transformer in hindi : ट्रांसफार्मर का कार्य सिद्धांत

 ट्रांसफार्मर एक लौहे के टैंक में रखा ऐसा स्थिर यन्त्र होता है जो ए सी वोल्टेज को ( आवृत्ति को बिना बदले ) बढ़ा या घटा कर एक विधुत परिपथ से दूसरे विधुत परिपथ में भेजता है। ट्रांसफॉर्मर का उपयोग आज बड़े से बड़े और छोटे से छोटे उपकरणों में किया जा रहा है। एक तरफ ये बड़े ट्रांसफॉर्मर के रूप में सब स्टेशन पर पाॅवर ट्रांसफॉर्मर की तरह प्रयोग किया जा रहा है। और दूसरी तरफ ये छोटे ट्रांसफॉर्मर के रूप में चार्जर के अन्दर प्रयोग किया जा रहा है।

 चार्जर में एक step down transformer होता है। जो 220 वोल्ट सप्लाई को 12 वोल्ट में बदल देता है। चार्जर के अन्दर लगा रेक्टीफायर इस 12 वोल्ट ए सी सप्लाई को 12 वोल्ट डी सी सप्लाई में बदल देता है।ये 12 वोल्ट डी सी सप्लाई ही मोबाइल की बैटरी को चार्ज करने के लिए प्रयोग की जाती है। आज हम transformer के बारे में विस्तार से बात करेंगे। जैसे transformer in hindi,इसके भाग क्या क्या होते है,ये कितने प्रकार के होते है और इसका कार्य सिध्दांत क्या होता है तों चलिए शुरू करते है।

Transformer ( परिणामित्र ) क्या होता है

परिणामित्र (Transformer) एक ऐसा स्थिर यन्त्र (static device) हैं जिसका उपयोग प्रत्यावर्ती वोल्टेज (a.c voltage) के स्तर (level) को घटाने या बढ़ाने के लिए किया जाता हैं । यह विधुत ऊर्जा को फैराडे के विधुत चुम्बकीय प्रेरण के नियम पर एक सर्किट से दूसरे सर्किट में आवृत्ति (frequancy) में बिना परिवर्तन (change) किये पहुंचाता है ।

Transformer में एक चुम्बकीय कोर होती है जो कि उच्च पारगम्यता वाले पदार्थ सीलिकन स्टील (high permibility material silicon steel) की बनी होती हैं । इस पर दो winding लिपटी होती है जिन्हें high voltage और low voltage कहा जाता हैं । यही winding primary और secondary के रुप में जानी जाती हैं । Primary winding को सप्लाई सिस्टम से कनेक्ट करते हैं और secondary winding पर load कनेक्ट किया जाता हैं । 
जब सेकेण्डरी वाइंडिंग ओपन होती है और प्राइमरी को सप्लाई से जोड़ते हैं तब प्राइमरी वाइंडिंग में बहने वाली धारा नो लोड धारा (no load current) कहलाती हैं ।

(नो लोड धारा × प्राइमरी वाइंडिंग के फेरों), के कारण एक चुम्बकीय वाहक बल (magnetic motive force,mmf) उत्पन्न होता है जो कि कोर के अन्दर प्रतिवर्ति फलक्स (alternately flux) स्थापित करता है । इस फलक्स के कारण प्राइमरी वाइंडिग मे स्वः प्रेरण (self induction) विधुत वाहक बल (EMF) उत्पन्न होता हैं ।

इसे भी देखें : auto transformer in hindi

Transformer का कार्य सिद्धान्त

Transformer फैराडे के विधुत चुम्बकीय प्रेरण के सिध्दांत पर कार्य करता है। जब transformer की प्राइमरी साइड में ए सी सप्लाई को जोड़ा जाता है तों transformer की कोर में एक फ्लक्स उत्पन्न होता है। यह फ्लक्स समय के साथ परिवर्तित होता है। जिसके कारण प्राइमरी वाइंडिंग में एक विधुत वाहक बल उत्पन्न होगा। यह विधुत वाहक बल प्राइमरी वाइंडिंग में बहने वाली धारा का विरोध करता है (लैंज के नियम के अनुसार)। स्व:प्रेरण के कारण यह फ्लक्स सेकेंडरी वाइंडिंग से भी लिंक करेगा। जिससे सेकेंडरी वाइंडिंग में भी एक विधुत वाहक बल उत्पन्न होगा (अन्योयं प्रेरण के कारण)। और यदि सेकेंडरी वाइंडिंग पर भार को लगाया गया है तों उसमें एक विधुत धारा बहने लगेगी। इस धारा के द्वारा उत्पन्न होने वाला फ्लक्स प्राइमरी वाइंडिंग के फ्लक्स का विरोध करता है
 transformer in hindi Transformer में उत्पन्न होने वाला विधुत वाहक बल स्थिर होता है जिसकी दिशा का लैंज के नियम द्वारा पता लगाया जाता है।

Transformer के मुख्य भाग

यहां बात करेंगे हम transformer के जो main part होते है उनके बारे में जैसे हमने अभी ऊपर पड़ा है कि transformer में कोर होती है, वाइंडिंग होती, टैंक होता है और काफी सारे भाग होते है तो अब में आपको इनके बारे में एक एक करके आराम से समझाऊंगा।

                        क्रोड़ (Core)

Transformer की कोर को हम high permeability वाले पदार्थ से बनातें है ताकि कोर में हिटेरिसिस हानियां कम की जा सके। इन कोर को सीलिकन स्टील की काफी सारी पत्तियों को लेमिनेटेड करके वार्निश इंशुलेशन लगाकर बनाया जाता है लेमिनेशन करने से कोर का प्रतिरोध बढ़ जाता है। जिससे कोर में होने वाले eddy current loss कम हो जाते है। इस लेमिनेशन की मोटाई 0.35mm से 0.5mm रखते है। 
कोर को बनाने के लिए CRGO steel का प्रयोग भी किया जाता है।
CRGO ( Cold Rolled Grain Oriented ) 

प्राथमिक कुण्डली (primery winding)

Transformer की जिस कुण्डली को ए सी सप्लाई दी जाती है या transformer के जिस और इनपूट दिया जाता है। उसे transformer की प्राथमिक कुण्डली कहते है।

द्वितियक कुण्डली (secondary winding)

Transformer की जिस तरफ भार जोड़ा जाता है या जिस तरफ से transformer का आउटपुट प्राप्त होता है। उसे transformer की द्वितियक कुण्डली कहते है।


                   Conservator Tank

इस टैंक का इस्तेमाल large transformer या power transformer में किया जाता है ‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌power transformer काफी बड़े होते है। इनका उपयोग सब स्टेशन पर किया जाता है। इन transformer पर भार 24 घंटे रहता है जिससे ये बहुत गर्म हो जाते है। transformer की गर्मी को conservator tank के द्वारा ही बाहर निकाला जाता है। 
Conservator tank में तेल का स्तर tank के आयतन का 50 प्रतिशत होता है। इस टैंक में ऊपर की ओर एक छिद्र होता है। जब transformer का तेल गर्म हो जाता है तो गर्म तेल ऊपर conservator tank में आ जाता है। छिद्र के द्वारा तेल की गर्मी बाहर निकल जाती है और तेल ठंडा हो जाता है। ये तेल फिर से transformer tank में चला जाता है और ये प्रोसेस ऐसे ही चलता रहा है।

                             Brither


यह transformer के बाहर लगा एक डब्बा सा होता है। जिसके अन्दर सिलिका जैल को रखा जाता है। जब conservator tank के द्वारा transformer की गर्मी को बाहर निकाला जाता है तो उसी वक्त बाहरी वातावरण से नमी तेल में मिल जाती है जिससे तेल की प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है ‌‌‌‌‌‌‌तो तेल से इस नमी को दूर करने का काम सिलिका जैल करता है। सिलिका जैल इस नमी को अपने अन्दर शौख लेता है।
 जब सिलिका जैल को शुरुआत में ब्रिदर में रखा जाता है तो इसका रगं निला होता है जैसे जैसे ये नमी को शौखता जाता है इसका रगं गुलाबी रंग में बदलने लगता है और जब इसकी नमी शौखने की क्षमता खत्म हो जाती है इसका रंग डार्क गुलाबी हो जाता है। 

                        ब्कोल्ज रीलें 

Conservator tank और transformer tank के बीच ब्कोल्ज रीलें को लगाया जाता है। इस रीलें का काम हमे सूचित करना होता है। इस रिले के अन्दर एक इंडिकेटर लगा होता है जो तेल के स्तर को बताता है। और ये रिले transformer की protection भी करता है। जब transformer के अन्दर कोई छोटा फाल्ट आता है तो ये रीलें एक सिग्नल देता है और जब transformer के अन्दर खतरनाक फाल्ट आता है तो ये रीलें सप्लाई को trip कर देती है transformer in hindi 

              Transformer Tank

Transformer को एक लौहे से बने टैंक में रखा जाता है। यह मजबूत लौहे का बना होता है। ट्रांसफॉर्मर को इस टैंक में रख कर तेल भर दिया जाता है। ये तेल ट्रांसफॉर्मर को ठंडा करने का काम करता है और ट्रांसफॉर्मर की काॅयल के इंशूलेशन को खराब होने से बचाता है। और ये टैंक transformer को बाहरी वातावरण से होने वाले नुकसान से बचाता है। बारीश, आंधी, तूफान में ये transformer को सुरक्षा प्रदान करता है ‌ 

       Transformer की अर्थिगं

Transformer पूरे transmission system का एक मुख्य डाॅचा होता है। यदि transformer में खराबी आ जाये तो पूरी सप्लाई बन्द हो जाती है। सब स्टेशन पर इस्तेमाल होने वाले transformer काफी बड़े होते है। और इनकी शुरुआती किमत भी बहुत ज्यादा होती है। पूरे सब स्टेशन में transformer सबसे महंगा उपकरण होता है। इसलिए transformer की अर्थिगं करना बहुत जरूरी होता है। जिससे यदि कभी आसमानी बिजली transformer पर गिरती है तो transformer को कोई नुक्सान न पहुंचे। इसलिए transformer को आसमानी बिजली से बचाने के लिए इसकी अर्थिगं करना जरूरी है।

           Transformer के प्रकार

Transformer कई प्रकार के होते है। जैसे कुछ transformer कोर के आधार पर बनाये जातें है और कुछ transformer फेज के आधार पर बनाये जातें है। तों चलिए बात कर लेते है कुछ प्रमुख transformer के बारे में तों सबसे पहले बात करते है सब स्टेशन पर प्रयोग किया जाने वाला power transformer की

(1) Power transformer

पावर transformer  वह transformer हैं जिनका उपयोग जैनरेटिगं स्टेशन और टाॢन्समिशन में किया जाता है 250KVA से ऊपर के सभी transformer power transformer की श्रेणी में आते हैं । यह transformer 1-phase और 3-phase होते हैं ।
3-phase system में delta-delta, delta-star connection use किये जाते हैं ।
इन transformer पर कनेक्ट भार हमेशा full load रखा जाता हैं और हल्के भार (lightly load) पर इन्हे disconnect कर दिया जाता हैं ।
इनकी maximum efficiency full load पर रखी जाती हैं और iron and copper loss का रेशों 1ः1 रखा जाता हैं ।
इन transformer में उपयोग होने वाली flux density 1.5 tesla से 1.7 tesla के बीच होती है और वोल्टेज रेगुलेशन का मान 6-10% के नजदीक होता हैं ।

Cooling के लिए इनमें Oil cooling, forced air cooling, forced water cooling का उपयोग किया जाता हैं ।

(2) Distribution Transformer

वह transformer जो distribution में उपयोग होते हैं distribution transformer कहलाते हैं । इनकी रेटिंग अधिकतम 200KvA तक होती है इनमें उपयोग किये जाने वाले कनेक्शन delta-star और star star होते हैं । और इनकी maximum efficiency full load पर ना होकर near to full load होती हैं । इनके iron और copper loss का रेशों 1ः3 रखा जाता हैं । और इनका वोल्टेज रेगुलेशन लगभग 4-8% के बीच होता हैं । इनकी कोर की flux density लगभग 1.7tesla रखी जाती हैं । इनमें self oil cooling का उपयोग किया जाता हैं ।

(3) Three phase transformer

3-phase transformer का basic principle 1-phase transformer के समान ही है । इसकी प्राइमरी और सेकेंडरी में 3 pairs ह़ोते हैं । जिन्हें आवश्यकता अनुसार star और delta में जोडा जाता हैं ।

Connection के आधार पर ये transformer 4 प्रकार के होते हैं ।

(1) star star connection
(2) delta delta connection
(3) star delta connection
(4) delta star connection

Transformer की हानियां ( Losses of transformer )

Transformer में दो प्रकार की हानियां होती है

(1) स्थिर हानियां (constant loss) या लोह हानियां (iron loss) 
(2) अस्थिर हानियां (variable loss) या ताॅम्र हानियां (copper loss)

(1) स्थिर हानियां ( constant loss )

Transformer की कोर में होने वाले loss को लोह हानियां (iron loss) कहते हैं । चुकि कोर में स्थापित फलक्स प्रतिवर्ति व्यवहार (nature) का होता है । इसलिए कोर में दो प्रकार की हानियां उत्पन्न होती है
(a) hysteresis loss
(b) Eddy current loss

(a) Hysteresis loss

विधुत वाहक बल के प्रत्येक चक्कर के लिए hysteresis loop बनता है और प्रति सेकेण्ड बनने वाले hysteresis loop का मान

यहां
  Ph = hysteresis loss
   n = hysteresis coffiecient
   v = volume of core in meter qube
  Bmax = maximum flux density
  f = supply frequently
n का मान1.5-2.5 के बीच होता है और सीलिकन स्टील के लिए इसका मान 1.6 लिया जाता हैं ।

(b) Eddy current loss

प्रत्यावर्ती चुम्बकीय क्षेत्र के कारण ही कोर के अन्दर एक वोल्टेज उत्पन्न होती है जिससे बन्द पाथ मिलने के कारणeddy current उत्पन्न होती है यह eddy current कोर में eddy current loss उत्पन्न करती हैं । जिसका मान 

जहां
   Pe = eddy current loss
  Ke = constant
   t = thickness of core

(2) अस्थिर हानियां ( Variable loss ) 

Transformer की प्राइमरी और सेकेंडरी वाइंडिंग के कारण होने वाले I"×R losses copper loss कहलाते हैं

I" का मतलब सेकेण्डरी वाइंडिंग की धारा

हम जानते हैं कि प्राइमरी वाइंडिंग में बहने वाली धारा I' और सेकेंडरी वाइंडिंग में बहने वाली धारा I" हैं
यदि फुल लोड हो तो transformer में होने वाले टोटल लोस का मान full load copper loss कहलायेगा ।

Transformer का open circuit test

Transformer का open circuit test रेटेड वोल्टेज और रेटेड आवृत्ति पर किया जाता है। इस टैस्ट के द्वारा transformer की वाइंडिंग में होने वाले core loss का पता लगाया जाता है। 
इस टेस्ट को करने के लिए transformer की law voltage side का इस्तेमाल किया जाता है। क्योंकि law voltage side में law range वाले उपकरणों की आवश्यकता होगी। और ये उपकरण आसानी से मिल जाते है।
इस टेस्ट को law voltage side में करने से safety भी बनी रहती है।

                   Short circuit test

Short circuit test को transformer की high voltage वाली वाइंडिंग की साइड perform किया जाता है। इस टेस्ट के द्वारा transformer के copper loss का पता लगाया जाता है। 

Transformer का parallel operation

आज के समय में विधुत का उपयोग बहुत अधिक हो रहा है। फिर चाहे वो औधौगिक क्षेत्र हो या डोमेस्टिक क्षेत्र हर क्षेत्र में विधुत की जरूरत बढ़ती ही जा रही है। जैसे जैसे विधुत का उपयोग ज्यादा किया जाता है। वैसे वैसे transformer पर भी भार बढ़ता जाता है। जिससे transformer में आग लगने का खतरा बना रहता है ‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌transformer को इस घटना से बचाने के लिए दो transformer को समांतर में प्रयोग किया जाता है। 
दो transformer को समांतर में प्रयोग करने के लिए उनकी कुछ चीजों का आपस में मिलना और समान होना जरूरी होता है। जिनको मैंने नीचे बताया है।

(1) दोनों transformer की polarity समान होनी चाहिए।
(2) दोनों transformer की वोल्टेज रेटिंग समान होनी चाहिए।
(3) दोनों transformer का turn retio समान होना चाहिए।
(4) दोनों transformer का per unit impedance समान होना चाहिए।
(5) दोनों transformer का X/R retio समान होना चाहिए।

Transformer का transmission system में उपयोग

विधुत को 11kv वोल्टेज के आस पास generate किया जाता है। फिर इस 11kv वोल्टेज को transformer के द्वारा 400kv वोल्टेज में step up करके transmission line के द्वारा सब स्टेशन पर लाया जाता है। सब स्टेशन पर इस 400kv वोल्टेज को फिर से transformer के द्वारा 11kv वोल्टेज में step down कर दिया जाता है। सब स्टेशन से इस 11kv वोल्टेज को distribution transformer तक ले जाया जाता है। Distribution transformer 11kv को 220v वोल्टेज में step down कर देता है। ये 220 वोल्टेज विधुत पोल के द्वारा consumer तक आती है। इस प्रकार विधुत ऊर्जा हमें प्राप्त होती है। इस पूरे process में transformer एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। 

Transformer (परिणामित ) की कुछ मुख्य बातें

transformer एक ऐसा यन्त्र होता है जो एक ही स्थान पर रखा रहता है। इसके अन्दर कोई भी घूमने वाला भाग नहीं होता है। transformer को लौहे के एक टैंक में विधुतरोधी तेल डालकर रखा जाता है। 
Transformer की दोनों वाइंडिंग के बीच अनन्त प्रतिरोध होता है क्योंकि दोनों वाइंडिंग एक दूसरे से अलग होती है। इनमें कोई भी electrically connection नहीं होता। 

Transformer a.c voltage को घटाने और बढ़ाने का काम इसलिए कर सकता क्योंकि इसकी दोनों वाइंडिंग में magnetic coupling बन जाती है। 
Transformer को सर्किट में जोड़ने से पहले यह पता नहीं लगा सकते कि प्राइमरी वाइंडिंग कौनसी है और सेकेंडरी वाइंडिंग कौनसी है। उस समय बस ये कह सकते है जिस वाइंडिंग में अधिक turn होंगे उसे high voltage winding और जिस वाइंडिंग में कम turn होंगे उसे low voltage winding 
Transformer की दोनों वाइंडिंग में आवृत्ति समान रहती है।
Transformer एक रूका हुआ यानी स्थिर यन्त्र होने के कारण इसकी दक्षता (efficiency) काफी अच्छी (batter) होती है। जितने भी घूमने वाले यन्त्र होते है उनकी दक्षता 50 प्रतिशत तक कम हो जाती है लेकिन transformer के स्थिर होने के कारण ही इसकी दक्षता 90 से 99 प्रतिशत के बीच में रहती है।

हैलो दोस्तो आज की इस आर्टिकल में हमने जाना है कि transformer in hindi और इसके विभिन्न भागों के काम की भी जानकारी हमने ग्रहन की है अगर पोस्ट को पढ़कर आपको मजा आया है और सिखने को कुछ मिला है तो कमेंट करके जरूर बताइए यार आपके कॉमेंट से हमें लिखने के लिए प्रेरित करता है। हमारे लेख को पढ़ने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद।


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