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 हैलो दोस्तो आज की इस पोस्ट में हम जानेंगे कि MCB और RCCB क्या होता है और mcb or rccb me difference क्या है mcb का प्रयोग कहा किया जाता है और RCCB को किस जगह पर इस्तेमाल में लाया जाता है। इन दोनों का काम क्या होता है और किन किन चीजों से ये प्रोटेक्शन प्रदान करती है। इंटरव्यू के अन्दर भी आपसे इस पर प्रश्र पूछा जा सकता है कि mcb और rccb में क्या अंतर होता है तो इसे समझने के लिए आप इस पोस्ट बड़ी ही ध्यान पूर्वक पढ़िए तभी आप इन दोनों ही प्रोटेक्शन डिवाइस के बारे में अच्छे से समझ पायेंगे तो चलिए शुरू करते है आज के इस बहुत ही प्यारे टोपिक को।


mcb or rccb me difference


MCB क्या होता है

सबसे पहले हम mcb के बारे में बात करेंगे कि MCB क्या होता है। इस प्रोटेक्शन डिवाइस का पूरा नाम miniature circuit breaker होता है और यह केवल ओर केवल ओवर लोड और शाॅर्ट सर्किट पर ही सुरक्षा प्रदान करती है इसके अलावा यह ओर किसी चीज पर प्रोटेक्शन नहीं देती है।

चलिए इसको एक उदाहरण के द्वारा समझते है पहले ओवर लोड से प्रोटेक्शन कैसे करता है उसको समझते है। मान लीजिए आपके घर में एक 10 एम्पीयर रेटिंग की mcb लगी हुई है। यदि इसमें करंट 10 एम्पीयर तक फ्लो हो रहा है तब तक तो कोई चिंता की बात नहीं होती है लेकिन यदि किसी कारण इसमें करंट का मान दस एम्पीयर से थोडा भी ज्यादा हो जाता है यानी के 10.5 या 11 एम्पीयर हो जाता है तो आपके घर में लगी यह mcb तुरंत ही trip कर जाती है जिससे घर के अंदर लगें उपकरण और इलैक्ट्रिकल वायरिंग सुरक्षित बच जाती है तो इस तरह से एक MCB ओवर लोड से सुरक्षा प्रदान करती हैं।

अब शाॅर्ट सर्किट से प्रोटेक्शन कैसे करती है यह समझते है। मान लीजिए आपके घर में विधुत सप्लाई आ रही है और इसमें mcb लगा हुआ है इसमें से दो वायर आते है जो आगे विधुत बल्ब या विधुत मोटर तक जातें है। जिनमें से एक तार फेज का होता है और दूसरा न्यूट्रल का होता है। यदि किसी कारण इनमें से एक तार टूट कर दूसरे तार से मिल जाये यानी फेज वाला वायर टूटकर न्यूट्रल वायर से टच हो जाये तो दोनों तारों में शाॅर्ट सर्किट होने के कारण mcb तुरंत ही trip कर जाती है तो इस प्रकार यह शाॅर्ट सर्किट से भी सुरक्षा प्रदान करती हैं।

RCCB क्या होता है

इस सुरक्षा यंत्र का पूरा नाम residual current circuit breaker होता है। इसके अन्दर हमे काफी सारी सुविधाएं मिल जाती है जो कि mcb के अन्दर नहीं पाई जाती है इसका मुख्य कार्य परिपथ में विधुत धारा का बैलेंस जब बिगड़ जाता है तो उस कंडिशन में परिपथ को सप्लाई से पृथक करना होता है आसान से शब्दों में इसे ऐसे कह सकते है कि rccb का काम सर्किट में करंट को बैलेंस करना होता है।

चलिए इसको भी एक उदाहरण के द्वारा समझते है। मान लीजिए आपके पूरे घर में rccb लगा हुआ है आपका एक छोटा पांच या आठ साल का बच्चा है जिसने घर में लगें विधुत बोर्ड के सोकेट में उंगली दे दी है और उस सोकेट का स्विच भी ओन कंडिशन में है तो उस समय क्या होगा ? आपके घर की rccb तुरंत ही ट्रिप कर जायेंगी और आपका बच्चा करंट लगने से बच जायेगा। तो इस प्रकार से यह सुरक्षा प्रदान करती है। इसलिए इस प्रोटेक्शन डिवाइस को लगवाना बहुत जरूरी होता है क्योंकि बच्चों को पता नहीं होता है यदि किसी कारण वह कोई बिजली का तार पकड़ लेते है या फिर किसी विधुत बोर्ड के सोकेट में अपनी उंगली डाल देते है तो rccb उसे करंट लगने से पहले ही बचा लेगी इस तरह से आप और आपके बच्चे बिजली से सुरक्षित रहेंगे।

MCB और RCCB में अंतर

दोस्तों जैसा हमने अभी ऊपर जाना है कि mcb सिर्फ दो चीजों से सुरक्षा प्रदान करती है एक तो over load और दूसरा short circuit यानी के जब परिपथ में ओवर लोड की कंडीशन आयेगी या कहीं पर आपस में दो तारों में शाॅर्ट सर्किट हुआ हो तो इनसे ही यह प्रोटेक्शन करती है। और rccb एक ऐसी प्रोटेक्शन डिवाइस होती है जब परिपथ में करंट अनियंत्रित हो रहा हो यानी के जितना करंट फेज से आ रहा है उतना ही अगर हमें न्यूट्रल पर नहीं मिल रहा है तो उस समय यह सर्किट से सप्लाई को अलग कर देती है। यही mcb और rccb में अंतर होता है।
Er. Chand दिसंबर 02, 2021
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 On grid solar system क्या होता है

जब सोलर प्लांट पावर ग्रीड या ट्रांसफॉर्मर से आने वाली विधुत सप्लाई से जुड़ा हो तो ऐसे सिस्टम को on grid solar system कहते हैं। इसे और दूसरे नाम से भी जाना जाता है जैसे ग्रीड टाइड सोलर सिस्टम इस नाम से भी इसको जानते हैं।
हैलो फ्रेंड्स आज हम इसी के बारे में बात करेंगे कि ओन ग्रीड सोलर सिस्टम क्या होता है यह कैसे काम करता है और इस सिस्टम को लगाने से पहले हमें किन किन बातों का ध्यान रखना होता है और इस सोलर सिस्टम के क्या क्या लाभ और हानियां है। अगर आप भी on grid solar system लगवाना चाहते है तो आपको कुछ बातों का ध्यान जरूर रखना चाहिए।

अगर आप ओन ग्रीड सोलर सिस्टम लगवा रहे है यह तभी काम करेगा जब आपके घर का पावर सप्लाई किसी ग्रीड या परिणामित्र से जुडा हों। कहने का मतलब यह है कि अगर आपके घर में विधुत सप्लाई नहीं आ रही है तब आप इस सोलर सिस्टम को नहीं लगवा सकते हैं। यह सिस्टम तभी फायदेमंद होता है जब आपके क्षेत्र में बिजली सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक आती हों। इस सिस्टम को तभी लगवाना चाहिए जब आप बिजली बिल को कम करना चाहते हों।

On grid solar system कैसे काम करता है

जब सूर्य की किरणें सोलर पैनल पर गिरती है तो इन किरणों के सोलर प्लेट पर गिरने से डी सी सप्लाई जेनरेट होती है लेकिन हमारे घरों में जितने भी उपकरण लगें होते है जैसे बल्ब, फैन, कूलर, एयर कंडीशनर, फ्रिजर, हिटर और वाशींग मशींन ये सब ए सी सप्लाई के द्वारा चलते हैं। तो हमें एक ऐसा डिवाइस चाहिए होता है जो इस डी सी सप्लाई को ए सी सप्लाई में कन्वर्ट कर दें। इसके लिए एक इन्वर्टर लगाया जाता है इसमें जिस इंवर्टर का प्रयोग करते है उसे ग्रीड टाइड इंवर्टर कहते हैं। सोलर पैनल से आने वाली डी सी सप्लाई को ये इंवर्टर ए सी सप्लाई में बदल देता है और ये सप्लाई आगे लगें स्विच बोर्ड में जाती है जहां पर सेफ्टी यन्त्र जैसे सर्किट ब्रेकर वगैरा लगें होते हैं।
On grid solar system kya hai


यहां से सप्लाई दो भागों में बट जाती है। एक लाइन यहां से सप्लाई की घरों में लगे लोड की ओर जाती है और दूसरी लाइन सप्लाई की नैट मीटर से होते हुए ग्रीड की ओर जाती है। नैट मीटर के दो काम होते है पहला जो घरों के कनैक्शन होते है वह किसी न किसी ग्रीड की सप्लाई से कनैक्ट होता है तो यह नैट मीटर उस ग्रीड की घरों में कितनी बिजली खर्च होती है उसका हिसाब रखता है और दूसरा सोलर पैनल के द्वारा बनने वाली कितनी बिजली ग्रीड को सप्लाई की जा रही है उसका भी रिकॉर्ड रखता है।

On grid solar system के लाभ

• इस सोलर सिस्टम को लगवाने का सबसे बड़ा फायदा यह हो जाता है कि जो हमारा महिने का बिजली का बिल आता है वह कम हो जाता है। क्योंकि इस सिस्टम में सप्लाई को जेनरेट भी करते हैं और साथ ही साथ ग्रीड को सप्लाई भी करते हैं।

• जैसा कि हम जानते है कि इस सोलर सिस्टम में बैटरी का प्रयोग नहीं होता है जिसके कारण इस प्लांट की मरम्मत करना आसान हो जाता है।

• इस सोलर पैनल की लगवाने की किमत भी बहुत कम होती है ओफ ग्रीड सोलर सिस्टम और हाई ग्रीड सोलर सिस्टम की तुलना में।

ओन ग्रीड सोलर सिस्टम की हानियां

• हमें पता है कि on grid solar system सीधे ही ग्रीड से कनैक्ट होता है। यदि किसी कारणवश ग्रीड से आपके घर में कोई विधुत सप्लाई नहीं आ रही है तो उस कंडिशन में यह सोलर सिस्टम काम नहीं करता है चाहे आपके सोलर पैनल पर सूर्य की कितनी भी अच्छी किरणें क्यों न गिर रही हों।

• इस प्लांट में किसी भी तरह की बैटरी का इस्तेमाल नहीं करते है जिसके कारण इसमें कोई बैकअप नहीं होता है। यही इस सिस्टम की सबसे बड़ी खामियां होती हैं।

Er. Chand नवंबर 25, 2021
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 सड़क पर लगें ब्रेकरों द्वारा बिजली कैसे बनायी जाती है।

हैलो दोस्तो आज मैं आपको बिजली बनाने के नये स्त्रौत के बारे में बताने जा रहा हूं। तों इस खास स्त्रौत का नाम है सड़क पर लगें ब्रेकरों द्वारा बिजली कैसे बनयी जाती है। जी हां दोस्तों इस इलैक्ट्रिसिटी उत्पादन के नये स्त्रौत का आज बहुत देशों के अन्दर प्रयोग किया जा रहा है तो आज हम इसी तरिके के बारे में जानेंगे कि सड़क पर लगें ब्रेकरों द्वारा बिजली कैसे बनती जाती है।


यह एक बहुत ही आसान और किफायती तरिका है जिससे बिजली का उत्पादन किया जा सकता है। इस तरिके मैं सड़कों पर जहां ब्रेकर लगें होते है उनके स्थान पर घूमने वाले लौहे के पहिए लगा दिये जाते हैं और इन पहियों से जेनरेटर की साफ्ट को जोड़ दिया जाता है। जैसे ही इनके ऊपर से कार या बस गुजरती है तो ये घूमने लगते है इनके घूमने से जेनरेटर की साफ्ट भी घूमने लगती है इस प्रकार इस स्त्रौत के द्वारा विधुत बनने लगती है।

इस स्त्रौत का उपयोग ज्यादातर जहां पुल बने होते है वहां किया जाता है क्योंकि पुलों पर इस स्त्रौत के उपकरणों को लगाना आसान होता है। पुल पर इसे बिना किसी खुदाई के प्लेस किया जा सकता है और इसे ऐसी सड़कों पर लगाना अधिक फायदेमंद होता है जिन रास्तों पर वाहनों का आना जाना लगातार बना रहता है। क्योंकि जितने ज्यादा वाहन इन ब्रेकरों के ऊपर से गुजरते है बिजली का उत्पादन उतना ही अधिक होगा।

सड़कों पर ब्रेकरों द्वारा बिजली बनाने में एक बात का खास ख्याल रखा जाना चाहिए। इस स्त्रौत को हमेशा ऐसी सड़कों पर लगाना चाहिए जहां पर गाड़ीयां एक ही दिशा में चलती हों तभी इसके द्वारा बिजली का उत्पादन अच्छा होता है वरना दोनों और से चलने वाली सड़कों पर इससे बिजली बनाने में काफी कठिनाई आती है।

ब्रेकरों द्वारा बनी बिजली का उपयोग

इस स्त्रौत से विधुत का उत्पादन करना बहुत आसान होता है यह तो आपने जान लिया। लेकिन इस स्त्रौत से बिजली की पैदावार बहुत कम मात्रा में होती है इसलिए इसका उपयोग ज्यादा बड़े सैक्टरो में नहीं किया जा सकता है। इस विधुत की मात्रा कम होने के कारण इसका उपयोग, जहां इस स्त्रौत को लगाया जाता है वही पर रात के समय लाइटों को जलाने में किया जाता है।
Er. Chand नवंबर 21, 2021
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 औधौगिक क्षेत्र में प्रयोग होने वाली विधुत मोटरें (Electric motors used in industries)


(1) खराद मशींन (Lathe machine) 

खराद मशींन को स्थिर गति वाली पिंजरा प्रेरण मोटर द्वारा चलायि जाता है। इन कार्यों के लिए 50 hp तक की मोटर बनाई जाती है। कभी कभी बहु गति वाली ए सी धारा की स्लिपरिंग प्रेरण मोटरें या ध्रुव परिवर्तित मोटरें तथा दिष्ट धारा शंट मोटरें या ध्रुव परिवर्तित चलाने के लिए प्रयोग की जाती है।


(2) प्लेनर (planer) 

प्लेनर में एक तल होता है जो कि प्लेटन से जुड़ा होता है, जो तल पर आगें पीछे चलता है। कार्य को प्लेटन से बांध दिया जाता है और कार्य शिकंजे में फंसे स्थिर टूल द्वारा समतल कियि जाता है। इसमें समंजनशील गति वाली प्रतिवर्ती मोटरें प्रयोग की जाती है। 

(3) पंच और शियरस (punch and shears) 

पंच और शियरस मशीनों में गतिपाल पहिया लगा होता है, जो कटिंग के समय ऊर्जा प्रदान करता है। इन मशीनों में ए सी मोटर उपयोग में लायी जाती है, जो ढलवां गत बलाघूर्ण अभिलक्षण रखती हों, ताकि मोटर की गति कम हो जायें जब उस पर उच्च भार पड़े। 

(4) मशींन टूल्स (machine tools) 

मशीन टूल के अन्तर्गत विधुत से चलने वाली मशीनें, बरमा मशींन और स्पेनर आदि आतें हैं। इनको चलाने के लिए उच्च गति वाली मोटरें गियर सहित प्रयोग में लायी जाती है। छोटी बरमा मशीनों और स्पेनर के साथ श्रेणी प्ररूपि सार्वत्रिक मोटर प्रयोग की जाती है, जो कि प्रत्यावर्ती धारा और दिष्ट धारा दोनों पर कार्य करती है। बड़े टूल्स के लिए दिष्ट धारा सप्लाई पर कम्पाउन्ड मोटरें और ए सी धारा के लिए पिंजरा प्रेरण मोटर उपयोग की जाती है।

(5) लिफ्ट (lift) 

लिफ्ट में प्रयोग की जाने वाली मोटर सरलता से प्रारम्भ और रुकनी चाहिए, इसके लिए मोटर का आर्मेचर हल्का और साधारण गति पर चलना चाहिए। लिफ्ट के लिए दिष्ट धारा कम्पाउन्ड मोटर, ए सी धारा स्लिप रिंग मोटर, प्रेरण प्रतिकर्षण मोटर और परिवर्ती गति वाली ए सी धारा की दिकपरिवर्तक मोटर अधिक उपयुक्त रहती है। 

(6) खनन उद्योग में (minning industries) 

खनन उद्योग में काम आने वाली मोटर पूरी तरह बंद घेरे वाली और ज्वालासह होनी चाहिए। इसमें 10 hp तक के लिए पिंजरा प्रारूपि प्रेरण मोटरें या डी सी मोटर प्रयोग में लायी जाती है। दिष्ट धारा मोटरों में गति नियंत्रण के लिए शंट क्षेत्र नियंत्रण विधि प्रयोग की जाती है और स्लिप रिगं मोटर के गीत नियंत्रण के लिए सोपानी विधि इस्तेमाल की जाती है।

(7) कपड़ा मिलों में (textile mills) 

कपड़ा मिलों में समूह चालन और अर्द्ध समूह चालन प्रयोग किया जाता है, जिसमें मोटर साफ्ट पर पुलिया लगी होती है जो अनेकों मशीनों को चलाती है। कपड़ा मिलों में उपयोग की जाने वाली मोटरें पूर्ण रूप से बन्द घेरें वाली होनी चाहिए, ताकि कपड़ों की फुन्जी आदि से मोटर सुरक्षित रहें। इसके साथ मोटर का विधुत रोधन नमी सह होना चाहिए ताकि सीलन से सुरक्षा हो सकें, क्योंकि कपड़ा मिलों में सीलन वातावरण होता है। कपड़ा मिलों में ए सी सप्लाई की थ्री फेज मोटरें प्रयोग की जाती है, क्योंकि इनकी गति सप्लाई आवृत्ति द्वारा नियंत्रित और स्थिर रहती है। कपड़ा मिलों में दिष्ट धारा मोटर प्रयोग करना उचित नहीं है क्योंकि इनकी गति सप्लाई वोल्टेज और गर्मी ज्यादा ऊत्पन्न होने पर परिवर्तित हो जाती है। इनमें प्रयुक्त होने वाली मशीनों की दक्षता और प्रारम्भन बहुत उच्च होना चाहिए।


Er. Chand नवंबर 01, 2021
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 जिस प्रकार किसी विशेष कार्य के लिए विधुत मोटर का चयन करते समय उसके विधुत अभिलक्षणों को देखा जाता है, उतने ही महत्व के साथ उसकी यांत्रिक संरचना पर भी ध्यान देना चाहिए, और स्थिति के अनुसार ही विशेष यांत्रिक संरचना वाली मोटरों का चयन किया जाना चाहिए। तो यहां हम उन्ही विधुत मोटर के यांत्रिक अभिलक्षण के बारे में पढ़ेंगे। मोटर का चयन करते समय निम्न यांत्रिक अभिलक्षणों को ध्यान में रखना चाहिए।



घेरें के प्ररूप (type of enclosure)

मोटर के सभी मुख्य भाग जैसे कुण्डलन, बेयरिंग, विधुतरोधन आदि को वायुमंडल में उपस्थित दुषित वायु से बचाना अत्यन आवश्यक होता है। औधोगिक इकाइयों में मोटरों के चारों ओर धातु धूल, तेल धूल, पानी और प्रज्वलनशील धुआं इकठ्ठा हो जाता है। घेरें का काम मोटर को दूषित हवा से बचाना होता है। अगर इस प्रकार की सुरक्षा प्रदान करने के लिए किसी तरह का घेरा इस्तेमाल किया जाता है तो हम देखते है कि मोटर को ठण्डी हवा मिलनी बंद हो जाती है, जिससे मोटर का तापमान बढ़ जाता है और इससे उसी परिमाप की असुरक्षित मोटर की अपेक्षा इस मोटर की निर्गत घट जाती है। मोटर के घेरे का डिजाइन करते समय निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए।
• मोटर को लगाने का स्थान
• मोटर को ठण्डा करने का प्राविधान
• मोटर से लिया जाने वाला काम

(1) खुली प्रारूपि मोटर

इस प्रकार की मशीनों में दूषित हवा, जैसे धातु धूल, पानी, साधारण धूल आदि से कोई सुरक्षा नहीं मिलती। ये मशीनें दोनों सिरों से खुली होती है, और मशीन के बियरिंग साधारण पैडस्टल या सिरा ब्रैकट पर लगे होते है। पुराने जमाने में ऐसी ही मोटरें प्रयोग की जाती थी, लेकिन आज कल केवल बहुत बड़ी दिष्ट धारा मोटरों में इस तरह के घेरे प्रयोग किये जाते हैं।

(2) पूर्णतया बन्द घेरे वाली मोटर

यह मोटर पूरी तरह से बंद घेरे वाली होती है, इनके फ्रेम ठोस होते है और सिरा प्लेटों में हवादारी के लिए छिद्र नहीं होते। इस प्रकार की घेरें वाली मोटरे धूल, दूषित हवा और रसायन धुएं आदि से पूरी तरह सुरक्षित होती है और इन्हे ऐसे स्थानों पर लगाया जाता है, जहां वातावरण दूषित रहता हो, जैसे आरा मिल, रसायन प्लांट, कोयला हैंडलिंग प्लांट में। इन मोटरों के शीतलन में कठिनाई के कारण इनकी निर्गत सुरक्षित मशीनों की अपेक्षा 50 से 70 तक होती है। इन्हें 2 से 3 अश्व शक्ति का ही बनाया जाता है, इससे अधिक अश्व शक्ति की मोटरों के लिए साफ्ट पर पंखा लगाया जाता है

(3) पूरी तरह बंद पंखा शीतलित मोटर

इस प्रकार की मोटरों में शीतलन के लिए साफ्ट के अचालन सिरों पर एक पंखा लगा दिया जाता है और उसे एक ढक्कन द्वारा ढक दिया जाता है। साफ्ट पर लगा यह पंखा घेरे के बाहर हवि फेंकता है, जिससे मोटर को ठंडा होने में मदद मिलती है। इस तरह की मोटरें 50 अश्व शक्ति तक बनायी जा सकती है और यह आरा मिलों, आटा चक्की, सीमेंट कार्यो में प्रयोग की जाती है।

(4) सुरक्षित मोटर

इस प्रकार की मोटरों में सिरा ढक्कन लगायें जातें है और दोनों सिरों पर हवा के लिए बड़े बड़े छिद्र छोड़े जातें है। इस तरह की मोटरें आज कल औधोगिक कार्यों के लिए इस्तेमाल की जाती है

बियरिंग (Bearing)

विधुत मोटरों में निम्न दो प्रकार के बियरिंग उपयोग में लाये जाते हैं, स्लीव बियरिंग और बाॅल बियरिंग या रोलर बियरिंग। इन दोनों का नीचे बिस्तार से अध्यन करेंगे।

(1) स्लीव बियरिंग

स्लीव बियरिंग कासा धातु के बने होते हैं, लेकिन सार्वत्रिक मोटरों और पंखा शीतलित मोटरों में छिद्रित पाउडर या सरंध्र धातु के बने स्लीव बियरिंग भी प्रयोग में लाएं जा सकते हैं, क्योंकि यह कोशिश क्रिया के कारण स्वं स्नेहक गुण रखतें हैं। बहुत छोटी मोटरों में स्लीव बियरिंग को तेल बस्ती द्वारा स्नेहित किया जाता है, जो कि साफ्ट पर स्प्रिंग द्वारा दबी रहती है। तेल बत्ती हल्के तेल द्वारा भिगी रहनी चाहिए।

(2) बाॅल या रोलर बियरिंग

रोलर बियरिंग में एक आन्तरिक रेस, एक ब्राह्रा रेस और एक पिंजरा होता है, जिसमें बाल या रोलर को फंसाया जाता है। इन बियरिंगों में ग्रीस लगाकर, इन्हे मोटर की साफ्ट के दोनों ओर सिरा प्लेटों में लगाया जाता है। आजकल स्लीव बियरिंग का स्थान बाल बियरिंग लेते जा रहें हैं और ऊर्ध्वाधर साफ्ट वाली मोटरों में बाल बियरिंग ही प्रयोग कियें जाते हैं, क्योंकि यह अक्षिय प्रघात को सहन कर सकते है और इनकी लागत भी अधिक होती है। इनमें घर्सण हानियां कम और अनुरक्षण व्यय लगभग नग्नय होता है इसलिए रोटर और स्टेटर में भी कम वायु अंतराल रखा जा सकता है।

चालन को संचालित करने की विधि

मोटर के प्ररूप और संरचना के चयन के साथ साथ चालन को भी संचारित करने की विधि का उपयोग चयन करना महत्वपूर्ण होता है। मोटर की गति का चयन करना भी जरूरी होता है क्योंकि उच्च गति पर मोटर की दक्षता और शक्ति गुणांक उच्च होता है और लागत प्रति अश्व शक्ति कम होती है, इसी कारण उच्च गति वाली मोटरें बनाई जाती है। यदि काम को निम्न गति पर करना हो तो घटाव गियर्स या अन्य उपर्युक्त विधि द्वारा मोटर की गति कम कर लेते हैं। मशीनों को चलाने के लिए निम्न संचारित विधियां प्रयोग की जाती है।

(1) पट्टा चालन

इस विधि में चमड़े या नायलोन धागे का पट्टा प्रयोग किया जाता है। यह सबसे अच्छा और सबसे ज्यादा उपयोग की जाने वाली विधि है, जिसके द्वारा 300 अश्व शक्ति तक यांत्रिक शक्ति संचारित की जा सकती है, जबकि अन्य सीमा, गति अनुपात और पुली के केन्द्रो के साथ दूरी पर निर्भर करती है। इसके अतिरिक्त पट्टे की स्लिप को भी ध्यान में रखना चाहिए, जोकि 3 से 4 प्रतिशत हो सकती है।

(2) रस्सी चालन या वी पट्टा चालन

यह विधि वहां प्रयोग की जाती है, जहां पट्टा चालन इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। पुली के ऊपर बने वी प्रारूपि खाचो में कई रस्सियां, जिन्हें वी पट्टे भी कहते है चलती हैं। इस विधि का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसमें स्लिप बिल्कुल नहीं होती और यह अधिक दक्ष हैं। आजकल पट्टा चालन के स्थान पर इसी का ज्यादा इस्तेमाल किया जा रहा है।

(3) जंजीर चालन

यह विधि पट्टा चालन और रस्सी चालन की अपेक्षा अधिक खर्चीलीं है, लेकिन इस चालन की दक्षता बहुत अच्छी होती है और इसमें स्लिप भी नग्नय होती है। इसके अतिरिक्त इसके द्वारा 6:1 अनुपात में गति प्राप्त की जा सकती है और उच्च गति के लिए भी यह विधि संतोषजनक है।

आवाज या ध्वनि (Noise) 

मोटर या मशीन के चयन में उसके द्वारा उत्पन्न आवाज का एक महत्वपूर्ण स्थान है। घरेलू उपयोग में आने वाले उपकरणों जैसे हेयर ड्रायर, मिक्सर, फ्रिज और पंखों आदि में तथा चिकित्सालयों और छविग्रह में प्रयोग आने वाली मशीनों में आवाज बिल्कुल नहीं होनी चाहिए। अधिक आवाज से रोगियों एवं दर्शकों को असुविधा होंगी। इसके साथ साथ औधोगिक कार्यों में इस्तेमाल होने वाली मशीनों में भी आविज न्यूनतम होनी चाहिए, अन्यथा अधिक आवाज, काम करने वालों को थका सकती है, जिससे फैकल्टी का उत्पादन घट सकता है। इसलिए यह आवश्यक है कि मोटर निर्माता ऐसी मोटरें डिजाइन करें, जिनसे कम ध्वनि ऊत्पन्न हो। 

हैलो दोस्तो हमने आज की पोस्ट में जाना है कि विधुत मोटरों के यांत्रिक अभिलक्षण उम्मीद है आपको ये लेख अच्छा लगा होगा। अगर वाकई आपको हमारी यह जानकारी अच्छी लगी है तो हमें कमेंट करके जरूर सूचित किजियेगां।

Er. Chand अक्टूबर 28, 2021
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 प्रकाश कार्यों के लिए आज कल प्रतिदिप्त ट्यूब का प्रयोग बढता जा रहा है, क्योंकि इसका वैधुत खर्च प्रति कैण्डल शक्ति बहुत कम है। यहां पर इस लेख में हम प्रतिदिप्ति ट्यूब का कार्य सिद्धान्त को समझेगे ओर जानेंगे कि इसका उपयोग कहां किया जाता है, कैसे ये काम करती है।


यह एक चार फिट तक लम्बी ट्यूब होती है जिसके अन्दर की सतह पर प्रतिदिप्ति चूर्ण या फास्फर का लेप किया जाता है। ट्यूब के अन्दर थोड़ी मात्रा में आर्गन गैस, मर्करी के साथ भरी होती है। ट्यूब के दोनों सिरों पर इलैक्ट्रोड ऊत्सर्जित करने वाले सर्पील तन्तु होते है। जो कि टंगस्टन के कुण्डलित तन्तु होते है और बेरियम और स्टान्शियम आॅक्साइड के मिश्रण से लेपित होते है। जिससे ऊत्सर्जन थोडा कम होने पर अधिक मात्रा में इलैक्ट्रोन ऊत्सर्जित हो सकें। प्रत्येक इलैक्ट्रोड के साथ दो धातु प्लेट लगी होती है जो कि तन्तु के दोनों सिरों पर लगी रहती है। यह प्लेट ऐनोड का कार्य करती है इलैक्ट्रोडों द्वारा अर्ध चक्र के दौरान, जब इलैक्ट्रोड धनात्मक होता है, उस समय यह बम्बारमैन्ट को सह सकती है। दूसरे अर्ध चक्र में निकटवर्ती गर्म तन्तु कैथोड का काम करता है और इलैक्ट्रोन ऊत्सर्जित करता है। प्रतिदिप्ति ट्यूब स्वचालित नहीं होता है इसलिए इसे स्टार्ट करने के लिए स्टार्टर की आवश्यकता होती है, इसमें दो प्रकार के स्टार्टर स्विच प्रयोग किये जाते हैं।

• ग्लो प्ररूपि स्टार्टर स्विच

• थर्मल स्टार्टर स्विच


प्रतिदिप्ति ट्यूब का कार्य सिद्धान्त



जब प्रतिदिप्ति ट्यूब के परिपथ में विधुत सप्लाई प्रदान की जाती है, तो स्टार्टर के दोनों इलैक्ट्रोडों के मध्य ग्लो विसर्जन के कारण एक लघु धारा प्रवाहित होती है। इस लघु धारा के कारण स्टार्टर के इलैक्ट्रोड की यू आकार की द्वि धातु पत्ती गर्म होकर फैलती है और दोनों इलैक्ट्रोड आपस में मिल जाते हैं अर्थात ट्यूब के तन्तु स्टार्टर परिपथ द्वारा लघुपथित हो जाते हैं। जिससे इलैक्ट्रोड के द्वारा बहुत उच्च धारा प्रवाहित होती है, जो कि इलैक्ट्रोडों को उद्दीपन कर देती है और ट्यूब की गैस आयनित हो जाती है। एक या दो सैकेंड पश्चात् स्टार्टर की द्वि धातु पत्ती खुद ही ठण्डी पढ़ जाती है और स्टार्टर का स्विच खुल जाता है और इस प्रकार धारा के एक दम घटने से चोक में 800 से 1000 वोल्ट का विधुत वाहक बल उत्पन्न हो जाता है। यह परिणामी उच्च वोल्टेज का हिल्लोल इलैक्ट्रोडों के मध्य आर्गन गैस को आयनित करने के लिए प्रर्याप्त होता है। ट्यूब में ऊत्पन्न ताप के कारण मर्करी वाष्पित हो जाती है और ट्यूब के पार्श्व में वोल्टेज घटकर 100 से 110 वोल्ट के बीच रह जाती है। यह विभवान्तर स्टार्टर में दौबारा ग्लो विसर्जन ऊत्पन्न करने के लिए पर्याप्त नहीं होता जबकि और इस प्रकार ट्यूब में सामान्य क्रिया होती रहती है।

प्रतिदिप्ति ट्यूब में चोक का काम

प्रतिदिप्ति ट्यूब में इस्तेमाल होने वाली चोक विधुत रोधी तार द्वारा पटलित लौह क्रोड पर कुण्डलित एक उच्च प्रतिघात वाली कुण्डली होती है। जिसमें प्रत्यावर्ती धारा प्रवाहित होने पर उच्च स्वं प्रेरण ऊत्पन्न होता है इसके निम्न कार्य होते है।

• यह इलैक्ट्रोड का पूर्ण तापन करता है ताकि मुक्त इलैक्ट्रोनों के प्रवाह के लिए उच्च धारा प्राप्त हो सकें।

• इलैक्ट्रोनों के मध्य आर्क को ऊत्पन्न करने के लिए यह अपेक्षाकृत अधिक वोल्टेज ( 800 से 1000 वोल्ट ) तक का हिल्लोल देता है।

• यह ट्यूब के लिए पहले से निश्चित आर्क धारा को बढ़ने से रोकता है।

क्या प्रतिदिप्ति ट्यूब को दिष्ट धारा पर प्रयोग किया जा सकता है?

उत्तर- प्रतिदिप्ति ट्यूब मौलिक रूप से एक प्रत्यावर्ती धारा लैम्प है, लेकिन फिर भी इसको डी सी सप्लाई पर उपयोग किया जा सकता है। यदि ए सी सप्लाई उपलब्ध न हो, तब इसको डी सी धारा पर प्रयोग किया जाता है और वोल्टेज का शीखर मान प्राप्त न होने के कारण लैम्प स्टार्टिंग में प्रत्यावर्ती धारा की अपेक्षा बहुत कठिनाई आती है और इसके लिए विशेष स्टार्टिंग युक्तियां प्रयोग की जाती है। चोक की जगह, चोक के सीरीज में एक प्रतिरोध लगाना पड़ता है और मैनुअल प्रतिवर्ती स्विच भी लगाना पड़ता है। 

जब प्रतिदिप्ति ट्यूब को दिष्ट धारा पर प्रयोग किया जाता है, तब इसका एक सिरा कुछ घंटे जलने से बाद मन्द हो जाता है। इसका कारण इलैक्ट्रोनों का एक दिशा में क्रियाशील होना है। कुछ समय बाद विशेष प्रतिवर्ती स्विच द्वारा धारा प्रवाह की दिशा बदल कर ( दिन में एक बार या जब आवश्यक समझे ) ट्यूब के सिरों को मन्द होने से बचाया जा सकता है।

अगर आपको हमारी यह पोस्ट प्रतिदिप्ति ट्यूब का कार्य सिद्धान्त अच्छी लगी है तो आप कमेंट करके बता सकते है कि किसी दूसरे टोपीक पर पोस्ट चाहिए तो comment box में कमेंट करके जरूर बताइए।
Er. Chand अक्टूबर 25, 2021
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 इलेक्ट्रिक वेल्डिंग क्या है

वेल्डन शब्द का मतलब किन्हीं दो लौहे के टुकड़ों को साथ साथ रखकर उन्हें उनके गलन बिन्दु तक गर्म करके जोड़ने से है। इलेक्ट्रिक वेल्डिंग क्या हैं? में दो वस्तुओं को आपस में जोड़ने के लिए आवश्यक तापमान विधुत धारा के द्वारा उत्पन्न किया जाता है। बोल्ट के जोड़ों की अपेक्षा वेल्डन जोड़ अधिक मजबूत होते है, इसलिए आजकल इंजिनियरी में वैधुत वैल्डिंग का अधिक प्रयोग किया जा रहा है आज के इस समय में कई प्रकार की वैल्डन का उपयोग जैसे प्रतिरोध वैल्डिंग और आर्क वैल्डिंग का बहुत ज्यादा इस्तेमाल किया जा रहा है यहां पर वैल्डिंग और वेल्डन के प्रकार के बारे में अच्छे से पढ़ेंगे।


             resistance welding in hindi

प्रतिरोध वैल्डिंग (Resistance welding)

जैसा कि इस वेल्डन के नाम से ही पता चल रहा है कि यहां पर वैल्डिंग के लिए आवश्यक ताप, उच्च प्रतिरोध और उच्च धारा के द्वारा विकसित किया जाता है। इस प्रकार प्रतिरोध वेल्डन में उच्च धारा को, जोड़े जाने वाले भागों से प्रवाहित किया जाता है जोड़ और धातु का प्रतिरोध, गलन और वैल्डिंग प्रचालन के लिए पर्याप्त ताप उत्पन्न करता है।

वैधुत वेल्डन में 2 से 10 वोल्ट तक की वोल्टेज आवश्यक होती है जिसका मान वेल्डन क्षेत्र और वेल्डन किए जाने वाली धातु के टुकड़ों की मोटाई पर निर्भर करता है। प्रतिरोध वैल्डिंग के लिए प्रत्यावर्ती धारा बहुत उपयुक्त होती है क्योंकि ट्रांसफॉर्मर द्वारि आवश्यक धारा और वोल्टेज प्राप्त की जा सकती है। प्रतिरोध इलेक्ट्रिक वेल्डिंग भी कई प्रकार की होती है जिनका वर्णन नीचे किया गया है।

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(1) बट या टक्कर वेल्डन (Butt welding) 

बट वेल्डन के भी दो प्रकार होते है, जिसमें पहली स्थुल टक्कर वेल्डन और दूसरा चमक टक्कर वेल्डन है 
स्थूल टक्कर वेल्डन इस विधि में जोड़ें जाने वाले भागों को के सिरों को आपस में जोड़ा जाता है। इसमें धातु के दो टुकड़ों के जोड़े जाने वाले सिरों को आमने-सामने मिलाकर वैल्डिंग मशींन से क्लैम्प इलैक्ट्रोडों में कस दिया जाता है। एक इलैक्ट्रोड फिक्स होता है और दूसरा मूवेबल होता है। इलैक्ट्रोड में विधुत धारा प्रवाहित करने पर धातु सिरों का तापमान गलन बिन्दु तक पहुंच जाता है, इस स्थिति में चल इलैक्ट्रोड की ओर से यांत्रिक दाब दिया जाता है, जिससे थोड़े समय में ही दोनों सिरे आपस में वेल्ड हो जाते है।
चमक टक्कर वेल्डन- इस वैल्डिंग में धारा प्रवाहित करने के बाद दोनों धातु सिरों को धीरे धीरे नजदीक लाया जाता है। जैसे ही धातु के सिरे एक दूसरे के पास पहुंचते है तो दोनों सिरों के बीच एक आर्क उत्पन्न होता है, जिसके कारण सिरों का तापमान गलन बिन्दु तक पहुंच जाता है तो चल इलैक्ट्रोड की ओर से यांत्रिक दाब दिया जाता है और सप्लाई को बन्द कर दिया जाता है इस प्रकार दोनों धातु आपस में जुड़ जाती है। 

                 
                 spot welding in hindi

(2) बिन्दु वेल्डन (spot welding) 

धातुओं की चादरों को जोड़ने के लिए स्पाॅट या बिन्दु वेल्डन का प्रयोग किया जाता है। इस प्रकार के जोड़ केवल यांत्रिक मजबूती प्रदान करते है यह पानी वाले स्थानों या वायु रोधक नहीं होते है। इस इलेक्ट्रिक वेल्डिंग में धातु चादरों को एक के ऊपर एक, इलैक्ट्रोड के मध्य रखा जाता है और धारा के प्रवाह के बाद गति करने वाली इलैक्ट्रोड के द्वारा यांत्रिक दाब दिया जाता है, जिससे दोनों धातु चादरों के मध्य धारा प्रवाह और सम्पर्क प्रतिरोध के कारण अधिक ताप ऊत्पन्न होता है, जिससे दोनों चादरे सम्पर्क बिन्दु पर पिघल कर जुड़ जाती है।

आर्क वैल्डिंग (Arc welding) 

आर्क वैल्डिंग में यांत्रिक दाब की जरूरत नहीं होती है, इसमें इलैक्ट्रोड और धातु के बीच में आर्क उत्पन्न किया जाता है, जिससे आर्क की गर्मी से धातु पीघल जाती है। आर्क वेल्डन में 3500 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान की आवश्यकता होती है इस ताप पर धातुओं के गलन में किसी यांत्रिक दाब की आवश्यकता नहीं रहती। आर्क ऋणात्मक प्रतिरोध रिजन रखता है या यह कह सकते है कि धारा बढ़ने से आर्क प्रतिरोध घटता है और प्रतिरोध घटने से धारा बढ़ती है। जिससे आर्क एक समान नहीं रहता है।
आर्क वैल्डिंग में प्रत्यावर्ती धारा और दिष्ट धारा दोनों का प्रयोग किया जा सकता है। आर्क ऊत्पन्न करने के लिए प्रत्यावर्ती धारा सप्लाई के 70 से 💯 वोल्ट तक और डी सी सप्लाई के 50 से 60 वोल्ट तक तथा धारा 30 से 600 एम्पियर तक हो सकती है। एक बार आर्क उत्पन्न हो जाने पर उसको बनाएं रखने के लिए 20 से 30 वोल्ट काफी होते है।

इस अध्याय में हमने इलेक्ट्रिक वेल्डिंग क्या है और यह कितने प्रकार की होती है, कहां कहां इसको प्रयोग किया जाता है और आज के समय में इसका उपयोग कहां किया जा रहा है यह जाना है पोस्ट में अगर कोई गलती या कुछ छूट गया है तो आप कमेंट करके जरूर बताइए जिससे कि हम अपनी गलती को सुधार सकें।


Er. Chand अक्टूबर 03, 2021
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             एल ई डी क्या होता है

एल ई डी का पूरा नाम प्रकाश उत्सर्जक डायोड होता है। एल ई डी एक ऐसा बल्ब होता है जो बहुत कम विधुत लेकर ज्यादा प्रकाश उत्सर्जित करता है। आज एल ई डी का बहुत ज्यादा प्रयोग किया जा रहा है। आज हम एल ई डी के बारे में बात करेंगे। इसके काम करने का तरीका,इसको किस कम्पंनी के द्वारा बनाया गया और इसके उपयोग करने के क्या लाभ है तो हम इसके बारे में नीचे पढ़ेंगे। 


आदर्श इन्डीकेटर एल०इ०डी 30 से 60 मिली वाट विधुत शक्ती व्यय पर डिजाइन किया गया लगभग सन् 1999 में फिलिप्स लुमिलेडस ने 1 वाट पर निरन्तर प्रचालित करने वाली एल०इ०डी से परिचय कराया

एल०इ०डी का मुख्य लाभ यह है कि इसकी दक्षता सी०एफ०एल की अपेक्षा काफी अधिक है सन् 2002 में फिलिप्स लुमिलेडस ने तीव्र सफेद प्रकाश उत्पन्न करने वाले 5 वाट एल०इ०डी लैम्ब का निर्माण किया जिसकी ल्युमिनेन्श दक्षता 18 से 22 लुमेन्श प्रति वाट है 

इस लैम्प की तुलना फिलामेंट 60-100 वाट लैम्प से की जा सकती हैं जबकि फिलामेंट लैम्प 15 ल्युमन प्रति वाट का प्रकाश उत्सर्जित करता है

एल०इ०डी में मुख्य दोष यह है कि इसकेे आर पार वोल्टेज बढ़ने पर इसकी विधुत धारा के बढ़ने पर इसकी दक्षता तीव्रत्रा से घटती है


           LED के लाभ(Advantage of LED )

इस वाले भाग में में आपको बताउंगा कि एल ई डी का प्रयोग करने से क्या लाभ होता है। इसकी दक्षता कम होती है या ज्यादा,इसके प्रकाश का रगं केया हमारे लिए लाभदायक है या नहीं, इसका आकार कैसा होता है इसको लगाने में कोई दिक्कत तो नहीं और ये कितना समय बन्द और चालू होने में, इन्ही सब बिन्दुओं पर इस भाग में बात करेंगे।

(1) दक्षता Efficiency

एल०इ०डी फिलामेंट लैम्प के सापेक्ष अधिक प्रकाश उत्सर्जित करता है इसकी दक्षता सी०एफ०एल के समान इसका आकार एवं आकृति बदलने से प्रभावी नहीं होती ।

(2) प्रकाश का रगं colour of light

एल०इ०डी बिना कलर स्क्रीन प्रयोग किये ही इच्छित रंग का प्रकाश उत्सर्जित कर सकती हैं ।

(3) LED का आकार size of LED 

LED का आकार 2mm square से भी कम हो सकता है इसलिए इसका उपयोग प्रचार हेतु रनिगं डिस्प्लै बोर्ड पर किया जाता है डिस्प्ले बोर्ड का आकार प्रचार हेतु उपयोग किये जाने वाले शब्दों की संख्या पर निर्भर करता है ।

(4) ऑन ऑफ समय ON/OF Time

LED बहुत शीघ्र ही प्रकाशित हो जाती है यह 1 माइक्रो सेकेंड से कम समय में पूर्ण प्रकाश उत्सर्जित करता है LED का उपयोग संचार परिपथ में किया जाता है

(5) LED का मन्द होना Dimming of light

LED का प्रकाश बहुत सूक्ष्म समय में मन्द हो जाता हैं इसका प्रकाश फारवर्ड धारा के घटने पर मन्द हो जाता हैं ।

(6) जीवन काल Life Time

LED का जीवन काल बहुत लम्बा होता हैं अनुमान के अनुसार 10,000 से 15,000 घण्टों तक होता हैं ।

(7) झटको के प्रति प्रतिरोध Resistance against Shock

LED सोलिड स्टेट घटक (component) है इसलिए इस पर झटको का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है ।




   LED की हानियां ( Disadvantages of LED )

यहां पर एल ई डी की हानियों के बारे में बात करेंगे। कुछ चीजें ऐसी होती है एल ई डी के अन्दर जो इसकी कमजोरी को बताती है। जैसे एल ई डी की शुरुआती किमत बहुत ही ज्यादा होती है। इसकी शुरुआती किमत एक तन्तु बल्ब से लगभग 10 गुना ज्यादा होती है। इसलिए इसकी शुरुआती किमत ज्यादा होने से कुछ लोग एल ई डी का प्रयोग कम करते है। और भी इसकी ऐसी बहुत सी कमजोरियां है जिनको में आपको नीचे फुर्सत से बता रहा हूं।

(1) तापमान निर्भरता ( Temperature dependence )

LED का प्रदर्शन वातावरण के तापमान पर निर्भर करता है वातावरण के उच्च तापमान पर जब LED परिचालित होती है तब LED पैकेज का बह्म आवरण अधिक गरम हो जाता हैं जिससे LED कमजोर हो जाती हैं जिससे इसका जीवन काल तीव्रता से घटता है ।

(2) वोल्टेज सुग्राहिता (Voltage Sensitivity ) 

LED को न्यूनतम वोल्टेज से अधिक अधिक वोल्टेज प्रयुक्त किए जाने चाहिए जिससे कि उसकी धारा निर्धारित धारा से कम नहीं होने पाएं। इस समस्या के समाधान के लिए धारा नियंत्रित पावर सप्लाई प्रयुक्त की जानी चाहिए, जिससे कि LED की प्रकाश तिव्रता एक समान बनी रहे ।

(3) उच्च प्रारंभिक मूल्य ( High initial price ) 

प्रारम्भिक मूल्य के आधार पर LED का मूल्य अन्य प्रकाश तकनीकों की अपेक्षा प्रति ल्यूमेन अधिक महंगा है ।
Er. Chand जून 30, 2021
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                      विधुत ऊर्जा के स्रोत 

विधुत ऊर्जा के स्त्रोत उन्हें कहते है जिनके द्वारा विधुत ऊर्जा को उत्पन्न किया जाता है। आज की इस भाग दौड़ की ज़िन्दगी में विधुत ऊर्जा का उपयोग बहुत अधिक बढ़ गया है आज के इस युग में हर चीज विधुत ऊर्जा से ही चलती है जेसे विधुत मोटर, विधुत प्रेस, विधुत मशीन, कम्प्यूटर, मोबाइल फोन भी विधुत ऊर्जा से ही चार्ज होता है, और हमारी बड़ी बड़ी कम्पनियां जो चल रही है उनमें विधुत ऊर्जा के द्वारा ही काम किया जा रहा है। इस प्रकार विधुत ऊर्जा का हमारे दैनिक जीवन में विशेष योगदान है इसके जो प्रमुख स्त्रोत है उनके बारे में नीचे बता रहा हूं।

(1) विधुत सेल 

इसमें विभिन्न रासायनिक क्रियाओं के द्वारा रासायनिक ऊर्जा विधुत ऊर्जा में परिवर्तित  होती है जैसे वोल्टीय सेल, लेक्लांशी सेल, शुष्क सेल, डेनियल सेल,सीसा संचायक सेल आदि।

(2) विधुत जनित्र

विधुत जेनरेटर एक ऐसा यन्त्र है जिसके द्वारा हम विधुत ऊर्जा को उत्पन्न करते हैं। विधुत जेनरेटर से विधुत ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए एक कुण्डली को हम चुम्बकीय क्षेत्र में रखते है फिर हम विधुत जेनरेटर को हाथ से ही घुमाते हैं। तों इसमें एक विधुत वाहक बल उत्पन्न होता है जिसके कारण इस कुण्डली में विधुत धारा बहने लगती हैं। ओर इस कुण्डली पर एक टाॅर्क भी लगने लगता है इस प्रकार विधुत जेनरेटर द्वारा उत्पन्न की गई यांत्रिक ऊर्जा विधुत ऊर्जा में बदल जाती हैं।

जब बन्द कुण्डली को चुम्बकीय क्षेत्र में घुमाया जाता है तो विधुत चुम्बकीय प्रेरण के कारण कुण्डली को घुमाने में व्यय यांत्रिक ऊर्जा विधुत ऊर्जा में बदल जाती है।

(3) ताप युग्म 

जब दो भिन्न धातुओं जैसे एंटीमनी वह बिस्मत की छड़ों को सिरों पर जोड़कर एक बन्द परिपथ बनाते हैं और दोनों सन्धीयो को भिन्न भिन्न ताप पर रखते हैं तो परिपथ में एक विधुत वाहक बल उत्पन्न हो जाता है और धारा प्रवाहित होने लगती है। इस युग्म को ताप युग्म कहते हैं।

(4)प्रकाश विधुत सेल 



प्रकाश ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदलने की युक्ती प्रकाश विधुत सेल कहलाती है जब पराबैंगनी प्रकाश को पोटेशियम या सीजियम धातु पर डाला जाता है तो धातु के प्रष्ट से इलैक्टोन उत्सर्जित होते हैं इस प्रकार प्रकाश ऊर्जा विधुत ऊर्जा में परिवर्तित होती है। अन्तरिक्ष यान,कर्त्रिम उपग्रह में प्रयुक्त सोर बैटरी इसी सिद्धांत पर कार्य करती है। 
Er. Chand जून 27, 2021
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