Results for AC Machine

 हैलो एवरी वन स्वागत है आप सब का हमारे इलैक्ट्रिकल टिप्स ब्लोग में आज का हमारा टोपिक है थ्री फेज सिंक्रोनस मोटर का बेसिक सिध्दांत क्या होता है। इस मोटर का सिध्दांत सेम डी सी मोटर के समान ही होता है लेकिन इनमें फर्क सिर्फ इतना होता है डी सी मोटर में हम डी सी सप्लाई का प्रयोग करते है और सिंक्रोनस मोटर में हम ए सी सप्लाई का इस्तेमाल करते है। सिंक्रोनस मोटर दो प्रकार की होती है एक सिंगल फेज सिंक्रोनस मोटर और दूसरी थ्री फेज सिंक्रोनस मोटर। सिंगल फेज सिंक्रोनस मोटर स्पेशल मशींन मोटर में आती है इसलिए हम यहां सिर्फ थ्री फेज सिंक्रोनस मोटर के बारे में पढ़ेंगे।


थ्री फेज सिंक्रोनस मोटर क्या होती है

थ्री फेज सिंक्रोनस मोटर एक ऐसी मोटर होती है जो सिर्फ सिंक्रोनस स्पीड पर ही चलती है इसलिए इस मोटर को सिंक्रोनस मोटर नाम दिया गया है। इस मोटर के अन्दर दूसरी मोटरों की तरह दो मेन पार्ट होते है एक होता है स्टेटर यह मशीन का स्थिर रहने वाला भाग होता है जो एक स्थान पर रूका रहता है इसे शुद्ध हिंदी में स्थाता कहते है। दूसरा भाग मेन भाग रोटर होता है जैसा कि हमने दूसरी मोटरों में भी पढ़ा है रोटर मशीन का एक घूमने वाला भाग होता है जो मोटर के अन्दर रोटेट करता है।

इस मोटर के स्टेटर पर थ्री फेज वाइंडिंग होती है जो एक दूसरे से 120 डिग्री इलैक्ट्रिकली अपार्ट होती है चूंकि यह एक सिंक्रोनस मोटर है इसलिए यह सिंक्रोनस स्पीड पर ही रन करती है जिसकी गति Ns = 120f/p सूत्र द्वारा निकाली जा सकती है इस सूत्र में Ns का मतलब है सिंक्रोनस स्पीड, f का मतलब है सप्लाई फ्रिक्वेंसी और p मोटर को डिजाइन करते वक्त उसके रोटर पर बनाये गयें पोलो की संख्या होती है। इस सूत्र का उपयोग करके थ्री फेज सिंक्रोनस मोटर की सिंक्रोनस स्पीड को आसानी से निकाला जा सकता है।

इस मोटर के स्टेटर में थ्री फेज वाइंडिंग में थ्री फेज सप्लाई दी जाती है इसकी तीनों वाइंडिंग से एक एक फेज कनैक्ट हो जाता है इसके रोटर को परमानेंट मैगनेट बनाना होता है ताकि रोटर स्टेटर के मैगनेटिक फील्ड के साथ लोक होकर सिंक्रोनस स्पीड पर रोटेट करें। इसलिए मोटर की साफ्ट पर एक डी सी शंट जेनरेटर को परमानेंटली लगा दिया जाता है और इससे थ्री फेज सिंक्रोनस मोटर के रोटर की वाइंडिंग को सप्लाई दी जाती है ताकी वह एक स्थायी चुंबक की तरह व्यवहार करें और मोटर सिंक्रोनस स्पीड पर रन करने लगें।

थ्री फेज सिंक्रोनस मोटर का बेसिक सिध्दांत

Three phase Synchronous motor basic concepts


जैसा इस फोटो में दिखाया गया है इसी के बेस पर हम थ्री फेज सिंक्रोनस मोटर के बेसिक सिध्दांत को समझेंगे।
मान लीजिए यह हमारा एक स्टेटर है बेसिकली स्टेटर को हम एक वृत से दर्शातें है यह मोटर का एक स्थिर भाग होता है और इसके ऊपर थ्री फेज वाइंडिंग की जाती है। इन वाइंडिंग के तीन पोइंट होते है जिनमें सप्लाई कनैक्ट की जाती है और इनके बीच में एक सैलियंट पोल रोटर होता है। अब देखिए इस मोटर में होता क्या है जैसे ही हम स्टेटर की थ्री फेज वाइंडिंग को थ्री फेज सप्लाई देते है तो इस मोटर के स्टेटर में एक थ्री फेज रोटेटिंग मेग्नेटिक फील्ड ऊत्पन्न हो जाता है जो सिंक्रोनस स्पीड पर रोटेट करता है। अब इस स्टेटर के अन्दर हमारा रोटर होता है जो एक पर्मानैंट मेग्नेट की तरह वर्क करता है। तो इसके बाद होता क्या है रोटर के जिस पोल पर नाॅर्थ पोल बनता है वह स्टेटर के मैगनेटिक फील्ड के साउथ पोल के साथ मैगनेटिक लोकिंग बना लेता है और इसी प्रकार रोटर का साउथ पोल स्टेटर के मैगनेटिक फील्ड के नार्थ पोल के साथ मैगनेटिक लोकिंग बना लेता है इस तरह से रोटर भी सिंक्रोनस स्पीड पर घूमने लगता है इसी कारण इस मोटर को सिंक्रोनस मोटर कहते हैं।

रोटर को परमानेंट मैगनेट कैसे बनाते है

जैसा कि हमने अभी देखा है कि सिंक्रोनस मोटर में रोटर एक स्थायी चुंबक की तरह व्यवहार करता है तो अब हम यह देखेंगे कि इसको परमानेंट मैगनेट कैसे बनाते है सबसे पहले किसी भी लौहे की छड़ को चुंबक बनाने के लिए उस पर तांबे के तार की वाइंडिंग लपेटी जाती है और उसमें करंट को प्रवाहित किया जाता है जिससे वह छड़ विधुत चुंबक बन जाती है तो इस मोटर के रोटर को परमानेंट मैगनेट बनाने के लिए हम क्या करते है। इसके रोटर की वाइंडिंग को एक डी सी शंट जेनरेटर से जोड़ देते है जिससे वाइंडिंग में एक करंट फ्लो होने लगती है और रोटर के एक पोल प नाॅर्थ और दूसरे पर साउथ पोल बनता है डी सी सप्लाई होने के कारण यह पोल चेंज नहीं होते है यानी जिस तरह रोटर पर साउथ पोल बनता है वह साउथ ही रहता है और जिस तरह नाॅर्थ पोल बनता है वह नाॅर्थ ही रहता है इस प्रकार थ्री फेज सिंक्रोनस मोटर में रोटर एक परमानेंट मैगनेट बन जाता है।

थ्री फेज सिंक्रोनस मोटर की स्टार्टिंग

थ्री फेज सिंक्रोनस मोटर के रोटर की वाइंडिंग से एक डी सी शंट जेनरेटर जुड़ा रहता है अब जैसे ही स्टेटर में थ्री फेज सप्लाई दी जाती है तो स्टेटर में एक थ्री फेज रोटेटिंग मेग्नेटिक फील्ड इंड्यूज हो जाता है लेकिन स्टार्टिंग में रोटर रुका हुआ होता है जिसके कारण रोटर वाइंडिंग से कनैक्ट जेनरेटर में भी कोई वोल्टेज नहीं बनती है तो इस मोटर को सेल्फ स्टाॅर्ट बनाने के लिए इसकेे अन्दर एक अलग से स्कारल केज बार इंसर्ट की जाती है। जिससे यह मोटर एक इंडक्शन मोटर की तरह सेल्फ स्टाॅर्ट होती है लेकिन इंडक्शन मोटर कभी भी सिंक्रोनस स्पीड पर नहीं चलती है यह सिंक्रोनस गति से थोड़ी कम गति पर चलती है तो देखते है कि कैसे यह मोटर सिंक्रोनस स्पीड पर घूमती है।

तो देखिए क्या होता है जैसे ही इसकी स्टेटर वाइंडिंग में सप्लाई दी जाती है उसमें मैगनेटिक फील्ड बनता है अब फैराडे लाॅ के द्वारा जो हमने स्काइरल केज बार इंसर्ट की थी उनमें एक इ एम एफ इंड्यूज होता है जिससे केज बार में भी एक मैगनेटिक फील्ड बन जाता है जिसकी दिशा स्टेटर फील्ड की ओर होती है इस तरह से रोटर भी घूमने लगता है और उससे जुड़ा जेनरेटर भी घूमने लगता है इसके घूमते ही इसमें एक वोल्टेज उत्पन्न हो जाती है जिसके कारण रोटर वाइंडिंग में एक करंट फ्लो होती है और रोटर एक परमानेंट मैगनेट बन जाता है इस तरह रोटर, स्टेटर के मैगनेटिक फील्ड से मैगनेटिक लोकिंग करके सिंक्रोनस स्पीड पर घूमने लगता है।




Er. Chand दिसंबर 08, 2021
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 सिंगल फेज इंडक्शन मोटर प्रश्र उतर

प्रशन-1 सिंगल फेज इंडक्शन मोटर का शक्ति गुणांक कम क्यों होता है ?

उत्तर- अधिक मेग्नैटायजिंग करंट के कारण, सिंगल फेज इंडक्शन मोटर का शक्ति गुणांक कम होता है।

प्र-2 थ्री फेज इंडक्शन मोटर की अपेक्षा, सिंगल फेज इंडक्शन मोटर चलते समय अधिक ध्वनि ऊत्पन्न क्यों करती है ?

उत्तर- सिंगल फेज की पल्सेटिंग सप्लाई वोल्टेज से ऊत्पन्न टाॅर्क द्वारा सतत स्थिर यांत्रिक शक्ति प्रदान करने के कारण, चलतें समय अधिक शोरगुल करती है।
थ्री फेज मोटर मे थ्री फेज घूर्णी चुम्बकीय क्षेत्र ऊत्पन्न होता है, जिससे लगातार एक समान बलाघूर्ण ऊत्पन्न होता है इसलिए यह चलते हुए कम आवाज करती है।

प्र-3 आप किसी विभक्त कला एकल कला प्रेरण मोटर के घूमने की दिशा को किस प्रकार परिवर्तित करेंगे या विपरीत करेंगे ?

एकल कला प्रेरण मोटर के स्टेटर पर स्थापित दोनों वाइंडिंगों (मुख्य वाइंडिंग या सहायक वाइंडिंग) में से किसी एक सिरों की ध्रुवता को आपस में बदलकर, मोटर के घूमने की दिशा परिवर्तित करेंगे।

प्र-4 क्या छादित चुम्बकीय ध्रुव प्ररूपि सिंगल फेज इंडक्शन मोटर के घूमने की दिशा को बदला जा सकता है ?

इस मोटर की दिशा को नहीं बदला जा सकता है क्योंकि इसमें इस प्रकार का कोई जुगाड नहीं होता है।

प्र-5 छादित पोल प्ररूपि इंडक्शन मोटर किस दिशा में घुमती है ?

यह मोटर छादित यानी शेडेड पोल से अन शेडेड पोल की ओर घूमती है।

प्र-6 सिंगल फेज इंडक्शन मोटर की कहां जरूरत होती है ?

इस मोटर की काफी सारी स्थानों पर जरूरत पड़ती है जैसे-
• जहां पर एक अश्व शक्ति से कम रेटिंग हो
• छोटे आकार के पोर्टेबल उपकरणों को चलाने में
• और जहां थ्री फेज सप्लाई उपलब्ध न हो।
• कुछ ऐसी जगहों पर भी जहां दक्षता का अधिक महत्व न हों।

प्र-7 उधौगों में कौनसी मोटर सबसे अधिक उपयोग की जाती है और क्यों ?

• आज के समय में पूरी दुनिया के अन्दर ए सी स्काइरल केज रोटर टाइप इंडक्शन मोटर सबसे ज्यादा प्रयोग की जाती है क्योंकि इसमें दूसरी मोटरों की अपेक्षा बहुत सारे अच्छे गुण होते हैं।
• इसकी संरचना बहुत ही आसान होती है।
• यह एक सेल्फ स्टाॅर्ट मोटर होती है।
• इसमें ऊत्पन्न बलाघूर्ण शुटेबल होता है।
• यह मोटर सर्पि वलय और ब्रश से मुक्त होती है।
• बाजार में आसानी से मिल जाती है।

प्र-8 आवासीय कार्यों में कौनसी मोटर सर्वाधिक प्रयोग की जाती है और क्यों ?

आजकल सम्पूर्ण विश्व के अन्दर घरेलू कामों में परमानेंट केपेसिटर सिंगल फेज इंडक्शन मोटर बहुत अधिक प्रयोग होती है क्योंकि इस मोटर के अन्दर काफी सारे शुभ गुण होते हैं।
• आकार में सुविधाजनक
• संरचना में सादी
• स्वचालित और स्वप्रवर्तित
• उच्च बलाघूर्ण वाली
• अनुरक्षण और मरम्मत किमत बहुत कम
• बाजार से कम किमत पर सुगमता से उपलब्ध
• स्लिप रिगं और ब्रश लेस

प्र-9 संधारित्र प्ररूपि सिंगल फेज इंडक्शन मोटर में विकसित टाॅर्क अधिक क्यों होता है ?

• चूंकि स्टेटर पर स्थापित मुख्य कुण्डलन की धारा और सहायक वाइंडिंग की धारा के बीच का कोण अधिक होता है, इसलिए मोटर में बनने वाला बलाघूर्ण भी अधिक होता है।

प्र-10 उच्च आरम्भिक बलाघूर्ण के कार्यों में रिपल्शन इंडक्शन मोटर की अपेक्षा, कैपेसिटर इंडक्शन मोटर को अधिक पसंद क्यों किया जाता है ?

• इसका मेन रिजन यह है कि संधारित्र इंडक्शन मोटर की अपेक्षा, रिपल्शन इंडक्शन मोटर की प्रारंभिक लागत अधिक साथ साथ इसकी अनुरक्षण और मरम्मत की लागत भी अधिक होती है, क्योंकि इस मोटर के अन्दर कम्यूटेटर और ब्रश होते है जिससे इसकी कीमत बढ़ जाती है। इसलिए रिपल्शन मोटर को कम और कैपेसिटर मोटर को अधिक पसंद किया जाता है।

प्र-11 सिंगल फेज इंडक्शन मोटर में सहायक वाइंडिंग का क्या काम होता है ?

इस वाइंडिंग का प्रमुख काम, मोटर की शुरुआत के समय में मुख्य वाइंडिंग के साथ मिलकर, रोटेटिंग मेग्नेटिक फील्ड ऊत्पन्न करना होता है ताकि रोटर पर बलाघूर्ण लागू हो सकें। जब मोटर की स्पीड सिंक्रोनस स्पीड की सत्तर प्रतिशत तक पहुंच जाती है, तब इस वाइंडिंग को अपकेन्द्री स्विच द्वारा अलग कर दिया जाता है।

प्र-12 क्या होगा यदि एकल कला प्रेरण मोटर में लगा अपकेन्द्री स्विच खुलने में असफल हो जायें ?

• ऐसा होने पर मोटर के स्टेटर पर लगी सहायक वाइंडिंग जलकर राख हो जायेंगी, क्योंकि इस वाइंडिंग की प्रतिबाधा बहुत कम होता है जिससे इसमें बहुत अधिक धारा बहेगी और ये जलकर नष्ट हो जाती है।

प्र-13 प्रतिरोध स्टार्ट स्पिलिट फेज इंडक्शन मोटर में विशेष कमी क्या है ?

इस मोटर में सहायक वाइंडिंग पतले तारों और कम टर्न की होती है यानी मेन वाइंडिंग की अपेक्षा इसका प्रतिरोध अधिक होता है, इसलिए इसमें धारा घनत्व उच्च होता है। जिसके कारण यह बहुत जल्दी गर्म हो जाती है। यदि यह मोटर स्टार्ट होने में पांच सेकेंड से ज्यादा समय लेती है, तो इस मोटर की आरम्भिक कुण्डलन या सहायक वाइंडिंग जल कर नष्ट हो जाती है।
सिंगल फेज इंडक्शन मोटर प्रश्र उतर

प्र-14 प्रतिरोध विभक्त कला प्ररूपि प्रेरण मोटर में उत्पन्न आरम्भिक बलाघूर्ण न्यून क्यों होता है ?

• चूंकि प्रतिरोध विभक्त कला इंडक्शन मोटर में स्टेटर पर स्थापित मुख्य कुण्डलन की धारा और सहायक वाइंडिंग की धारा के बीच का कोण बहुत कम होता है, इसलिए इस मोटर में ऊत्पन्न होने वाला स्टार्टिंग टाॅर्क भी कम होता है।

प्र-15 क्या विधुत सप्लाई सिरों की पोलैरिटी को परस्पर बदलकर किसी भी सिंगल फेज इंडक्शन मोटर के घूमने की दिशा को बदला जा सकता है ?

• नहीं बदला जा सकता, क्योंकि ऐसा करने से स्टेटर पर लगी दोनों वाइंडिंग के टर्मिनल की ध्रुवता बदल जाती है, जबकि मोटर के घूमने की दिशा को बदलने के लिए केवल दोनों में से एक कुण्डली के सिरों की ध्रुवता आपस में परिवर्तित होनी चाहिए।

प्र-16 स्थैतिक चुम्बकीय क्षेत्र, स्पन्दनीय चुंबकीय क्षेत्र और रोटेटिंग मेग्नेटिक फील्ड में क्या अंतर है ?

डी सी सप्लाई के कारण ऊत्पन्न होने वाला चुंबकीय क्षेत्र, स्थैतिक चुंबकीय क्षेत्र कहलाता है। इसमें वाइंडिंग के सिरों पर निर्मित पोलेरिटी एक समान रहती है। सिंगल फेज ए सी सप्लाई के द्वारा ऊत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र, पल्सेटिंग मैगनेटिक फील्ड कहलाता है इसमें वाइंडिंग के सिरों की ध्रुवता समय के साथ बदलती रहती है और थ्री फेज सप्लाई से ऊत्पन्न क्षेत्र, घूर्णी चुम्बकीय क्षेत्र होता है जो सिंक्रोनस स्पीड पर घूमता है जिसकी गति का पता लगाने के लिए निम्न सूत्र का उपयोग किया जाता है।
 
           Ns = 120f/p.  r.p.m



Er. Chand नवंबर 17, 2021
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 कैपेसिटर स्टार्ट इंडक्शन मोटर (capacitor start induction motor)

कैपेसिटर स्टार्ट इंडक्शन मोटर एक ऐसी मोटर होती है जिसमें प्रतिरोध के स्थान पर स्टेटर की स्टार्टिंग वाइंडिंग के श्रेणी में अपकेन्द्री स्विच के साथ स्टार्टिंग कैपेसिटर जुड़ा रहता है, इसलिए इसे कैपेसिटर स्टार्ट इंडक्शन मोटर कहते हैं। इस मोटर के स्टेटर के सहायक परिपथ में जुड़े आरम्भिक संधारित्र के कारण ही इसमें फेज विभाजन स्थापित होता है, जो मेन सर्किट की मेन वाइंडिंग करंट और सहायक सर्किट की स्टार्टिंग वाइंडिंग करंट में फेज डिफरेंस ऊत्पन्न कर देता है, जिससे मोटर में रोटेटिंग मेग्नेटिक फील्ड ऊत्पन्न हो जाता है, जो मोटर के रोटर पर आरम्भिक टाॅर्क लागू करता है और रोटर घूमने लगता है। तुरन्त बाद ही रोटर की गति के कारण, उत्पादित अपकेन्द्री बल से अपकेन्द्री स्विच प्रचालित होकर, स्टेटर के सहायक परिपथ को अलग कर देता है और मुख्य परिपथ ज्यों का त्यों कायम रहने के कारण मोटर लगातार चलती रहती है।
कैपेसिटर-स्टार्ट-इंडक्शन-मोटर


यदि कैपेसिटर स्टार्ट इंडक्शन मोटर में सेंट्रिफ्यूगल स्विच का उपयोग न किया जाए, तो सहायक परिपथ मोटर की घूमने की अवस्था में भी कनैक्ट रहेगा। ऐसी अवस्था में वह स्थायी संधारित्र प्ररूपि इंडक्शन मोटर कहलायेगी, जिसका प्रयोग आजकल छत के पंखों में होता है।

कैपेसिटर स्टार्ट इंडक्शन मोटर के सामान्य गुणधर्म

• साइज या क्षमता - 1/8 hp से 1 hp तक
• स्टाॅर्टिंग टाॅर्क - उच्च होता है
• आरम्भिक धारा - पूर्ण भार धारा की दो गुनी
• आरम्भिक अवस्था - सेल्फ स्टाॅर्ट
• गति या चाल - स्थिर यानी एक समान गति
• गति नियंत्रण - एक मात्र वोल्टेज नियंत्रण द्वारा
• शक्ति गुणांक - उच्च 0.7 से 0.9 तक, हमेशा पश्चगामी
• अनुरक्षण किमत - बहुत कम
कैपेसिटर स्टार्ट इंडक्शन मोटर का आरंभिक बलाघूर्ण प्रतिरोध स्टार्ट इंडक्शन मोटर की अपेक्षा लगभग 2.5 गुणा और फुल लोड टाॅर्क का 3.5 से 4.5 गुना होता है।

अनुप्रयोग -

औधौगिक क्षेत्र में इस मोटर का उपयोग सिंगल फेज ए सी वोल्टेज पर स्थिर गति, उच्च स्टार्टिंग टाॅर्क के छोटे कार्यों में होता है, जैसे गैसोलीन पम्प, स्माॅल एयर कम्प्रेसर्स, एयर कंडीशनर, फ्रिजर, वैक्यूम क्लीनर, कपड़े धोने की मशीन, पोर्टेबल हाॅयस्ट, स्टोकर्स, छत के पंखों में

कैपेसिटर स्टार्ट एंड रन इंडक्शन मोटर (capacitor start and run induction motor) 

कैपेसिटर स्टार्ट एंड रन इंडक्शन मोटर दो प्रकार की होती है, एक होती है डबल वैल्यू कैपेसिटर प्ररूपि प्रेरण मोटर और दूसरी होती है सिंगल वैल्यू कैपेसिटर प्ररूपि प्रेरण मोटर

(1) डबल वैल्यू कैपेसिटर प्ररूपि

यह स्थायी फेज विभक्त संधारित्र मोटर और संधारित्र स्टार्ट मोटर का संयोग है। इसमें एक कैपेसिटर Cr स्टेटर के सहायक परिपथ में हमेशा स्थायी रूप से मोटर की रनिंग कंडिशन में भी जुड़ा रहता है, इसलिए इसे रनिंग कैपेसिटर कहते हैं। दूसरा संधारित्र Cs मोटर की धावी अवस्था में अपकेन्द्री स्विच द्वारा स्थाता के सहायक परिपथ से अलग कर दिया जाता है, इसलिए इसे स्टार्टिग कैपेसिटर कहते हैं। यह मोटर उच्च शक्ति गुणांक, उच्च आरम्भिक बलाघूर्ण, उच्च रनिंग टाॅर्क, उच्च अतिभार क्षमता, हाई दक्षता, शांत प्रचालन आदि सभी गुणों से सम्पन्न होती है।


सिंगल वैल्यू कैपेसिटर प्ररूपि

यह मोटर डबल वैल्यू कैपेसिटर प्ररूपि इंडक्शन का ही एक संशोधित या विकसित रूप है। इसे परमानेंट स्पिलिट फेज कैपेसिटर मोटर या परमानेंट केपेसिटर मोटर भी कहते हैं। इसका ओवर ओल परफॉर्मेंस बहुत ही बढ़िया होता है इसलिए आजकल दुनिया भर में इस मोटर का उपयोग व्यापक रूप से हो रहा है।

कैपेसिटर स्टार्ट एंड रन मोटर के सामान्य गुणधर्म

• साइज या क्षमता - 1/8 hp से 1/4 hp या 1 hp
• आरम्भिक बलाघूर्ण - उच्च होता है
• आरम्भिक धारा - पूर्णभार धारा की दो गुनी
• ओपरेटिंग टाॅर्क - उच्च और शान्त प्रचालन
• स्पीड - कोंस्टेंट और ध्वनि रहित
• स्पीड कंट्रोल - ओनली वोल्टेज कंट्रोल द्वारा
• विपरित गति - स्टेटर की मुख्य या सहायक वाइंडिंग के सिरों की पोलेरिटी को आपस में चेंज करने से विपरित गति प्राप्त होती है।
• दक्षता - उच्च होती है
• अतिभार क्षमता - उच्च
• शक्ति गुणांक - अति उच्च 0.9 से 1 तक हमेशा पश्चगामी
• मेंटिनेंस कोस्ट - बहुत ही कम

इस मोटर के अनुप्रयोग

औधौगिक क्षेत्र में इस मोटर का प्रयोग, एकल कला प्रदायी वोल्टता पर परिवर्तन शील भार के अन्तर्गत स्थिर गति की आवश्यकता और उच्च आरम्भिक बलाघूर्ण के कार्यों में किया जाता है। इसके अलावा इस मोटर का उपयोग ऐसे कार्यों में भी किया जाता है, जहां पर वातावरण को शांत बनायें रखना आवश्यक होता है। जैसे लाइब्रेरी, दफ्तर, अस्पताल और प्रयोगशाला के पंखों में, कूलर, रिकॉर्डर प्लेयर, टेली प्रिन्टर्स, ग्राफिक इन्स्टूमेंटस, क्लोक और समय सम्बंधी यन्त्र आदि में भी किया जाता है।
Er. Chand नवंबर 15, 2021
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 रिलक्टाॅन्स मोटर ( Reluctance motor)

रिलक्टाॅन्स मोटर को प्रतिष्टम्भ मोटर भी कहते है, यह स्काइरल केज रोटर टाइप इंडक्शन मोटर का ही एक विकसित रूप है। जिसमें प्रतिष्टम्भ के सिध्दांत पर यांत्रिक टाॅर्क उत्पन्न होता है, इसलिए इसे प्रतिष्टम्भ मोटर का नाम दिया गया है। तो दोस्तों आज की पोस्ट reluctance motor in hindi यानी रिलक्टाॅन्स मोटर क्या है इससे रिलेटेड जानकारी को प्राप्त करेंगे।

reluctance-motor-in-hindi


निर्भार से पूर्ण भार की अवस्था में रिलक्टाॅन्स मोटर सिंक्रोनस गति पर चलती है, तब यह सिंक्रोनस रिलक्टाॅन्स मोटर कहलाती है। जब भार को बढ़ाया जाता है यानी अति भार की स्थिति में इसकी गति कुछ घट जाती है, उस समय यह मोटर इंडक्शन मोटर की तरह अंडर सिंक्रोनस गति पर ही चलती है इसलिए यह इंडक्शन रिलक्टैन्स मोटर कहलाती है।

जब किसी रिलैक्टेंस मोटर में स्टेटर पर बनने वाले इलैक्ट्रिकल पोलो की अपेक्षा, रोटर पर स्थापित सैलियंट पोलो की संख्या अधिक होती है, तो यह मोटर एक स्थिर औसत गति पर चलती है। यह गति, आभासी तुल्यकाली गति की सब गुणक होती है, इसलिए इस मोटर को सब सिंक्रोनस मोटर भी कह सकते है।

रिलक्टाॅन्स मोटर का कार्य सिद्धान्त ( working principle of reluctance motor in hindi )

रिलक्टाॅन्स मोटर एक स्काइरल केज रोटर टाइप इंडक्शन मोटर की तरह से स्टाॅर्ट होती है। जैसे जैसे इसकी गति तुल्यकाली गति के नजदीक पहुंचती जाती है; वैसे वैसे रोटर पर स्थापित सोफ्ट आयरन पोल की स्लिप कम होती चली जाती है। इस प्रचालन में एक स्थिति ऐसी भी आती है, रोटेटिंग मेग्नेटिक फील्ड और रोटर स्पीड में पारस्परिक अंतर इतना कम रह जाता है कि स्टेटर के पोल्स द्वारा रोटर के पोल्स चुम्बकित हों जातें है, तब रोटर स्टेटर के मैगनेटिक फील्ड के अनुदिश घुमने लगता है, इस अवस्था में रोटर सिंक्रोनस स्पीड पर घूमता है।


रिलैक्टैंस मोटर का स्टेटर

रिलैक्टैंस मोटर के स्टेटर की बनावट स्काइरल केज इंडक्शन मोटर के स्टेटर के समान ही निम्न तीन प्रकार की होती है।

(1) विभक्त कला प्ररूपि स्थाता, जिसके साथ एक सेंट्रीफ्यूगल स्विच लगा होता है।

(2) स्थायी संधारित्र प्ररूपि स्टेटर, इसमें सेंट्रीफ्यूगल स्विच का उपयोग नहीं किया जाता है।

(3) त्रिकला प्ररूपि स्टेटर, जिसका प्रयोग समाकलन अश्व शक्ति निर्धारणों वाली रिलक्टैंस मोटर में होता है।

रिलक्टैंस मोटर का रोटर या घूर्णक

सिंगल फेज फ्रेक्सनल हाॅर्स पावर वाली रिलक्टैंस मोटर में एक विशेष प्रकार के मैगनेटिक स्काइरल केज टाइप रोटर का उपयोग किया जाता है। इस विशेष प्रकार के रोटर को लौकिक स्काइरल केज रोटर में विशेष प्रकार के खाॅचें काटकर बनाया जाता है। इन खाॅचों को नर्म लौहे के वायु प्रक्षेपित ध्रुवों की तरह काम में लाया जाता है। इसकी संख्या स्टेटर पर बनने वाले इलैक्ट्रिक पोल की संख्या के बराबर होती है। इस प्रकार यह सारी व्यवस्था मोटर को सेल्फ स्टाॅर्ट उसी तरह बनाती है, जिस प्रकार पोल शू पर स्थापित डेम्पर वाइंडिंग, सिंक्रोनस मोटर को सेल्फ स्टाॅर्ट बनाती हैं।

रिलक्टैंस मोटर की विशेषताएं ( specialities of reluctance motor in hindi )

• क्षमता- आंशिक अश्व शक्ति
• बाह्मा खिंचाव बलाघूर्ण - 2 से 2.5 
• अन्त खिंचाव बलाघूर्ण - 0.9 से 1.2
• आरम्भिक अवस्था - सेल्फ स्टाॅर्ट
• गति नियंत्रण - परम स्थिर गति के कारण सम्भव नहीं है
• विपरित गति - इंडक्शन मोटर की तरह ही प्राप्त होती है
• शक्ति गुणांक - 0.6 से 0.8 न्यूनतम
• ताम्र हानियां - स्थिर तुल्यकाली गति के भार पर, रोटर में ताम्र हानियां शून्य होती है
• निर्गत - न्यून
• दक्षता - न्यून ( 70 से 80 ) प्रतिशत तक
• अनुरक्षण किमत - कम
• प्रतिस्टम्भ अनुपात - 3 से 6

रिलक्टैंस मोटर के अनुप्रयोग ( Application of reluctance motor in hindi )

रिलक्टैंस मोटर का उपयोग निम्न कार्यों में अधिक किया जाता है।
• न्यूक्लीयर रियेक्टर में नियंत्रण छड की स्थिति स्थापन के लिए
• टेक्सटाइल मशीनों को तुल्यकाली गति पर चलाने के लिए
• रेक्टिफायर, इनवर्टर यूनिटों की नियंत्रित स्विचन क्रिया द्वारा परिवर्तनीय आवृत्ति प्रदाय प्राप्त करने के लिए
• इस मोटर का उपयोग चालन की तरह स्थाति स्थापना, गति नियंत्रण और इन दोनों के संयोग के लिए होता है।
Er. Chand नवंबर 09, 2021
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 हिस्टेरिसिस मोटर क्या होती है

हिस्टेरिसिस मोटर एक विशेष प्रकार की सिंगल फेज, फ्रेक्शनल हाॅर्स पावर सिंक्रोनस मोटर होती है, जिसके लिए डी सी एक्साइटेशन की आवश्यकता नहीं होती है। इसमें मंदायन के सिध्दांत पर यांत्रिक बलाघूर्ण ऊत्पन्न होता है, इसकी प्रचालन अभिलक्षणे लगभग सिंक्रोनस मोटर के समान ही होती है, परन्तु इसकी संरचना स्पिलिट फेज स्काइरल केज इंडक्शन मोटर के समान होती है। इसे शैथिल्य मोटर के नाम से भी जाना जाता है। हिस्टेरिसिस मोटर क्या होती है इसके बारे में और भी बहुत कुछ हम इस पोस्ट में जानेंगे।

हिस्टेरिसिस मोटर का प्रचालन ( Operation of hysterisis motor )

दो शैडेड पोल टाइप हिस्टेरिसिस मोटर को नीचे चित्र में दिखाया गया है। इसके रोटर की संरचना, कोबाल्ट स्टील की बहुत सी चपटी चक्रिकाओं को शाफ्ट पर प्रेस्ड करके की गई है। इस रोटर ऐसेम्बली को पटलित लौह क्रोड से निर्मित स्टेटर के शैडेड पोलो के बीच में स्थापित किया जाता है।

हिस्टेरिसिस मोटर क्या होती है


स्टेटर के दोनों शैडेड पोलो द्वारा उत्पन्न रोटेटिंग मेग्नेटिक फील्ड के प्रभाव से रोटर सर्किट में विधुत धारा प्रवाहित होती है, जो मोटर को इंडक्शन मोटर की तरह स्टार्ट कर देती है। अब जैसे ही मोटर की गति बढ़ती है, वैसे ही डिस्क रोटर में अधिकाधिक हिस्टेरिसिस हानियां विकसित होने लगती है, जो सामान्य मोटर की अपेक्षा, अति उच्च शैथिल्य बलाघूर्ण ऊत्पन्न करते हैं।

रोटर की दो क्रोस बार्स की लंबाई की और न्यूनतम रिलक्टैंस पाथ कायम रहता है। रोटर में प्रेरित धारा प्रवाहित होने के कारण, इसमें क्रार्स बार्स अक्ष की और दो स्थायी चुंबकीय ध्रुवों का विकास होता है। कोबाल्ट स्टील की चुंबकीय धारण शक्ति अत्यधिक होती है, इसलिए इसके चुम्बकीय ध्रुव अधिक देर तक अवशिष्ट चुंबकत्व को धारण किए रहते हैं। इस प्रकार से बनें हुए चुंबकीय ध्रुव, तब स्टेटर के रोटेटिंग मेग्नेटिक फील्ड के साथ सिंक्रोनिज्म में लाॅक हो जाते हैं और मोटर, सिंक्रोनस मोटर की तरह कार्य करने लगती है। रोटर सर्किट लगातार हिस्टेरिसिस लाॅस के रूप में शक्ति को कंज्यूम करता रहता है और हमेशा उच शैथिल्य बलाघूर्ण कायम रहता है। इस प्रकार यह मोटर, अनियमित भार परिवर्तन की अवस्था में भी परम स्थिर गति कायम रख सकती है।

स्टेटर या स्थाता

हिस्टेरिसिस मोटर के स्टेटर की संरचना, स्पिलिट फेज इंडक्शन मोटर के स्टेटर के समान ही निम्न दो प्रकार की होती है, एक तो छादित ध्रुव प्ररूपि प्रकार का होता है और दूसरा स्थायी प्ररुपि प्रकार का स्टेटर होता है।

रोटर या घूर्णक

हिस्टेरिसिस मोटर के रोटर की संरचना लगभग स्पिलिट फेज इंडक्शन मोटर के स्काइरल केज रोटर के समान ही होती है, इसमें अन्तर केवल इतना होता है कि इसका रोटर कोर, न्यून विधुत लाॅस वाले एनल्ड सिलिकॉन स्टील लेमिनेशन के स्थान पर अधिक शैथिल्य हानियों वाले हार्डण्ड मेग्नेटिक स्टील या कोबाल्ट स्टील का बहुत छोटे आकार में बना होता है, जिसमें किसी भी प्रकार का कोई स्लोट, टीथ और वाइंडिंग नहीं होती है। इस प्रकार यह रोटर सादा, चिकना, लघु बेलनाकार होता है, जो स्टैंड स्टिल स्थिति में सिंक्रोनस गति तक एक समान टाॅर्क और ध्वनि रहित तुल्यकाली गति पर चलता है।

हिस्टेरिसिस मोटर की विशेषताएं ( Specialities of hysterisis motor )

• यह एक यांत्रिक और चुंबकीय कम्पनों से रहित मोटर है, इसलिए इसके प्रचालन में किसी भी प्रकार की ध्वनि ऊत्पन्न नहीं होती है।

हिस्टेरिसिस मोटर का रोटर- खाॅचे रहित, दाॅते रहित, कुण्डलन लैस, सीमित लघु आमाप, बहुत ही सादा, चिकना, मजबूत, टिकाऊ, बेलनाकार होता है।

• इसके टाॅर्क का मान, शुरुआत से लेकर सिंक्रोनस गति तक, उच्च और एक समान होता है।

• हिस्टेरिसिस मोटर केवल तुल्यकाली गति पर ही चलती यि घूमती है।

• इस मोटर के अन्दर ऊत्पन्न शैथिल्य टाॅर्क, इसके रोटर में होने वाली हिस्टेरिसिस हानियों के बराबर होता है।

• यह मोटर अनियमित भार परिवर्तन की अवस्था में भी परम स्थिर गति को ज्यो के त्यों कायम रखती है।

• विधुत घड़ियों में प्रयोग होने वाली हिस्टेरिसिस मोटर का इनपुट दो या तीन वाट और आउटपुट कुछ ही मिली वाट होता है।

• 1/7 hp hysterisis motor की दक्षता और निष्पादन या कार्य कौशल लगभग समान आकार की इंडक्शन मोटर के समान ही होता है।

हिस्टेरिसिस मोटर के अनुप्रयोग ( Application of hysterisis motor ) 

प्रस्तुत मोटर की स्टार्टिंग, बिना आवाज और शुद्ध स्थिर गति होने के कारण, इसका उपयोग ध्वनि उपकरणों में, इलैक्ट्रिक घड़ियों में बहुत ज्यादा होता है; जैसे टेप रिकार्डिंग, फोनोग्राफ, टेलीक्रोन, घरों में प्रयोग होने वाले विधुत घड़ियों आदि के प्रचालन में होता है।

तो हिस्टेरिसिस मोटर क्या होती है ये आज की इस पोस्ट में हमने जाना है। उम्मीद है कि आप सब को यह जानकारी अच्छी लगी होंगी, अगर अच्छी लगी है तो हमें कमेंट करके जरूर अवगत करें।
Er. Chand नवंबर 08, 2021
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 सिंगल फेज इंडक्शन मोटर

सिंगल फेज इंडक्शन मोटर एक सिंगल फेज सप्लाई पर चलने वाली मोटर होती है इस मोटर की बनावट भी थ्री फेज इंडक्शन मोटर के जैसी ही होती है। लेकिन यह मोटर थ्री फेज इंडक्शन मोटर की तरह सेल्फ स्टाॅर्ट नहीं होती है। सिंगल फेज इंडक्शन मोटर को सेल्फ स्टाॅर्ट बनाने के लिए इसमें अलग से एक वाइंडिंग को स्थापित किया जाता है। इस वाइंडिंग को स्टार्टिंग वाइंडिंग या आक्जेलरी वाइंडिंग कहते है। सिंगल फेज इंडक्शन मोटर, थ्री फेज इंडक्शन मोटर की अपेक्षा कार्य करने में अधिक श्रेष्ठ नहीं होती है। फिर भी घरेलू और औधौगिक क्षेत्रो में सिंगल फेज इंडक्शन मोटर का उपयोग बहुत महत्वपूर्ण है। निचे काफी सारी सारे इंडक्शन मोटर के प्रकार को दिखाया गया है

सिंगल फेज इंडक्शन मोटर की संरचना

सिंगल फेज इंडक्शन मोटर की संरचना, थ्री फेज इंडक्शन मोटर के लगभग समान होती है, लेकिन कुछ पहलू ऐसे अवश्य है जो सिंगल फेज इंडक्शन मोटर की संरचना को थ्री फेज इंडक्शन मोटर की संरचना से पृथक करते है। इन्ही पहलुओं को यहां पर स्पष्ट किया गया है जो निम्न प्रकार है।

• सिंगल फेज इंडक्शन मोटर का रोटर स्काइरल केज टाइप होता है, जबकि थ्री फेज इंडक्शन मोटर का रोटर स्काइरल केज टाइप और फेज वाउण्ड टाइप दोनों प्रकार का होता है।

• सिंगल फेज इंडक्शन मोटर की स्टेटर पर केवल एक या दो सिंगल फेज वाइंडिंग होती है, जबकि थ्री फेज इंडक्शन मोटर के स्टेटर पर तीन अलग-अलग कुण्डलियों की थ्री फेज वाइंडिंग होती है।

• कुछ सिंगल फेज इंडक्शन मोटर की स्टेटर वाइंडिंग में अपकेन्द्री स्विच लगा होता है, जो मोटर के स्टार्ट हो जाने के बाद उसकी स्टार्टिंग वाइंडिंग या आक्जेलरी वाइंडिंग को सप्लाई वोल्टेज से अलग कर देता है, जबकि थ्री फेज इंडक्शन मोटर में ऐसा कुछ नहीं होता है।

• सिंगल फेज इंडक्शन मोटर की स्टेटर वाइंडिंग में केवल दो या चार सिरे बाहर निकलकर टर्मिनल बोक्स में आते है। और थ्री फेज में छः सिरे बाहर निकलकर टर्मिनल बोक्स में आते है।

• 1- फेज इंडक्शन मोटर की संरचना आंशिक अश्व शक्ति क्षमता में की जाती है जिसे स्मोल मोटर का नाम दिया जाता है, जबकि थ्री फेज की संरचना पूर्ण अश्व शक्ति क्षमता में की जाती है, जिसे लार्ज मोटर का नाम दिया जाता है।

सिंगल फेज इंडक्शन मोटर में घूर्णी चुम्बकीय क्षेत्र का उत्पादन या जनन

सिंगल फेज इंडक्शन मोटर की स्थाता कुण्डलन को जब ज्यावक्रीय एकल कला प्रत्यावर्ती प्रदाय वोल्टेज की जाती है तो मोटर की स्टेटर वाइंडिंग में ए प्रत्यावर्ती विधुत धारा प्रवाहित होने लगती है जिसके कारण मोटर की कुण्डली में एक प्रत्यावर्ती फ्लक्स ऊत्पन्न होता है। इसी कारण इसमे चुम्बकीय क्षेत्र की प्रकृति स्पंदनीय होती है। इसलिए इसे स्पंदनीय (pulsating) चुम्बकीय क्षेत्र भी कहते है। इससे एक स्पंदनीय या प्रत्यावर्ती बलाघूर्ण ऊत्पन्न होता है इस टाॅर्क का प्रारंभिक मान शून्य होता है इसलिए यह मोटर को स्टार्ट करने में असमर्थ होता है। मोटर को केवल घूर्णी टाॅर्क ही स्टार्ट कर सकता है इसलिए यदि मोटर के रोटर को किसी भी दिशा में किसी बाहरी स्त्रोत से घुमा दिया जाए, तो मोटर उसी दिशा में घुमना चालू कर देता है ऐसा इसलिए होता है, रोटर के घुमने से रोटर के अन्दर घूर्णी चुम्बकीय क्षेत्र ऊत्पन्न हो जाता है जो घूर्णी टाॅर्क उत्पन्न करता है। यह चुम्बकीय क्षेत्र दो सिध्दांतों के द्वारा उत्पन्न होता है।

क्रुश क्षेत्र सिध्दांत (cross field theory) 

पहले चित्र में स्टेटर की वाइंडिंग में प्रवाहित विधुत धारा से उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र और इसके परिणामी चुम्बकीय क्षेत्र को दिखाया गया है।
दुसरे चित्र में स्टेंड स्टील अवस्था पर रोटर की वाइंडिंग में परिणामित्र क्रिया द्वारा प्रेरित स्थैतिक विधुत वाहक बल के कारण प्रवाहित धारा से उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र और इसके परिणामी चुम्बकीय क्षेत्र को दिखाया गया है। जो स्टेटर के परिणामी चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा के विपरित है। इस प्रकार इन दोनों परिणामी चुम्बकीय क्षेत्रों के बीच का कोण 180 अंश है। इस स्थिति में मोटर के अन्दर टाॅर्ट ऊत्पन्न नहीं होता और मोटर स्टार्ट नहीं होती है।
तिसरे चीत्र के अनुसार अब यदि रोटर को किसी बाहरी स्त्रोत द्वारा दक्षिणावर्त दिशा में थोड़ा सा घुमा दिया जाए, तो रोटर द्वारा स्टेटर फील्ड कट जाता है जिससे रोटर की वाइंडिंग में एक अन्य गतिक विधुत वाहक बल उत्पन्न हो जायेगा, जो पूर्व परिणामित्र क्रिया द्वारा प्रेरित स्थैतिक विधुत वाहक बल से भिन्न होगा। इस गतिक विधुत वाहक बल के कारण, रोटर वाइंडिंग में प्रवाहित धारा से उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र और इसके परिणामी चुम्बकीय क्षेत्र को तिसरे चीत्र में दिखाया गया है जो स्टेटर के परिणामी चुम्बकीय क्षेत्र के लम्बवत है। इसे घूर्णक का क्रुश चुम्बकीय क्षेत्र कहते है। इसी के कारण रोटर पर अधिकतम टाॅर्क लगता है और मोटर घूमने लगता है।

द्वि परिक्रमण क्षेत्र सिध्दांत (double revolving field theory)

परिक्रामी क्षेत्र सिंद्धान्त के अनुसार, सिंगल फेज इंडक्शन मोटर की स्टेटर वाइंडिंग में धारा के कारण उत्पन्न प्रत्यावर्ती चुम्बकीय क्षेत्र को दो समान घूर्णी चुम्बकीय क्षेत्र के घटकों में विभाजित किया जा सकता है, जिसमें प्रत्येक का आयाम प्रत्यावर्ती चुम्बकीय क्षेत्र के आयाम का आधा होता है, जो एक दूसरे के विपरित दिशाओं में समान तुल्यकाली गति से समान रूप से घूमते हैं
अब यदि मोटर के रोटर को किसी भी दिशा में किसी बाहरी स्त्रोत से घुमा दिया जाए, तो उसी दिशा में मोटर की सर्पी घटती जाती है और बलाघूर्ण बढता जाता है जिससे मोटर की गति उसी दिशा में बढती जायेगी और मोटर घूमने लगेगी।

सिंगल फेज इंडक्शन मोटर को सेल्फ स्टाॅर्ट बनाना

हम जानते है कि सिंगल फेज इंडक्शन मोटर सेल्फ स्टाॅर्ट नहीं होती है। इस कमी को दूर करने के लिए इसे स्वप्रवर्ती बनाया जाता है। इसके लिए इसे स्टार्टिंग के समय, अस्थायी रूप से डबल फेज मोटर बनाया जाता है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए इसके स्थाता पर मुख्य कुण्डलन या धावी कुण्डलन के साथ एक अतिरिक्त कुण्डलन स्थापित की जाती है, जिसे सहायक कुण्डलन या आरम्भिक कुण्डलन कहते हैं। ये दोनों वाइंडिंग स्टेटर पर 90 डिग्री पर स्थापित की जाती है और दोनों वाइंडिंग को समांतर में जोड़कर सिंगल फेज सप्लाई वोल्टेज दी जाती है।
मुख्य और सहायक वाइंडिंग को इस प्रकार व्यवस्थित किया जाता है कि इनमें प्रवाहित होने वाली धाराओं के मध्य कलान्तर अत्यधिक हो। इस प्रकार से यह सिंगल फेज इंडक्शन मोटर, डबल फेज इंडक्शन मोटर की तरह कार्य करती है और इसमें दोनों वाइंडिंगों की धाराओं द्वारा द्वि कला घूर्णी चुम्बकीय क्षेत्र ऊत्पन्न होता है जो घूर्णी टाॅर्क उत्पन्न कर, मोटर को सेल्फ स्टाॅर्ट बनाता है।

सिंगल फेज इंडक्शन मोटर की स्टार्टिंग

सिंगल फेज इंडक्शन मोटर एक फ्रिक्शनल हाॅर्स पावर मोटर होती है जो कि बहुत ही कम क्षमता की मोटर होती है, जो स्टार्टिंग के समय पर सप्लाई स्त्रौत से बहुत कम धारा लेती है। इसकी स्टेटर वाइंडिंग बारीक वायर काॅयल की बनी होती है,जिसका प्रतिरोध अत्यधिक होता है। इसके अन्दर प्रयुक्त रोटर स्काइरल केज टाइप होता है, जिस पर लघुपथित बार कुण्डलन स्थापित रहती है,जो उच्च धारा के लिए बनी हुई होती है। इसलिए इसके स्टार्टिंग के लिए किसी भी स्टार्टर की आवश्यकता नहीं होती है। यह डायरेक्टर ओन लाइन स्टार्टर होती है,जिसे पूर्ण वोल्टेज स्टार्टिंग मैथड़ कहते हैं।


Er. Chand सितंबर 30, 2021
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 स्टार डेल्टा स्टार्टर

स्टार डेल्टा स्टार्टर में सबसे पहले स्विच की सहायता से मोटर की स्टेटर वाइंडिंग को स्टार में कनैक्ट किया जाता है, जो मोटर की स्टेटर वाइंडिंग को कम फेज वोल्टेज प्रदान करती है यानी के यह लाइन वोल्टेज का 1/√3 वा हिस्सा प्रदान करती है। जब मोटर स्टार्ट हो जाती है फिर दोबारा से स्विच की सहायता से मोटर की स्टेटर वाइंडिंग को डेल्टा में जोड़ दिया जाता है, डेल्टा में जुड़ते ही मोटर की वाइंडिंग पूर्ण लाइन वोल्टेज लेने लगती है। इस प्रकार स्टार्टिंग में मोटर को कम वोल्टेज प्राप्त होती है और मोटर सफलता पूर्वक स्टार्ट हो जाती है।
स्टार डेल्टा स्टार्टर द्वारा स्टार्ट की जाने वाली इंडक्शन मोटर की अभिकल्पना विशेष प्रकार से की जाती है, ताकी उसकी स्टेटर वाइंडिंग, स्टार्टिंग समय के दौरान, पहले स्टार में कनैक्ट हो और उसके ठीक बाद डेल्टा में कनैक्ट हो ताकि असामान्य वोल्टेज के झटकों पर टिक सके।स्टार डेल्टा स्टार्टर का उपयोग 5 से 20 hp तक की मोटरों के लिए किया जाता है।

ओटो ट्रांसफॉर्मर स्टार्टर

ओटो ट्रांसफॉर्मर स्टार्टर में सबसे पहले स्टार्टर स्विच की सहायता से मोटर के कनैक्शन सिरों को ओटो ट्रांसफॉर्मर के आरम्भिक सिरों से जोड़ा जाता है, ताकि ओटो ट्रांसफॉर्मर की सहायता से मोटर की स्टेटर वाइंडिंग को न्यून वोल्टेज प्राप्त हो और मोटर स्टार्ट हो जायें। जब मोटर स्टार्ट हो जाती है फिर ओटो ट्रांसफॉर्मर की सहायता से सप्लाई वोल्टेज को धीरे धीरे बढ़ाकर फुल वोल्टेज प्रदान की जाती है। अन्त में दौबारा स्टार्टिंग स्विच की सहायता से मोटर के कनैक्शन सिरों को प्रत्यक्ष लाइन वोल्टेज के रनिंग सिरों से जोड़ दिया जाता है।
यहां एक ओटो ट्रांसफॉर्मर स्टार्टर को थ्री फेज स्काइरल केज टाइप इंडक्शन मोटर के साथ कनैक्ट किया गया है। इंडक्शन मोटर की स्टार्टिंग की यह विधि उक्त वर्णित प्राइमरी रेजिस्टेंस स्टार्टिंग विधि का ही एक विकसित रूप है। जिससे स्टार और डेल्टा कनैक्ट स्टेटर वाइंडिंग वाली या दोनों प्रकार की थ्री फेज इंडक्शन मोटरों की स्टार्टिंग सफलता पूर्वक सम्भव है। 
ओटो ट्रांसफॉर्मर स्टार्टर का उपयोग 20hp से अधिक क्षमता वाली इंडक्शन मोटर में किया जाता है।

रोटर रेजिस्टेंस स्टार्टर

रोटर रेजिस्टेंस स्टार्टर एक ऐसा स्टार्टर होता है जो स्टार्टर परिवर्तनीय प्रतिरोध के सिद्धांत से रोटर सर्किट में धारा को नियंत्रित करता है। इस स्टार्टर को केवल स्लिप रिगं इंडक्शन मोटर या फेज वाउण्ड रोटर टाइप इंडक्शन मोटर के रोटर के साथ श्रेणी में प्रयोग किया जाता है। इस स्टार्टर का उपयोग स्काइरल केज रोटर टाइप इंडक्शन मोटर के रोटर के साथ सम्भव नहीं है, क्योंकि इसमें स्लिप रिगं नहीं होती है। इसका उपयोग केवल स्लिप रिगं इंडक्शन मोटर में ही सम्भव है। इसलिए इसे स्लिप रिगं मोटर स्टार्टर भी कहते है। 

इसमें सर्वप्रथम रोटर सर्किट के श्रेणी में स्टार्टर के सम्पूर्ण प्रतिरोध को स्लिप रिगं द्वारा कनैक्ट किया जाता है, ताकि रोटर वाइंडिंग में प्रेरित धारा का मान कम से कम हो और टाॅर्क अधिक से अधिक हो। रोटर धारा का मान रोटर टाॅर्क के व्यूत्क्रमानुपाती होता है और रोटर टाॅर्क का मान रोटर रेजिस्टेंस के समानुपाती होता है। जब मोटर स्टार्ट हो तब रोटर के परिपथ से स्टार्ट रेजिस्टेंस को धीरे धीरे कम करते है और अन्त में सम्पूर्ण प्रतिरोध को परिपथ से हटा देते है और इस तरह से मोटर स्टार्ट हो जाती है।
Er. Chand सितंबर 29, 2021
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 DOL स्टार्टर क्या है

dol स्टार्टर का पूरा नाम डायरेक्ट ओन लाइन स्टार्टर होता है और इस स्टार्टर को शुद्ध हिन्दी में प्रत्यक्ष प्रदाय वाला प्रवर्तक या आरम्भक कहते है। यह एक ऐसा स्टार्टर होता है जिसे लाइन के साथ डायरेक्ट जोड़ा जाता है dol स्टार्टर केवल मोटर को ओवर लोड को प्रोटैक्ट करने में मददगार होता है।
यहां पर आपको एक थ्री फेज पुश बटन डायरेक्ट ओन लाइन स्टार्टर के कनैक्शन को थ्री फेज स्काइरल केज इंडक्शन मोटर के साथ दिखाया गया है। dol स्टार्टर को पुश बटन स्टार्टर, फुल वोल्टेज स्टार्टर, स्पेशियल स्विच स्टार्टर आदि कई नामों से जाना जाता है। इस स्टार्टर का उपयोग उच्च रोटर रेजिस्टेंस रखने वाली 5 hp की मोटर के लिए होता है। 

dol स्टार्टर न तो विधुत धारा को नियंत्रित करता है और न ही वोल्टेज को नियंत्रित करता है यह केवल मोटर को अति भार रक्षण प्रदान करता है। इस स्टार्टर में दो पुश बटन होते है। पहला बटन हरें रगं का होता है, जो स्टार्ट या ओन स्विच होता है यह नोर्मल ओपन रहता है। यह स्विच मोटर को स्टार्ट करने के लिए होता है, इसको दबाने से स्टार्टर के ओपन काॅटैक्ट क्लोज्ड हो जाते है और परिपथ चुम्बकीय कुण्डली द्वारा पूर्ण हो जाता है जिससे चुम्बकीय कुण्डली में चुम्बकत्व आ जाता है और मोटर स्टार्ट हो जाती है।

dol स्टार्टर में दूसरा बटन लाल रंग का होता है, जो स्टोप या ओफ स्विच होता है यह नोर्मली क्लोज रहता है। यह बटन मोटर की गति को शून्य करने के लिए होता है, इसको दबाने से स्टार्टर के कोनटैक्ट ओपन हो जाते है और चुम्बकीय कुण्डली का विधुत परिपथ भंग हो जाता है यानी चुम्बकीय कुण्डली का चुम्बकत्व समाप्त हो जाता है जिससे चलती हुई मोटर रुक जाती है।
इस स्टार्टर के कुछ महत्वपूर्ण भाग होते है जो स्टार्टर के कार्य करने में काफी मदद करते है इन भागों के बारे में नीचे बिस्तार से बताया गया है।

लो वोल्टेज कुण्डली या शून्य वोल्टेज काॅयल

यह लोड कोर की परिनलिका पर लिपटी हुई एक कुण्डली होती है, जो सप्लाई वोल्टेज की उपस्थिति में अपने निकटतम मृदु लौहे के आर्मेचर को आकर्षक द्वारा पकड़े रखती है, लेकिन यह नो वोल्टेज या लो वोल्टेज की अवस्था में विचुम्बकित या न्यूनचुम्बकित होकर अपने निकटवर्ती आर्मेचर को आकर्षक द्वारा पकड़े रहने में समर्थ नहीं होती है। जिससे परिपथ भंग हो जाता है और मोटर का चलना बन्द हो जाता है।

ओवर लोड प्रोटेक्शन या अतिभार रक्षण

इसमें द्विधात्विक पत्तियों के ऊपर तापक कुण्डलियों को लपेट कर बनाया गया एक तापीय स्विच होता है जो नोर्मली क्लोज रहता है। परन्तु मोटर के अतिभार और अति धारा प्रदोष की अवस्था में जब धारा का मान, निर्धारित धारा के मान से अधिक हो जाता है, तब तापक कुण्डलियों के ताप से तप्त होकर द्वि धात्विक पत्ती मुड़ जाती है या तापन स्विच खुल जाता है। इससे परिपथ भंग हो जाता है और चुम्बकीय कुण्डली अ चुम्बकित होकर मृदु लौहे के आर्मेचर को मुक्त कर देती है। जिससे त्रिध्रुविय स्विच स्प्रिगं द्वारा ऊपर की ओर खींच लिया जाता है और विधुत सप्लाई के ओफ होते ही मोटर का चलना बन्द हो जाता है।
dol स्टार्टर क्या है आप इस पोस्ट में अच्छे से समझ गये होगें। अगर आपको मेरी यह पोस्ट अच्छी लगी है तो कमेंट करके जरूर बताइए और इसे अपने दोस्तों के साथ भी शेयर किजिए।
Er. Chand सितंबर 28, 2021
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 स्टार्टर क्या है

स्टार्टर एक विधुत युक्ति होती है, जो मोटर के आरम्भिक समय में सप्लाई वोल्टेज को नियंत्रित करके, सभी प्रकार से सुरक्षा प्रदान करता है। स्टार्टर को हिन्दी में प्रवर्तक कहते है। स्टार्टर कई प्रकार के होते है, परन्तु इनका मूल सिद्धांत लगभग एक समान होता है। आधुनिक स्टार्टरों के साथ मोटर की सुरक्षा युक्तियों का उपयोग भी होता है। स्टार्टर क्या है भिन्न भिन्न क्षमता की इंडक्शन मोटरों को स्टार्ट करने के लिए प्रयुक्त स्टार्टर निम्न प्रकार के होते है।

• प्रत्यक्ष लाइन पर जोड़ने वाला स्टार्टर (direct online starter)
• तारा त्रभुज स्टार्टर (star delta starter)
• लाइन प्रतिरोध स्टार्टर (line resistance starter)
• लाइन प्रतिघात स्टार्टर (line reactance starter)
• स्वपरिणामित्र स्टार्टर (auto transformer starter)
• घूर्णक प्रतिरोध स्टार्टर (rotor resistance starter)

स्टार्टर का कार्य

स्टार्टर का सबसे मुख्य काम मोटर को जब स्टार्ट किया जाता है तो यह स्टार्टिगं के समय मोटर की वोल्टेज को नियंत्रित करता है या कम करता है और जब मोटर का घूर्णक घुमना शुरू कर देता है तब सप्लाई वोल्टेज को धीरे धीरे बढ़ाते हुए, अंत में मोटर को पूर्ण वोल्टेज प्रदान करता है। यह सभी स्टार्टरों का एक सामान्य सिद्धांत होता है।

स्टार्टिंग समय में मोटर द्वारा उच्च विधुत धारा लेने का कारण

मोटर को स्टार्ट करते समय, बिल्कुल शुरुआती समय में जब घूर्णक की गति शून्य होती है, तब घूर्णक का परिपथ लघुपथित होने के कारण, ट्रांसफॉर्मर की लघुपथित द्वितियक कुण्डली की तरह कार्य करता है। जिसके कारण घूर्णक अत्यधिक विधुत धारा लेता है। इसका एक कारण यह भी है कि जब मोटर को शुरुआत में स्टार्ट करते है तो सप्लाई वोल्टेज का विरोध करने के लिए विरोधी विधुत वाहक बल का मान शून्य होता है। जिसके कारण मोटर द्वारा पूर्ण वोल्टेज धारण की जाती है, इसलिए मोटर अत्यधिक विधुत धारा लेती है। बाद में जब मोटर घूमने लगती है, तब विरोधी विधुत वाहक बल उत्पन्न होता है, जो विधुत धारा को कम कर देता है।

स्टार्टर की आवश्यकता या जरूरत क्यो होती है। 

थ्री फेज इंडक्शन मोटरें उच्च क्षमता की होती है, जो स्टार्टिंग के समय सप्लाई से अत्यधिक आरम्भिक धारा (पूर्ण भार धारा की 5 से 7 गुनी धारा) लेती है, जबकि इंडक्शन मोटर का आरंभिक बलाघूर्ण कम (पूर्ण भार बलाघूर्ण का 1.5 से 2.5 गुना) विकसित होता है। जिसकी वजह से फ्यूज के गलत निर्धारण पर मोटर की वाइंडिंग जलकर नष्ट हो सकती है। इसलिए इनमें स्टार्टर की आवश्यकता होती है। 

• अत्यधिक विधुत धारा के कारण सप्लाई की वितरण प्रणाली में लाइन वोल्टतापात अधिक बढ़ जाता है, जिसके कारण सप्लाई प्रणाली का वोल्टेज रेगुलेशन प्रभावित होता है। इसलिए इन मोटर में स्टार्टर जरूरी है।

• वोल्टेज रेगुलेशन प्रभावित होने से वितरण प्रणाली से जुड़े हुए उपस्करों के प्रचालन पर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ता है अर्थात् उपस्करों के कार्य करने की परर्फोमेंस खराब हो जाती है। 

• वितरण प्रणाली की स्टेबलिटी भी डिस्टर्ब होती है इसलिए इंडक्शन मोटर को स्टार्ट करने के लिए स्टार्टर की आवश्यकता होती है। तो स्टार्टर क्या है हमने इस पोस्ट में यह जाना है उम्मीद है कि आपको भी अच्छे से समझ में आ गया होगा। अगर आपको पोस्ट अच्छी लगी है तो कमेंट करके जरूर बताइए।




Er. Chand सितंबर 26, 2021
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घूर्णी चुंबकीय क्षेत्र क्या है

 जब किसी थ्री फेज सिंक्रोनस मशींन को थ्री फेज सप्लाई वोल्टेज दी जाती है तो उसकी थ्री फेज वाइंडिंग ऊर्जित होकर एक स्थिर परिमाण का चुम्बकीय क्षेत्र ऊत्पन्न करती है,थ्री फेज वाइंडिंग द्वारा उत्पन्न किया गया ये स्थिर परिमाण का चुम्बकीय क्षेत्र ही घूर्णी चुम्बकीय क्षेत्र कहलाता है। यह मशींन के रोटर और स्टेटर के बीच जो वायु गैप होता है उसमें स्थापित हो जाता है। इस घूर्णी चुम्बकीय क्षेत्र के ध्रुव,स्टेटर पर एक समान अवस्था में नहीं रहते है ये स्टेटर में चारों ओर अपनी स्थिति को आवर्त रूप में एक जगह से दूसरी जगह अदला बदली करते रहते है। इसलिए इस चुम्बकीय क्षेत्र को rotating magnetic field कहते है।इसे परिक्रामी चुम्बकीय क्षेत्र के नाम से भी जाना जाता है,जिसे छोटे रूप में R.M.F प्रतिकारक अक्षरों से व्यक्त किया जाता है। घूर्णी चुम्बकीय क्षेत्र की परिभाषा को छोटे रूप में निम्न प्रकार से भी लिख सकते है।

घूर्णी चुम्बकीय क्षेत्र

स्थिर परिमाण का वह चुम्बकीय क्षेत्र,बहुकला सप्लाई प्रणाली द्वारा उत्पन्न होता है और वरिम (space) के अन्दर एक नियत दिशा में तुल्यकाली गति से गमन (rotate) करता है, घूर्णी चुम्बकीय क्षेत्र कहलाता है।

चुम्बकीय क्षेत्र

किसी चुम्बकीय के चारों ओर का वह क्षेत्र जिसमें किसी चुम्बकीय पदार्थ को रखने पर वह चुम्बकीय पदार्थ एक बल का अनुभव करने लगता है तो वह क्षेत्र चुम्बकीय क्षेत्र कहलाता है।

प्रत्यावर्ती चुम्बकीय क्षेत्र

परिवर्तनीय परिमाण का वह चुम्बकीय क्षेत्र,जो सिंगल फेज सप्लाई प्रणाली द्वारा उत्पन्न होता है और वायु अंतराल में अपनी दिशा को समय के साथ बदलता रहता है,प्रत्यावर्ती चुम्बकीय क्षेत्र कहलाता है। इसे स्पन्दी चुम्बकीय क्षेत्र के नाम से भी जाना जाता है।

थ्री फेज घूर्णी चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा को विपरित करना

थ्री फेज घूर्णी चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा उसके फेज अनुक्रम पर निर्भर करती है इसलिए फेज अनुक्रम के बदलने से घूर्णी चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा बदल जाती है यानी विपरित हो जाती है।
थ्री फेज सप्लाई प्रणाली के किन्हीं दो लाइन तारों की ध्रुवता को आपस में बदलकर थ्री फेज घूर्णी चुम्बकीय क्षेत्र के फेज अनुक्रम को बदला जाता है, इस प्रकार से क्षेत्र के घूमने की दिशा भी बदल जाती है। इसको समझने के लिए मान लेते है कि RYB फेज अनुक्रम पर किया थ्री फेज घूर्णी चुम्बकीय क्षेत्र के घूमने की दिशा दक्षिणावर्त है। तब RBY फेज अनुक्रम पर इसकी दिशा वामावर्त होगी।

घूर्णी चुम्बकीय क्षेत्र के प्रमुख गुणधर्म

यह क्षेत्र तभी ऊत्पन्न होता है जब थ्री फेज मशींन को थ्री फेज सप्लाई दी जाती है। घूर्णी चुम्बकीय क्षेत्र वरिम यानी वायु अंतराल में ही स्थापित होता है। इस क्षेत्र का परिणाम हमेशा स्थिर या एक समान रहता है। घूर्णी चुम्बकीय क्षेत्र के घूमने की दिशा नियत यानी निश्चित होती है।rotating magnetic field की दिशा उसके फेज अनुक्रम पर निर्भर करती है उसके फेज अनुक्रम को बदलकर दिशा को बदला जा सकता है। घूर्णी चुम्बकीय क्षेत्र से मशींन में टाॅर्क उत्पन्न होता है, जो मशींन को सेल्फ स्टाॅर्ट बनाता है।
Er. Chand सितंबर 03, 2021
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 यूनिवर्सल मोटर क्या है

यूनिवर्सल मोटर एक ऐसी मोटर होती है जो ए सी सप्लाई और डी सी सप्लाई दोनों पर चलती है इस मोटर में भी दूसरी मोटरों की तरह स्टेटर और रोटर होता है। इस मोटर की स्टेटर वाइंडिंग और रोटर वाइंडिंग परस्पर श्रेणी में जुड़ी होती है इसलिए यह मोटर ए सी सप्लाई और डी सी सप्लाई पर आसानी से काम कर सकती है।

 यूनिवर्सल मोटर को सार्वभौमिक मोटर के नाम से भी जाना जाता है। इसका स्टाॅर्टिगं टाॅर्क बहुत अधिक होता है इस मोटर की गति भी बहुत अधिक होती है यह एक तेज गति पर चलने वाली मोटर होती है। इसलिए यूनिवर्सल मोटर का उपयोग (universal motor application) जहां उच्च स्टार्टिगं टाॅर्क और बहुत तेज गति की जरूरत होती है वहां किया जाता है।

यूनिवर्सल मोटर को व्यवहारिक क्षेत्र और औधौगिक क्षेत्र दोनों जगहों पर इस्तेमाल किया जाता है उधौगों में इसका प्रयोग जहां परिवर्तनीय गति की आवश्यकता होती है वहां किया जाता है जैसे पोर्टेबल टूल, पोर्टेबल मशीनों में और व्यवहारिक क्षेत्र में इसका यूनिवर्सल मोटर के उपयोग सिलाई की मशींन,रसोई घर में काम आने वाले उपयंत्र में,फूड मिक्सर, हेयर ड्रायर, निर्वात मार्जक, ब्लोवर और छोटे पंखे आदि घरेलू यन्त्र और उपयंत्र में किया जाता है।


Er. Chand सितंबर 02, 2021
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 हैलो दोस्तो आज हम बात करने जा रहे है शेडेड पोल इंडक्शन मोटर के बारे में शेडेड पोल मोटर क्या है ये कैसे काम करती है और इसका उपयोग कहां किया जाता है। दोस्तों shaded pole induction motor in hindi एक सिंगल फेज सेल्फ स्टाॅर्ट मोटर होती है इसको चालु करने के लिए कैपेसिटर की जरूरत नहीं होती है। 

इसमें स्काइरल केज टाइप रोटर का इस्तेमाल किया जाता है और इसके पोल सैलियंट टाइप होते है। इसकेे पोल की एक साइड को शेडेड करके उसके ऊपर एक ताॅबे का छल्ला लगा दिया जाता है। इसलिए इस पोल को शेडेड पोल और ताॅबे के छल्ले को शेडेड काॅयल कहते है। ये शेडेड पोल एक ताॅबे के तार के द्वारा आपस में जुड़े (शाॅर्ट) होते है। 

पोल के ऊपर वाले हिस्से पर जो वाइंडिंग हुईं होती है उसे मुख्य वाइंडिंग या प्राइमरी वाइंडिंग कहते है और शेडेड पोल की वाइंडिंग को सहायक वाइंडिंग या सेकेंडरी वाइंडिंग कहते है। ये शेडेड पोल वाइंडिंग ही शेडेड पोल इंडक्शन मोटर को सेल्फ स्टाॅर्ट बनाती है।

  शेडेड पोल मोटर का कार्य सिद्धान्त

जब शेडेड पोल इंडक्शन मोटर को सिंगल फेज ए सी सप्लाई से जोड़ते है तो इसकी मुख्य वाइंडिंग में एक धारा बहने लगती है जो इस वाइंडिंग में एक चुम्बकीय फ्लक्स को उत्पन्न करती है। ये चुम्बकीय फ्लक्स ताॅबे के छल्ले का छेदन करता है जिससे शेडेड पोल में एक विधुत वाहक बल उत्पन्न हो जाता है। इस विधुत वाहक बल के कारण शेडेड पोल वाइंडिंग में भी एक चुम्बकीय फ्लक्स ऊत्पन्न हो जाता है जिसे शेडेड पोल का चुम्बकीय फ्लक्स कहते है। शेडेड पोल का फ्लक्स मुख्य वाइंडिंग के फ्लक्स का विरोध करता है जिससे इन दोनों के परिणामी फ्लक्स की दिशा अन शेडेड पोल से शेडेड पोल की और हो जाता है। और मोटर में एक टाॅर्क उत्पन्न हो जाता है और मोटर अन शेडेड पोल से शेडेड पोल की दिशा में घुमने लगती है।

लाभ

• ये मोटरे बहुत ही सस्ती होती है।
• इन मोटरों का आकार बहुत छोटा होता है इन्हें आसानी से उठाया जा सकता है।
• इनको सही कराने में कम खर्चा आता है।
• यह एक सेल्फ स्टाॅर्ट मोटर होती है।

हानियां

• इस मोटर की घूमने की दिशा को बदला नहीं जा सकता है।
• इस मोटर का स्टाॅर्टिगं टाॅर्क बहुत कम होता है।
• इनकी दक्षता भी बहुत कम होती है इसलिए इन्हें छोटे आकार का बनाया जाता है।
• इस मोटर का शक्ति गुणांक कम होता है।
• इस मोटर में लोसेस ज्यादा होते है।

इस मोटर का उपयोग छोटे पंखों,हेयर ड्रायर,यूनिट हिटर,डेम्पर कंट्रोलर,इन्स्टूमेन्ट,खिलोनों और फोनोग्राम आदि उपकरणों में किया जाता है।

Er. Chand सितंबर 01, 2021
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सिंगल फेज सबमर्सिबल मोटर

सिंगल फेज सबमर्सिबल मोटर ऐसी मोटर होती है जो सिंगल फेज ए सी सप्लाई पर कार्य करती है, यह एक प्रकार की सिंगल फेज ए सी मोटर होती है। और सिंगल फेज सप्लाई में चलाने पर ये मोटर कोई बाधाॅ ऊत्पन्न नहीं करती है ऐसी मोटरों को सिंगल फेज सबमर्सिबल मोटर कहां जाता है।

 ये ऐसी मोटरे होती है जो पानी के अन्दर डूबी रहती है। और पानी के अन्दर बड़ी सरलता से काम करती है ऐसी मोटरों को सबमर्सिबल मोटर कहां जाता है। इन मोटरों को सबमर्सिबल पंप के नाम से भी जाना जाता है।सबमर्सिबल मोटर एक स्काइरल केज टाइप इंडक्शन मोटर होती है इन्हें सिंगल फेज और थ्री फेज में बनाया जाता है इनकी संरचना 0.5 hp से लेकर 100 hp तक होती है।

सबमर्सिबल मोटरों को उनकी संरचना और आकार के रुप में दो प्रकार की बनाई जाती है।                                           

(1) उच्च आयतन वाले पम्प या मोटर                            

आवश्यकता पड़ने पर यदा कदा इनका उपयोग तालाब से पानी निकालने के लिए होता है। कई निर्माताओं द्वारा इन पम्प या मोटर को लम्बे जलसह वैधुत तन्तुओं के साथ बनाया जाता है,जो पूर्ण रूप से निमंजित किए जा सकते है।         

   (2) न्यून आयतन वाले पम्प या मोटर                       

फौव्वारों और छोटे तालाबों के लिए न्यून आयतन वाले छोटे सबमर्सिबल मोटर प्रयोग किए जाते है                                सबमर्सिबल मोटर का उपयोग मुख्य रूप से तीन क्षेत्रो में किया जाता है। कृषि सम्बन्धी क्षेत्र में, सार्वजनिक क्षेत्र में और औद्योगिक क्षेत्र में                                                                               

Er. Chand अगस्त 30, 2021
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 प्र_1 यह मोटर प्रेरण मोटर क्यो कहलाती है अर्थात् इसे प्रेरण मोटर नाम क्यो दिया गया ?

चूंकि यह एक शुद्ध प्रत्यावर्ती धारा मोटर है जो प्रेरण के सिध्दांत पर कार्य करती है, इसलिए यह प्रेरण मोटर (induction motor) कहलाती है। इसलिए इसे प्रेरण मोटर नाम दिया गया।

प्र_2 इंडक्शन मोटर को औधौगिक मोटर क्यो कहां जाता है ?

क्योंकि इंडक्शन मोटर औधौगिक क्षेत्र में सबसे अधिक प्रयोग की जाने वाली मोटर है।

प्र_3 इंडक्शन मोटर को डाइनेमिक ट्रांसफॉर्मर क्यों कहते है ? 

इन सभी समानताओं के कारण इंडक्शन मोटर को डाइनेमिक ट्रांसफॉर्मर कहते है।
• ट्रांसफॉर्मर की तरह ही इंडक्शन मोटर भी एक ए सी मशींन है।
• ट्रांसफॉर्मर की तरह ही इंडक्शन मोटर भी प्रेरण के सिध्दांत पर कार्य करता है।
• ट्रांसफॉर्मर की तरह ही इंडक्शन मोटर में भी दो कुण्डलनें (winding) होती है। स्टेटर वाइंडिंग को प्राइमरी वाइंडिंग और रोटर वाइंडिंग को सेकेंडरी वाइंडिंग कहते है।
• ट्रांसफॉर्मर की तरह ही इंडक्शन मोटर में भी प्राइमरी वाइंडिंग से सेकेंडरी वाइंडिंग में विधुत वाहक बल उत्पन्न होता है।
इंडक्शन मोटर और ट्रांसफॉर्मर में अन्तर केवल इतना है कि ट्रांसफॉर्मर में टाॅर्क उत्पन्न नहीं होता, जबकि इंडक्शन मोटर में टाॅर्क उत्पन्न होता है। इसलिए ट्रांसफॉर्मर घुमता नहीं, लेकिन इंडक्शन मोटर घूमती है। इसलिए इंडक्शन मोटर को डाइनेमिक ट्रांसफॉर्मर कहते है। 

प्र_4 इंडक्शन मोटर को असिन्क्रोनस मोटर क्यों कहते है ?

क्योंकि इंडक्शन मोटर सिन्क्रोनस गति पर नहीं चलती है,यह असिन्क्रोनस गति पर चलती है,जो सिन्क्रोनस गति के बहुत नजदीक होती है पर सिन्क्रोनस गति से कम होती है।

प्र_5 इंडक्शन मोटर सिन्क्रोनस गति पर क्यों नहीं चल सकती ?

क्योंकि सिन्क्रोनस गति पर इंडक्शन मोटर में उत्पन्न टाॅर्क का मान शून्य हो जाता है। इसलिए इंडक्शन मोटर सिन्क्रोनस गति पर नहीं चल सकती है।

प्र_6 रोटर के सिन्क्रोनस गति पर चलने पर इंडक्शन मोटर में उत्पन्न टाॅर्क का मान शून्य क्यों हो जाता है ?

क्योंकि सिन्क्रोनस गति पर स्टेटर का चुम्बकीय क्षेत्र और रोटर दोनों की गति एक समान हों जाती है, अर्थात् दोनों के बीच जो सापेक्ष गति होती है वो शून्य हो जाती है, इसलिए प्रेरण (induction) का जो प्रभाव होता है वह समाप्त हो जाता है जिससे प्रेरित धारा का मान शून्य हो जाता है। इसी कारण उत्पन्न टाॅर्क का मान शून्य हो जाता है।

प्र_7 थ्री फेज इंडक्शन मोटर के घूमने की दिशा किन चीजों पर निर्भर करती है ? 

थ्री फेज इंडक्शन मोटर के घूमने की दिशा उसके फेज अनुक्रम (phade sequance) पर निर्भर करती है।

प्र_8 एक थ्री फेज इंडक्शन मोटर के घूमने की दिशा को किस प्रकार बदला जा सकता है ?

सप्लाई के तीन लाइन तारों में से किन्हीं दो तारों की ध्रुवता (polarity) को आपस में बदलकर, मोटर के घूमने की दिशा को सफलतापूर्वक बदला जा सकता है।

प्र_9 थ्री फेज इंडक्शन मोटर के प्रचालन (opration) का प्रमुख आधार क्या है ?

स्टेटर पर स्थापित थ्री फेज वाइंडिंग द्वारा उत्पन्न घूर्णी चुम्बकीय क्षेत्र (rotating magnetic field) जिसके अन्दर घूर्णक (rotor) अपने धुरे पर स्थापित रहता है।

प्र_10 इंडक्शन मोटर की आरम्भिक धारा (starting current) बहुत उच्च क्यों होती है ?

क्योंकि यह शुरुआत में लघुपथित परिणामित्र (short circuit transformer) की तरह कार्य करती है।

प्र_11 स्लिप रिगं और बिना स्लिप रिगं थ्री फेज इंडक्शन मोटर में से किस मोटर का टाॅर्क अधिक होता है और क्यों ?

स्लिप रिगं वाली थ्री फेज इंडक्शन मोटर का टाॅर्क अधिक होता है क्योंकि इसके घूर्णक का प्रतिरोध अधिक होता है और घूर्णक पर लगने वाले टाॅर्क का मान घूर्णक के प्रतिरोध के समानुपाती होता है।

प्र_12 इंडक्शन मोटर में घूर्णक के खाॅचों को तिरछा क्यों रखा जाता है ?

घूर्णक के खाॅचें तिरछे रखने से घूर्णक और स्टेटर के खाॅचें एक दूसरे के ठीक ऊपर व नीचे नहीं आते है और इससे मोटर में जकडन प्रभाव कम हो जाता है।
इससे स्टेटर और रोटर के बीच चुम्बकीय अभिबन्धन (magnetic locking) कम हो जाती है।
इससे मोटर में चुम्बकीय भिनभिनाहट ध्वनि कम हो जाती है, जिससे शोर कम होता है और मोटर शांतिपूर्वक चलतीं है।

इसे भी देखें : three phase induction motor in hindi

प्र_13 इंडक्शन मोटर का स्टार्टिगं टाॅर्क किस प्रकार बढ़ाया जा सकता है ?

इंडक्शन मोटर का स्टार्टिगं टाॅर्क रोटर सर्किट का प्रतिरोध बढाकर बढ़ाया जा सकता है, लेकिन रोटर प्रतिरोध को बढ़ाकर केवल स्लिप रिगं इंडक्शन मोटर का टाॅर्क ही बढ़ाया जा सकता है यह स्कुवैरल केज इंडक्शन मोटर में सम्भव नहीं है क्योंकि इसके रोटर की वाइंडिंग स्थायी रूप से शाॅर्ट सर्किट रहतीं है।

प्र_14 ट्रांसफॉर्मर की अपेक्षा इंडक्शन मोटर का शक्ति गुणांक कम क्यों होता है ?

ट्रांसफॉर्मर का चुम्बकीय परिपथ बन्द होने के कारण इसमें वायु अंतराल नहीं होता है, जबकि इंडक्शन मोटर में वायु अंतराल होता है, इसलिए ट्रांसफॉर्मर की अपेक्षा इंडक्शन मोटर में फ्लक्स क्षरण (flux leakage) अधिक होता है, जिससे ट्रांसफॉर्मर की अपेक्षा इंडक्शन मोटर में चुम्बकन धारा (magnetising current) अधिक होती है। इसलिए इंडक्शन मोटर का शक्ति गुणांक ट्रांसफॉर्मर से कम होता है।
Er. Chand अगस्त 25, 2021
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 प्र_1 प्रत्यावर्तक (Alternator) किसे कहते है ?

उ०_ प्रत्यावर्ती धारा जेनरेटर को प्रत्यावर्तक कहते है। जो यांत्रिक शक्ति को विधुत शक्ति में बदलता है। 

प्र_2 तुल्यकाली (Synchronous) जेनरेटर क्या है ?

वह प्रत्यावर्ती धारा जेनरेटर जो किसी टरबाइन या इंजन द्वारा तुल्यकाली गति (Synchronous speed) पर चलाया जाता है और जो स्थिर आवृत्ति की प्रत्यावर्ती वोल्टेज ऊत्पन्न करता है तुल्यकाली जेनरेटर कहलाता है।

प्र_3 तुल्यकाली गति क्या होती है ?

किसी प्रत्यावर्ती विधुत मशींन की वह एक समान गति जो मशींन की वोल्टेज की आवृत्ति (f) और मशींन के चुम्बकीय ध्रुवों (P) से एक निश्चित संबंध रखती है वह उस मशींन की तुल्यकाली गति कहलाती है। इसे Ns से प्रर्दशित करते है। सूत्र के रूप में इसे निम्न प्रकार लिखा जा सकता है

    Ns = 120f/P    चक्र प्रति सेकेण्ड(r.p.m)

प्र_4 प्रत्यावर्तक किन प्रमुख अंगों से मिलकर बना होता है ?

प्रत्यावर्तक दो मुख्य अंगों स्थाता (Stator) और घूर्णक (Rotor) से मिलकर बना होता है।

प्र_5 प्रत्यावर्तक के चुम्बकीय क्षेत्र को किस प्रकार उत्तेजित किया जाता है ?

प्रत्यावर्तक की साफ्ट पर एक छोटा डी सी शंट जेनरेटर आरोपित करके इस शंट जेनरेटर से उत्पन्न होने वाली डी सी सप्लाई से उत्तेजित किया जाता है।

प्र_6 स्थिर आवृत्ति पर किसी प्रत्यावर्तक को अधिकतम तुल्यकाली गति पर चलाने के लिए उसमें चुम्बकीय ध्रुवों की संख्या कितनी रखीं जाती है ?

प्रत्यावर्तक को अधिकतम गति पर चलाने के लिए उसके घूर्णक पर ध्रुवों की संख्या दो रखीं जाती है।

प्र_7 प्रत्यावर्तक की ऊत्पन्न वोल्टेज को किस प्रकार नियन्त्रित किया जाता है ?

चुम्बकीय क्षेत्र उत्तेजन के परिवर्तन द्वारा नियंत्रित किया जाता है।

प्र_8 प्रत्यावर्तक की निर्धारण क्षमता या निर्गत को किस मात्रक में व्यक्त किया जाता है ?

छोटे प्रत्यावर्तको का निर्धारण किलो वोल्ट एम्पीयर (kvA) में और अधिक क्षमता वाले अल्टरनेटरो का निर्धारण मेगावोल्ट एम्पीयर (MvA) में व्यक्त किया जाता है।

प्र_9 MVA,KVA और VA मात्रको में क्या सम्बन्ध है ?

1 MVA = 1000KVA = 1000000 VA

प्र_10 प्रत्यावर्तक का वोल्टेज नियमन (voltage regulation) ऋणात्मक कब होता है ?

जब प्रत्यावर्तक पर लगने वाले विधुत भार का शक्ति गुणांक अग्रगामी (leading) होता है।

प्र_11 छोटे ए सी जेनरेटर और डी सी जेनरेटर में क्या अन्तर होता है ?

ए सी जेनरेटर के द्वारा यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता है जबकि डी सी जेनरेटर द्वारा यांत्रिक ऊर्जा को डी सी विधुत ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता है। इसका मुख्य कारण यह है कि ए सी जेनरेटर में घूर्णक पर स्थापित आर्मेचर वाइंडिंग सर्पी वलयो (slip ring) से जुड़ी होती है जबकि डी सी जेनरेटर में घूर्णक पर स्थापित आर्मेचर वाइंडिंग विभक्त वलयो (split ring) से जुड़ी होती है जिनके समूह को दिक्परिवर्तक (commutator) कहते है।

प्र-12 बड़े प्रत्यावर्तको में शीतलन के लिए निम्न में से किसका उपयोग किया जाता है :

(1) पंखा

(2) एयर कंडीशनर

(3) कूलर

(4) वायु वाहिनिया

उत्तर-- (4) 

प्र-13 किसी अल्टरनेटर का विधुत वाहक बल कैसें बढाया जाता है :

(1) फ्लक्स बढाकर

(2) संधारित्र लगाकर 

(3) प्रतिरोध की मात्रा बढाकर

(4) वोल्टेज कम करके

उत्तर-- (1) 

प्र-14 बेलनाकार ध्रुव प्रारूपि रोटर का प्रयोग कितनी गति के अल्टरनेटर के लिए किया जाता है :

(1) 150 से 300 घूर्णन प्रति मीनट 

(2) 300 से 1000 घूर्णन प्रति मीनट 

(3) 3000 से 6000 घूर्णन प्रति मीनट

(4) 1500 से 3000 घूर्णन प्रति मिनट 

उत्तर-- (4) 

प्र-15 घूर्णन प्रत्यावर्तक आर्मेचर मे ए सी वोल्टेज कहा से मिलता है :

(1) आर्मेचर से

(2) रोटर से

(3) स्लिप रिंग से

(4) कम्यूटेटर से

उत्तर-- (3) 

प्र-16 अल्टरनेटर मे आर्मेचर प्रतिक्रिया सबसे अधिक किससे प्रभावित होती है ।

अल्टरनेटर मे आर्मेचर प्रतिक्रिया सबसे अधिक भार के शक्ति गुणांक से प्रभावित होती है। क्योंकि जब अल्टरनेटर पर भार डालते है तब आर्मेचर कुण्डलियों में धारा प्रवाहित होती है और इस धारा के कारण फ्लक्स ऊत्पन्न होता है जो अल्टरनेटर मे लगे मुख्य ध्रुवों से ऊत्पन्न होने वाले फ्लक्स को कमजोर कर देता है। और उनके बीच क्राॅस चुम्बकन पैदा कर देता है।



                  
 
                 


Er. Chand अगस्त 24, 2021
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 आज हम पड़ेंगे अल्टरनेटर में होने वाली हानियों के बारे में अल्टरनेटर एक ए सी वोल्टेज ऊत्पन्न करने वाली मशींन है जिसके कुछ अंग स्थिर होते है और कुछ अंग घूमने वाले होते है। अल्टरनेटर के इन्ही अंगों में हानियां उत्पन्न होती है। इन हानियों को हम इस लेख में अच्छे से समझेंगे।

सभी मशीनों की कार्य कुशलता उनके आउटपुट पर निर्भर करती है जिस मशींन का आउटपुट जितना अच्छा होता है वह मशींन उतनी ही अच्छी मानी जाती है। हर मशींन का आउटपुट उसमें होने वाली शक्ति हानियों पर निर्भर करता है। जितनी कम मशींन में हानियां होती है उतना ही अच्छा मशींन का आउटपुट होता है ‌‌‌‌‌‌‌‌‌

इसलिए मशींन का आउटपुट जानने के लिए इन हानियों के बारे में समझना जरूरी होता है। अल्टरनेटर में तीन प्रकार की हानियां होती है।

(1) लौह हानियां (iron losses)

ये हानियां अल्टरनेटर की कोर में उत्पन्न होती है। अल्टरनेटर में होने वाली भंवर धारा और शैथिल्य हानियों को एक जगह मिला दिया जाए तो इन्हें लौह हानियां कहतें है। इन हानियों को कोर हानियां, चुम्बकीय हानियां, स्थिर हानियां आदि नामों से भी जाना जाता है। ये हानियां आर्मेचर कोर, आर्मेचर खाॅचों और पोलों के नालों के लौहें वाले अंगों में चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन होने के कारण उत्पन्न होती है। 

इन हानियों पर भार के बढ़ने या घटने का कोई फर्क नहीं पड़ता है क्योंकि ये हानियां अल्टरनेटर की कोर में होती है और इन्हे उस वक्त फिक्स कर दिया जाता है जब अल्टरनेटर की कोर को बनाया जाता है। इसलिए ये हानियां फिक्स रहती है और इन पर भार के कम या ज्यादा होने का कोई फर्क नहीं पड़ता है।

(2) ताम्र हानियां (copper losses) 

ताम्र हानियां अल्टरनेटर की वाइंडिंग में होती है। अल्टरनेटर की वाइंडिंग में बहने वाली धारा के कारण अल्टरनेटर की वाइंडिंग में गर्मी पैदा हो जाती है। इस गर्मी को ही ताम्र हानियां कहते है। क्योंकि ये हानियां धारा की वजह से उत्पन्न होती है इसलिए ये पूरी तरह से धारा पर ही निर्भर करती है। अल्टरनेटर में ये हानियां तीन अंगों में होती है।

• आर्मेचर ताम्र हानियां___ये हानियां आर्मेचर के प्रतिरोध और आर्मेचर में प्रवाहित होने वाली धारा के कारण आर्मेचर में गर्मी उत्पन्न हो जाती है जिससे आर्मेचर हानियां होती है।

• फिल्ड ताम्र हानियां___ये हानियां फिल्ड वाइंडिंग के प्रतिरोध और उसमें प्रवाहित होने वाली धारा के कारण गर्मी पैदा होने के कारण उत्पन्न होती है।

• ब्रश ताम्र हानियां___ये हानियां बहुत कम होती है इसलिए इन्हें शून्य के बराबर ही माना जाता है। ये हानियां सर्पी वलयो और ब्रुशों के बीच सम्पर्क प्रतिरोध के कारण गर्मी बनने के कारण होती है।

(3) यांत्रिक हानियां (mechanical losses)

ये हानियां अल्टरनेटर के जो घूमने वाले अंगों में घर्षण होने के कारण ऊत्पन्न होती है। जब दो अंगों के बीच आपस में घर्षण होता है तब होती है। बियरिंग, स्लिप रिगं, वायु अंतराल में रोटर पर वायु का दबाव बनने से घर्षण उत्पन्न होता है जिससे ये हानियां पैदा हो जाती है।

अगर आपके मन में इस पोस्ट को पढ़ने के बाद भी कोई सवाल रह जाता है तो आप हमें कमेंट करके अपने सवाल का जवाब पा सकते है
आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद

Er. Chand अगस्त 20, 2021
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 अल्टरनेटर की रेटिंग kvA में लिखते है। Kw में क्यों नहीं लिखतें है आज हम इस पर विचार करेंगे और पता लगायेंगे कि Why alternator rating in kvA in hindi अल्टरनेटर की रेटिंग kvA में क्यों होती है और kw में क्यों नहीं होती।

सबसे पहले यह जान लेते है कि रेटिंग क्या होती है। रेटिंग को हिंदी में निर्धारण कहते है। किसी भी मशींन की रेटिंग उस मशींन का अधिकतम मान होता है जो एक समान रहता है जिसमें कोई भी बदलाव नहीं आता है। 

पहले हम डी सी जेनरेटर की बात कर लेते है क्योंकि डी सी जेनरेटर की रेटिंग kw में होती है। डी सी जेनरेटर की रेटिंग kw में इसलिए होती है क्योंकि डी सी परिपथों का शक्ति गुणांक यूनिटी यानी एक होता है जिससे डी सी परिपथ में kw और kvA एक दूसरे के बराबर होते है। 

Kw = V A Cos0     Cos0 = 1

Kw = V A 

KvA = V A  

KvA = Kw

डी सी परिपथों का शक्ति गुणांक (power factor)यूनिटी होने के कारण ही डी सी परिपथों में kw और kvA बराबर होते है। इसलिए डी सी जेनरेटर की रेटिंग kw में होती है।


अल्टरनेटर एक ए सी जेनरेटर होता है जो ए सी सप्लाई पर चलता है और ए सी सप्लाई का शक्ति गुणांक समय के साथ बदलता रहता है इसलिए ये यूनिटी नहीं होता है।

अल्टरनेटर का शक्ति गुणांक अल्टरनेटर पर लगायें गयें भार पर निर्भर करता है भार के बदलने के साथ शक्ति गुणांक भी बदलता रहता है। तो इसलिए अल्टरनेटर की रेटिंग kw में नहीं करते है।

इससे रिलेटेड इस पोस्ट को देखें : thermal power plant kya hota hai

इसका एक कारण यह भी है कि अल्टरनेटर के आर्मेचर में होने वाली हानिया आर्मेचर प्रतिरोध और आर्मेचर धारा पर निर्भर करती है। ये हानियां शक्ति गुणांक पर किसी भी प्रकार निर्भर नहीं करती है। इसलिए अल्टरनेटर की रेटिंग भी शक्ति गुणांक पर निर्भर नहीं करती तो इस वजह से भी अल्टरनेटर की रेटिंग kw में नहीं करते है। 

इस लेख में आप जान गयें होंगे कि Why alternator rating in kvA in hindi अल्टरनेटर की रेटिंग kw में क्यो नही करते। अगर आपको समझने में कोई भी समस्या आ रही है तो आप हमें कमेंट करके अपने सवाल का जवाब पा सकते है। 

Er. Chand अगस्त 19, 2021
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 अल्टरनेटर या सिन्क्रोनस मशींन क्या है

अल्टरनेटर एक ऐसी रोटेटिंग मशींन होती है जो प्रत्यावर्ती धारा वोल्टेज बनाती है। इसके द्वारा यांत्रिक ऊर्जा को प्रत्यावर्ती विधुत ऊर्जा में बदला जाता है। इसलिए इसे प्रत्यावर्ती धारा जेनरेटर भी कहा जाता है। अल्टरनेटर को शुरुआत में एक प्राइम मूवर के द्वारा घुमाया जाता है। ये प्राइम मूवर एक इंजन या टरबाइन होता है। 

जब अल्टरनेटर को इंजन से चलाया जाता है तब इसे इंजन अल्टरनेटर सेट, डीजल अल्टरनेटर सेट और डीजल जेनरेटर सेट के नाम से जाना जाता है। और जब अल्टरनेटर को टरबाइन से चलाया जाता है तब इसे टर्बो अल्टरनेटर, वाटर टर्बो अल्टरनेटर, स्टीम टर्बो अल्टरनेटर और गैस टर्बो अल्टरनेटर के नाम से जाना जाता है। थर्मल पॉवर प्लांट और गैस पाॅवर प्लांट में इन्ही अल्टरनेटर के द्वारा बिजली बनाईं जाती है।
आज कल लगभग सभी बिजली घरों पर इन्ही अल्टरनेटरों का प्रयोग करके प्रत्यावर्ती धारा वोल्टेज को बनाया जा रहा है।

           अल्टरनेटर का कार्य सिद्धान्त

अल्टरनेटर का कार्य सिद्धान्त डी सी जेनरेटर के समान ही होता है क्योंकि डी सी जेनरेटर के आर्मेचर में उत्पन्न होने वाला गतिकिय विधुत वाहक बल भी एक ए सी वोल्टेज होता है। जिसको कम्यूटेटर के द्वारा डी सी वोल्टेज में बदल दिया जाता है। यदि डी सी जेनरेटर में कम्यूटेटर के स्थान पर स्लिप रिगं लगा दें तो ब्रुशों के आर पार ए सी वोल्टेज प्राप्त होगीं 

अल्टरनेटर में डी सी जेनरेटर की अपेक्षा अलग से तीन परिवर्तन किये जाते है। 
• इसमें आर्मेचर को स्टेटर पर लगाया जाता है।
• और फिल्ड को रोटर पर स्थापित किया जाता है।
• अल्टरनेटर सेल्फ एक्साइटेड नहीं होते है इसे एक्साइटेड करने के लिए कम वोल्ट की डी सी सप्लाई देने के लिए रोटर की साफ्ट पर एक डी सी शंट जेनरेटर को स्थापित किया जाता है।
रोटर को डी सी सप्लाई देकर प्राइम मूवर की सहायता से घुमाया जाता है जिससे रोटर के अन्दर फ्लक्स बनता है इस फ्लक्स का रोटर के चालकों द्वारा छेदन किया जाता है फ्लक्स का छेदन होने से स्टेटर की आर्मेचर वाइंडिंग में एक गतिकीय विधुत वाहक बल उत्पन्न होता है। यही अल्टरनेटर के द्वारा उत्पन्न होने वाली ए सी वोल्टेज होती है। 

अल्टरनेटर इस प्रत्यावर्ती विधुत वाहक बल को कई सारे अंगों की मदद से उत्पन्न कर पाता है अगर ये अंग न हो तो अल्टरनेटर के लिए बिजली बनाना मुमकिन न होता। तो इन मुख्य अंगों के बारे में हम नीचे बिस्तार से पढ़ेंगे।

                      स्थाता(Stator)

स्टेटर ढलवां लोहे का बना हुआ मजबूत व टिकाऊ ढाॅचा होता है जिसके नीचे के भाग में जमीन पर रखने के लिए पैर लगें होते है। इस ढाॅचें के अन्दर खाॅचों को बनाकर आर्मेचर वाइंडिंग को डाला जाता है इसके ऊपर शीतलन वाहिनीयाॅ बनाई जाती है जो आर्मेचर वाइंडिंग की गर्मी को कम करती है। ये ढाॅचा मशींन को रोककर रखता है और इस पर लगे अंगों को सुरक्षा प्रदान करता है।

डी सी मशींन की तरह अल्टरनेटर में भी स्टेटर होता है किसी भी मशींन में रुकें हुए अंग को स्टेटर कहते है। अल्टरनेटर में स्टेटर की परिभाषा ऐसे दें सकते है। "अल्टरनेटर के स्थिर अंगों के समूह को स्टेटर कहते है।" सभी अल्टरनेटर में आर्मेचर को स्टेटर पर स्थापित किया जाता है। इसलिए अल्टरनेटर में आर्मेचर वाइंडिंग को स्टेटर वाइंडिंग,आर्मेचर कोर को स्टेटर कोर और आर्मेचर स्लोट को स्टेटर स्लोट कहते है। स्टेटर पर ये अंग लगें होते है।

• लिफ्टिगं बोल्ट (lifting bolt)
• पट्ट (name plate)
• टर्मीनल बोक्स (tarminal box)
• पाद (foot)
• फिक्सिगं होल (fixing holl) 
• इनर फिक्सिंग स्लोट (inner fixing slot)
• इनर फिक्सिंग टीथ (inner fixing teeth)
• आर्मेचर कोर (armeture core)
• आउटर फिक्सिंग स्लोट (outer fixing slot)
• आउटर फिक्सिंग टीथ (outer fixing teeth)
• आर्मेचर कोर स्लोट (armeture core slot)

         आर्मेचर कोर (Armeture core)

आर्मेचर कोर को स्टेटर कोर भी कहते है क्योंकि आर्मेचर कोर को स्टेटर फ्रेम में स्लोट कट करके डाला जाता है। इन कोर को सिलिकॉन स्टील की पटलित पत्तियों से बनाया जाता है। इन पत्तियों को विधुतरोधी के पतले लेप से वार्निश किया जाता है। अल्टरनेटर के अन्दर ये कोर वृत्ताकार बनाई जाती है।

             स्थाता खाॅचें (Stator slot)

इंजीनियरिंग भाषा में खाॅचों को स्लोट कहते है जिस स्थान पर वाइंडिंग को लगाया जाता है उस जगह को खाॅचें कहते है। खाॅचों को स्टेटर फ्रेम में बनाया जाता है अल्टरनेटर में की प्रकार के खाॅचों का प्रयोग किया जाता है जिनके बारे में हम नीचे पढ़ेंगे।

                   खुलें खाॅचें (open slot)

इन खाॅचो में वाइंडिंग को आसानी से डाला और निकाला जा सकता है इनमें वाइंडिंग की मरम्मत करने में भी कम समय लगता है। इसलिए इन खाॅचों का उपयोग सबसे अधिक किया जाता है।
इन खाॅचो की सबसे बड़ी कमी यह होती है इनके कारण वायु अंतराल में चुम्बकीय फ्लक्स गुच्छों के रूप में फैलता है। जिससे प्रेरित विधुत वाहक बल में अधिक ऊर्मिकायें पैदा हो जाती है। इसलिए इन खाॅचों का उपयोग केवल स्टेटर पर किया जाता है।

            अर्ध खुलें खाॅचें (semi open slot)

इन खाॅचो में काॅयल को डालना और निकालना मुश्किल होता है इनमें काॅयल को एक साथ स्थापित नहीं करते है। बल्की इनमें चालकों को एक एक करके फैसाना पढ़ता है। खुलें खाॅचों की अपेक्षा इन खाॅचो का उपयोग कम किया जाता है। इन खाॅचो को केवल उच्च गति वाले घूर्णक पर ही बनाया जाता है।

                  बन्द खाॅचें (close slot)

इन खाॅचो में वाइंडिंग को भरना बहुत मुश्किल होता है इनमें वाइंडिंग को भरने में बहुत समय लगता है और वाइंडिंग भरने का खर्चा भी अधिक आता है। इसलिए इन खाॅचों का उपयोग बहुत कम किया जाता है। लेकिन इन खाॅचो में एक अच्छीं बात होती है ये वायु अंतराल में चुम्बकीय फ्लक्स को फैलने नहीं देते है।

        स्थाता कुण्डलन (Stator winding)

अल्टरनेटर में स्थाता कुण्डलन को आर्मेचर वाइंडिंग भी कहा जाता है क्योंकि अल्टरनेटर में आर्मेचर वाइंडिंग को स्थाता पर ही खाॅचें बनाकर उनके अन्दर भरा जाता है। वाइंडिंग को बनाने के लिए ताॅबें के तार का उपयोग किया जाता है।

थ्री फेज सिंक्रोनस मशींन में तीन आर्मेचर वाइंडिंग का प्रयोग किया जाता है। इन तीनों वाइंडिंग को एक दूसरे से 120 डिग्री के कोण पर व्यवस्थित किया जाता है। 
उच्च क्षमता वाले अल्टरनेटर की स्थाता कुण्डलन में खोखलें चालकों की काॅयल बनाई जाती है। क्योंकि अल्टरनेटर के लगातार चलने के कारण अल्टरनेटर की गर्मी बहुत बढ़ जाती है। इसकी गर्मी को कम करने के लिए खोखलें चालकों में विधुतरोधी शीतलन पदार्थ का प्रवाह कराया जाता है जिससे चालकों की गर्मी कम हो जाती है। 
चालकों की गर्मी को कम करने के लिए विधुतरोधी शीतलन पदार्थ आसुत जल या हाइड्रोजन गैस का प्रयोग किया जाता है।

                     घूर्णक (Rotor)

अल्टरनेटर के घूमने वाले अंग को घूर्णक कहते है। घूर्णक अल्टरनेटर का एक मुख्य अंग होता है। अल्टरनेटर को घूर्णक की साफ्ट के द्वारा ही इनपूट प्राइम मूवर की सहायता से दी जाती है। अल्टरनेटर में अधिकतर दो प्रकार के घूर्णकों का उपयोग किया जाता है। जिनके बारे में नीचे बिस्तार से बताया गया है।

समुन्नत ध्रुव प्रारूपी घूर्णक (Salient pole type Rotor) 


समुन्नत ध्रुव प्रारूपी घूर्णक को उभरा ध्रुव घूर्णक भी कहते है क्योंकि इसके जो पोल होते है वो आगे की और उभरे हुए होतें है। इस घूर्णक पर अधिक पोल बनें होते है जिनकी संख्या 12 से 120 के बीच में रहती है। इसलिए इस घूर्णक की गति कम होती है इस घूर्णक की अधिकतम गति 500 आर पी एम होती है इसलिए इसे कम गति वाला घूर्णक भी कहते है। 

इस घूर्णक की चौड़ाई अधिक (3m से 6m)  होती है और इसकी लंबाई कम (0.5 से 1.5m) होती है। इसलिए ये वजन में बहुत ज्यादा भारी होतें है और चौड़ाई में अधिक स्थान घेरते है। इस घूर्णक को ऊर्ध्वाधर यानी इसकी साफ्ट ऊर्ध्वाधर दिशा में होती है। ये घूर्णक चलते हुए अधिक आवाज ऊत्पन्न करता है। 
इस घूर्णक की गति कम होने के कारण इनका उपयोग डीजल इंजन अल्टरनेटर और वाटर टर्बो अल्टरनेटर में किया जाता है।

चिकना बेलनाकार घूर्णक (Smooth cylindrical Rotor)

इस घूर्णक के पोल चिकने और बेलनाकार होते है इसलिए इसे चिकना बेलनाकार घूर्णक कहते है। इस घूर्णक पर बनाये गये पोल कम होते है जिनकी संख्या 2,4 या 6 रखीं जाती है। पोलो की संख्या कम होने के कारण इस घूर्णक की गति अधिक होती है। इस घूर्णक की न्यूनतम गति 1000 आर पी एम और अधिकतम गति 3000 आर पी एम होती है। इसलिए इस घूर्णक को उच्च गति वाला घूर्णक भी कहते है। 

इस घूर्णक की चौड़ाई कम (0.5 से 1.5m) होती है और इसकी अक्षीय लंबाई अधिक (3 से 6m) होती है। इसलिए ये घूर्णक लंबाई में अधिक स्थान घेरनें वाले होते है। और ये चलने पर आवाज भी बहुत कम करते है। इस घूर्णक की गति अधिक होने के कारण इसका उपयोग स्टीम टर्बो अल्टरनेटर और गैस टर्बो अल्टरनेटर में किया जाता है।

Er. Chand अगस्त 12, 2021
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थ्री फेज इंडक्शन मोटर क्या है

हैलो फ्रेंड्स कैसे हैं आप सब आज हम बात करेंगे थ्री फेज इंडक्शन मोटर क्या होता है और ये कैसे काम करता है इसका कार्य सिध्दांत क्या है और इसका उपयोग हम कहां करते हैं चलिए बात करते हैं सबसे पहले three phase induction motor क्या होता है

 वह शुद्ध प्रत्यावर्ती धारा मोटर जो विधुत चुम्बकीय प्रेरण (electro magnetic induction) के सिध्दांत पर कार्य करती है इंडक्शन मोटर कहलाती हैं।या वह शुद्ध प्रत्यावर्ती धारा मोटर जिसका कार्य कारी सिध्दांत या प्रचालन सिध्दांत विधुत चुम्बकीय प्रेरण पर निर्भर करता है इंडक्शन मोटर कहलाती हैं। इसे अतुल्यकाली मोटर (Asynchronous motor)  भी कहते है क्योंकि यह तुल्यकाली गति पर नहीं चलती हैं। इंडक्शन मोटर को हम स्लिप रिगं मोटर भी कह सकते है क्योंकि इसमें स्लिप रिगं का प्रयोग करते है।

इंडक्शन मोटर एक ऐसी मोटर है जो शुद्ध प्रत्यावर्ती धारा (pure a.c) और शुद्ध प्रेरण (induction) के सिध्दांत पर कार्य करती हैं।इसे हम शुद्ध प्रत्यावर्ती धारा मोटर भी कह सकते हैं। क्योंकि इसके लिए सिन्क्रोनस मोटर की तरह ए.सी सप्लाई के साथ डी सी सप्लाई की आवश्यकता नहीं होती हैं।और ना इसमें डी सी मशीन की तरह ए.सी को डी सी में बदला जाता हैं। इसमें सिर्फ प्रत्यावर्ती शक्ति (a.c power) को यांत्रिक शक्ति (mechanical power) में ही प्रत्यक्ष बदला जाता हैं। इसलिए इसे शुद्ध प्रेरण (induction) मोटर भी कहते हैं।

प्रेरण मोटर को हम गतिक ट्रांसफॉर्मर   (dynamic transformer) भी कह सकते हैं क्योंकि यह एक ट्रांसफार्मर की तरह ही शुद्ध प्रत्यावर्ती धारा सप्लाई को लेती हैं और यह मोटर ट्रांसफॉर्मर की तरह ही शुद्ध प्रेरण के सिध्दांत (principle of induction) पर कार्य करती हैं। यह ट्रांसफॉर्मर की तरह ही दो कुण्डली प्राथमिक और द्वितीयक रखती हैं। और यह ट्रांसफॉर्मर की तरह ही प्राइमरी वाइंडिंग से सेकेंडरी वाइंडिंग में विधुत वाहक बल उत्पन्न करती हैं। 

ट्रांसफॉर्मर में टाॅर्क उत्पन्न नहीं होता इसलिए ट्रांसफॉर्मर गतीक (dynamic) नहीं होता है लेकिन थ्री फेज इंडक्शन मोटर में टाॅर्क उत्पन्न होता है और यह गतिक होती है इसलिए हम इंडक्शन मोटर को डायनैमिक ट्रांसफॉर्मर कहते हैं।

इंडक्शन मोटर को हम औधोगिक मोटर (industrial motor) भी कह सकते है क्योंकि यह अभियांत्रिकी क्षेत्र के अन्तर्गत उधोगों में सबसे ज्यादा प्रयोग में लायी जाने वाली मोटर हैं। यहां तक कि दुनिया भर में लगभग 75% मोटर से होने वाले काम three phase induction motor के द्वारा ही किये जाते हैं। 

3 फेज इंडक्शन मोटर का कार्य सिद्धान्त


इस भाग में हम बात करेंगे कि इंडक्शन मोटर का कार्य सिद्धान्त क्या होता है और ये कैसे काम करता है तो चलिए शुरू करते है
जब इंडक्शन मोटर की 3 फेज स्टेटर वाइंडिंग में 3 फेज सप्लाई दी जाती है तो इस वाइंडिंग में धारा बहने लगती है और इस धारा प्रवाह से एक घूर्णी चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है।इसे स्टेटर का रोटेटिंग मैगनेटिक फिल्ड कहते हैं। इसकी दिशा स्टेटर वाइंडिंग की धारा के फेज अनुक्रम पर निर्भर करती हैं। और इसकी गति तुल्यकाली गति (synchronous speed) होती है जिसे हम Ns से प्रदर्शित करते हैं
जब यह घूर्णी चुम्बकीय क्षेत्र रोटर वाइंडिंग के सम्पर्क में आता है तो उसमें भी एक प्रेरित विधुत वाहक बल उत्पन्न हो जाता है जो रोटर वाइंडिंग के शाॅर्ट सर्किट होने के कारण उच्च प्रेरित धारा में बदल जाता है। इसी धारा के कारण रोटर में भी एक चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है जिसे रोटर का चुम्बकीय क्षेत्र कहते है। यह स्टेटर के घूर्णी चुम्बकीय क्षेत्र पर क्रिया करता है इन दोनो चुम्बकीय क्षेत्र के आपस में क्रिया करने के कारण एक बल उत्पन्न होता है जो रोटर के धारावाही चालकों पर लगता है। जिसके कारण मोटर में एक बलाघूर्ण उत्पन्न होता है जिससे रोटर स्टेटर के घूर्णी चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा में घुमने लगता है।अब जैसे जैसे रोटर की गति (N) स्टेटर के घूर्णी चुम्बकीय क्षेत्र की गति (Ns) के नजदीक आती है वैसे वैसे सापेक्ष गति (Ns-N) कम होती जाती है इससे रोटर पर लगने वाला टाॅर्क भी कम होता जाता है। रोटर की गति, तुल्यकाली गति (Ns) के निकट ही होती है लेकिन हमेशा इससे कम ही रहती है क्योंकि रोटर के तुल्यकाली गति पर पहुंचते ही रोटर पर लगने वाला टाॅर्क शून्य हो जाता है।

3 फेज इंडक्शन मोटर की संरचना

दुसरी मशीनों की तरह ही इंडक्शन मोटर के भी दो भाग होते हैं
(1) स्थाता (stator)
(2) घूर्णक (rotor)

(1) स्टेटर (stator)

three phase induction motor के स्टेटर की संरचना 3 फेज सिंक्रोनस मशीन के स्टेटर के सामन ही होती है। इस दोनों मशीन के स्टेटरो की संरचना इतनी समान होती है कि समान आकार, फेज, कनेक्शन, क्षमता वाली मशीनों के स्टेटरो को आपस में बदला जा सकता हैं।

(2) घूर्णक (rotor) 

इंडक्शन मोटर में हम दो प्रकार के रोटरो का प्रयोग करते हैं
(1) पिंजरी कुण्डलीत घूर्णक ( cage wound rotor)
(2) कला कुण्डलीत घूर्णक (phase wound rotor)

(1)  केज वाउण्ड रोटर की संरचना

 केज वाउण्ड रोटर भी दो प्रकार के होते हैं
(1) सिंगल केज वाउण्ड रोटर
(2) डबल केज वाउण्ड रोटर

(1) सिंगल केज वाउण्ड रोटर

इस भाग में हम बात करेंगे सिंगल केज वाउण्ड रोटर की ये कैसे काम करता है और किस चीज का बना होता है
यह रोटर में भी दुसरे रोटरो की तरह ही स्लोट कटी हुई होती है और यह रोटर विधुतरोधी पतली वार्निश से लेपित की हुई लेमिनेशनो का बना होता है। इस रोटर की कोर में बन्द खाॅचे होते है जिनमें धातु की मोटी छड़ों को पिरोया जाता है और इन धातु की छड़ों के दोनों सिरों पर धातु के दो ऐण्ड रिंग्स को लगाकर शाॅर्ट सर्किट कर दिया जाता है इसलिए इसे बन्द खाॅचे वाली छड़ वाइंडिंग कहते है। इस बार वाइंडिंग के लिए किसी प्रकार के विधुतरोधी पदार्थ की आवश्यकता नहीं होती है। इस सिंगल केज वाउण्ड रोटर को हम काॅपर एलुमिनियम या मिश्रधातु, जैसे ब्रास, ब्रोन्ज आदि का बना होता है।

(2) डबल केज वाउण्ड रोटर


इस रोटर को हम डबल केज वाउण्ड रोटर इसलिए कहते है क्योंकि इस रोटर में डबल वाइंडिंग होती है इस रोटर में ऊपर और नीचे डबल खाॅचे होते है इसमें जो खाॅचे साफ्ट के पास होते है उन्हें आन्तरिक खाॅचे कहते है और ये खाॅचे पुरी तरह से बन्द होते है। इन खाॅचो में जो वाइंडिंग की जाती है उन्हें आन्तरिक वाइंडिंग कहते है। यह वाइंडिंग मोंटे तार से बनायी जाती है इसलिए इसे न्यून प्रतिरोध वाइंडिंग कहते है। three phase induction motor की साफ्ट से दूर वाले खाॅचो को ब्राहा खाॅचे कहते है और इनमें जो वाइंडिंग की जाती है उन्हें ब्राहा या ऊपर वाली वाइंडिंग कहते है। और इसको पतले चालकों से बनाया जाता है इसलिए इसका प्रतिरोध उच्च होता है और इसके खाॅचे आधे बन्द और आधे खुले होते है। स्टार्टिगं के समय अधिकतर धारा ऊपर वाली वाइंडिंग से ही बहती है जिसका प्रतिरोध उच्च होता है। इसलिए इस रोटर में उत्पन्न होने वाला स्टार्टिगं टाॅर्क सिंगल केज वाउण्ड रोटर की अपेक्षा उच्च होता है और भार के समय अधिकतर धारा निचे वाली वाइंडिंग से बहती है जिसका प्रतिरोध कम होता है जिससे रोटर आवृत्ति कम होने पर इसका प्रतिघात भी कम होता है।

(2) फेज वाउण्ड रोटर या स्लिप रिंग्स टाइप रोटर


इस रोटर में हम स्लिप रिगं का प्रयोग करते है जो रोटर की साफ्ट पर लगी होती है इसलिए इसे स्लिप रिगं रोटर भी कहते है इस रोटर में दो प्रकार के खाॅचे होते है खुले और अर्ध खुले खाॅचे बनें होते है। इन खाॅचो में स्टेटर के समान ही पतले चालकों की वाइंडिंग की जाती है और इसमें पोलो की संख्या स्टेटर के पोलो के बराबर ही रखीं जाती हैं स्टेटर में 3 फेज डेल्टा कनैक्टेड वाइंडिंग की जाती है जबकि रोटर पर 3 फेज स्टार कनैक्टेड वाइंडिंग की जाती है। इस स्टार कनैक्टेड वाइंडिंग के सिरों को प्रत्येक स्लिप रिगं से कनैक्ट किया जाता है और यह कार्बन ब्रुशो द्वारा स्टार कनैक्टेड स्टार्टिगं प्रतिरोध से कनैक्ट रहती है।
इस रोटर पर पतले तारो की वाइंडिंग होती है जिससे इसका प्रतिरोध उच्च होता है इसलिए इस रोटर में उत्पन्न स्टार्टिगं टाॅर्क, दोनों प्रकार के केज वाउण्ड रोटरो में उत्पन्न टाॅर्क से अधिक होता है।
इसमें स्लिप रिगं के द्वारा स्टार्टिगं प्रतिरोध जुड़ जाने के कारण इसका टाॅर्क और अधिक हो जाता है इसलिए स्लिप रिगं टाइप रोटर वाली इंडक्शन मोटर का प्रयोग हम वहां करते है जहां उच्च स्टार्टिगं टाॅर्क की आवश्यकता होती है।

three phase induction motor रोटर के घूमने की दिशा और उसमें उत्पन्न टाॅर्क

जब 3 फेज इंडक्शन मोटर के स्टेटर में 3 फेज सप्लाई दी जाती है तो स्टेटर की वाइंडिंग में धारा बहने लगती है जो घूर्णी चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न करती है। इस चुम्बकीय क्षेत्र को स्टेटर का फिल्ड कहते है। माना कि स्टेटर फिल्ड की दिशा क्लाॅकवाइज है।स्टेटर का यह चुम्बकिय क्षेत्र वायु अन्तराल से गुजरता हुआ रोटर के चालकों से टकराता है। रोटर में एक विधुत वाहक बल उत्पन्न होता है जिससे कारण चालकों पर एक बल लगता है जिससे एक टाॅर्क उत्पन्न हो जाता है। इस टाॅर्क के कारण रोटर स्टेटर फिल्ड की दिशा में घुमने लगता है।

3 फेज इंडक्शन मोटर के लाभ

(1) इसकी संरचना बहुत आसान और मजबूत टिकाऊ होती हैं।

(2) इसकी शुरुआत में किमत भी बहुत कम होती हैं

(3) जब मोटर घराब हो जाती है तो इसको ठीक कराने में भी कम किमत लगती हैं।

(4) इंडक्शन मोटर एक स्वचालित (self start) मोटर होती हैं।

(5) इसके लिए डी सी सप्लाई की आवश्यकता नहीं होती है यह सीर्फ ए सी सप्लाई पर ही चलती हैं।

(6) पूर्ण भार पर भी इसका शक्ति गुणांक सन्तोष जनक होता है।

(7) पूर्ण भार (full load) पर इसकी दक्षता (efficiency) उच्च होती हैं।

(8) भारतीय बाजारों में यह आसानी से मिल जाती हैं।

(9) यह एक स्थिर गति पर चलने वाली मोटर होती है।

(10) इसकी देखभाल करने की आवश्यकता बहुत कम होती हैं।

(11) इसमें सर्पी वलय के साथ ब्रुशो का प्रयोग नहीं होता है इसलिए इसमें स्पार्किगं की समस्या नहीं आती हैं।

3 फेज इंडक्शन मोटर की हानियां

(1) इंडक्शन मोटर पर भार बढ़ने पर इसकी गति कुछ कम हो जाती है।
(2) इंडक्शन मोटर की गति कम होने से इसकी दक्षता भी कम हो जाती है।
(3) जब इंडक्शन मोटर पर भार कम होता है तो इसकी दक्षता भी कम होती है।
(4) भार कम होने के कारण इसका शक्ति गुणांक भी कम हो जाता है।
(5) इसका शुरुआत में लगने वाला टाॅर्क सामान्य होता है।
(6) इसकी गति को नियंत्रित करने में बहुत दिक्कत आती है।

three phase induction motor का शक्ति गुणांक कम होने का कारण क्या है

इंडक्शन मोटर का शक्ति गुणांक कम होने का कारण काफी सारी वजह है इन वजहों को में आपको विस्तार पूर्वक निचे बता रहा हूं

(1) इंडक्शन मोटर का आकार

जी हां यह देखा गया है कि बड़ी इंडक्शन मोटरों की अपेक्षा छोटी इंडक्शन मोटरों का शक्ति गुणांक कम होता है तो हम इससे यह समझ सकते है कि इंडक्शन मोटर की क्षमता (capacity) घटने पर उसका शक्ति गुणांक भी कम हो जाता है।

(2) इंडक्शन मोटर में प्रयोग होने वाला पदार्थ

इंडक्शन मोटर में यह भी देखा गया है कि अगर इंडक्शन मोटर बनाने में प्रयोग किया जाने वाला पदार्थ घटिया गुणवत्ता (low quality) का है तो इससे भी इंडक्शन मोटर का शक्ति गुणांक कम हो जाता है। तों शक्ति गुणांक को बैटर रखने के लिए हमें अच्छी गुणवत्ता के पदार्थ का इस्तेमाल करना चाहिए।

(3) इंडक्शन मोटर को दी जाने वाली सप्लाई वोल्टेज

यदि इंडक्शन मोटर पर लगाया जाने वाला भार एक समान स्थिती में बना हुआ है तो इंडक्शन मोटर को दी जाने वाली सप्लाई वोल्टेज बढ़ जाती है जिसके कारण मोटर का शक्ति गुणांक कम हो जाता है क्योंकि वोल्टेज के बढ़ने से धारा का चुम्बकीय घटक बढ जाता है जिससे शक्ति गुणांक घट जाता है।

(4) इंडक्शन मोटर पर लगाया जाने वाला भार

थ्री फेज इंडक्शन मोटर पर लगाया जाने वाला भार जैसे जैसे घटता जाता है वैसे वैसे इंडक्शन मोटर का शक्ति गुणांक भी घटता जाता है और बिना भार के तो इंडक्शन मोटर का शक्ति गुणांक बहुत ज्यादा घट जाता है। कभी भी इंडक्शन मोटर को बिना भार के नहीं चलानी चाहिए। जहां तक हो सके इंडक्शन मोटर को पूर्ण भार पर ही चलानी चाहिए। क्योंकि पूर्ण भार पर ही इंडक्शन मोटर का शक्ति गुणांक सबसे अच्छा होता है।

इंडक्शन मोटर में क्राॅलिगं क्या होता है (Crawling of induction motor)

कभी कभी ऐसा हो जाता है कि इंडक्शन मोटर बहुत कम गति पर चलने लगती है तो इंडक्शन मोटर का इस कम गति पर चलना ही क्राॅलिगं कहलाता है।
ऐसा इसलिए होता है जब three phase induction motor में दी जाने वाली सप्लाई नोन साइनोसोडियल हो जिसके कारण स्टेटर में उत्पन्न होने वाला चुम्बकीय वाहक बल भी नोन साइनोसोडियल आकार का होता है जिसके कारण मोटर में हार्मोनिक्स उत्पन्न होते है हार्मोनिक्स फ्लक्स तरंगें उत्पन्न होने से मोटर की गति कम हो जाती है जो कि अपनी सामान्य गति का सात गुना तक कम हो जाती है।
इन हार्मोनिक्स फ्लक्स तरंगों की आवृत्ति बहुत उच्च होती है जिसके कारण मोटर में विकसित टाॅर्क कमजोर हो जाता है क्योंकि टाॅर्क फ्लक्स के समानुपाती होता है इसी वजह से मोटर बहुत कम गति पर चलने लगती है।



Er. Chand जुलाई 23, 2021
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