वाटहीन धारा क्या है | wattless current in hindi

 वाटहीन धारा क्या है

प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में जब ओमीय प्रतिरोध का मान शून्य होता है तो परिपथ में धारा तो प्रवाहित होती है परन्तु व्यय होने वाली औसत शक्ति शून्य होती है, यानी परिपथ में कोई भी ऊर्जा खर्च नहीं होती तो परिपथ में बहने वाली इस धारा को ही वाटहीन धारा कहते है।
जब किसी परिपथ में केवल प्रेरकत्व या संधारित्र है और प्रतिरोध का मान शून्य है तो धारा और वोल्टेज के बीच 90 डिग्री का कलान्तर होता है जिससे परिपथ का शक्ति गुणांक शून्य हो जाता है और सर्किट की पावर भी शून्य हो जाती है
Cos90 = 0
P = V rms × I rms Cos90 = 0
 
इसलिए इस सर्किट में बहने वाली धारा वाटहीन धारा होती है।

इस सिद्धांत का प्रयोग चोक कुण्डली में किया जाता है। शुद्ध प्रेरकत्व वाले प्रत्यावर्ती परिपथ के लिए तात्कालिक धारा I, वोल्टेज V और शक्ति P में वक्र को नीचे फोटो में दिखाया गया है। शक्ति समय वक्र समय अक्ष के सापेक्ष ठीक सममित आता है। इसका मतलब यह है कि एक चक्र के लिए परिपथ में व्यय औसत शक्ति शून्य होती है। एक चौथाई चक्र के दौरान प्रेरक विधुत स्त्रोत से ऊर्जा लेकर अपने अन्दर चुंबकीय क्षेत्र के रूप में संचित करता है, और अगले एक चौथाई चक्र के दौरान प्रेरक का चुंबकीय क्षेत्र शून्य हो जाता है यानी के प्रेरक स्त्रौत से ली गई ऊर्जा को वापस लोटा देता है। इस प्रकार प्रेरक विधुत स्त्रोत से कोई नेट ऊर्जा नहीं लेता है। 

शुद्ध धारिता वाले परिपथ में भी ऐसा ही होता है। संधारित्र एक चौथाई में जितनी ऊर्जा प्रत्यावर्ती स्त्रौत से विधुत क्षेत्र के रूप में लेता है। अगले एक चौथाई चक्र में वह उतनी ही ऊर्जा स्त्रौत को लोटा देता है और फिर अगले आधे चक्र में भी ऐसा ही होता है।
यही कारण है कि प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में धारा नियन्त्रण के लिए प्रेरकत्व और वोल्टेज नियन्त्रण के लिए धारिता को प्रयोग में लाया जाता है। इसके लिए प्रतिदिप्त नलिकाओं में चोक कुण्डली और पंखों में संधारित्र उपयोग में लाये जाते हैं। 

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