विधुत धारा का क्या मतलब है
आज के इस युग में विधुत ने हमारे जीवन को बदलकर रख दिया है इसी विधुत की बदौलत आज हम चांद तक पहुंच गये है। ये विधुत का ही कमाल है कि आज हम फोन पर सारी दुनिया को अपने घर पर ही बैठें देख सकते है। क्योंकि फोन और कम्प्यूटर विधुत से ही चलतें है। क्या आपने कभी सोचा है कि अगर विधुत न होती तो आज हमारा जीवन कैसा होता। आज हम जितनी भी टैक्नोलॉजी का उपयोग कर रहे है। इन सभी को विधुत के द्वारा ही चलाया जा रहा है। औधौगिक क्षेत्र में जितना भी काम किया जा रहा है। सब विधुत के द्वारा ही किया जा रहा है।
तो अब हम बात करने वाले है electric current in hindi क्या होती है यह कितने प्रकार की होती है यह किस तरह की राशि है और दिशा किस तरफ होती है।
विधुत धारा क्या है
किसी धारावाही तार या विधुत परिपथ में प्रवाहित होने वाले आवेश की दर को विधुत धारा कहते हैं। या किसी तांबे के तार में जब इलैक्ट्रोन प्रवाह करते है तो हम कह सकते है इसमें विधुत धारा है। विधुत धारा का एस आई (SI) मात्रक एम्पीयर (Ampere) होता हैं विधुत धारा किसी चालक में धनावेश विभव (positive potential) से ऋणावेश विभव (negitive potential) की ओर बहती हैं ।
किसी भी चालक मैं धारा प्रवाहित तभी होती है अगर उस चालक के सिरों के बीच विभवान्तर हो यदि चालक में विभवान्तर नहीं होगा तो चालक में कभी भी धारा प्रवाहित नहीं होगी। किसी भी चालक में धारा प्रवाहित होने के लिए विभवान्तर का होना आवश्यक है
मान लेते है कि किसी चालक में q आवेश t सेकेंड में बह रहा है तो विधुत धारा
I = q / t एम्पीयर
जहां। q = ne
n=इलैक्टौन की संख्या
e=इलैक्ट्रोन
एक e पर 1.6×10 की पावर (-) 19 कूलाम्ब का आवेश होता है
परिपथ में धन आवेश प्रवाह की दिशा विधुत धारा की दिशा मानी जाती हैं (इलैक्टौन प्रवाह की दिशा के विपरित)।
विधुत धारा की दिशा की माप अमीटर से की जाती है जिसमें दो टर्मिनल (+) वाली (-) होते हैं
अमीटर को परिपथ में श्रेणी में जोडते हैं
अमीटर का धन(+) सीरा उच्च विभव (सेल के + से ) ओर ऋण सिरा निम्न विभव ( सेल के - से ) जोडते हैं।
धातुओं के परमाणुओं की बह्रा कक्षा में 1 या 2 इलैक्टोन होते हैं इन पर नाभिक का आकर्षण बल कम होता हैं। सामान्य तापमान पर ये इलैक्ट्रोन थोड़ी सी ऊर्जा से ही परमाणु से अलग होकर पदार्थ में स्वतन्त्र (free) होकर घुमने लगते हैं परन्तु धातु को छोड़कर नहीं जाते। इन इलैक्ट्रोन को मुक्त इलैक्ट्रोन ( free electron ) कहते हैं । धातुओं के अन्दर ये अनियमित रूप से घुमते हैं पदार्थ में इनका वितरण सामान्यतः एक समान होता हैं । जब धातुओं के सिरो पर विभवान्तर लगाया जाता है तो इन इलैक्ट्रोनो की गति नियमित हो जाती हैं जिससे विधुत धारा धातु में एक स्थान से दूसरे स्थान की और जाने लगती है यानी विधुत धारा बहने लगती हैं ।
जब परमाणु की बाहरी कक्षा में संयोजी इलैक्ट्रोन की संख्या 4 से कम होती है तो वो परमाणु धातु होता है यानि के जितने भी तत्त्व धातु होते है। उन सब की बाहरी कक्षा में जो संयोजी इलैक्ट्रोन होते है उनकी संख्या 4 से कम ही होती है।
और जितने भी परमाणु अधातु होते है उन सब की बाहरी कक्षा में संयोजी इलैक्ट्रोन की संख्या 4 से ज्यादा होती है।
और जो परमाणु अर्ध धातु होते है। उन सब की बाहरी कक्षा में संयोजी इलैक्ट्रोन की संख्या 4 के बराबर होती है।
विधुत धारा का सबसे अच्छा चालक
वैसे तो विधुत धारा का सबसे अच्छा चालक चांदी को माना जाता है। लेकिन इसका प्रयोग करना बहुत महंगा होता है क्योंकि चांदी एक महंगी धातु होती है। इसलिए हम ज्यादातर तांबा और एल्यूमिनियम धातु का प्रयोग करते है क्योंकि इन धातुओं की किमत भी कम होती है और ये आसानी से मिल भी जाती है।
विधुत धारा की दिशा
विधुत धारा एक अदिश राशि है लेकिन इसके बावजूद भी इसकी दिशा को विधुत चालकों और विधुत परिपथों में लेना जरूरी होता है। किसी भी विधुत परिपथ में विधुत धारा के बहने की दिशा परिपथ के धनावेश विभव सिरे से ऋणावेश विभव सिरे की और होती है या फिर इलैक्ट्रोन जिस दिशा में चलते है विधुत धारा उनके विपरित दिशा में बहती है।
द्रव और गैस में विधुत धारा का बहना
हमे पता है कि द्रवो में भी विधुत धारा बहती है लेकिन द्रव में धारा मुक्त इलैक्ट्रोन के कारण नहीं बहती है।द्रवो में आयन बनते है। धनावेश आयन और ऋणावेश आयन। इन आयनों के बनने से ही द्रव में धारा बहने लगती है।
गैसों में विधुत धारा का प्रवाह मुक्त इलैक्ट्रोन और आयनों के कारण होता है
आयन कैसे बनते है
किसी भी पदार्थ की सबसे छोटी से छोटी इकाई को परमाणु कहते है। परमाणु के अन्दर एक नाभिक होता है और मुक्त इलैक्ट्रोन इस नाभिक के चारों ओर कक्षाओं में चक्कर लगाते है। नाभिक के अन्दर प्रोटॉन ओर न्यूटाॅन होते है प्रोटाॅन पर धन आवेश और न्यूटाॅन पर कोई आवेश नहीं होता जबकि इलैक्ट्रोन पर ऋण आवेश होता है। किसी भी परमाणु में प्रोटाॅन और इलैक्ट्रोन की संख्या बराबर होती है। इस प्रकार पूरा परमाणु न्यूट्रल होता है।
जब कोई इलैक्ट्रोन अपनी कक्षा को छोड़कर परमाणु से बाहर निकल जाता है तो परमाणु के अन्दर इलैक्ट्रोन की कमी हो जाती है और प्रोटोन्स बढ़ जाते है। प्रोटोन बढ़ जानें से इस परमाणु को धनावेश आयन (positive ions) कहते है।
जब परमाणु इलैक्ट्रोन को ग्रहण करता है तो उसके अन्दर इलैक्ट्रोन अधिक हो जाते है। इलैक्ट्रोन के बढ़ जाने से इस परमाणु को ऋणावेश आयन (Nagetive ions) कहते है।
धारा घनत्व
माना किसी चालक के अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल (A) है। ओर मान लेते है कि (I) एम्पीयर की विधुत धारा इस चालक में समान रूप से वितरित हो रही है तो उस चालक में बहने वाली विधुत धारा और उस चालक के अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल के अनुपात को धारा घनत्व कहते है। धारा घनत्व को इंग्लिश अक्षर (j) से व्यक्त करते है।
धारा घनत्व की दिशा विधुत धारा की दिशा में ही होती है।
मान लेते है किसी धारावाही चालक में बहने वाली विधुत धारा I है और चालक का क्षेत्रफल A है तों धारा घनत्व
धारा घनत्व = विधुत धारा / क्षेत्रफल
j = I / A
एम्पीयर / मीटर वर्ग
एक एम्पीयर की परिभाषा
जब किसी धारावाही परिपथ में एक कूलाॅम का आवेश उसमें चलने के लिए एक सेकेंड लेता है। तो उस परिपथ में बहने वाली विधुत धारा एक एम्पीयर होंगी।
विधुत धारा को समझने के लिए एक उदाहरण मैंने नीचे दिया है
मान लेते है किसी धारावाही चालक में 5 सेकेंड में 10 कूलाॅम का आवेश प्रवाहित हो रहा है तो उस चालक में बहने वाली विधुत धारा का मान 2 एम्पीयर होगा।
विधुत धारा के प्रकार
मानव द्वारा उपयोग में लायी जाने वाली विधुत धारा दो प्रकार की होती है। एक होती है दिष्ट धारा जिसे D.C से व्यक्त करते है और दूसरी होती है प्रत्यावर्ती धारा जिसे हम (A.C) से व्यक्त करते है।
दिष्ट धारा (Direct current)
दिष्ट धारा एक समान और एक ही दिशा में बहने वाली धारा है। समय बदलने के साथ इस धारा में कोई परिवर्तन नहीं आता है। इस धारा का अधिकतम मान और निम्नतम मान बराबर होता है। इसलिए यह धारा मनुष्य के लिए बहुत खतरनाक होती है क्योंकि यह धारा एक समान बहती ही रहती है कभी भी कम ज्यादा नहीं होती है।
इस धारा को आसानी से बैटरी में स्टोर किया जा सकता है। इसमें समय के साथ परिवर्तन न होने के कारण ही इसको स्टोर किया जा सकता है।
दिष्ट धारा बनाने के लिए डी सी जेनरेटर, सोलर सेल और कई प्रकार की युक्तियों का प्रयोग किया जाता है
प्रत्यावर्ती धारा (Alternating current)
प्रत्यावर्ती धारा एक ऐसी धारा है जिसका मान समय के साथ बदलता रहता है। यह एक सेकेंड के अन्दर 100 बार शून्य होती है और 100 बार ही अपने अधिकतम मान पर पहुंचती है। इस धारा में समय के साथ परिवर्तन होने के कारण इसको स्टोर नहीं किया जा सकता है। इस धारा को ए सी जेनरेटर ओर अल्टरनेटर के द्वारा बनाया जाता है।
इस धारा में प्रयोग की जाने वाली आवृत्ति 50 हर्टज होती है। लेकिन अमेरिका में 60 हर्टज का प्रयोग किया जाता है। तो वहां धारा एक सेकेंड में 120 बार शून्य होती है और 120 बार अधिकतम मान पर पहुंचती है।
लेकिन 60 हर्टज की आवृत्ति को बढ़िया नहीं माना जाता है।अधिकतर देशों में 50 हर्टज आवृत्ति का ही उपयोग किया जाता है
विधुत धारा का ऊष्मीय प्रभाव
जब किसी धारावाही चालक या विधुत परिपथ में विधुत धारा प्रवाहित की जाती है तो वह धारावाही चालक या विधुत परिपथ गर्म होने लगता है तो इस धारावाही चालक के गर्म होने को विधुत धारा का ऊष्मीय प्रभाव कहते है।
आप इस प्रभाव को अपनी आंखों से अपने घरों में भी देख सकते है। घरों में जलने वाले विधुत बल्ब,हिटर ओर विधुत प्रेस विधुत धारा के ऊष्मीय प्रभाव का ही उदाहरण है।
विधुत धारा स्रोत (Current Source)
एक आदर्श धारा स्रोत का आन्तरिक प्रतिरोध अनन्त होना चाहिए। जिससे विधुत परिपथ में लगाये गये भार पर एक समान धारा पहुंच सकें।
विधुत धारा स्रोत एक ऐसा स्रौत होता है जो परिपथ में लगने वाले भार को एक समान विधुत धारा उपलब्ध कराता है।
धारामापी (Ammeter)
विधुत परिपथ में बहने वाली धारा को जिस यन्त्र से मापा जाता है। उसे धारामापी कहते है। धारामापी को परिपथ में लगने वाले भार के श्रेणी में लगाया जाता है। धारामापी का आन्तरिक प्रतिरोध बहुत कम होता है।
एक आदर्श धारामापी का आन्तरिक प्रतिरोध शून्य होता है।
यदि धारामापी को परिपथ में लगने वाले भार के समांतर में लगा दिया जाये तो धारामापी से एक बहुत उच्च मान विधुत धारा बहेगी जिससे धारामापी जल जायेगा। क्योंकि धारामापी का आन्तरिक प्रतिरोध बहुत कम होता है।
विधुत आवेश का इलैक्ट्रोन सिद्धांत
पूरी दुनिया के अन्दर जितने भी पदार्थ हो या वस्तु सब छोटे छोटे कणों से मिलकर बना होता है और इन कणों को परमाणु कहते हैं। किसी भी पदार्थ का जो बीच वाला हिस्सा होता है वो पदार्थ के अन्य भाग से भारी होता है पदार्थ के इस भारी वाले भाग को नाभिक कहते है। नाभिक दो प्रकार के कणों से मिलकर बना होता है जिनको प्रोटोन और न्यूट्रोन कहा जाता है। नाभिक के अन्दर प्रोटोन पर धनावेश होता है और न्यूट्रोन पर कोई आवेश नहीं होता यह एक बिना आवेश वाला कण होता है।
चूंकि नाभिक में केवल प्रोटोन पर धनावेश होता है इसलिए नाभिक का व्यवहार भी एक धनावेशित कण की तरह होता है। नाभिक के चारों ओर एक तिसरे प्रकार का कण कक्षाओं में चक्कर लगाता रहता है, जिसे इलैक्ट्रोन कहते हैं। कक्षाओं में घूम रहे जितने भी इलैक्ट्रोन होते है सभी पर प्रोटोन के आवेश के बराबर ऋणावेश होता है। एक परमाणु के अन्दर इलैक्ट्रोनों और प्रोटोनों की संख्या बराबर होती है, इस प्रकार से पूरा परमाणु उदासीन होता है।
यदि किसी प्रकार किसी परमाणु से एक या अधिक इलैक्ट्रोन निकाल लिये जायें तो इस परमाणु पर धन आवेश की मात्रा बढ़ जाती है और यह धनावेशित कहा जाता है। और जब कोई परमाणु बाहर से किसी प्रकार एक या एक से अधिक इलैक्ट्रोन को अपने अन्दर ले लेता है तो इस पर श्रण आवेश की मात्रा बढ़ जाती है और इसे ऋणावेशित कहा जाता है। हमें पता है कि किसी भी पदार्थ के अन्दर अन गीनत परमाणु होते है इसलिए किसी पदार्थ का धनावेशित होना उसके परमाणुओं में इलैक्ट्रोनों की कमी को बताता है और ऋणावेशित होना, इलैक्ट्रोनों की संख्या अधिक होने को दर्शाता है।
किसी वस्तु के धनावेशित और ऋणावेशित होने की क्रिया इलैक्ट्रोनों के स्थानान्तरण से ही समझायी जा सकती है, क्योंकि इलैक्ट्रोन परमाणु के बाहरी वालें भाग में भी कक्षाओं में चक्कर लगाते रहते है, इसलिए इलैक्ट्रोनों को आसानी से अलग किया जा सकता है। लेकिन प्रोटोन परमाणु के बीच वाले हिस्से में उपस्थित होते है जिन्हें परमाणु से अलग करना नामुमकिन होता है, इसलिए किसी वस्तु के आवेशित होने के लिए इलैक्ट्रोन ही उत्तरदायी होता है। न कि प्रोटोंन
किसी चालक में स्थायी विधुत धारा प्राप्त करना
किसी चालक में स्थायी विधुत धारा प्राप्त करने के लिए आवश्यक है कि उसमें विधुत आवेश का प्रवाह लगातार बना रहे और इसके लिए हमें उस चालक के सिरों के बीच विभवान्तर को स्थिर रखना पड़ेगा और इसके लिए एक बाहरी विधुत स्त्रौत की आवश्यकता होती है, जो आवेश वाहकों को चालक मैं एक निश्चित दिशा में गति करने के लिए बाध्य करता है। इस प्रकार स्थायी धारा प्राप्त करने के लिए विधुत सेल, बैटरी या डायनेमो का उपयोग किया जाता है। ये सभी विधुत वाहक बल के स्त्रौत होते है।
वास्तव में विधुत वाहक बल कोई बल नहीं है, बल्कि यह स्त्रौत के द्वारा दी गई वह ऊर्जा है, जो एकांक आवेश को पूरे परिपथ में धक्का लगाने का काम करता है, दूसरे शब्दों में यह एकांक आवेश द्वारा प्राप्त की गई वह विधुत स्थितिज ऊर्जा है, जो सेल सहित पूरे परिपथ में एक इलैक्ट्रोड से दूसरे इलैक्ट्रोड तक प्रवाहित होने में प्राप्त करता है जबकि उस समय बाहरी परिपथ में कोई विधुत धारा ना बह रही हो। सेल के विधुत वाहक बल का मात्रक वोल्ट होता है और इसे E से दर्शाया जाता है।
विधुत धारा की दिशा प्रचलित प्रणाली के अनुसार किसी चालक में धारा के बहने की दिशा चालक के धनावेश वाहकों की गति की दिशा में या चालक के विधुत क्षेत्र की दिशा में होती है या ऋणावेशित वाहकों की गति की दिशा के विपरित ली जाती है।
किसी चालक में विधुत धारा उस चालक विशेष का एक लाक्षणिक गुण है और यह एक अदिश राशि है। यदि किसी तार में बहने वाली धारा को तीर के निशान से व्यक्त किया जाता है, तो इसका मतलब यह नहीं कि धारा एक सदिश राशि है यह निशान तो केवल इतना बताता है कि तार में धनावेश किस दिशा में चल रहा है। विधुत धारा सदिश राशियों के गुणों का पालन भी नहीं करती है। जैसे, यदि हम किसी तार को किसी स्थान पर मोड़ दें या गांठ लगा दें तो इस तार में धारा का मान वहीं रहता है जो पहले था। जबकि सदिश राशियों में दिशा के साथ उनका मान भी बदल जाता है। और विधुत धारा वैक्टरों के नियम का पालन भी नहीं करती है।
धात्विक चालकों में विधुत धारा का प्रवाह
धात्विक चालकों में विधुत धारा के बहने के लिए आवेश वाहकों का कार्य ये मुक्त इलैक्ट्रोन ही करते है, जिन्हें चालक इलैक्ट्रोन भी कहते है। धातुओं में मुक्त इलैक्ट्रोन की संख्या बहुत अधिक होती है, इसी कारण से धातुओं में विधुत धारा का प्रवाह बहुत ही आसानी से और बहुत जल्दी हो जाता है। धातुएं विधुत की सुचालक होती है धातुओं में विधुत का सबसे अच्छा सुचालक चादी होती है। धातु चालकों में धनायन की स्थितियां निश्चित होती है ये अपनी स्थिति के इर्द-गिर्द कम्पन तो करते रहते हैं, लेकिन पदार्थ के अन्दर घूमने के लिए स्वतन्त्र नहीं होते है। धात्विक चालकों में धनायन विधुत चालन के लिए उत्तरदायी नहीं होते, केवल धातुओं में चालन के लिए मुक्त इलैक्ट्रोन ही उत्तरदायी होते है।
अनुगमन वेग और विधुत धारा में संबंध
माना एक तार का क्षेत्रफल A और उसकी लंबाई l है इस तार के दोनों सिरों के बीच एक बैटरी जोड़कर विभवांतर V को स्थापित किया जाता है। इसके कारण तार के अन्दर एक E तीव्रता का विधुत क्षेत्र ऊत्पन्न हो जाता है, जिसके प्रभाव से तार के अन्दर मुक्त इलैक्ट्रोन इस विधुत क्षेत्र की विपरित दिशा में अनुगमन वेग Vd से गति करने लगते हैं।
परन्तु किसी चालक में बहने वाली विधुत धारा की प्रबलता तार के क्षेत्रफल से प्रति सेकेण्ड गुजरने वाले विधुत आवेश के मान से मापी जाती है।
यदि इस तार के क्षेत्रफल से t सेकेण्ड में गुजरने वाले इलैक्ट्रोनों द्वारा ले जाया गया आवेश q हो, तो तार में बहने वाली धारा
I = q / t
अब मान लेते है कि तार के प्रति एकांक आयतन में मुक्त इलैक्ट्रोनों की संख्या n है और तार का अनुप्रस्त क्षेत्रफल A है, तो t सैकेंड में गुजरने वाले इलैक्ट्रोनों की संख्या = nA×Vd×t
l = q/t = ne/t
I = nA×Vd×t×e/t
I = neAVd
I = विधुत धारा
Vd = अनुगमन वेग
n = इलैक्ट्रोनों की संख्या
e = इलैक्ट्रोन पर आवेश
A = तार का क्षेत्रफल
यही विधुत धारा और अनुगमन वेग में संबंध होता है। इस सूत्र से आसानी से electric current in hindi को ज्ञात किया जा सकता है।
कोई टिप्पणी नहीं: