V / l 
जहां   
               V = चालक पर विभवान्तर

                l = चालक की लंबाई

इस क्षेत्र द्वारा प्रत्येक इलैक्टोन पर बल

                F = eE.  = eV / l

यदि इलैक्ट्रोन का द्रव्यमान m है तब इलैक्ट्रोन में त्वरण a

               a = F / m.      =  eV / ml
चालक मैं मुक्त इलैक्ट्रोन धन आयनों से टकराते हैं दो क्रमागत टक्करो में लगा समय श्रांतिकाल कहलाता है

इलैक्ट्रोन का औसत अनुगमन वेग

               Vd = 0+v / 2.      ( v = a×श्रांतिकाल )
      
              श्रांतिकाल = T

                 Vd = aT / 2

                  Vd = 1/2 [ eV / ml ].   .....   .........(2)

                   Vd = eVT / 2ml

समिकरण (1) से,

                     i = neA {eVT / 2ml }

                       = ne×eT/2m × (A/l)×V

                 V/i = 2m × l / ne ×e T A
जहां
                       2m × l / ne×eT A = R

                      V / i = R 


 यही ओम का नियम है ।
Er. Chand जून 23, 2021
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 विधुत धारा का क्या मतलब है

आज के इस युग में विधुत ने हमारे जीवन को बदलकर रख दिया है इसी विधुत की बदौलत आज हम चांद तक पहुंच गये है। ये विधुत का ही कमाल है कि आज हम फोन पर सारी दुनिया को अपने घर पर ही बैठें देख सकते है। क्योंकि फोन और कम्प्यूटर विधुत से ही चलतें है। क्या आपने कभी सोचा है कि अगर विधुत न होती तो आज हमारा जीवन कैसा होता। आज हम जितनी भी टैक्नोलॉजी का उपयोग कर रहे है। इन सभी को विधुत के द्वारा ही चलाया जा रहा है। औधौगिक क्षेत्र में जितना भी काम किया जा रहा है। सब विधुत के द्वारा ही किया जा रहा है।
तो अब हम बात करने वाले है electric current in hindi क्या होती है यह कितने प्रकार की होती है यह किस तरह की राशि है और दिशा किस तरफ होती है।

                    विधुत धारा क्या है


किसी धारावाही तार या विधुत परिपथ में प्रवाहित होने वाले आवेश की दर को विधुत धारा कहते हैं। या किसी तांबे के तार में जब इलैक्ट्रोन प्रवाह करते है तो हम कह सकते है इसमें विधुत धारा है। विधुत धारा का एस आई (SI)  मात्रक एम्पीयर (Ampere) होता हैं विधुत धारा किसी चालक में धनावेश विभव (positive potential) से ऋणावेश विभव (negitive potential) की ओर बहती हैं ।

किसी भी चालक मैं धारा प्रवाहित तभी होती है अगर उस चालक के सिरों के बीच विभवान्तर हो यदि चालक में विभवान्तर नहीं होगा तो चालक में कभी भी धारा प्रवाहित नहीं होगी। किसी भी चालक में धारा प्रवाहित होने के लिए विभवान्तर का होना आवश्यक है

मान लेते है कि किसी चालक में q आवेश t सेकेंड में बह रहा है तो विधुत धारा


                     I = q / t       एम्पीयर


      जहां।         q = ne       


                       n=इलैक्टौन की संख्या

                       e=इलैक्ट्रोन

  एक e पर 1.6×10 की पावर (-) 19 कूलाम्ब का आवेश होता है

परिपथ में धन आवेश प्रवाह की दिशा विधुत धारा की दिशा मानी जाती हैं (इलैक्टौन प्रवाह की दिशा के विपरित)। 

विधुत धारा की दिशा की माप अमीटर से की जाती है जिसमें दो टर्मिनल (+) वाली (-) होते हैं

अमीटर को परिपथ में श्रेणी में जोडते हैं

अमीटर का धन(+) सीरा उच्च विभव (सेल के + से ) ओर ऋण सिरा निम्न विभव ( सेल के - से ) जोडते हैं।

धातुओं के परमाणुओं की बह्रा कक्षा में 1 या 2 इलैक्टोन होते हैं इन पर नाभिक का आकर्षण बल कम होता हैं। सामान्य तापमान पर ये इलैक्ट्रोन थोड़ी सी ऊर्जा से ही परमाणु से अलग होकर पदार्थ में स्वतन्त्र (free) होकर घुमने लगते हैं परन्तु धातु को छोड़कर नहीं जाते। इन इलैक्ट्रोन को मुक्त इलैक्ट्रोन ( free electron ) कहते हैं । धातुओं के अन्दर ये अनियमित रूप से घुमते हैं पदार्थ में इनका वितरण सामान्यतः एक समान होता हैं । जब धातुओं के सिरो पर विभवान्तर लगाया जाता है तो इन इलैक्ट्रोनो की गति नियमित हो जाती हैं जिससे विधुत धारा धातु में एक स्थान से दूसरे स्थान की और जाने लगती है यानी विधुत धारा बहने लगती हैं । 

जब परमाणु की बाहरी कक्षा में संयोजी इलैक्ट्रोन की संख्या 4 से कम होती है तो वो परमाणु धातु होता है यानि के जितने भी तत्त्व धातु होते है। उन सब की बाहरी कक्षा में जो संयोजी इलैक्ट्रोन होते है उनकी संख्या 4 से कम ही होती है।

और जितने भी परमाणु अधातु होते है उन सब की बाहरी कक्षा में संयोजी इलैक्ट्रोन की संख्या 4 से ज्यादा होती है।

और जो परमाणु अर्ध धातु होते है। उन सब की बाहरी कक्षा में संयोजी इलैक्ट्रोन की संख्या 4 के बराबर होती है।

 विधुत धारा का सबसे अच्छा चालक 

वैसे तो विधुत धारा का सबसे अच्छा चालक चांदी को माना जाता है। लेकिन इसका प्रयोग करना बहुत महंगा होता है क्योंकि चांदी एक महंगी धातु होती है। इसलिए हम ज्यादातर तांबा और एल्यूमिनियम धातु का प्रयोग करते है क्योंकि इन धातुओं की किमत भी कम होती है और ये आसानी से मिल भी जाती है।

विधुत धारा की दिशा

विधुत धारा एक अदिश राशि है लेकिन इसके बावजूद भी इसकी दिशा को विधुत चालकों और विधुत परिपथों में लेना जरूरी होता है। किसी भी विधुत परिपथ में विधुत धारा के बहने की दिशा परिपथ के धनावेश विभव सिरे से ऋणावेश विभव सिरे की और होती है या फिर इलैक्ट्रोन जिस दिशा में चलते है विधुत धारा उनके विपरित दिशा में बहती है। 


द्रव और गैस में विधुत धारा का बहना

हमे पता है कि द्रवो में भी विधुत धारा बहती है लेकिन द्रव में धारा मुक्त इलैक्ट्रोन के कारण नहीं बहती है।द्रवो में आयन बनते है। धनावेश आयन और ऋणावेश आयन। इन आयनों के बनने से ही द्रव में धारा बहने लगती है।
गैसों में विधुत धारा का प्रवाह मुक्त इलैक्ट्रोन और आयनों के कारण होता है

आयन कैसे बनते है

किसी भी पदार्थ की सबसे छोटी से छोटी इकाई को परमाणु कहते है। परमाणु के अन्दर एक नाभिक होता है और मुक्त इलैक्ट्रोन इस नाभिक के चारों ओर कक्षाओं में चक्कर लगाते है। नाभिक के अन्दर प्रोटॉन ओर न्यूटाॅन होते है प्रोटाॅन पर धन आवेश और न्यूटाॅन पर कोई आवेश नहीं होता जबकि इलैक्ट्रोन पर ऋण आवेश होता है। किसी भी परमाणु में प्रोटाॅन और इलैक्ट्रोन की संख्या बराबर होती है। इस प्रकार पूरा परमाणु न्यूट्रल होता है। 

 जब कोई इलैक्ट्रोन अपनी कक्षा को छोड़कर परमाणु से बाहर निकल जाता है तो परमाणु के अन्दर इलैक्ट्रोन की कमी हो जाती है और प्रोटोन्स बढ़ जाते है। प्रोटोन बढ़ जानें से इस परमाणु को धनावेश आयन (positive ions) कहते है।

जब परमाणु इलैक्ट्रोन को ग्रहण करता है तो उसके अन्दर इलैक्ट्रोन अधिक हो जाते है। इलैक्ट्रोन के बढ़ जाने से इस परमाणु को ऋणावेश आयन (Nagetive ions)  कहते है।

                        धारा घनत्व

माना किसी चालक के अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल (A) है। ओर मान लेते है कि (I) एम्पीयर की विधुत धारा इस चालक में समान रूप से वितरित हो रही है तो उस चालक में बहने वाली विधुत धारा और उस चालक के अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल के अनुपात को धारा घनत्व कहते है। धारा घनत्व को इंग्लिश अक्षर (j) से व्यक्त करते है।
धारा घनत्व की दिशा विधुत धारा की दिशा में ही होती है।

मान लेते है किसी धारावाही चालक में बहने वाली विधुत धारा I है और चालक का क्षेत्रफल A है तों धारा घनत्व

      धारा घनत्व  =  विधुत धारा / क्षेत्रफल


                          j = I / A                    

              एम्पीयर / मीटर वर्ग

एक एम्पीयर की परिभाषा

जब किसी धारावाही परिपथ में एक कूलाॅम का आवेश उसमें चलने के लिए एक सेकेंड लेता है। तो उस परिपथ में बहने वाली विधुत धारा एक एम्पीयर होंगी।

विधुत धारा को समझने के लिए एक उदाहरण मैंने नीचे दिया है
मान लेते है किसी धारावाही चालक में 5 सेकेंड में 10 कूलाॅम का आवेश प्रवाहित हो रहा है तो उस चालक में बहने वाली विधुत धारा का मान 2 एम्पीयर होगा।

विधुत धारा के प्रकार

मानव द्वारा उपयोग में लायी जाने वाली विधुत धारा दो प्रकार की होती है। एक होती है दिष्ट धारा जिसे D.C से व्यक्त करते है और दूसरी होती है प्रत्यावर्ती धारा जिसे हम (A.C) से व्यक्त करते है।

दिष्ट धारा (Direct current) 

दिष्ट धारा एक समान और एक ही दिशा में बहने वाली धारा है। समय बदलने के साथ इस धारा में कोई परिवर्तन नहीं आता है। इस धारा का अधिकतम मान और निम्नतम मान बराबर होता है। इसलिए यह धारा मनुष्य के लिए बहुत खतरनाक होती है क्योंकि यह धारा एक समान बहती ही रहती है कभी भी कम ज्यादा नहीं होती है।
इस धारा को आसानी से बैटरी में स्टोर किया जा सकता है। इसमें समय के साथ परिवर्तन न होने के कारण ही इसको स्टोर किया जा सकता है।
दिष्ट धारा बनाने के लिए डी सी जेनरेटर, सोलर सेल और कई प्रकार की युक्तियों का प्रयोग किया जाता है


प्रत्यावर्ती धारा (Alternating current) 

प्रत्यावर्ती धारा एक ऐसी धारा है जिसका मान समय के साथ बदलता रहता है। यह एक सेकेंड के अन्दर 100 बार शून्य होती है और 100 बार ही अपने अधिकतम मान पर पहुंचती है। इस धारा में समय के साथ परिवर्तन होने के कारण इसको स्टोर नहीं किया जा सकता है। इस धारा को ए सी जेनरेटर ओर अल्टरनेटर के द्वारा बनाया जाता है।
इस धारा में प्रयोग की जाने वाली आवृत्ति 50 हर्टज होती है। लेकिन अमेरिका में 60 हर्टज का प्रयोग किया जाता है। तो वहां धारा एक सेकेंड में 120 बार शून्य होती है और 120 बार अधिकतम मान पर पहुंचती है। 
लेकिन 60 हर्टज की आवृत्ति को बढ़िया नहीं माना जाता है।अधिकतर देशों में 50 हर्टज आवृत्ति का ही उपयोग किया जाता है ‌

विधुत धारा का ऊष्मीय प्रभाव

जब किसी धारावाही चालक या विधुत परिपथ में विधुत धारा प्रवाहित की जाती है तो वह धारावाही चालक या विधुत परिपथ गर्म होने लगता है तो इस धारावाही चालक के गर्म होने को विधुत धारा का ऊष्मीय प्रभाव कहते है। 

आप इस प्रभाव को अपनी आंखों से अपने घरों में भी देख सकते है। घरों में जलने वाले विधुत बल्ब,हिटर ओर विधुत प्रेस विधुत धारा के ऊष्मीय प्रभाव का ही उदाहरण है।

विधुत धारा स्रोत (Current Source) 

एक आदर्श धारा स्रोत का आन्तरिक प्रतिरोध अनन्त होना चाहिए। जिससे विधुत परिपथ में लगाये गये भार पर एक समान धारा पहुंच सकें।
विधुत धारा स्रोत एक ऐसा स्रौत होता है जो परिपथ में लगने वाले भार को एक समान विधुत धारा उपलब्ध कराता है।

धारामापी (Ammeter) 

विधुत परिपथ में बहने वाली धारा को जिस यन्त्र से मापा जाता है। उसे धारामापी कहते है। धारामापी को परिपथ में लगने वाले भार के श्रेणी में लगाया जाता है। धारामापी का आन्तरिक प्रतिरोध बहुत कम होता है।
एक आदर्श धारामापी का आन्तरिक प्रतिरोध शून्य होता है।
यदि धारामापी को परिपथ में लगने वाले भार के समांतर में लगा दिया जाये तो धारामापी से एक बहुत उच्च मान विधुत धारा बहेगी जिससे धारामापी जल जायेगा। क्योंकि धारामापी का आन्तरिक प्रतिरोध बहुत कम होता है।

विधुत आवेश का इलैक्ट्रोन सिद्धांत


पूरी दुनिया के अन्दर जितने भी पदार्थ हो या वस्तु सब छोटे छोटे कणों से मिलकर बना होता है और इन कणों को परमाणु कहते हैं। किसी भी पदार्थ का जो बीच वाला हिस्सा होता है वो पदार्थ के अन्य भाग से भारी होता है पदार्थ के इस भारी वाले भाग को नाभिक कहते है। नाभिक दो प्रकार के कणों से मिलकर बना होता है जिनको प्रोटोन और न्यूट्रोन कहा जाता है। नाभिक के अन्दर प्रोटोन पर धनावेश होता है और न्यूट्रोन पर कोई आवेश नहीं होता यह एक बिना आवेश वाला कण होता है। 

चूंकि नाभिक में केवल प्रोटोन पर धनावेश होता है इसलिए नाभिक का व्यवहार भी एक धनावेशित कण की तरह होता है। नाभिक के चारों ओर एक तिसरे प्रकार का कण कक्षाओं में चक्कर लगाता रहता है, जिसे इलैक्ट्रोन कहते हैं। कक्षाओं में घूम रहे जितने भी इलैक्ट्रोन होते है सभी पर प्रोटोन के आवेश के बराबर ऋणावेश होता है। एक परमाणु के अन्दर इलैक्ट्रोनों और प्रोटोनों की संख्या बराबर होती है, इस प्रकार से पूरा परमाणु उदासीन होता है। 

यदि किसी प्रकार किसी परमाणु से एक या अधिक इलैक्ट्रोन निकाल लिये जायें तो इस परमाणु पर धन आवेश की मात्रा बढ़ जाती है और यह धनावेशित कहा जाता है। और जब कोई परमाणु बाहर से किसी प्रकार एक या एक से अधिक इलैक्ट्रोन को अपने अन्दर ले लेता है तो इस पर श्रण आवेश की मात्रा बढ़ जाती है और इसे ऋणावेशित कहा जाता है। हमें पता है कि किसी भी पदार्थ के अन्दर अन गीनत परमाणु होते है इसलिए किसी पदार्थ का धनावेशित होना उसके परमाणुओं में इलैक्ट्रोनों की कमी को बताता है और ऋणावेशित होना, इलैक्ट्रोनों की संख्या अधिक होने को दर्शाता है।

किसी वस्तु के धनावेशित और ऋणावेशित होने की क्रिया इलैक्ट्रोनों के स्थानान्तरण से ही समझायी जा सकती है, क्योंकि इलैक्ट्रोन परमाणु के बाहरी वालें भाग में भी कक्षाओं में चक्कर लगाते रहते है, इसलिए इलैक्ट्रोनों को आसानी से अलग किया जा सकता है। लेकिन प्रोटोन परमाणु के बीच वाले हिस्से में उपस्थित होते है जिन्हें परमाणु से अलग करना नामुमकिन होता है, इसलिए किसी वस्तु के आवेशित होने के लिए इलैक्ट्रोन ही उत्तरदायी होता है। न कि प्रोटोंन

किसी चालक में स्थायी विधुत धारा प्राप्त करना


किसी चालक में स्थायी विधुत धारा प्राप्त करने के लिए आवश्यक है कि उसमें विधुत आवेश का प्रवाह लगातार बना रहे और इसके लिए हमें उस चालक के सिरों के बीच विभवान्तर को स्थिर रखना पड़ेगा और इसके लिए एक बाहरी विधुत स्त्रौत की आवश्यकता होती है, जो आवेश वाहकों को चालक मैं एक निश्चित दिशा में गति करने के लिए बाध्य करता है। इस प्रकार स्थायी धारा प्राप्त करने के लिए विधुत सेल, बैटरी या डायनेमो का उपयोग किया जाता है। ये सभी विधुत वाहक बल के स्त्रौत होते है। 

वास्तव में विधुत वाहक बल कोई बल नहीं है, बल्कि यह स्त्रौत के द्वारा दी गई वह ऊर्जा है, जो एकांक आवेश को पूरे परिपथ में धक्का लगाने का काम करता है, दूसरे शब्दों में यह एकांक आवेश द्वारा प्राप्त की गई वह विधुत स्थितिज ऊर्जा है, जो सेल सहित पूरे परिपथ में एक इलैक्ट्रोड से दूसरे इलैक्ट्रोड तक प्रवाहित होने में प्राप्त करता है जबकि उस समय बाहरी परिपथ में कोई विधुत धारा ना बह रही हो। सेल के विधुत वाहक बल का मात्रक वोल्ट होता है और इसे E से दर्शाया जाता है। 

विधुत धारा की दिशा प्रचलित प्रणाली के अनुसार किसी चालक में धारा के बहने की दिशा चालक के धनावेश वाहकों की गति की दिशा में या चालक के विधुत क्षेत्र की दिशा में होती है या ऋणावेशित वाहकों की गति की दिशा के विपरित ली जाती है। 

किसी चालक में विधुत धारा उस चालक विशेष का एक लाक्षणिक गुण है और यह एक अदिश राशि है। यदि किसी तार में बहने वाली धारा को तीर के निशान से व्यक्त किया जाता है, तो इसका मतलब यह नहीं कि धारा एक सदिश राशि है यह निशान तो केवल इतना बताता है कि तार में धनावेश किस दिशा में चल रहा है। विधुत धारा सदिश राशियों के गुणों का पालन भी नहीं करती है। जैसे, यदि हम किसी तार को किसी स्थान पर मोड़ दें या गांठ लगा दें तो इस तार में धारा का मान वहीं रहता है जो पहले था। जबकि सदिश राशियों में दिशा के साथ उनका मान भी बदल जाता है। और विधुत धारा वैक्टरों के नियम का पालन भी नहीं करती है।

धात्विक चालकों में विधुत धारा का प्रवाह


धात्विक चालकों में विधुत धारा के बहने के लिए आवेश वाहकों का कार्य ये मुक्त इलैक्ट्रोन ही करते है, जिन्हें चालक इलैक्ट्रोन भी कहते है। धातुओं में मुक्त इलैक्ट्रोन की संख्या बहुत अधिक होती है, इसी कारण से धातुओं में विधुत धारा का प्रवाह बहुत ही आसानी से और बहुत जल्दी हो जाता है। धातुएं विधुत की सुचालक होती है धातुओं में विधुत का सबसे अच्छा सुचालक चादी होती है। धातु चालकों में धनायन की स्थितियां निश्चित होती है ये अपनी स्थिति के इर्द-गिर्द कम्पन तो करते रहते हैं, लेकिन पदार्थ के अन्दर घूमने के लिए स्वतन्त्र नहीं होते है। धात्विक चालकों में धनायन विधुत चालन के लिए उत्तरदायी नहीं होते, केवल धातुओं में चालन के लिए मुक्त इलैक्ट्रोन ही उत्तरदायी होते है।

अनुगमन वेग और विधुत धारा में संबंध


माना एक तार का क्षेत्रफल A और उसकी लंबाई l है इस तार के दोनों सिरों के बीच एक बैटरी जोड़कर विभवांतर V को स्थापित किया जाता है। इसके कारण तार के अन्दर एक E तीव्रता का विधुत क्षेत्र ऊत्पन्न हो जाता है, जिसके प्रभाव से तार के अन्दर मुक्त इलैक्ट्रोन इस विधुत क्षेत्र की विपरित दिशा में अनुगमन वेग Vd से गति करने लगते हैं।
परन्तु किसी चालक में बहने वाली विधुत धारा की प्रबलता तार के क्षेत्रफल से प्रति सेकेण्ड गुजरने वाले विधुत आवेश के मान से मापी जाती है। 
यदि इस तार के क्षेत्रफल से t सेकेण्ड में गुजरने वाले इलैक्ट्रोनों द्वारा ले जाया गया आवेश q हो, तो तार में बहने वाली धारा

       I = q / t 

अब मान लेते है कि तार के प्रति एकांक आयतन में मुक्त इलैक्ट्रोनों की संख्या n है और तार का अनुप्रस्त क्षेत्रफल A है, तो t सैकेंड में गुजरने वाले इलैक्ट्रोनों की संख्या = nA×Vd×t

               l = q/t = ne/t

               I = nA×Vd×t×e/t

               I = neAVd

I = विधुत धारा
Vd = अनुगमन वेग
n = इलैक्ट्रोनों की संख्या
e = इलैक्ट्रोन पर आवेश
A = तार का क्षेत्रफल

यही विधुत धारा और अनुगमन वेग में संबंध होता है। इस सूत्र से आसानी से electric current in hindi को ज्ञात किया जा सकता है।











Er. Chand जून 22, 2021
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