अर्धचालक दो प्रकार के होते है जिसमें पहला प्रकार होता है आन्तरिक या निज अर्धचालक और दूसरा प्रकार होता है बाह्मा अर्धचालक, इसलिए दोनों प्रकार के अर्धचालक पर तापमान का प्रभाव अलग-अलग होता है। पहले हम बात करेंगे आन्तरिक अर्धचालक के प्रतिरोध पर तापमान बढ़ाने से क्या होता है।
सिलिकाॅन और जर्मेनियम आन्तरिक अर्धचालक होते है इनकी बाहरी कक्षा में चार इलैक्ट्रोन होते है जो बन्ध बनाने में व्यस्थ रहते है।परम शून्य ताप पर ये अर्धचालक एक विधुतरोधी की तरह व्यवहार करता है लेकिन जैसे ही इसका तापमान बढ़ाया जाता है तो सिलिकॉन या जर्मेनियम की बहारी कक्षा में जो चार इलैक्ट्रोन उपस्थित होते है उनके बीच के बन्ध टूट जाते है और ये इलैक्ट्रोन इधर उधर घूमने लगते है। अब यदि इस अर्धचालक के सिरों पर एक बैटरी को जोड़ दिया जाए तो इस अर्धचालक के अन्दर विधुत धारा प्रवाहित होने लगेंगीं। इससे हमें पता चलता है कि आन्तरिक अर्धचालक का प्रतिरोध तापमान बढ़ाने पर कम हो जाता है।
अब बात करेंगे हम बाह्मा अर्धचालक की बाह्मा अर्धचालक दो प्रकार के होते है n-प्रकार और p_प्रकार तो यहां पहले देखते है n-प्रकार के अर्धचालक पर तापमान का क्या प्रभाव पड़ता है।
n-प्रकार के अर्धचालक को बनाने के लिए पांच संयोजकता वाला अपद्रव्य फास्फोरस, सिलिकॉन या जर्मेनियम में मिलातें है। फास्फोरस की बाहरी कक्षा में पांच इलैक्ट्रोन होते है जिनमें से चार इलैक्ट्रोन सिलिकॉन या जर्मेनियम के चार इलैक्ट्रोनों के साथ बन्ध बना लेते है और एक इलैक्ट्रोन बच जाता है और ये इधर उधर घूमता रहता है यानी के n-प्रकार अर्धचालक में पहले से फ्री इलैक्ट्रोन होते है और यह परम शून्य ताप पर भी एक चालक की तरह व्यवहार करता है। यदि इसका तापमान बढ़ाते है तो बन्ध बनाने वाले इलैक्ट्रोन भी फ्री हो जाते है जिससे फ्री इलैक्ट्रोनों की संख्या अधिक हो जाती है और ये इलैक्ट्रोन एक दूसरे से टकराने लगते है और इनके मार्ग में रुकावट पैदा हो जाती है जिससे विधुत धारा के मार्ग में भी रुकावट पैदा हो जाती है इसलिए इसका तापमान बढ़ाने पर प्रतिरोध बढ़ जाता है।
p-प्रकार के अर्धचालक को बनाने के लिए तीन संयोजकता वाला अपद्रव्य एल्यूमीनियम, सिलिकॉन या जर्मेनियम में मिलातें है। एल्यूमिनियम की बाहरी कक्षा में तीन इलैक्ट्रोन होते है जो सिलिकॉन या जर्मेनियम के इलैक्ट्रोनों से बन्ध बना लेते है और कोई भी इलैक्ट्रोन फ्री नहीं होता है इसलिए यह परम शून्य ताप पर एक विधुतरोधी की तरह व्यवहार करता है और तापमान बढ़ाने पर इलैक्ट्रोनों के बन्ध टूट जाते है जिससे इसमें आसानी से विधुत धारा प्रवाहित होने लगती है, इसलिए इसका तापमान बढ़ाने पर प्रतिरोध कम हो जाता है।
इस लेख में हमने यह जाना है कि अर्धचालक पर तापमान का प्रभाव से क्या होता है उम्मीद करता हूं कि आप जान गए होंगे। पोस्ट अच्छी लगी है तो कमेंट करके जरूर बताइए और आपको और किसी टोपिक के बारे में जानकारी चाहिए तो आप कमेंट करके हमें बता सकते है।
किसी विधुत आवेश या किसी विधुत आदेशों के समूह के चारों ओर का वह क्षेत्र जिसके अन्दर किसी दूसरे आवेशित कण को लाये जाने पर यदि यह कण इस क्षेत्र में एक आकर्षण बल या प्रतिकर्षण बल का एहसास करता है। तो ऐसा क्षेत्र विधुत क्षेत्र कहलाता है।
किसी भी कण को विधुत क्षेत्र में तभी कहां जा सकता है जब वह कण उस क्षेत्र में एक स्थार बल का एहसास करता है विधुत क्षेत्र का सबसे पहले वैज्ञानिक फैराडें ने पता लगाया था।
ओम के नियम का प्रयोग करके सिर्फ सरल और छोटे परिपथों में धारा और वोल्टेज निकाली जा सकती है ऐसे परिपथ जिनमें बहुत सारे प्रतिरोध और काफी सारे वोल्टेज सोर्स जुड़े होते है ऐसे परिपथों में ओम का नियम फैल हो जाता है और धारा और वोल्टेज निकाल नहीं पाता है। तो ऐसे परिपथों में धारा और वोल्टेज को निकालने के लिए वैज्ञानिक गुस्ताव राॅबर्ट किरचाॅफ ने सन् 1842 में दो नियम को स्थापित किया और तभी से इन नियमों को किरचाॅफ के नियम यानी Kirchhoff's laws कहां जाता है।
आज की इस पोस्ट में हम जानेंगे कि नोडल ऐनालेशिस क्या होता है। इसका प्रयोग क्यो किया जाता है और इसके द्वारा किस चीज को निकाला जाता है।
नोडल ऐनालेशिस के द्वारा परिपथों के नोड का वोल्टेज निकाला जाता है। जिन परिपथों में ओम के नियम या किरचाॅफ के नियम से वोल्टेज नहीं निकलती है वहां पर नोडल ऐनालेशिस का प्रयोग करके उस परिपथ के नोड का वोल्टेज ज्ञात किया जाता है।
या जिन परिपथों में बहुत सारे वोल्टेज सोर्स या करंट सोर्स लगें होते है और देखने में ये परिपथ बहुत कठिन दिखाई देते है तो ऐसे परिपथों में भी नोडल ऐनालेशिस के द्वारा ही नोड का वोल्टेज निकाला जाता है।
नोडल ऐनालेशिस को किसी भी परिपथ में अप्लाई करने से पहले कुछ बातों का ध्यान रखना बहुत जरूरी होता है। इन बातों को में आपको स्टेप बाई स्टेप निचे बता रहा हूं।
• स्टेप नम्बर एक
सबसे पहले जिस परिपथ को नोडल ऐनालेशिस से हल करना है उस परिपथ में नोड की संख्या देखेंगे कितनी है।
• स्टेप नम्बर दो
फिर उसमें से एक नोड को रिफरेंस मान लेते है यानी के उस नोड के वोल्टेज को शून्य (0V) मान लेते है। आपको ऐसे नोड के वोल्टेज को शून्य मानना है जिससे परिपथ हल करने में आसानी हो।
• स्टेप नम्बर तीन
परिपथ के जिस नोड का वोल्टेज निकल सकता है उसे निकाल लेते है और जिस नोड का वोल्टेज आसानी से नहीं निकलता उसे V1,V2 आदि मान लेंगे।
• स्टेप नम्बर चार
उसके बाद परिपथ में नोडल ऐनालेशिस अप्लाई करके V1,V2 आदि के मान निकाल लेते है।
तो इस तरह से नोडल ऐनालेशिस का प्रयोग करके नोड का वोल्टेज ज्ञात किया जाता है।
उम्मीद करता हूं कि आप सब समझ गये होगें कि कैसे नोडल ऐनालेशिस का प्रयोग करके नोड का वोल्टेज निकाला जाता है। अगर आपको यह पोस्ट अच्छी लगी है या आप का कोई सवाल है तो आप हमें कमेंट करके जरूर बताइए।
अनन्त (Infinite) से किसी इकाई धन आवेश को विधुत क्षेत्र के विपरित चलाने के लिए जितनी ऊर्जा (energy) की आवश्यकता होती है या जितना कार्य किया जाता है उसे उस बिंदु (point) का विधुत विभव (Electric potential) कहते हैं।
इसे V से प्रदर्शित करते हैं
इसका एस आई मात्रक वोल्ट होता हैं ।
विधुत विभव = कार्य / आवेश
(1) यह एक अदिश राशि है
(2) विधुत विभव ऊर्जा का ही एक रूप है।
(3) अनन्त (Infinite) का मतलब जहां विधुत क्षेत्र शून्य होता है।
ब्राहा: द्रविय अर्धचालक का तापमान बढ़ाने पर इनका प्रतिरोध बढ़ जाता है क्योंकि इन अर्धचालको में पहले से फ्री इलैक्ट्रोन होते हैं और जब हम इनका तापमान बढ़ाते हैं तो ये फ्री इलैक्ट्रोन एक दूसरे से टकराने लगते हैं जिससे इनके पाथ में रुकावट आ जाती है और इनका प्रतिरोध बढ़ जाता हैं ।

R = R1 + R2
यदि किसी पदार्थ की लंबाई एक मीटर और क्षेत्रफल एक मीटर वर्ग हैं तो उस पदार्थ का प्रतिरोध उसकी प्रतिरोधकता कहलाती है। इसे विशिष्ट प्रतिरोध भी कहते हैं।
(1) प्रतिरोधकता लंबाई और क्षेत्रफल पर निर्भर नहीं करती हैं।
(2) प्रतिरोधकता पदार्थ की प्रकृति ओर तापमान पर निर्भर करती हैं।
(1) किसी भी पदार्थ का प्रतिरोध उसकी लंबाई के बढ़ने पर बढ़ता है। यानि प्रतिरोध पदार्थ की लंबाई के समानुपाती होता है।
(2) पदार्थ का क्षेत्रफल बढ़ने पर उसका प्रतिरोध कम हो जाता है। यानि प्रतिरोध पदार्थ के क्षेत्रफल के व्यूतक्रमानुपाती होता है।
(3) प्रतिरोध पदार्थ की प्रकृति पर भी निर्भर करता है।
(4) प्रतिरोध पदार्थ का तापमान बढ़ने पर बढ़ जाता है।
ओम के नियम की खोज एक जर्मन वैज्ञानिक ने सन् 1826 में की थी। जिनका नाम डॉ जाॅर्ज साइमन ओम था। इस नियम का नाम उन्होंने अपने नाम पर ही रखा था। जिसे हम ohm's law in hindi भी कहते है।
वैज्ञानिक ओम ने अपने प्रयोग में एक तांबे का तार लिया उस तार के सिरों पर एक वोल्टेज स्रौत यानि बैटरी को जोड़ दिया। और उन्होंने देखा कि इस तांबे के तार में विधुत धारा बहने लगी है। फिर उन्होने इस तांबे के तार में बहने वाली विधुत धारा और तार के सिरों पर लगने वाले वोल्टेज के बीच एक संबंध को स्थापित किया। उन्होंने इस संबंध में कहा कि
जब हम किसी चालक की भौतिक अवस्था (तापमान,दाब, आयतन, लंबाई,क्षेत्रफल आदि) में कोई परिवर्तन न किया जाए तो इस चालक से बहने वाली विधुत धारा उस चालक के सिरों पर लगने वाले वोल्टेज के समानुपाती होती है।
R=नियतांक
I=धारा
V=वोल्टेज
यहा पर R एक नियतांक होता है जिसे चालक का प्रतिरोध कहते हैं
प्रतिरोध तांबे के तार का वह गुण होता है जो उस तार में बहने वाली विधुत धारा को बहने से रोकता है यानी उस धारा का विरोध करता है।
प्रतिरोध का एस आई मात्रक ओम होता है।
ओम के नियम में हमेशा धारा ही वोल्टेज के समानुपाती होती है। हम ऐसा नहीं कह सकते कि वोल्टेज धारा के समानुपाती हैं। क्योंकि हमें पता है कि किसी भी चालक में धारा प्रवाहित होने के लिए विभवान्तर का होना आवश्यक है इससे यह पता चलता है कि पहले वोल्टेज आया है फिर धारा तों इसलिए हम धारा को वोल्टेज के समानुपाती लेते हैं ।
1.जो तत्व ओम के नियम का पालन करते हैं उन्हें रेखिय तत्त्व (linear elements) कहते हैं
2.जो तत्त्व ओम के नियम का पालन नहीं करते हैं उन्हें अरेखिय तत्त्व (non-linear elements) कहते हैं
3. सभी चालक रेखिय तत्त्व (linear elements) होते हैं
4. अरेखिय तत्त्व Diode,Transistor,BJT,JFET आदि होते हैं ।
इसे भी देखें : विधुत सेल क्या है
V / i = R
किसी धारावाही तार या विधुत परिपथ में प्रवाहित होने वाले आवेश की दर को विधुत धारा कहते हैं। या किसी तांबे के तार में जब इलैक्ट्रोन प्रवाह करते है तो हम कह सकते है इसमें विधुत धारा है। विधुत धारा का एस आई (SI) मात्रक एम्पीयर (Ampere) होता हैं विधुत धारा किसी चालक में धनावेश विभव (positive potential) से ऋणावेश विभव (negitive potential) की ओर बहती हैं ।
मान लेते है कि किसी चालक में q आवेश t सेकेंड में बह रहा है तो विधुत धारा
I = q / t एम्पीयर
जहां। q = ne
n=इलैक्टौन की संख्या
e=इलैक्ट्रोन
एक e पर 1.6×10 की पावर (-) 19 कूलाम्ब का आवेश होता है
परिपथ में धन आवेश प्रवाह की दिशा विधुत धारा की दिशा मानी जाती हैं (इलैक्टौन प्रवाह की दिशा के विपरित)।
विधुत धारा की दिशा की माप अमीटर से की जाती है जिसमें दो टर्मिनल (+) वाली (-) होते हैं
धारा घनत्व = विधुत धारा / क्षेत्रफल