On grid solar system क्या होता है

जब सोलर प्लांट पावर ग्रीड या ट्रांसफॉर्मर से आने वाली विधुत सप्लाई से जुड़ा हो तो ऐसे सिस्टम को on grid solar system कहते हैं। इसे और दूसरे नाम से भी जाना जाता है जैसे ग्रीड टाइड सोलर सिस्टम इस नाम से भी इसको जानते हैं।
हैलो फ्रेंड्स आज हम इसी के बारे में बात करेंगे कि ओन ग्रीड सोलर सिस्टम क्या होता है यह कैसे काम करता है और इस सिस्टम को लगाने से पहले हमें किन किन बातों का ध्यान रखना होता है और इस सोलर सिस्टम के क्या क्या लाभ और हानियां है। अगर आप भी on grid solar system लगवाना चाहते है तो आपको कुछ बातों का ध्यान जरूर रखना चाहिए।

अगर आप ओन ग्रीड सोलर सिस्टम लगवा रहे है यह तभी काम करेगा जब आपके घर का पावर सप्लाई किसी ग्रीड या परिणामित्र से जुडा हों। कहने का मतलब यह है कि अगर आपके घर में विधुत सप्लाई नहीं आ रही है तब आप इस सोलर सिस्टम को नहीं लगवा सकते हैं। यह सिस्टम तभी फायदेमंद होता है जब आपके क्षेत्र में बिजली सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक आती हों। इस सिस्टम को तभी लगवाना चाहिए जब आप बिजली बिल को कम करना चाहते हों।

On grid solar system कैसे काम करता है

जब सूर्य की किरणें सोलर पैनल पर गिरती है तो इन किरणों के सोलर प्लेट पर गिरने से डी सी सप्लाई जेनरेट होती है लेकिन हमारे घरों में जितने भी उपकरण लगें होते है जैसे बल्ब, फैन, कूलर, एयर कंडीशनर, फ्रिजर, हिटर और वाशींग मशींन ये सब ए सी सप्लाई के द्वारा चलते हैं। तो हमें एक ऐसा डिवाइस चाहिए होता है जो इस डी सी सप्लाई को ए सी सप्लाई में कन्वर्ट कर दें। इसके लिए एक इन्वर्टर लगाया जाता है इसमें जिस इंवर्टर का प्रयोग करते है उसे ग्रीड टाइड इंवर्टर कहते हैं। सोलर पैनल से आने वाली डी सी सप्लाई को ये इंवर्टर ए सी सप्लाई में बदल देता है और ये सप्लाई आगे लगें स्विच बोर्ड में जाती है जहां पर सेफ्टी यन्त्र जैसे सर्किट ब्रेकर वगैरा लगें होते हैं।
On grid solar system kya hai


यहां से सप्लाई दो भागों में बट जाती है। एक लाइन यहां से सप्लाई की घरों में लगे लोड की ओर जाती है और दूसरी लाइन सप्लाई की नैट मीटर से होते हुए ग्रीड की ओर जाती है। नैट मीटर के दो काम होते है पहला जो घरों के कनैक्शन होते है वह किसी न किसी ग्रीड की सप्लाई से कनैक्ट होता है तो यह नैट मीटर उस ग्रीड की घरों में कितनी बिजली खर्च होती है उसका हिसाब रखता है और दूसरा सोलर पैनल के द्वारा बनने वाली कितनी बिजली ग्रीड को सप्लाई की जा रही है उसका भी रिकॉर्ड रखता है।

On grid solar system के लाभ

• इस सोलर सिस्टम को लगवाने का सबसे बड़ा फायदा यह हो जाता है कि जो हमारा महिने का बिजली का बिल आता है वह कम हो जाता है। क्योंकि इस सिस्टम में सप्लाई को जेनरेट भी करते हैं और साथ ही साथ ग्रीड को सप्लाई भी करते हैं।

• जैसा कि हम जानते है कि इस सोलर सिस्टम में बैटरी का प्रयोग नहीं होता है जिसके कारण इस प्लांट की मरम्मत करना आसान हो जाता है।

• इस सोलर पैनल की लगवाने की किमत भी बहुत कम होती है ओफ ग्रीड सोलर सिस्टम और हाई ग्रीड सोलर सिस्टम की तुलना में।

ओन ग्रीड सोलर सिस्टम की हानियां

• हमें पता है कि on grid solar system सीधे ही ग्रीड से कनैक्ट होता है। यदि किसी कारणवश ग्रीड से आपके घर में कोई विधुत सप्लाई नहीं आ रही है तो उस कंडिशन में यह सोलर सिस्टम काम नहीं करता है चाहे आपके सोलर पैनल पर सूर्य की कितनी भी अच्छी किरणें क्यों न गिर रही हों।

• इस प्लांट में किसी भी तरह की बैटरी का इस्तेमाल नहीं करते है जिसके कारण इसमें कोई बैकअप नहीं होता है। यही इस सिस्टम की सबसे बड़ी खामियां होती हैं।

Er. Chand नवंबर 25, 2021
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 transformer ki maintenance 

पावर ग्रीड और सब स्टेशन के अन्दर बड़े बड़े परिणामित्र लगें होते है। सब स्टेशन में सभी उपकरणों में ट्रांसफॉर्मर सबसे महंगा यन्त्र होता है इसलिए इसकी देखभाल करना बहुत ही महत्वपूर्ण हो जाता है। आज हम इस लेख में transformer ki maintenance के बारे में ही जानेंगे।
ट्रांसफॉर्मर की मरम्मत करने के काफी सारे शेड्यूल होते है जैसे घंटों के बेस पर मेंटिनेंस करना, रोजाना के बेस पर, महिने के बेस पर, तीन महीने के बेस पर, अर्ध वार्षिक बेसिस पर और वार्षिक बेसिस पर इन सभी शेड्यूल के बेसिक पर transformer ki maintenance की जाती है। नीचे इन सभी शेड्यूल के बारे में विस्तार से जानकारी प्राप्त करेंगे कि कैसे इन शेड्यूल में ट्रांसफॉर्मर की मरम्मत की जाती है।

transformer ki maintenance


• घंटों के बेसिस पर (hourly basis)

पावर ग्रीड या सब स्टेशन के अन्दर जो ओपरेटर होते है वो हर एक घंटे बाद परिणामित्र की निम्न चीजों की देख रेख करते है और उन सभी अपने रजिस्टर में लिखते है। जैसे ट्रांसफॉर्मर की प्राइमरी साइड में कितना भार जुड़ा हुआ है और transformer की आउटपुट वोल्टेज को चैक करते है। तिसरी चीज इस शेड्यूल में तेल का तापमान चैक करते है।

इसे भी पढ़ें : Transformer kya hota hai in hindi

• रोजाना बेसिस पर (daily basis) 

इस शेड्यूल में सबसे पहले यह चैक करते है कि ट्रांसफॉर्मर टैंक से कहीं तेल तो नहीं निकल रहा है यदि टैंक से कहीं को तेल का रिसाव होता है तो इसे जल्दी ही ठीक किया जाता है। फिर इसमें परिणामित्र की काॅयल का ताप देखा जाता है कि वह नाॅर्मल है या नहीं। इसका पता ट्रांसफॉर्मर के मार्सिलिंग बाॅक्स में दो चीजों को देखने से पता चलता है। पहला है वाइंडिंग टेम्प्रेचर इंडिकेटर और दूसरा है ओयल टेम्प्रेचर इंडिकेटर इन दोनों इंडिकेटर की मदद से वाइंडिंग और तेल के तापमान पता चल जाता है। तिसरी चीज इस शेड्यूल में कंजर्वेटर टैंक में तेल का लेवल चैक किया जाता है और चौथी चीज बुसिंग में ओयल का स्तर चेक करते है फिर इसी के हिसाब से transformer ki maintenance की जाती है।

• महिने वार (monthly basis) 

इस शेड्यूल में सबसे पहले ट्रांसफॉर्मर की ब्रिदर को चैक करते है। ब्रिदर कंजर्वेटर टैंक से कनेक्ट होती है इसमें सबसे नीचे के हिस्से में तेल के लेवल को चैक किया जाता है। ब्रिदर के ऊपरी हिस्से में निले रंग का सिलिका जेल भरा होता है इसका काम तेल से नमी को निकालना होता है। जब इसका रंग गुलाबी हो जाता है तो ये खराब हो जाता है इसकी नमी को ऐब्जोर्ब करने की ताकत खतम हो जाती है। ब्रिदर के अन्दर फिर दुसरा सिलिका जेल डाला जाता है या इसको अधिक तापमान पर गर्म करके दोबारा से प्रयोग में लाया जा सकता है। दूसरी चीज इसमें बुकोल्ज रिले में ओयल के लेवल को चैक करते है।

• तीन महीने पर (three month basis) 

हर तीन महीने बाद ट्रांसफॉर्मर की बुसिंग को चैक करना होता है क्योंकि इनमें गंदगी धूल मिट्टी के कण बैठ जाते है जिसकी वजह से बुसिंग की विधुतरोधी ताकत कम हो जाती है और इनका ब्रेकडाउन होने का खतरा बढ़ जाता है इसलिए बुसिंग की हर तीन महीने बाद मरम्मत करना जरूरी होता है।
दूसरी चीज इस शेड्यूल में transformer oil की टेस्टिंग की जाती है जिसे ओयल ब्रेकडाउन वोल्टेज टेस्ट कहते हैं। और हर तीन महीने बाद जितने भी बड़े परिणामित्र होते है उनके अन्दर जो कूलिंग फैन लगें होते है जो मैन्यूवली और ओटोमेटिक दोनों तरिके से काम करते हैं। यह फैन transformer की वाइंडिंग को ठंडा करने का काम करते है इसलिए इनकी काम करने की पर्फोमेंस को भी चैक किया जाता है।

• अर्ध वार्षिक बेसिस पर (half yearly basis) 

हर छं महिने बाद ट्रांसफॉर्मर ओयल की सम्पूर्ण टेस्टिंग की जाती है जिसमें तेल में मोजूद अम्लता को चैक किया जाता है क्योंकि यदि तेल अधिक अम्लीय होगा तो तेल में जल जल्दु मील जाता है फिर इसमें तेल में मोजूद sludge content को देखते है क्योंकि यह ओयल को जल्दी ठण्डा नहीं होने देते है इसी प्रकार से और भी बहुत सी तेल की टेस्टिंग की जाती है।

• वार्षिक बेसिस पर (yearly basis)

transformer ki maintenance के इस शेड्यूल में ग्रीड या सब स्टेशन में जो ट्रांसफॉर्मर होते है उसकी पूरी तरह से मेंटिनेंस की जाती है। जिसके लिए सब स्टेशन को कुछ घंटों के लिए शड डाउन किया जाता है। इसमें बुकोल्ज रिले के मैकेनिकल फंक्शन को चैक किया जाता है देखा जाता है कि इसके ट्रिपिंग और अलार्म कोन्टैक्ट अच्छे से काम कर रहे है या नहीं। और इस शेड्यूल में परिणामित्र का मार्सिंग बाॅक्स और उसमें लगें इंडिकेटर को अच्छे से साफ किया जाता है और दखा जाता है कि ये सही से चल रहे है या नहीं चल रहे। और कूलिंग फैन को भी चैक किया जाता है कि वे हिल तो नहीं रहें या फिर ज्यादा आवाज तो नहीं कर रहे और ट्रांसफॉर्मर का इंसुलेशन प्रतिरोध को भी चैक किया जाता है और परिणामित्र अर्थिंग भी चैक की जाती है और सबसे बाद में यदि transformer की बाॅडी की सर्फेश खराब हो गई है या उसका पेंट खराब हो गया हो तो उसकी बाॅडी पर दौबारा से पेंट किया जाता है।

तो यही था transformer ki maintenance का पूरा लेखा जोखा जो आपको इस छोटी सी जानकारी में मैंने बताया है उम्मीद करता हूं कि आप सब को यह पोस्ट अच्छी लगी होंगी। आप की तरह और भी आपके ऐसे इलैक्ट्रिकल मित्र होंगे जिन्हें ट्रांसफॉर्मर की मरम्मत के बारे में पता नहीं होगा तो आप इस पोस्ट को अपने उन मित्रो के साथ भी शेयर जरूर किजिए।
Er. Chand नवंबर 23, 2021
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 सड़क पर लगें ब्रेकरों द्वारा बिजली कैसे बनायी जाती है।

हैलो दोस्तो आज मैं आपको बिजली बनाने के नये स्त्रौत के बारे में बताने जा रहा हूं। तों इस खास स्त्रौत का नाम है सड़क पर लगें ब्रेकरों द्वारा बिजली कैसे बनयी जाती है। जी हां दोस्तों इस इलैक्ट्रिसिटी उत्पादन के नये स्त्रौत का आज बहुत देशों के अन्दर प्रयोग किया जा रहा है तो आज हम इसी तरिके के बारे में जानेंगे कि सड़क पर लगें ब्रेकरों द्वारा बिजली कैसे बनती जाती है।


यह एक बहुत ही आसान और किफायती तरिका है जिससे बिजली का उत्पादन किया जा सकता है। इस तरिके मैं सड़कों पर जहां ब्रेकर लगें होते है उनके स्थान पर घूमने वाले लौहे के पहिए लगा दिये जाते हैं और इन पहियों से जेनरेटर की साफ्ट को जोड़ दिया जाता है। जैसे ही इनके ऊपर से कार या बस गुजरती है तो ये घूमने लगते है इनके घूमने से जेनरेटर की साफ्ट भी घूमने लगती है इस प्रकार इस स्त्रौत के द्वारा विधुत बनने लगती है।

इस स्त्रौत का उपयोग ज्यादातर जहां पुल बने होते है वहां किया जाता है क्योंकि पुलों पर इस स्त्रौत के उपकरणों को लगाना आसान होता है। पुल पर इसे बिना किसी खुदाई के प्लेस किया जा सकता है और इसे ऐसी सड़कों पर लगाना अधिक फायदेमंद होता है जिन रास्तों पर वाहनों का आना जाना लगातार बना रहता है। क्योंकि जितने ज्यादा वाहन इन ब्रेकरों के ऊपर से गुजरते है बिजली का उत्पादन उतना ही अधिक होगा।

सड़कों पर ब्रेकरों द्वारा बिजली बनाने में एक बात का खास ख्याल रखा जाना चाहिए। इस स्त्रौत को हमेशा ऐसी सड़कों पर लगाना चाहिए जहां पर गाड़ीयां एक ही दिशा में चलती हों तभी इसके द्वारा बिजली का उत्पादन अच्छा होता है वरना दोनों और से चलने वाली सड़कों पर इससे बिजली बनाने में काफी कठिनाई आती है।

ब्रेकरों द्वारा बनी बिजली का उपयोग

इस स्त्रौत से विधुत का उत्पादन करना बहुत आसान होता है यह तो आपने जान लिया। लेकिन इस स्त्रौत से बिजली की पैदावार बहुत कम मात्रा में होती है इसलिए इसका उपयोग ज्यादा बड़े सैक्टरो में नहीं किया जा सकता है। इस विधुत की मात्रा कम होने के कारण इसका उपयोग, जहां इस स्त्रौत को लगाया जाता है वही पर रात के समय लाइटों को जलाने में किया जाता है।
Er. Chand नवंबर 21, 2021
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 सिंगल फेज इंडक्शन मोटर प्रश्र उतर

प्रशन-1 सिंगल फेज इंडक्शन मोटर का शक्ति गुणांक कम क्यों होता है ?

उत्तर- अधिक मेग्नैटायजिंग करंट के कारण, सिंगल फेज इंडक्शन मोटर का शक्ति गुणांक कम होता है।

प्र-2 थ्री फेज इंडक्शन मोटर की अपेक्षा, सिंगल फेज इंडक्शन मोटर चलते समय अधिक ध्वनि ऊत्पन्न क्यों करती है ?

उत्तर- सिंगल फेज की पल्सेटिंग सप्लाई वोल्टेज से ऊत्पन्न टाॅर्क द्वारा सतत स्थिर यांत्रिक शक्ति प्रदान करने के कारण, चलतें समय अधिक शोरगुल करती है।
थ्री फेज मोटर मे थ्री फेज घूर्णी चुम्बकीय क्षेत्र ऊत्पन्न होता है, जिससे लगातार एक समान बलाघूर्ण ऊत्पन्न होता है इसलिए यह चलते हुए कम आवाज करती है।

प्र-3 आप किसी विभक्त कला एकल कला प्रेरण मोटर के घूमने की दिशा को किस प्रकार परिवर्तित करेंगे या विपरीत करेंगे ?

एकल कला प्रेरण मोटर के स्टेटर पर स्थापित दोनों वाइंडिंगों (मुख्य वाइंडिंग या सहायक वाइंडिंग) में से किसी एक सिरों की ध्रुवता को आपस में बदलकर, मोटर के घूमने की दिशा परिवर्तित करेंगे।

प्र-4 क्या छादित चुम्बकीय ध्रुव प्ररूपि सिंगल फेज इंडक्शन मोटर के घूमने की दिशा को बदला जा सकता है ?

इस मोटर की दिशा को नहीं बदला जा सकता है क्योंकि इसमें इस प्रकार का कोई जुगाड नहीं होता है।

प्र-5 छादित पोल प्ररूपि इंडक्शन मोटर किस दिशा में घुमती है ?

यह मोटर छादित यानी शेडेड पोल से अन शेडेड पोल की ओर घूमती है।

प्र-6 सिंगल फेज इंडक्शन मोटर की कहां जरूरत होती है ?

इस मोटर की काफी सारी स्थानों पर जरूरत पड़ती है जैसे-
• जहां पर एक अश्व शक्ति से कम रेटिंग हो
• छोटे आकार के पोर्टेबल उपकरणों को चलाने में
• और जहां थ्री फेज सप्लाई उपलब्ध न हो।
• कुछ ऐसी जगहों पर भी जहां दक्षता का अधिक महत्व न हों।

प्र-7 उधौगों में कौनसी मोटर सबसे अधिक उपयोग की जाती है और क्यों ?

• आज के समय में पूरी दुनिया के अन्दर ए सी स्काइरल केज रोटर टाइप इंडक्शन मोटर सबसे ज्यादा प्रयोग की जाती है क्योंकि इसमें दूसरी मोटरों की अपेक्षा बहुत सारे अच्छे गुण होते हैं।
• इसकी संरचना बहुत ही आसान होती है।
• यह एक सेल्फ स्टाॅर्ट मोटर होती है।
• इसमें ऊत्पन्न बलाघूर्ण शुटेबल होता है।
• यह मोटर सर्पि वलय और ब्रश से मुक्त होती है।
• बाजार में आसानी से मिल जाती है।

प्र-8 आवासीय कार्यों में कौनसी मोटर सर्वाधिक प्रयोग की जाती है और क्यों ?

आजकल सम्पूर्ण विश्व के अन्दर घरेलू कामों में परमानेंट केपेसिटर सिंगल फेज इंडक्शन मोटर बहुत अधिक प्रयोग होती है क्योंकि इस मोटर के अन्दर काफी सारे शुभ गुण होते हैं।
• आकार में सुविधाजनक
• संरचना में सादी
• स्वचालित और स्वप्रवर्तित
• उच्च बलाघूर्ण वाली
• अनुरक्षण और मरम्मत किमत बहुत कम
• बाजार से कम किमत पर सुगमता से उपलब्ध
• स्लिप रिगं और ब्रश लेस

प्र-9 संधारित्र प्ररूपि सिंगल फेज इंडक्शन मोटर में विकसित टाॅर्क अधिक क्यों होता है ?

• चूंकि स्टेटर पर स्थापित मुख्य कुण्डलन की धारा और सहायक वाइंडिंग की धारा के बीच का कोण अधिक होता है, इसलिए मोटर में बनने वाला बलाघूर्ण भी अधिक होता है।

प्र-10 उच्च आरम्भिक बलाघूर्ण के कार्यों में रिपल्शन इंडक्शन मोटर की अपेक्षा, कैपेसिटर इंडक्शन मोटर को अधिक पसंद क्यों किया जाता है ?

• इसका मेन रिजन यह है कि संधारित्र इंडक्शन मोटर की अपेक्षा, रिपल्शन इंडक्शन मोटर की प्रारंभिक लागत अधिक साथ साथ इसकी अनुरक्षण और मरम्मत की लागत भी अधिक होती है, क्योंकि इस मोटर के अन्दर कम्यूटेटर और ब्रश होते है जिससे इसकी कीमत बढ़ जाती है। इसलिए रिपल्शन मोटर को कम और कैपेसिटर मोटर को अधिक पसंद किया जाता है।

प्र-11 सिंगल फेज इंडक्शन मोटर में सहायक वाइंडिंग का क्या काम होता है ?

इस वाइंडिंग का प्रमुख काम, मोटर की शुरुआत के समय में मुख्य वाइंडिंग के साथ मिलकर, रोटेटिंग मेग्नेटिक फील्ड ऊत्पन्न करना होता है ताकि रोटर पर बलाघूर्ण लागू हो सकें। जब मोटर की स्पीड सिंक्रोनस स्पीड की सत्तर प्रतिशत तक पहुंच जाती है, तब इस वाइंडिंग को अपकेन्द्री स्विच द्वारा अलग कर दिया जाता है।

प्र-12 क्या होगा यदि एकल कला प्रेरण मोटर में लगा अपकेन्द्री स्विच खुलने में असफल हो जायें ?

• ऐसा होने पर मोटर के स्टेटर पर लगी सहायक वाइंडिंग जलकर राख हो जायेंगी, क्योंकि इस वाइंडिंग की प्रतिबाधा बहुत कम होता है जिससे इसमें बहुत अधिक धारा बहेगी और ये जलकर नष्ट हो जाती है।

प्र-13 प्रतिरोध स्टार्ट स्पिलिट फेज इंडक्शन मोटर में विशेष कमी क्या है ?

इस मोटर में सहायक वाइंडिंग पतले तारों और कम टर्न की होती है यानी मेन वाइंडिंग की अपेक्षा इसका प्रतिरोध अधिक होता है, इसलिए इसमें धारा घनत्व उच्च होता है। जिसके कारण यह बहुत जल्दी गर्म हो जाती है। यदि यह मोटर स्टार्ट होने में पांच सेकेंड से ज्यादा समय लेती है, तो इस मोटर की आरम्भिक कुण्डलन या सहायक वाइंडिंग जल कर नष्ट हो जाती है।
सिंगल फेज इंडक्शन मोटर प्रश्र उतर

प्र-14 प्रतिरोध विभक्त कला प्ररूपि प्रेरण मोटर में उत्पन्न आरम्भिक बलाघूर्ण न्यून क्यों होता है ?

• चूंकि प्रतिरोध विभक्त कला इंडक्शन मोटर में स्टेटर पर स्थापित मुख्य कुण्डलन की धारा और सहायक वाइंडिंग की धारा के बीच का कोण बहुत कम होता है, इसलिए इस मोटर में ऊत्पन्न होने वाला स्टार्टिंग टाॅर्क भी कम होता है।

प्र-15 क्या विधुत सप्लाई सिरों की पोलैरिटी को परस्पर बदलकर किसी भी सिंगल फेज इंडक्शन मोटर के घूमने की दिशा को बदला जा सकता है ?

• नहीं बदला जा सकता, क्योंकि ऐसा करने से स्टेटर पर लगी दोनों वाइंडिंग के टर्मिनल की ध्रुवता बदल जाती है, जबकि मोटर के घूमने की दिशा को बदलने के लिए केवल दोनों में से एक कुण्डली के सिरों की ध्रुवता आपस में परिवर्तित होनी चाहिए।

प्र-16 स्थैतिक चुम्बकीय क्षेत्र, स्पन्दनीय चुंबकीय क्षेत्र और रोटेटिंग मेग्नेटिक फील्ड में क्या अंतर है ?

डी सी सप्लाई के कारण ऊत्पन्न होने वाला चुंबकीय क्षेत्र, स्थैतिक चुंबकीय क्षेत्र कहलाता है। इसमें वाइंडिंग के सिरों पर निर्मित पोलेरिटी एक समान रहती है। सिंगल फेज ए सी सप्लाई के द्वारा ऊत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र, पल्सेटिंग मैगनेटिक फील्ड कहलाता है इसमें वाइंडिंग के सिरों की ध्रुवता समय के साथ बदलती रहती है और थ्री फेज सप्लाई से ऊत्पन्न क्षेत्र, घूर्णी चुम्बकीय क्षेत्र होता है जो सिंक्रोनस स्पीड पर घूमता है जिसकी गति का पता लगाने के लिए निम्न सूत्र का उपयोग किया जाता है।
 
           Ns = 120f/p.  r.p.m



Er. Chand नवंबर 17, 2021
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 कैपेसिटर स्टार्ट इंडक्शन मोटर (capacitor start induction motor)

कैपेसिटर स्टार्ट इंडक्शन मोटर एक ऐसी मोटर होती है जिसमें प्रतिरोध के स्थान पर स्टेटर की स्टार्टिंग वाइंडिंग के श्रेणी में अपकेन्द्री स्विच के साथ स्टार्टिंग कैपेसिटर जुड़ा रहता है, इसलिए इसे कैपेसिटर स्टार्ट इंडक्शन मोटर कहते हैं। इस मोटर के स्टेटर के सहायक परिपथ में जुड़े आरम्भिक संधारित्र के कारण ही इसमें फेज विभाजन स्थापित होता है, जो मेन सर्किट की मेन वाइंडिंग करंट और सहायक सर्किट की स्टार्टिंग वाइंडिंग करंट में फेज डिफरेंस ऊत्पन्न कर देता है, जिससे मोटर में रोटेटिंग मेग्नेटिक फील्ड ऊत्पन्न हो जाता है, जो मोटर के रोटर पर आरम्भिक टाॅर्क लागू करता है और रोटर घूमने लगता है। तुरन्त बाद ही रोटर की गति के कारण, उत्पादित अपकेन्द्री बल से अपकेन्द्री स्विच प्रचालित होकर, स्टेटर के सहायक परिपथ को अलग कर देता है और मुख्य परिपथ ज्यों का त्यों कायम रहने के कारण मोटर लगातार चलती रहती है।
कैपेसिटर-स्टार्ट-इंडक्शन-मोटर


यदि कैपेसिटर स्टार्ट इंडक्शन मोटर में सेंट्रिफ्यूगल स्विच का उपयोग न किया जाए, तो सहायक परिपथ मोटर की घूमने की अवस्था में भी कनैक्ट रहेगा। ऐसी अवस्था में वह स्थायी संधारित्र प्ररूपि इंडक्शन मोटर कहलायेगी, जिसका प्रयोग आजकल छत के पंखों में होता है।

कैपेसिटर स्टार्ट इंडक्शन मोटर के सामान्य गुणधर्म

• साइज या क्षमता - 1/8 hp से 1 hp तक
• स्टाॅर्टिंग टाॅर्क - उच्च होता है
• आरम्भिक धारा - पूर्ण भार धारा की दो गुनी
• आरम्भिक अवस्था - सेल्फ स्टाॅर्ट
• गति या चाल - स्थिर यानी एक समान गति
• गति नियंत्रण - एक मात्र वोल्टेज नियंत्रण द्वारा
• शक्ति गुणांक - उच्च 0.7 से 0.9 तक, हमेशा पश्चगामी
• अनुरक्षण किमत - बहुत कम
कैपेसिटर स्टार्ट इंडक्शन मोटर का आरंभिक बलाघूर्ण प्रतिरोध स्टार्ट इंडक्शन मोटर की अपेक्षा लगभग 2.5 गुणा और फुल लोड टाॅर्क का 3.5 से 4.5 गुना होता है।

अनुप्रयोग -

औधौगिक क्षेत्र में इस मोटर का उपयोग सिंगल फेज ए सी वोल्टेज पर स्थिर गति, उच्च स्टार्टिंग टाॅर्क के छोटे कार्यों में होता है, जैसे गैसोलीन पम्प, स्माॅल एयर कम्प्रेसर्स, एयर कंडीशनर, फ्रिजर, वैक्यूम क्लीनर, कपड़े धोने की मशीन, पोर्टेबल हाॅयस्ट, स्टोकर्स, छत के पंखों में

कैपेसिटर स्टार्ट एंड रन इंडक्शन मोटर (capacitor start and run induction motor) 

कैपेसिटर स्टार्ट एंड रन इंडक्शन मोटर दो प्रकार की होती है, एक होती है डबल वैल्यू कैपेसिटर प्ररूपि प्रेरण मोटर और दूसरी होती है सिंगल वैल्यू कैपेसिटर प्ररूपि प्रेरण मोटर

(1) डबल वैल्यू कैपेसिटर प्ररूपि

यह स्थायी फेज विभक्त संधारित्र मोटर और संधारित्र स्टार्ट मोटर का संयोग है। इसमें एक कैपेसिटर Cr स्टेटर के सहायक परिपथ में हमेशा स्थायी रूप से मोटर की रनिंग कंडिशन में भी जुड़ा रहता है, इसलिए इसे रनिंग कैपेसिटर कहते हैं। दूसरा संधारित्र Cs मोटर की धावी अवस्था में अपकेन्द्री स्विच द्वारा स्थाता के सहायक परिपथ से अलग कर दिया जाता है, इसलिए इसे स्टार्टिग कैपेसिटर कहते हैं। यह मोटर उच्च शक्ति गुणांक, उच्च आरम्भिक बलाघूर्ण, उच्च रनिंग टाॅर्क, उच्च अतिभार क्षमता, हाई दक्षता, शांत प्रचालन आदि सभी गुणों से सम्पन्न होती है।


सिंगल वैल्यू कैपेसिटर प्ररूपि

यह मोटर डबल वैल्यू कैपेसिटर प्ररूपि इंडक्शन का ही एक संशोधित या विकसित रूप है। इसे परमानेंट स्पिलिट फेज कैपेसिटर मोटर या परमानेंट केपेसिटर मोटर भी कहते हैं। इसका ओवर ओल परफॉर्मेंस बहुत ही बढ़िया होता है इसलिए आजकल दुनिया भर में इस मोटर का उपयोग व्यापक रूप से हो रहा है।

कैपेसिटर स्टार्ट एंड रन मोटर के सामान्य गुणधर्म

• साइज या क्षमता - 1/8 hp से 1/4 hp या 1 hp
• आरम्भिक बलाघूर्ण - उच्च होता है
• आरम्भिक धारा - पूर्णभार धारा की दो गुनी
• ओपरेटिंग टाॅर्क - उच्च और शान्त प्रचालन
• स्पीड - कोंस्टेंट और ध्वनि रहित
• स्पीड कंट्रोल - ओनली वोल्टेज कंट्रोल द्वारा
• विपरित गति - स्टेटर की मुख्य या सहायक वाइंडिंग के सिरों की पोलेरिटी को आपस में चेंज करने से विपरित गति प्राप्त होती है।
• दक्षता - उच्च होती है
• अतिभार क्षमता - उच्च
• शक्ति गुणांक - अति उच्च 0.9 से 1 तक हमेशा पश्चगामी
• मेंटिनेंस कोस्ट - बहुत ही कम

इस मोटर के अनुप्रयोग

औधौगिक क्षेत्र में इस मोटर का प्रयोग, एकल कला प्रदायी वोल्टता पर परिवर्तन शील भार के अन्तर्गत स्थिर गति की आवश्यकता और उच्च आरम्भिक बलाघूर्ण के कार्यों में किया जाता है। इसके अलावा इस मोटर का उपयोग ऐसे कार्यों में भी किया जाता है, जहां पर वातावरण को शांत बनायें रखना आवश्यक होता है। जैसे लाइब्रेरी, दफ्तर, अस्पताल और प्रयोगशाला के पंखों में, कूलर, रिकॉर्डर प्लेयर, टेली प्रिन्टर्स, ग्राफिक इन्स्टूमेंटस, क्लोक और समय सम्बंधी यन्त्र आदि में भी किया जाता है।
Er. Chand नवंबर 15, 2021
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 विधुत उपकेंद्र क्या है

बिजली का उत्पादन 11 kv पर शक्ति केन्द्रों पर होता है। इस वोल्टेज पर विधुत ऊर्जा की अधिक लाॅस होने के कारण संचरण और वितरण नहीं किया जा सकता, इस विधुत को एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजने के लिए वोल्टेज को बढ़ाना पड़ता है और वितरण के लिए वोल्टेज को कम करके ही विधुत ऊर्जा का उपयोग किया जा सकता है। जिस स्थान पर विधुत ऊर्जा को बढ़ाने और घटाने का काम किया जाता है, उस स्थल को electric substation कहते हैं।

विधुत ऊर्जा का स्टेप अप और स्टेप डाउन करना ही उपकेंद्र का मुख्य काम होता है। इसके अतिरिक्त उपकेंद्रों पर बिजली का स्विचिंग, आवृत्ति में परिवर्तन, दिष्टकारी विधुत ऊर्जा को प्रत्यावर्ती ऊर्जा में परिवर्तन आदि कार्य भी किया जाता है। उधोगों में प्रयुक्त substation को औधौगिक उपकेन्द्र कहते हैं और इस जगह पर शक्ति गुणांक में भी सुधार किया जाता है।


वैधुत उपकेन्द्र, विधुत प्रदाय तन्त्र में वह स्थान है जहां विधुत ऊर्जा का रूपांतरण और नियंत्रण किया जाता है। विधुत प्रदाय कम्पनी सबसे पहले 11 kv, 33 kV या 66kv पर उच्च transmission substation को स्थापित करते है। 100kw से कम विधुत भार के उपभोक्ताओं के लिए अपचायी उपकेंद्रों द्वारा 440 वोल्ट पर वैधुत वितरित की जाती है। लेकिन 100kw से अधिक भार के लिए कम्पनी उपभोक्ता को 1.1kv या 6.6kv बिजली प्रदान करती है। और इस बिजली को नियंत्रित करने के लिए उपभोक्ता को खुद का 440 वोल्ट का उपकेन्द्र लगाना पड़ता है।

विधुत उपकेंद्र पर प्रयोग किएं जाने वाले उपकरण (Electric substation equipments)


• विधुत रोधक (Insulator) 

विधुत उपकेंद्र में इंसुलेटर धारा प्रवाहित चालकों और बस बारो को आधार प्रदान करते हैं और उन्हें वैधुत संचालन भागों से अलग रखते हैं। इंसुलेटर का निर्माण चीनी मिट्टी से किया जाता है, उपकेंद्र में बुसिंग या पोस्ट इंसुलेटर का इस्तेमाल किया जाता है। इनको 66kv या उससे कम वोल्टेज के लिए चट्टो में क्षैतिज या ऊर्ध्वाधर रूप में लगातें है।

• बस बार (Bus bar) 

Substation पर बस बार ठोस वृत्ताकार या आयताकार ताॅबे या एल्यूमीनियम चालक की होती है। कुछ विशेष परिस्थितियों में जहां बस बार को बहुत उच्च धारा वहन करनी पड़ती है और उच्च तापमान प्रभाव की सम्भावना होती है, वहां पर बस बार खोखली, वृत्ताकार या आयताकार ताम्र की भी होती है। इनके अलावा केबिलों के लिए विकृति बस बार भी प्रयोग की जाती है। bus bar का आकार उसकी धारा वहन क्षमता पर निर्भर करता है।

• पृथक्कारी स्विच (Isolate switch)

आइसोलेटर बिना भार पर परिपथ को उच्च वोल्टेज सप्लाई से विस्थापित करने के लिए प्रयोग किये जाते हैं। ये वायु विच्छेद होते है, उच्च वोल्टेज को नियंत्रित करने के लिए इन्हें मोटर की सहायता से परिचालित किया जाता है। 50kv से नीचे ये पृथक्कारी एकल ध्रुव होते है और 132kv या उससे उच्च वोल्टेज के लिए इन्हें समूह परिचालित बनाया जाता है।

• परिपथ वियोजक (Circuit breaker) 

उपकेन्दों पर सर्किट ब्रेकर को परिपथ की असाधारण स्थितियों को ध्यान में रखते हुए लगाया जाता है। ये उच्च वोल्टेज परिपथ में ओटोमेटिक और प्रसामान्य भार स्थिति में हस्त द्वारा संचालित होने चाहिए। 11केवी वोल्टेज के लिए तेल पूरित प्रकार का परिपथ वियोजक अपनाया जाता है।

• फ्यूज (Fuses) 

फ्यूज, ट्रांसफॉर्मर और लाइन को अधिभार से होने वाली हानि से बचाता है, लेकिन इनमें एक कमी यह है कि एक फ्यूज के उड़ने पर पद्वति अन्य दो फेजों पर काम करेंगी। फ्यूज की इस कमी को दूर करने के लिए उच्च वोल्टेज परिपथ में फ्यूज के साथ एक रक्षी रिले भी प्रयोग की जाती है। 

• परिणामित्र (Transformer) 

प्राइमरी संचारण के लिए डेल्टा-स्टार पावर transformer, सेकेंडरी संचारण के लिए स्टार-स्टार power transformer का उपयोग किया जाता है और प्राथमिक वितरण के लिए स्टार-डेल्टा शक्ति परिणामित्र और द्वितियक न्यून वोल्टेज के लिए डेल्टा स्टार वितरक ट्रांसफॉर्मर प्रयोग कियें जाते हैं। पावर स्टेशन पर परिणामित्र वोल्टेज को बढ़ाने के लिए और बाकी सभी स्थानों पर वोल्टेज को कम करने के लिए ट्रांसफॉर्मर स्थापित कियें जाते हैं और विशेष ध्यान यह रखा जाता है कि electric substation में परिणामित्र में कम से कम हानि हो। 

• रक्षी रिले (Protective Relay)  

विधुत दोष और अधिभार पर परिपथ के स्व एवं शीघ्र विच्छेदन के लिए और ट्रांसफॉर्मर की सुरक्षा के लिए विधुत उपकेंद्र पर परिपथ वियोजक के साथ रक्षी रिले इस्तेमाल की जाती है।

धारा ट्रांसफॉर्मर (Current transformer) 

सबस्टेशन पर मापन एवं संकेतक उपयन्त्रो और रक्षी रिले के साथ करंट ट्रांसफॉर्मर उपयोग किये जाते हैं, ये उच्च वोल्टेज परिपथ में मापन और संकेतक यन्त्रो के साथ साथ उन्हें high voltage से अलग करते है जिससे सभी उपयन्त्र सुरक्षित रहते हैं और substation पर काम करने वाले व्यक्तियों को हाई वोल्टेज से हानि होने की संभावना नहीं रहती।

• विभव परिणामित्र (Potential transformer) 

विभव परिणामित्र भी मापन और संकेतक उपकरणों के साथ प्रयोग में लाया जाता है इसकी सेकेंडरी साइड में यन्त्रों को लगाया जाता है। यह भी उच्च वोल्टेज से संयोजित उपयंत्रों को अलग रखता है।

विधुत उपकेंद्र के लिए स्थान का चयन करना (selection of site for an Electric substation) 

विधुत उपकेंद्र के लिए स्थान का चयन करने से पहले उसकी क्षमता, वोल्टेज और प्रकार पर भी ध्यान देना अनिवार्य होता है। प्राइमरी ट्रांसमिशन के लिए इलैक्ट्रिक सबस्टेशन विधुत पावर प्लांट के पास, जबकि प्राथमिक और द्वितियक डिस्ट्रिब्यूशन उपकेंद्र, विधुत भार प्लांट के पास होने चाहिए। 11केवी से अधिक वोल्टेज वाले सबस्टेशन हमेशा शहरी क्षेत्र से बाहर और 11केवी या उससे कम वोल्टेज के उपकेंद्र बस्ती के बाहर या अंदर भार केन्द्र को ध्यान में रखकर स्थापित किया जा सकता है। विधुत उपकेंद्र के स्थान के लिए निम्न बातों का ध्यान में रखना बहुत जरूरी है।

• विधुत भार (Electric weight) 

विधुत उपकेंद्र के चयन में सबसे महत्वपूर्ण गुणक भार है। भार केन्द्र पर सबस्टेशन को स्थापित करने का प्रयास किया जाता है, विशेष कर वितरण के लिए जहां की वितरक की लंबाई electric substation के स्थापन से प्रभावित होती है।

• भूमि के प्रकार और मूल्य के आधार पर

सबस्टेशन के लिए जगह ऐसी होनी चाहिए कि परिणामित्र के अधिक भार के कारण भूमि के धंसने की संभावना नहीं हों और हाई वोल्टेज लाइन के मार्ग में घना जंगल भी नहीं पड़ना चाहिए। वैसे भार केन्द्र के महत्व को ध्यान में रखते हुए भूमि के महत्व को ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता है।

• सबस्टेशन का प्रकार

High voltage उपकेन्दों को गांव या कस्बे से बाहर स्थापित किया जाता है जबकि मध्यम और न्यून वोल्टेज सब स्टेशनों को बस्ती के अन्दर ही लगाया जाता है। प्राथमिक संचारण उपकेंद्र, जनन केन्द्र के पास ही इंस्टाॅल किया जाता है।



Er. Chand नवंबर 12, 2021
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 रिलक्टाॅन्स मोटर ( Reluctance motor)

रिलक्टाॅन्स मोटर को प्रतिष्टम्भ मोटर भी कहते है, यह स्काइरल केज रोटर टाइप इंडक्शन मोटर का ही एक विकसित रूप है। जिसमें प्रतिष्टम्भ के सिध्दांत पर यांत्रिक टाॅर्क उत्पन्न होता है, इसलिए इसे प्रतिष्टम्भ मोटर का नाम दिया गया है। तो दोस्तों आज की पोस्ट reluctance motor in hindi यानी रिलक्टाॅन्स मोटर क्या है इससे रिलेटेड जानकारी को प्राप्त करेंगे।

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निर्भार से पूर्ण भार की अवस्था में रिलक्टाॅन्स मोटर सिंक्रोनस गति पर चलती है, तब यह सिंक्रोनस रिलक्टाॅन्स मोटर कहलाती है। जब भार को बढ़ाया जाता है यानी अति भार की स्थिति में इसकी गति कुछ घट जाती है, उस समय यह मोटर इंडक्शन मोटर की तरह अंडर सिंक्रोनस गति पर ही चलती है इसलिए यह इंडक्शन रिलक्टैन्स मोटर कहलाती है।

जब किसी रिलैक्टेंस मोटर में स्टेटर पर बनने वाले इलैक्ट्रिकल पोलो की अपेक्षा, रोटर पर स्थापित सैलियंट पोलो की संख्या अधिक होती है, तो यह मोटर एक स्थिर औसत गति पर चलती है। यह गति, आभासी तुल्यकाली गति की सब गुणक होती है, इसलिए इस मोटर को सब सिंक्रोनस मोटर भी कह सकते है।

रिलक्टाॅन्स मोटर का कार्य सिद्धान्त ( working principle of reluctance motor in hindi )

रिलक्टाॅन्स मोटर एक स्काइरल केज रोटर टाइप इंडक्शन मोटर की तरह से स्टाॅर्ट होती है। जैसे जैसे इसकी गति तुल्यकाली गति के नजदीक पहुंचती जाती है; वैसे वैसे रोटर पर स्थापित सोफ्ट आयरन पोल की स्लिप कम होती चली जाती है। इस प्रचालन में एक स्थिति ऐसी भी आती है, रोटेटिंग मेग्नेटिक फील्ड और रोटर स्पीड में पारस्परिक अंतर इतना कम रह जाता है कि स्टेटर के पोल्स द्वारा रोटर के पोल्स चुम्बकित हों जातें है, तब रोटर स्टेटर के मैगनेटिक फील्ड के अनुदिश घुमने लगता है, इस अवस्था में रोटर सिंक्रोनस स्पीड पर घूमता है।


रिलैक्टैंस मोटर का स्टेटर

रिलैक्टैंस मोटर के स्टेटर की बनावट स्काइरल केज इंडक्शन मोटर के स्टेटर के समान ही निम्न तीन प्रकार की होती है।

(1) विभक्त कला प्ररूपि स्थाता, जिसके साथ एक सेंट्रीफ्यूगल स्विच लगा होता है।

(2) स्थायी संधारित्र प्ररूपि स्टेटर, इसमें सेंट्रीफ्यूगल स्विच का उपयोग नहीं किया जाता है।

(3) त्रिकला प्ररूपि स्टेटर, जिसका प्रयोग समाकलन अश्व शक्ति निर्धारणों वाली रिलक्टैंस मोटर में होता है।

रिलक्टैंस मोटर का रोटर या घूर्णक

सिंगल फेज फ्रेक्सनल हाॅर्स पावर वाली रिलक्टैंस मोटर में एक विशेष प्रकार के मैगनेटिक स्काइरल केज टाइप रोटर का उपयोग किया जाता है। इस विशेष प्रकार के रोटर को लौकिक स्काइरल केज रोटर में विशेष प्रकार के खाॅचें काटकर बनाया जाता है। इन खाॅचों को नर्म लौहे के वायु प्रक्षेपित ध्रुवों की तरह काम में लाया जाता है। इसकी संख्या स्टेटर पर बनने वाले इलैक्ट्रिक पोल की संख्या के बराबर होती है। इस प्रकार यह सारी व्यवस्था मोटर को सेल्फ स्टाॅर्ट उसी तरह बनाती है, जिस प्रकार पोल शू पर स्थापित डेम्पर वाइंडिंग, सिंक्रोनस मोटर को सेल्फ स्टाॅर्ट बनाती हैं।

रिलक्टैंस मोटर की विशेषताएं ( specialities of reluctance motor in hindi )

• क्षमता- आंशिक अश्व शक्ति
• बाह्मा खिंचाव बलाघूर्ण - 2 से 2.5 
• अन्त खिंचाव बलाघूर्ण - 0.9 से 1.2
• आरम्भिक अवस्था - सेल्फ स्टाॅर्ट
• गति नियंत्रण - परम स्थिर गति के कारण सम्भव नहीं है
• विपरित गति - इंडक्शन मोटर की तरह ही प्राप्त होती है
• शक्ति गुणांक - 0.6 से 0.8 न्यूनतम
• ताम्र हानियां - स्थिर तुल्यकाली गति के भार पर, रोटर में ताम्र हानियां शून्य होती है
• निर्गत - न्यून
• दक्षता - न्यून ( 70 से 80 ) प्रतिशत तक
• अनुरक्षण किमत - कम
• प्रतिस्टम्भ अनुपात - 3 से 6

रिलक्टैंस मोटर के अनुप्रयोग ( Application of reluctance motor in hindi )

रिलक्टैंस मोटर का उपयोग निम्न कार्यों में अधिक किया जाता है।
• न्यूक्लीयर रियेक्टर में नियंत्रण छड की स्थिति स्थापन के लिए
• टेक्सटाइल मशीनों को तुल्यकाली गति पर चलाने के लिए
• रेक्टिफायर, इनवर्टर यूनिटों की नियंत्रित स्विचन क्रिया द्वारा परिवर्तनीय आवृत्ति प्रदाय प्राप्त करने के लिए
• इस मोटर का उपयोग चालन की तरह स्थाति स्थापना, गति नियंत्रण और इन दोनों के संयोग के लिए होता है।
Er. Chand नवंबर 09, 2021
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