Results for DC Machine
 जैसा कि आपको इस पोस्ट के टाइटल को ही पढ़कर पता चल गया होगा कि आज हम किस विषय पर बात करने वाले है। जी हां दोस्तों आज हम डी सी मोटर कैसे काम करती है इस टोपिक पर बात करेंगे और डी सी मोटर के अन्दर जितने भी मेन पार्ट होते है वो कैसे काम करते है उन सभी के कार्य के बारे में जानेंगे तो चलिए शुरू करते है इस महत्वपूर्ण जानकारी को।


डी सी मोटर कैसे काम करती है

तो सबसे पहले जान लेते है डी सी मोटर का काम क्या होता है चाहे कोई भी मोटर हो ए सी या फिर डी सी सभी मोटर सेम काम होता है इलैक्ट्रिकल ऐनर्जी को मकैनिकल ऐनर्जी में कन्वर्ट करना। मकैनिकल ऐनर्जी का मतलब होता है किसी भी चीज का चलना या घूमना यानी जो चीज घूमने लगती है या फिर चलने लगती है उसी को हम उसकी यांत्रिक ऊर्जा कहते है इसी प्रकार जब मोटर को इलैक्ट्रिकल ऐनर्जी दी जाती है तो मोटर घूमने लगती है और मोटर की साफ्ट से किसी मशींन को जोड़ देते है इस प्रकार यह विधुत ऊर्जा मैकेनिकल ऐनर्जी में कन्वर्ट होकर मोटर की साफ्ट के द्वारा मशींन को इनपुट के रूप में दी जाती है।

अब बात करते है इसके कार्य सिद्धान्त की तो डी सी मोटर एक तरह से आकर्षण और प्रतिकर्षण के सिध्दांत पर कार्य करती है देखिए इसमें होता क्या है मोटर का जो ऊपर वाला भाग होता है उसे योक कहते है ठीक इसके निचे स्टेटर होता है जिसपर फील्ड वाइंडिंग की जाती है इसलिए इसमें ऊत्पन्न होने वाले फ्लक्स को फिल्ड फ्लक्स कहते है स्टेटर में जो फील्ड बनता है वह फिक्स होता है यानी यह एक पर्मानैंट मेग्नेट की तरह कार्य करता है इस फोटो में मोटर का जो भाग दिखाया गया है उसे स्टेटर कहते है साधारण भाषा में इस ढांचे को फील्ड बोलते हैं।

DC Motor kaise kam karti hai

इस फील्ड यानी स्टेटर के अन्दर रोटर को डाला जाता है रोटर पर आर्मेचर वाइंडिंग की होती है जैसे ही हम डी सी मोटर के आर्मेचर में सप्लाई देते है तो इसमें एक मैगनेटिक फ्लक्स बनता है यह फिल्ड स्टेटर के मैगनेटिक फील्ड के आकर्षण या प्रतिकर्षण करता है जिसके कारण डी सी मोटर घूमने लगती है।
एग्जाम की दृष्टि से अगर देखें तो इससे काफी सारे महत्वपूर्ण प्रशन बनते है जैसे की आपसे पूछा जा सकता है कि डी सी मोटर मे कौन सा नियम लागू होता है डी सी मोटर में फ्लेमिंग के बायें हाथ का नियम जिसे लैफ्ट हैंड रुल कहते है लागू होता है और डी सी जेनरेटर के अन्दर फ्लैमिंग राइट हैंड रुल लागू होता है।

DC Motor kaise kam karti hai

दोस्तों आपको फोटो में जो डी सी मोटर का पार्ट दिखाया गया है उसे आर्मेचर कहते है और इसे ही रोटर कहते है। इस पर आप लोगों को काफी सारे कंम्पोनेंट लगें दिखाई दे रहे होंगे जिनके बारे में हम जानेंगे।

आपकों इसके राइट साइड वाले हिस्से पर जो चीज लगी दिखाई दे रही है उसे बियरिंग कहते है अगर में आज से कुछ साल पहले की बात करु तो उस समय बियरिंग के स्थान पर बुस का उपयोग किया जाता था। लेकिन आज कल सभी डी सी मोटर के अन्दर बियरिंग कि ही प्रयोग किया जाता है। 

बियरिंग के बाद इस आर्मेचर पर जो चीज लगी है उसे कम्यूटेटर कहते है बहुत सारे लोगों एक कंफ्यूजन होता है कि कम्यूटेटर ए सी सप्लाई को डी सी सप्लाई में बदलता है या फिर डी सी को ए सी में कन्वर्ट करता है तो आपको में बता दूं के यह दोनों काम करता है। लेकिन अगर बात करें हम डी सी मोटर की तो इसमें यह डी सी सप्लाई को ए सी सप्लाई में कन्वर्ट करता है और जेनरेटर के अन्दर यह ए सी को डी सी में कन्वर्ट करता है यानी मोटर के अन्दर कम्यूटेटर एक इन्वर्टर की तरह और जेनरेटर के अन्दर एक रेक्टिफायर की तरह कार्य करता है। 

आपको इस चित्र में कम्यूटेटर के ऊपर कुछ लाइनें कटी दिखाई दे रही होगी इन्हें कम्यूटेटर सेगमेंट कहा जाता है इन सेगमेंट का काम ही डी सी को ए सी बनाना होता है जितने ज्यादा कम्यूटेटर में सिग्मेंट कटे होते है उतनी ही अच्छी हमें ए सी सप्लाई मिलती है।

कम्यूटेटर को हार्ड ड्राउन काॅपर का बनाया जाता है क्योंकि इससे कार्बन ब्रस टच रहते है अगर इसे खाली काॅपर का बना दें तो यह जल्दी ही घीस जायेगा जिससे कम्यूटेटर सेगमेंट को जल्दी जल्दी बदलना पड़ेगा इसलिए इसे हार्ड ड्राउन काॅपर का बनाया जाता है क्योंकि इससे बनें कम्यूटेटर सेगमेंट जल्दी नहीं घिसते है और इन सेगमेंट में हल्का सा गैप होता है जिसमें माइका इंसुलेशन को लगाया जाता है ताकि ये पूरे तरीके से इंसुलेटेड रहे और अच्छे से वर्क करें। कम्यूटेटर सेगमेंट को जिस चीज के ऊपर लगाया जाता है उसे बैकेलाइट कहते है।

अब बात करते है इसके आर्मेचर की इसको बनाने के लिए पतली पतली सीलीकाॅन स्टील की पत्तियों का उपयोग किया जाता है इसको पतली पत्ति से बनाने का मेन मकसद यह होता है क्योंकि इसमें कुछ लोसेस होते है जैसे हिस्टेरिसिस और एडी करंट लोस इन्हें कम करने के लिए ही आर्मेचर को सिलिकॉन स्टील की पतली पत्तियों को वार्निश करके बनाया जाता है। कम्यूटेटर के ऊपर स्लोट कटे होते है जिनमें वाइंडिंग को डालकर ऊपर से इंसुलेटिंग मटेरियल कागज या माइका की बारिक पत्तियों को लगा दिया जाता है ताकि वाइंडिंग बाहर न निकले और अन्दर अच्छे से फिक्स रहें।



Er. Chand दिसंबर 11, 2021
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 हैलो दोस्तो मैं हूं आपका दोस्त आपका होस्ट तो आज की इस पोस्ट में हम बात करने वाले हैं डी सी जेनरेटर के बारे में इस पोस्ट में हम जानेंगे कि dc generator in hindi क्या होता है यह कैसे काम करता है कैसे ये डी सी सप्लाई को ए सी सप्लाई में बदलता है इसका कार्य सिध्दांत क्या है और डी सी जेनरेटर कितने प्रकार के होते है।इसके पार्ट क्या क्या होते है तो आज हम डी सी जेनरेटर की इन्ही सब विषयों के बारे में बात करेंगे तो चलिए शुरू करते है सबसे पहले बात करते हैं कि डी सी जेनरेटर होता क्या है।

डी सी जेनरेटर क्या होता है

DC जेनरेटर (DC Generator) एक ऐसी मशीन है जिसका प्रयोग विधुत ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए किया जाता है। डी सी जेनरेटर का मुख्य काम यांत्रिक ऊर्जा (Mechanical energy) को विधुत ऊर्जा (Electrical energy) में परिवर्तित करना होता हैं।

सबसे पहले एक विधुत जेनरेटर का अविष्कार एक वैज्ञानिक ने किया था।जिनका नाम माइकल फैराडे था।वह इंग्लैंड के रहने वाले थे। ओर उन्होंने इस dc generator in hindi का अविष्कार 1831 ईशवी में किया था।

डी सी जेनरेटर का कार्य सिद्धान्त (working principle of DC Generator)

जेनरेटिगं मोड़ में रोटर को हम अपने हाथ से घुमाते हैं या किसी प्राइम मूवर द्वारा घुमाया जाता है जिससे चालक में विधुत वाहक बल (electro motive force) या धारा (current) उत्पन्न होती हैं। चालक में धारा की दिशा पोल बदलने पर बदलती रहती हैं। अर्थात् चालक में जो धारा उत्पन्न होती है वह एक प्रत्यावर्ती धारा (Alternating current) होती हैं। इस प्रत्यावर्ती धारा को कम्यूटेटर और ब्रस के द्वारा दिष्ट धारा (direct current) में परिवर्तित कर दिया जाता हैं। 
यदि किसी चालक को चुम्बकीय क्षेत्र में घुमाया जाये तो उसमें एक विधुत वाहक बल (electro motive force, EMF) उत्पन्न होता है जिसकी दिशा फ्लेमिगं के दायं हाथ के नियम (flaming Right Hand Rull) से निकाली जाती हैं।
{ डी सी जेनरेटर एक mechanical Rectifire की तरह काम करता हैं। }
{ डी सी जेनरेटर में electro magnetic torqe की दिशा motion के विपरित होती हैं। }

डी सी जेनरेटर का equivalent Circuit diagram

डी सी जेनरेटर के मुख्य भाग (important parts of dc generator) 

(a) स्टेटर (stator) 

यह हमारी मशीन का एक मुख्य भाग होता है जो हमारी मशीन को यांत्रिक सहायता (machanical support) प्रदान करता हैं। और यह स्टेटर में बनने वाले फ्लक्स के लिए low relectance पाथ प्रदान करता हैं और यह छोटी मशीनों में cast iron का बना होता है। और बड़ी मशीनों में इसे febricated steel का बनाया जाता हैं। और मशीन का यह भाग non lemineted होता है। dc generator in hindi के स्टेटर के बहुत सारे मुख्य भाग निचे दिखाये गये हैं।

 (1) फिल्ड वाइंडिंग
 (2) फिल्ड पोल
 (3) इन्टर पोल
 (4) पोल कोर
 (5) योक
 (6) पोल सू
 (7) कोम्पनसेटिगं वाइंडिंग

(b) रोटर (Rotor)

रोटर भी मशीन का एक मुख्य भाग होता है। यह मशीन का घूमने वाला भाग होता है।रोटर पर ही आर्मेचर वाइंडिंग को प्लेस किया जाता है।रोटर की कोर हम सीलिकन स्टील की प्रयोग करते है क्योंकि इसकी पर्मेबिलीटी हाई होती हैं। इसकी पर्मेबिलीटी हाई होने के कारण इसमें उत्पन्न होने वाली हानि (loss) कम हो जाती हैं।रोटर पर लगने वाले मुख्य भागों को निचे दिखाया गया हैं।
(1) आर्मेचर वाइंडिंग
(2) आर्मेचर कोर
(3) कम्यूटेटर
(4) कम्यूटेटर सिगमेंट
(5) ब्रस
(6) साफ्ट

डी सी जेनरेटर के प्रकार (types of dc generator) 

डी सी जेनरेटर दो प्रकार के होते हैं।
(1) सेप्रेटेली एक्साइटेड 
(2) सेल्फ एक्साइटेड
सेल्फ एक्साइटेड जेनरेटर तीन प्रकार के होते हैं।
(1) डी सी शंट जेनरेटर
(2) डी सी सीरीज जेनरेटर
(3) डी सी कम्पाउडं जेनरेटर
डी सी कम्पाउडं जेनरेटर दो प्रकार के होते हैं।
(1) कम्यूलेटिव कम्पाउडं
(2) डीफरेशिंयल कम्पाउडं

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(1) सेपरेटली एक्साइटेड जेनरेटर (separately excited generator)

सेपरेटली एक्साइटेड जेनरेटर में हम फिल्ड वाइंडिंग को हम एक अलग सेपरेट सोर्स से एक्साइट करते हैं। तो इसमें एक विधुत वाहक बल उत्पन्न हो जाता है जिसके कारण जेनरेटर में एक धारा प्रवाहित होने लगती है।

(2) डी सी शंट जेनरेटर (DC shunt generator) 

इस जेनरेटर में हम आर्मेचर के शंट में एक शंट वाइंडिंग जोड़ देते है जिसे फिल्ड वाइंडिंग कहते हैं। इस फिल्ड वाइंडिंग का प्रतिरोध उच्च होता है। इस वाइंडिंग के घुमाओ (turn) की संख्या अधिक होती है और इसे पतले (thin) तार से बनाया जाता हैं।

(3) डी सी सीरीज जेनरेटर (DC series generator)

इस जेनरेटर में हम एक वाइंडिंग को आर्मेचर वाइंडिंग के सीरीज में जोड़ देते है। इस वाइंडिंग को हम सीरीज वाइंडिंग कहते हैं। इसमें यही हमारी फिल्ड वाइंडिंग होती हैं। इस फिल्ड वाइंडिंग का प्रतिरोध बहुत कम होता है। और इसके घुमाओ भी कम होते हैं। इस वाइंडिंग को मोटे तार (think wire) से बनाया जाता हैं।

डी सी कम्यूलेटिव कम्पाउडं जेनरेटर (DC commulative compound generator)

इस जेनरेटर में हम शंट फिल्ड वाइंडिंग और सीरीज फिल्ड वाइंडिंग दोनों का प्रयोग करते हैं। यदि सीरीज फिल्ड वाइंडिंग और शंट फिल्ड वाइंडिंग दोनों का फ्लक्स एक समान दिशा (same direction) में है-तो ऐसी मशीन को कम्यूलेटिव कम्पाउडं जेनरेटर कहते हैं।

डिफरेंशियल कम्पाउडं जेनरेटर (Differential compound generator)

यदि सीरीज फिल्ड वाइंडिंग और शंट फिल्ड वाइंडिंग दोनों का फ्लक्स विपरित दिशा में है तो ऐसी मशीन को डिफरेंशियल कम्पाउडं जेनरेटर कहते हैं।

डी सी जेनरेटर का उपयोग (use of dc generator)

• वैल्डिगं में डिफरेंशियल कम्पाउडं जेनरेटर का उपयोग किया जाता है क्योंकि इसमें शाॅर्ट सर्किट करन्ट की वल्यू कम होती हैं।
• सेपरेटली एक्साइटेड dc generator in hindi का उपयोग लेबोरेट्री में टेस्टीगं परपज के लिए और इलैक्ट्रो प्लेटिगं में किया जाता है।
• डी सी शंट जेनरेटर का उपयोग बैटरी चार्जिंग और लाइटिंग सिस्टम में किया जाता है।
• डी सी सीरीज जेनरेटर का उपयोग बूस्टर में किया जाता है बूस्टर को डी सी डिस्ट्रिब्यूशन लाइन में सीरिज में कनैक्ट किया जाता है जो लाइन वोल्टेज ड्राॅप को कोम्पनसेट करता हैं।
• कम्यूलेटिव कम्पाउडं डी सी जेनरेटर का उपयोग हाई वोल्टेज डी सी (H.V.D.C) में किया जाता है। 

डी सी जेनरेटर की Characterstics

डी सी जेनरेटर के लिए दो प्रकार की characterstics define की जाती है।
(1) बिना भार (no load) Characterstics
(2) भार (load) Characterstics
भार Characterstics दो प्रकार की होती है।
(a) internal Characterstics
(b) external Characterstics

(1) no load Characterstics

यह Characterstics आर्मेचर टर्मिनल को खुला रखते हुए नो लोड टर्मिनल वोल्टेज और फिल्ड करन्ट के बीच खींची जाती है इस Characterstics को मैगनेटाइजीगं कर्व भी कहते हैं। इसे खिंचने के फिल्ड करंट को धिरे धिरे बढ़ाया जाता हैं। और इसके अनुसार आर्मेचर की टर्मिनल वोल्टेज बिना भार के निकाली जाती हैं।

(2) Load Characterstics

यह दो प्रकार की होती है इनको खिंचने के लिए जेनरेटर पर भार को जोड़ा जाता हैं।
Internal Characterstics आर्मेचर में जेनरेटेड वोल्टेज और आर्मेचर करंट के बीच खींची जाती हैं।
External Characterstics आर्मेचर टर्मिनल वोल्टेज और लोड करन्ट के बीच खींची जाती हैं।

सेपरेटली एक्साइटेड जेनरेटर की characterstics


रेटेड स्पीड और फिल्ड करंट पर आर्मेचर की टर्मिनल वोल्टेज नियत (constant) रहती है लेकिन जैसे जैसे भार बढ़ाया जाता है आर्मेचर रियक्शन के कारण टर्मिनल वोल्टेज थोड़ी कम हो जाती है इसलिए external Characterstics constant न रहकर थोड़ी drop हो जाती हैं।
External Characterstics drow करने के लिए जेनरेटेड वोल्टेज में से आर्मेचर drop (Ia.Ra) घटाया जाता हैं। जिसके लिए एक आर्मेचर रेसिस्टेंस लाइन ड्रो करके उतना ही ड्रॉप कम कर दिया जाता हैं।

डी सी सीरीज जेनरेटर की characterstics

डी सी सीरीज जेनरेटर के चुम्बकन वक्र (magnetising curve) क़ खिंचने के लिए भी उस पर भार कैनेक्ट किया जाता है यदि पोल के सेचुरेशन के बाद भी भार को बढ़ाया जाता है तब आर्मेचर रियक्शन के कारण फ्लक्स बढ़ने की बजाए घटना शुरु हो जाता है जिससे जेनरेटेड वोल्टेज और टर्मिनल वोल्टेज दोनों खिंच जाती हैं।

डी सी कंपाउंड जेनरेटर की characterstics

डी सी कंपाउंड जेनरेटर में शंट के फ्लक्स के साथ सीरीज का फ्लक्स भी कार्य करता है सीरीज वाइंडिंग का फ्लक्स शंट वाइंडिंग के फ्लक्स का विरोध करता हैं।
डी सी कंपाउंड जेनरेटर के लिए एक निशचित भार पर सीरीज वाइंडिंग का फ्लक्स शंट वाइंडिंग के फ्लक्स पर चार प्रकार से प्रभाव डालता है।
(1) फ्लैट कंपाउंड
(2) ओवर कंपाउंड
(3) अन्डर कंपाउंड
डिफरेंशियल कम्पाउडं

(1) फ्लैट कंपाउंड

फ्लैट कंपाउंड का मतलब उस जेनरेटर से है जिसकी टर्मिनल वोल्टेज नो लोड पर और फुल लोड पर बराबर होती हैं।

(2) ओवर कंपाउंड

ओवर कंपाउंड उस dc generator in hindi से है जिसकी फुल लोड वोल्टेज, नो लोड वोल्टेज से अधिक होती हैं।

(3) अन्डर कंपाउंड

जिस समय हमारा जेनरेटर अन्डर कंपाउंड कन्डिशन में होगा उस समय फुल लोड वोल्टेज, नो लोड वोल्टेज से कम होगी।







Er. Chand जुलाई 20, 2021
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 आर्मेचर रियक्शन ( Armeture Reaction )

जब आर्मेचर पर भार (load) को कनैक्ट किया जाता है तब आर्मेचर चालक में धारा बहने लगती है जिसके कारण आर्मेचर अपना फ्लक्स उत्पन्न करता हैं। इस आर्मेचर फ्लक्स के कारण मेन फ्लक्स पर जो प्रभाव पड़ता है उसे आर्मेचर रियक्शन कहते हैं।
आर्मेचर फ्लक्स के प्रभाव के कारण मेन फ्लक्स डिस्टोर्टेड और डीमेगनेटाइज हों जाता हैं।

डी सी मशीन में किसी पोल पर चुम्बकीय क्षेत्र का बढ़ जाना और किसी पोल पर चुम्बकीय क्षेत्र का घट जाना आर्मेचर रियक्शन के कारण होता हैं ।



डी सी मशीन में आर्मेचर रियेक्शन या आर्मेचर फ्लक्स क्राॅस मैगनेटाइजीगं होते है जिसके कारण सारा चुम्बकीय क्षेत्र (resultant field) distorted यानी एक पोल टिप पर चुम्बकीय क्षेत्र ज्यादा हो जाता है और एक पोल टिप पर चुम्बकीय क्षेत्र कम हो जाता है। जिस पोल टिप पर चुम्बकीय क्षेत्र ज्यादा हो जाता है उसे strengthening effect कहते है और जिस पोल टिप पर चुम्बकीय क्षेत्र कम हो जाता है उसे weakning effect कहते हैं । 


जेनरेटर पर आर्मेचर रियक्शन के प्रभाव से ट्रेलिंग पोल टिप पर चुम्बकीय क्षेत्र ज्यादा हो जाता हैं और लिडिगं पोल टिप पर चुम्बकीय क्षेत्र कम हो जाता हैं ।

मोटर पर आर्मेचर रियक्शन के प्रभाव के कारण ट्रेलिग पोल टिप पर चुम्बकीय क्षेत्र का मान कम हो जाता है और लिडिगं पोल टिप पर चुम्बकीय क्षेत्र का मान ज्यादा हो जाता है ।


        आर्मेचर रियक्शन का प्रभाव

आर्मेचर रियक्शन के कारण डी सी मशीन के कई भागों पर इसका प्रभाव पड़ता हैं।

(1) आयरन लोस (iron loss) बढ़ जाते हैं

आर्मेचर रियक्शन के कारण एक पोल टिप पर चुम्बकीय क्षेत्र का मान ज्यादा हो जाता है जिससे कोर saturated (छक जाती है इसका मतलब यह है कि हम एक गिलास ले और उसे पानी से पुरा भर दें अब अगर हम इस गिलास में पानी डालेंगे तो वह पानी बाहर निकल जायेगा और खराब हो जायेगा यानी के गिलास saturate हों चुका इसी प्रकार कोर भी saturate हों जाती है और अब इसमें जितना भी चुम्बकीय क्षेत्र बनेगा वह लोस हों जायेगा । ) इस कारण कोर लोस काफी अधिक हो जाते हैं ।

(2) कम्यूटेशन (commutation) के समय चिंगारी उत्पन्न होना 

आर्मेचर रियक्शन के कारण MNA, GNA से दूर हों जाती है और जिस काॅयल में कम्यूटेशन होगा उसमें उत्पन्न विधुत वाहक बल (emf) का मान शून्य नहीं होगा जिसके कारण कम्यूटेशन के समय चिंगारी (sparking) उत्पन्न होगी।


(3) रिंग फायर का उत्पन्न होना

फ्लक्स डेंसिटी में डिस्टोर्शन के कारण यदि किन्हीं दो कम्यूटेटर सिगमेंट के बीच वोल्टेज अधिक हो जाये तो माइका इंसुलेशन का ब्रेक डाउन हो जाता है जिससे काॅयल शाॅर्ट सर्किट हो जाती है। जिससे कम्यूटेटर में स्पार्किगं होने के कारण रिंग फायर उत्पन्न हो जाता है। 

(4) फिल्ड वाइंडिंग की लागत बढ़ जाती है।

डि मैगनेटाइजिगं प्रभाव के कारण रिजल्टेंट फ्लक्स कम हो जाता है जिससे उत्पन्न होने वाला विधुत वाहक बल कम हो जाता है। इस विधुत वाहक बल का मान बढ़ाने के लिए हमें फिल्ड वाइंडिंग के चालकों का घुमाव बढ़ाना पड़ता है जिससे फिल्ड वाइंडिंग की लागत बढ़ जाती है।


आर्मेचर रियक्शन को कम करने के तरीके


(1) हाई रिलेक्टेसं की पोल टिप का प्रयोग करके

पोल टिप का रिलेक्टेसं बढ़ाने से आर्मेचर में क्राॅस फ्लक्स कम हो जाता है जिससे सारे चुम्बकीय क्षेत्र (resultant magnetic field) में डिस्टोर्शन कम हो जाता है। इसमें  पोल की कोर पर आयताकार होल बनाये जातें है ऐसा करने से आर्मेचर फ्लक्स के पाथ का रिलेक्टेंस बढ जाता है और आर्मेचर फ्लक्स का प्रभाव कम हो जाता है।


(2) इन्टर पोल का प्रयोग करके

आर्मेचर रियक्शन के कारण चुम्बकीय क्षेत्र distorted हों जाता है जिससे इन्टर पोल एक्सिस पर सारा चुम्बकीय क्षेत्र शून्य नहीं होता है। इन्टर पोल एक्सिस पर चुम्बकीय क्षेत्र शून्य करने के लिए इन्टर पोल बनाये जातें है जिनके द्वारा उत्पन्न होने वाला फ्लक्स GNA पर सारे चुम्बकीय क्षेत्र को शून्य कर देता हैं ।इन्टर पोल वाइंडिंग को आर्मेचर के साथ श्रेणी में जोड़ा जाता हैं।


(3) कोम्पनसेटिगं वाइंडिंग (compernsating winding) का उपयोग करके।

कोम्पनसेटिगं वाइंडिंग को पोल फेस में स्लोट कट करके उसमें डाला जाता है और इस वाइंडिंग को आर्मेचर के सीरीज में कनैक्ट किया जाता है। इस वाइंडिंग में धारा की दिशा उसके सामने वाले आर्मेचर चालक में बहने वाली धारा की दिशा के विपरित रखीं जाती है। कोंपनसेटिगं वाइंडिंग एक फ्लक्स उत्पन्न करती है जो कि आर्मेचर फ्लक्स के बराबर और उसके विपरित होता है जिससे आर्मेचर रियक्शन का प्रभाव पूरा खत्म हो जाता हैं।


ब्रस शिफ्ट करने का प्रभाव

यदि हम ब्रसेस को जेनरेटर के घुमने की दिशा में शिफ्ट कर दे तो बिना सैचुरेशन के ही डि मैगनेटाइजिगं प्रभाव होगा। और यदि ब्रसेस को मोटर के घुमने की दिशा में शिफ्ट कर दे तो मैगनेटाइजिगं प्रभाव के कारण रिजल्टएंट फिल्ड बढ़ जाता है जिससे उसमें उत्पन्न होने वाला विधुत वाहक बल भी बढ़ जाता है।


कम्यूटेशन का प्रभाव

जब कोई काॅयल या चालक एक पोल के प्रभाव से निकलकर दुसरे पोल के प्रभाव में पहुंचता है तब उस काॅयल या चालक में बहने वाली धारा अपने पूरे मान के लिए वापस (reverse) होती है। इस घटना को ही कम्यूटेशन कहते है।
कम्यूटेशन के दौरान काॅयल, ब्रस के द्वारा शाॅर्ट सर्किटेड होती है और इस शाॅर्ट सर्किट समय में ही धारा अपना पूरा मान परिवर्तित करती है।
शाॅर्ट सर्किट समय को कम्यूटेशन समय कहते है। यदि धारा कम्यूटेशन समय में अपने पूरे मान को वापस नहीं हो पाती है तो यह धारा स्पार्किगं के रूप में जम्प करती है। जिससे ब्रस और कम्यूटेटर के बीच स्पार्किगं दिखाई देती है।
गुड़ कम्यूटेशन--गुड कम्यूटेशन का मतलब यह होता है कि धारा अपने पूरे मान को वापस हों जाती है। और ब्रस और कम्यूटेटर के बीच कोई स्पार्किगं नहीं होती है।इसे आदर्श कम्यूटेशन भी कहते है।
पुवर (weak) कम्यूटेशन___पुवर कम्यूटेशन का मतलब यह होता है कि शाॅर्ट सर्किट समय में धारा का पूर्ण रूप से अपने मान को वापस ना हो पाना है जिससे कारण से ब्रस और कम्यूटेटर के बीच स्पार्किगं होती है।

डिल्य कम्यूटेशन दूर करने की विधियां


कम्यूटेशन को इम्प्रूव करने के काफी सारी विधियां है।

(1) वोल्टेज कम्यूटेशन

हमेशा जी एन ए (GNA) पर काॅयल में उत्पन्न विधुत वाहक बल शून्य होना चाहिए। इसलिए इंटर पोल पर अलग से विधुत वाहक बल उत्पन्न कराया जाता है। जिससे एक रोटेशनल विधुत वाहक बल उत्पन्न होगा जो रियक्टैंस वोल्टेज के प्रभाव को कम कर देता है। इस प्रकार कम्यूटेशन में लगने वाला समय कम हो जाता है।

(2) प्रतिरोध कम्यूटेशन

इस विधि में हम काॅयल या चालक का प्रतिरोध बढ़ा देते है जिससे काॅयल या चालक की इंडक्टिव प्रोपर्टी कम हो जाती है जिसके कारण काॅयल के रियक्टेंस वोल्टेज का प्रभाव भी कम हो जाता है इस प्रकार इस विधि के द्वारा भी कम्यूटेशन में लगने वाला समय कम हो जाता है।


Er. Chand जुलाई 19, 2021
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                    डी सी मोटर क्या होती है

डी सी मोटर (dc motor) एक ऐसी मशीन होती है जिसके द्वारा विधुत ऊर्जा (electrical energy) को यांत्रिक ऊर्जा (mechanical energy) में परिवर्तित किया जाता है ।ऐसी मोटर को डी सी मोटर कहते हैं । इन मोटरों का उपयोग हम कई जगह करते हैं जैसे traction system में, क्रेन में, elevator और लिफ्ट में, ऐसी काफ़ी जगहों पर हम डी सी मोटर का उपयोग करते हैं । आगे अब dc motor in hindi पर बिस्तार से चर्चा करेंगे।
   

                    

   डी सी मोटर का कार्य सिद्धान्त (working principle of dc motor)


V  = डी सी  सप्लाई वोल्टेज
 I  =  प्रत्यावर्ती धारा जो चालक में बहती है
 B  =  चुम्बकीय क्षेत्र जिसकी दिशा नोर्थ से साउथ की ओर है
C1,C2  =  कम्यूटेटर
B1,B2  =  ब्रस
N  =  नोर्थ पोल
S  =  साउथ पोल

जब हम डी सी मोटर को डी सी सप्लाई देते है तो इस डी सी सप्लाई को दिकपरिवर्तक (commutator) ऐ सी सप्लाई में परिवर्तित कर देता है । अब डी सी मोटर के चालकों में जो धारा बहेगी वह प्रत्यावर्ती धारा (AC current) होगी । चालक में प्रत्यावर्ती धारा प्रवाहित होने के कारण चालक में एक फ्लक्स उत्पन्न होगा इस फ्लक्स को चुम्बकीय क्षेत्र कट करेगा जिससे फ्लक्स दर परिवर्तित होने के कारण चालक में एक विधुत वाहक बल (electro motive force, EMF) उत्पन्न होगा । इस विधुत वाहक बल के कारण चालक पर एक बल लगेगा । इस बल के लगने के कारण हमारी dc motor in hindi घुमने लगती हैं । इस बल की दिशा फ्लेमिगं के बायं हाथ के नियम ( flaming laft hand rull ) के द्वारा निकाली जाती हैं ।

डी सी मोटर के बारे में कुछ बातों को ध्यान में रखना बहुत जरूरी है जो मैंने नीचे बताई है ।

• दिकपरिवर्तक (commutator) का काम डी सी सप्लाई को ऐ सी सप्लाई में परिवर्तित करना होता हैं ।
• डी सी मोटर में एक समान टाॅर्क उत्पन्न करने के लिए धारा की दिशा पोल के साथ बदलनी चाहिए । यदि ऐसा नहीं होगा तो resultant torqe zero हो जायेगा ।
• चालक मैं धारा की दिशा लगातार बदलती रहती है इसलिए चालक मैं हमेशा प्रत्यावर्ती धारा ही होगी ।
• मोटर में चालक पर लगने वाला बल (torqe) रोटर के घूमने की दिशा में ही लगता है ।
• डी सी मोटर में ब्रस stasnory होते है और commutator घूमता (rotating) हैं ।
• डी सी मोटर एक invertor की तरह काम करता हैं ।

डी सी मोटर के प्रकार ( types of dc motor in hindi ) 

डी सी मोटर दो प्रकार की होती है 
(1) सेपरेटली एक्साइटेड
(2) सेल्फ एक्साइटेड
सेल्फ एक्साइटेड मोटर तीन प्रकार की होती हैं

(a) डी सी शंट मोटर

डी सी शंट मोटर लगभग एक समान गति पर चलने वाली मोटर होती है। इस मोटर को शंट मोटर इसलिए कहते है क्योंकि फिल्ड वाइंडिंग को आर्मेचर के शंट में लगाते है। यह शंट वाइंडिंग पतले चालकों की बनी होती है इसलिए इसका प्रतिरोध उच्च होता है। इस वाइंडिंग में जो वोल्टेज होती है वह सप्लाई वोल्टेज के समान होती है। इस शंट वाइंडिंग में बहने वाली धारा रेटेड धारा की लगभग 4 से 5 प्रतिशत होती है। इस मोटर का उपयोग उन स्थानों पर किया जाता है जहां एक समान गति की आवश्यकता होती है।

इसे भी देखें : dc motor questions and answers in hindi

(b) डी सी सीरीज मोटर

डी सी सीरीज मोटर एक परिवर्तित गति पर चलने वाली मोटर है। इस मोटर में शुरुआत में बहने वाली धारा रेटेड धारा की 4 से 5 गुना अधिक होती है इसलिए इस मोटर का स्टार्टिगं टाॅर्क बहुत अधिक होता है।डी सी सीरीज मोटर को कभी भी बिना भार (no load) के नहीं चलानी चाहिए। क्योंकि बिना भार के इसकी गति बहुत तेज होती है जो कि बहुत ख़तरनाक होती है। इस मोटर को सीरीज मोटर इसलिए कहते है क्योंकि फिल्ड वाइंडिंग को आर्मेचर के सीरीज में कनैक्ट करते है। यह वाइंडिंग मोंटे तार से बनायी जाती है। इसलिए इसका प्रतिरोध बहुत कम होता है। इसमें बहने वाली धारा रेटेड धारा के बराबर होती है।

(c) कम्पाउडं मोटर

इस मोटर में दो फिल्ड वाइंडिंग का प्रयोग किया जाता है। एक फिल्ड वाइंडिंग को आर्मेचर के सीरीज में कनैक्ट किया जाता है और दूसरी फिल्ड वाइंडिंग को आर्मेचर के शंट में लगाया जाता है। कम्पाउडं मोटर दो प्रकार की होती है। कम्यूलेटिव कम्पाउडं मोटर और डिफरेंशियल कम्पाउडं मोटर। कम्यूलेटिव कम्पाउडं मोटर में दोनों फिल्ड वाइंडिंग का फ्लक्स एक ही दिशा में होता है और डिफरेंशियल कम्पाउडं मोटर में दोनों फिल्ड वाइंडिंग का फ्लक्स अलग अलग दिशा में होता है। 

डिफरेंशियल कम्पाउडं मोटर को स्टार्ट करने के लिए इसकी सीरीज फिल्ड वाइंडिंग को शाॅर्ट कर दिया जाता है। और जब मोटर रेटेड स्पीड के आस पास पहुंच जाती है तो इसकी सीरीज फिल्ड वाइंडिंग को सर्किट से वापस जोड़ दिया जाता है। यानि इस मोटर को एक शंट मोटर की तरह स्टार्ट किया जाता है। यहां पर हम जानकारी ले रहे हैं dc motor in hindi के बारे में

डिफरेंशियल कम्पाउडं मोटर एक समान गति (constant speed) पर चलने वाली मोटर है। इसकी गति में जरा सा भी वैरियेशन नहीं आता है। 

डी सी मोटर में प्रयोग होने वाली ब्रेकिंग

डी सी मोटर में तीन तरह की ब्रेकिंग का प्रयोग किया जाता है ।
(1) रिजेनरेटिव ब्रेकिंग
(2) प्लगिंग
(3) रेहॉस्टैटिक ब्रेकिंग या डायनैमिक ब्रेकिंग

(1) रिजेनरेटिव ब्रेकिंग

रिजेनरेटिव ब्रेकिंग में आर्मेचर वोल्टेज (Ea) के मान को सप्लाई वोल्टेज से अधिक किया जाता है जिससे आर्मेचर करंट की दिशा बदल जाती है और विधुत वाहक बल की दिशा भी बदल जाती हैं। इस प्रकार डी सी मोटर एक जेनरेटर की तरह काम करने लगता है। ओर जेसे ही मोटर जेनरेटर की तरह घुमना शुरू करती है उसी समय हम मोटर की सप्लाई को बन्द कर देते है और मोटर रुक जाती हैं।

इस विधि में हम रोटर की गतिज ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदल कर सप्लाई सोर्स को वापस कर दिया जाता हैं।
सीरीज मोटर में रिजेरेटिव ब्रेकिंग का प्रयोग नहीं किया जाता है।

(2) प्लुगिंग (plugging)

इस विधि में सप्लाई टर्मिनल को आपस में बदल दिया जाता है और फिल्ड वाइंडिंग में हम कोई बदलाव नहीं करते हैं।जिसकी वजह से आर्मेचर करंट की दिशा बदल जाती हैं और विधुत वाहक बल की दिशा भी बदल जाती हैं।सप्लाई टर्मिनल बदलने से धारा का मान बहुत अधिक बढ़ जाता है। धारा को एक समान रखने के लिए आर्मेचर सर्किट में एक ब्राहा प्रतिरोध (external resistance) जोड़ा जाता हैं।

यदि हम dc motor in hindi की स्पीड शून्य होने के बाद भी सप्लाई को कनेक्ट रहने दें तो मोटर दूसरी दिशा में घुमने लगेगी।
प्लुगिगं में इलैक्ट्रिकल पावर मुख्य सप्लाई से ली जाती है और यांत्रिक पावर साफ्ट से ली जाती हैं।इन दोनों पावर का सम रोटर सर्किट में ऊष्मा के रूप में खर्च होता है जिसके कारण तापमान बहुत बढ़ जाता हैं।
डी सी मशीन में प्लुगिगं दो तरिके से की जाती है
आर्मेचर पोलैरिटी को उल्टा करके
फिल्ड वाइंडिंग की पोलैरिटी को उल्टा करके

(3) रिहोस्टेटिक या डायनैमिक ब्रेकिंग

इस विधि में सप्लाई को बन्द करके एक प्रतिरोध लगा दिया जाता है जिससे आर्मेचर करंट की दिशा बदल जाती है और उसमें उत्पन्न विधुत वाहक बल की दिशा भी बदल जाती हैं। इस प्रकार मोटर रुक जाती हैं।
इस विधि में तेज़ गति से ब्रेकिंग करने के लिए स्पीड कम होने के साथ-साथ भार प्रतिरोध को भी कम कर दिया जाता हैं जिससे आर्मेचर करंट constant रहें।
इन ब्रेकिंग विधियों में सबसे दक्षतापूर्ण विधि रिजेनरेटिव ब्रेकिंग विधि हैं। और सबसे तेज गति से ब्रेकिंग करने वाली विधि प्लुगिगं विधि हैं। और सबसे सस्ती ब्रेकिंग विधि रिजेनरेटिव ब्रेकिंग विधि हैं।

dc motor in hindi की गति नियंत्रित करने की विधियां

यहां में आपको बताउंगा कि डी सी मोटर की गति नियंत्रित कैसे कर सकते है। डी सी मोटर की गति तीन चीजों पर निर्भर करती है।फिल्ड फ्लक्स,आर्मेचर प्रतिरोध और आर्मेचर वोल्टेज इन तीन चीजों को नियंत्रित करके डी सी मोटर की गति नियंत्रित कर सकते है। 

(1) फिल्ड फ्लक्स को नियंत्रित करके

इस विधि का प्रयोग केवल मोटर की गति को बढ़ाने के लिए करते है।के। क्योंकि फ्लक्स को ज्यादा बढ़ाने से कोर सैचुरेटेड हो जाती है जिससे कोर के टूटने का खतरा रहता है। जब फ्लक्स को कम करते है तो आर्मेचर वोल्टेज भी कम हो जाती है। आर्मेचर वोल्टेज कम होने से आर्मेचर धारा बढ़ जाती है। जिससे मोटर का विधुत चुम्बकीय टाॅर्क बढ जाता है और लोड टाॅर्क कम हो जाता है जिससे मोटर की गति बढ़ जाती है।

(2) आर्मेचर प्रतिरोध को नियंत्रित करके

इस विधि का प्रयोग केवल मोटर की गति कम करने के लिए किया जाता है। क्योंकि मोटर बन के तैयार हो चुकी है। इसलिए इसके प्रतिरोध को कम नहीं किया जा सकता है। केवल बढाया जा सकता है। इस विधि में एक ब्राहा प्रतिरोध आर्मेचर में जोड़ देते है। जिससे आर्मेचर का प्रतिरोध बढ जाता है। आर्मेचर का प्रतिरोध बढ़ने से आर्मेचर धारा घट जाती है। जिससे विधुत चुम्बकीय टाॅर्क कम हो जाता है और लोड टाॅर्क बढ जाता है जिससे मोटर की गति कम हो जाती है।

(3) आर्मेचर वोल्टेज नियन्त्रण विधि

इस विधि का उपयोग भी केवल गति को कम करने के लिए किया जाता है। जब आर्मेचर वोल्टेज को कम करते है तो सप्लाई वोल्टेज भी कम हो जाता है। जिससे आर्मेचर धारा कम हो जाती है ‌‌। आर्मेचर धारा कम होने से विधुत चुम्बकीय टाॅर्क भी कम हो जाता है। लेकिन लोड टाॅर्क बढ जाता है और मोटर की गति कम हो जाती है।

डी सी सीरीज मोटर की गति नियंत्रित करने की विधियां

डी सी सीरीज मोटर बिना भार बहुत ख़तरनाक गति पर चलती है। क्योंकि इसका स्टार्टिगं टाॅर्क बहुत उच्च होता है। इसकी गति को नियंत्रित करने के लिए इसकी फिल्ड वाइंडिंग के समांतर में एक कम वैल्यू का प्रतिरोध जोड़ा जाता है। इस प्रतिरोध को डायवर्टर कहते है। जिससे फिल्ड वाइंडिंग की धारा कम हो जाती है। और उसका फ्लक्स भी कम हो जाता है। जिससे dc motor in hindi की गति बढ़ जाती है। 

फिल्ड वाइंडिंग की टैपिंग करके भी गति नियंत्रित कर सकते है। जब फिल्ड वाइंडिंग की टैपिंग कर देते है। तो टैपिंग का प्रयोग करने से फिल्ड वाइंडिंग के चक्करों की संख्या कम हो जाती है जिससे फ्लक्स कम हो जाता है और मोटर की गति बढ़ जाती है।

    डी सी मोटर के उपयोग

(1) सेपरेटली एक्साइटेड मोटर का उपयोग सर्वो मोटर, स्टीम रोलिंग यूनिट, पेपर मील, डिजल इलैक्ट्रिक कपलशन और शीप यानी जहाज आदि में उपयोग किया जाता है ।
(2) शंट मोटर का उपयोग ऐसी जगह किया जाता है जहां पर एक समान (constant) गति की आवश्यकता होती है जैसे लेंथ मशीन, सेंट्रीफ्यूगल पम्प, फैन, ब्लोवर, रेसिप्रोकेटिगं पम्प, प्रीटिंग प्रेस आदि में किया जाता है ।
(3) सीरिज मोटर का उपयोग वहां किया जाता है जहां पर हाई स्टार्टिगं टाॅर्क की आवश्यकता होती है डी सी सीरीज मोटर का स्टार्टिगं टाॅर्क हाई होता है इसलिए इसका उपयोग ट्रेक्शन सिस्टम, क्रेन, हाइस्ट्स, कव्वेयर्स, इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव आदि में किया जाता है ।
(4) कम्यूलेटिव कम्पाउडं मोटर का उपयोग शेयर्स मशीन, पुंचेस मशीन, एलिवेटर, रोलिंग मील आदि में किया जाता है ।
(5) डिफरेंशियल कम्पाउडं मोटर का उपयोग कॉन्स्टेंट स्पीड एप्लिकेशन में किया जाता है जैसे एलिवेटर ओर एक्सीलेटर आदि में ।

भाईयों हमने इस लेख में dc motor in hindi से रिलेटेड ज्ञान को अर्जित किया है, उम्मीद करता हूं कि आपको मोटर से संबंधित यह जानकारी अच्छी लगी होंगी। इस पोस्ट कमेंट करके अपनी राय जरुर दिजियेगा।





Er. Chand जुलाई 17, 2021
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             डी सी मशीन क्या होती है

जहां विधुत यांत्रिक ऊर्जा परिवर्तन यन्त्र का उपयोग किया जाता है उसे मशीन कहते हैं। जैसे डी सी मोटर में हम विधुत ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में परिवर्तित करते हैं और डी सी जेनरेटर में हम यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करते हैं । dc machine in hindi का मुख्य भाग स्टेटर और रोटर होता है। स्टेटर मशींन का स्थिर भाग होता है जो एक ही स्थान पर रुका रहता है। रोटर मशींन का घूमने वाला भाग होता है जिसके घूमने पर मशींन में एक विधुत वाहक बल उत्पन्न होता है।

डी सी मशीन के मुख्य भाग

डी सी मशीन के मुख्य दो भाग होते हैं
(1) स्टेटर
(2) रोटर 

                      (1)   स्थाता (Stator)

मशीन के जिस भाग पर हम फिल्ड वाइंडिंग लगाते है उस भाग को हम स्टेटर कहते हैं । स्टेटर मशीन का स्थिर (रुका हुआ) भाग होता है । यह फ्लक्स को आसानी से अपने अन्दर से गुजारने का काम करता हैं ।

फिल्ड सिस्टम का मुख्य काम एक समान चुम्बकीय क्षेत्र बनाना है । जिसमें आर्मेचर घुमता हैं । । फिल्ड सिस्टम बनाने के लिए विधुत चुम्बक का प्रयोग किया जाता हैं । जिसकी मैगनेटाइजीगं धारा कंट्रोल करके फिल्ड की स्ट्रेंथ कंट्रोल की जाती हैं ।

स्टेटर के चार मुख्य भाग होते हैं ।

(1) योक या फ्रेम

(2) पोल बोड़ी या पोल कोर

(3) पोल सू

(4) फिल्ड वाइंडिंग


                     (1)    योक या फ्रेम

योक एक हॉलो सिलेण्डिरीकल स्ट्रक्चर हैं । जो कि मशीन का फ्रेम कहलाता है । छोटी रेटिंग की मशीन में यह कास्ट आयरन का बना होता है जबकि बड़ी मशीनों में फेब्रिकेटेड स्टील से बनाया जाता हैं । क्योंकि इसकी पर्मेबिलीटी हाई होती हैं ।

                        (2) पोल बोड़ी

पोल बोड़ी चुम्बकीय क्षेत्र का सोर्स हैं जिसकी सहायता से चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न किया जाता हैं ।

                         (3) पोल सू

पोल सू भी पोल बोड़ी का ही एक हिस्सा हैं जो क्यूरेटिव आकार लिए रहता हैं । पोल सू का मुख्य काम फ्लक्स को स्प्रेड आउट करना है । साथ ही साथ यह फील्ड कॉयल को भी रोककर रखता है । 

                          (4) फिल्ड काॅयल

फिल्ड काॅयल काॅपर की बनी वांइडिग होती है जिन्हें पोल बोड़ी के ऊपर लपेटा जाता हैं ।

                     (2)  घूर्णक (Rotor)

यह dc machine in hindi का घूमने वाला पार्ट है जो कि बेलनाकार आकार के रुप में बना होता है। रोटर मशीन का घूमने वाला भाग होता है। इस पर आर्मेचर वाइंडिंग को लपेटा जाता हैं ।इसके मुख्य निम्न भाग होते हैं ।
(1) आर्मेचर कोर 
(2) दिकपरिवर्तक
(3) ब्रस
(4) आर्मेचर वाइंडिंग
(5) साफ्ट ओर बियरिंग

                   (1) आर्मेचर कोर

आर्मेचर का मुख्य काम कन्डक्टर को अपने अन्दर प्लेस करके चुम्बकीय क्षेत्र में घुमाना होता है इसके लिए लगभग .3mm - .6mm Si steel से बनी लेमिनेटेड कोर से एक बेलनाकार आकार बनाया जाता है जिसमें स्लोट कटे होते हैं । इन स्लोट में आर्मेचर वाइंडिंग को प्लेस किया जाता हैं ।

        (2) दिकपरिवर्तक (Commutator) 

दिकपरिवर्तक एक घुमने वाला स्विच है जो कि आर्मेचर और बाहरी परिपथ के बीच लगा होता है इसका मुख्य काम बाहरी परिपथ के कनेक्शन को ऊल्टा करना होता हैं । जो कि आर्मेचर काॅयल में धारा के रिवर्स होने पर किये जाते हैं । 

Commutator ही आर्मेचर में उत्पन्न ऐ सी को डी सी में बदलता है साथ ही साथ एक इलैक्ट्रिकल कनेक्शन भी बाहरी परिपथ के साथ बनाता है ।

यह उच्च चालकता वाले हार्ड ड्राउन काॅपर का बना होता हैं । कुछ मशीन में यह फॉर्ज्ड कॉपर का बना होता हैं 

दिकपरिवर्तक को सिगमेंट में बांटा जाता है और हर एक सिगमेंट .5 -  1mm की माइका की लेयर से इन्सूलेटेड होता हैं ।

कैम्मुटेटर सेगमेंट से धारा को इकट्ठा करने का काम ब्रस करते हैं यह आयताकार आकार के होते है और कार्बन के बने होते हैं । इन्हें ब्रस होलडर के अन्दर लगाया जाता है और कॉमुटेटर सेगमेंट पर प्लेस किया जाता हैं । ये dc machine in hindi के एक तरह से मेन पाट होते है।
ब्रस कार्बन ग्रेफाईट, ग्रेफाईट, मेटल ग्रेफाईट, कॉपर के भी बने होते हैं । 

(3) आर्मेचर वाइंडिंग

जिस वाइंडिंग में विधुत वाहक बल (इएमएफ) उत्पन्न होता है उस वाइंडिंग को आर्मेचर वाइंडिंग कहते है ।
आर्मेचर वाइंडिंग में हमेशा प्रत्यावर्ती धारा बहती हैं ।
आर्मेचर वाइंडिंग भार धारा ग्रहण करती हैं ।
डी सी मशीन में आर्मेचर वाइंडिंग रेटेड पावर ग्रहण करती है जबकि फिल्ड वाइंडिंग रेटेड पावर का 2 से 5% ग्रहण करती हैं ।

डी सी मशीन में दो प्रकार की आर्मेचर वाइंडिंग होती हैं

(1) लेप वाइंडिंग (Lap winding)
(2) वेव वाइंडिंग (Wave winding)

(4) साफ्ट ओर बियरिंग

छोटी मशीन में बाॅल बियरिंग प्रयोग किये जाते हैं जबकि बड़ी मशीनों में रोल बियरिंग प्रयोग किये जाते हैं बहुत अधिक रेटिंग की मशीनों में पेडेशटल बियरिंग प्रयोग किये जाते हैं ।

dc machine in hindi में आर्मेचर कोर को साफ्ट के ऊपर लगाया जाता है यह साफ्ट माइल्ड स्टील की बनी होती हैं । सभी घुमने वाले पार्ट को साफ्ट पर लगाया जाता हैं ।


Er. Chand जून 26, 2021
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