Results for Physics 12th

 चुंबकन क्षेत्र (Magnetising field)

जब कोइ चुंबकीय पदार्थ किसी चुम्बकीय क्षेत्र में रखा जाता है तो वह चुंबकित हो जाता है अर्थात उसमें भी चुंबक का गुण आ जाता है। चुम्बकीय पदार्थों के इस प्रकार चुम्बकत्व ग्रहण करने की क्रिया को चुंबकन कहते हैं। इस चुंबकीय क्षेत्र को जिसके कारण पदार्थ में चुम्बकत्व का गुण आया है, चुंबकन क्षेत्र या चुम्बकीय प्रेरण कहते है। चुंबकन क्षेत्र भी एक चुंबकीय पदार्थों के गुण है आगे और इसके कुछ गुणों के बारे में विस्तार से पढ़ेंगे।

चुंबकन की क्रिया में चुंबकीय पदार्थों के सिरों की चुम्बकीय ध्रुवता चुम्बकन क्षेत्र की ध्रुवता के विपरित बनती है अर्थात् चुंबकन क्षेत्र में उत्तरी ध्रुव की ओर वाला चुंबकीय पदार्थ का सिरा दक्षिणी ध्रुव तथा क्षेत्र के दक्षिणी ध्रुव की ओर वाला सिरा उत्तरी ध्रुव पर बनता है। अतः चुम्बकित पदार्थ की चुम्बकीय बल रेखायें चुंबकन क्षेत्र की बल रेखाओं के विपरित दिशा में होती है। चुंबकीय पदार्थ की बल रेखाओं को प्रेरण बल उत्पन्न रेखायें कहते हैं।

किसी बिंदु पर चुम्बकन क्षेत्र की त्रिवता उस बल से मापी जाती है जो उस पर स्थित एकांक उत्तरी ध्रुव पर कार्य करता है। दूसरे शब्दों में चुंबकन क्षेत्र की त्रिवता उन बल रेखाओं की संख्या के बराबर होती है जो उस बिंदु पर स्थित एकांक क्षेत्रफल के लम्बवत गुजरती है। इसका CGS पद्ति में मात्रक आर्स्टेड या गौस होता है और MKS पद्ति में मात्रक वेबर/मीटर वर्ग होता है।

चुंबकीय फ्लक्स घनत्व (Magnetic flux density)

किसी चुम्बकीय क्षेत्र में चुंबकीय बल रेखाएं ही चुम्बकीय क्षेत्र की प्रतिक होती है। चुंबकन की क्रिया में दो चुम्बकीय क्षेत्र होते है अर्थात् दो प्रकार की बल रेखाएं होती हैं। एक तो चुंबकन क्षेत्र की बल रेखाएं और दूसरी चुम्बकित पदार्थ की बल रेखाएं। चुंबकन क्षेत्र की बल रेखाओं को अविरत रेखाओं द्वारा और चुंबकीय पदार्थ की बल रेखाओं को बिंदुदार रेखाओं द्वारा प्रर्दशित किया जाता है। पदार्थ के अन्दर किसी बिंदु पर परिणामी चुम्बकीय क्षेत्र की त्रिवता इन दोनों चुंबकीय क्षेत्र की तीव्रताओं के योग के बराबर होती है। इस परिणामी तीव्रति को ही चुंबकीय फ्लक्स घनत्व कहते हैं। इसको चुंबकीय प्रेरण का संख्यात्मक मान भी कहते है, इस राशि को B से व्यक्त किया जाता है, यह एक सदिश राशि है और इसका एस आई मात्रक वेबर प्रति मीटर वर्ग होता है।


चुंबकन की तीव्रता

किसी चुम्बकित पदार्थ की चुम्बकीय अवस्था का वर्णन जिस भौतिक राशि द्वारा किया जाता है, वह चुंबकन की तीव्रता कहलाती है। इसको I से प्रर्दशित करते है यह एक सदिश राशि है, इसका परिमाण प्रति एकांक आयतन चुंबकीय आघूर्ण के बराबर होता है।
चुम्बकित पदार्थ की चुम्बकीय अवस्था उसकी चुम्बकन तीव्रता से ज्ञात की जाती है। यदि किसी चुंबकीय पदार्थ को H तीव्रता वाले चुंबकन क्षेत्र में रखने पर प्रेरण द्वारा उसमें M चुंबकीय आघूर्ण उत्पन्न हो और पदार्थ का आयतन V हो तो चुंबकन तीव्रता

                    I = M / V

इसका मात्रक ऐम्पीयर प्रति मीटर होता है।

चुंबकीय प्रवृत्ति

किसी निश्चित शक्ति के चुंबकीय क्षेत्र में किसी चुम्बकीय पदार्थ को रखने पर उसमें ऊत्पन्न चुम्बकत्व की मात्रा जितनी अधिक होती है, उसकी चुंबकीय प्रवृत्ति उतनी ही अधिक कही जाती है। अतः चुम्बकीय प्रवृत्ति से तात्पर्य, पदार्थ द्वारा सरलता से चुम्बकत्व ग्रहण करने की क्षमता से हैं। किसी पदार्थ में ऊत्पन्न चुंबकन की तीव्रता I और चुंबकन क्षेत्र H के अनुपात को उस पदार्थ की चुम्बकीय प्रवृत्ति कहते हैं। नर्म लौहा स्टील की अपेक्षा अत्यंत सरलता से अधिक शक्ति का चुंबकन बनाया जा सकता है, जबकि दोनों पर कार्य कारी चुम्बकीय क्षेत्र बराबर हो। नर्म लौहे की चुंबकीय प्रवृत्ति स्टील से अधिक होती है।

चुंबकशीलता (Permeability) 

वायु की अपेक्षा लौहे या अन्य किसी चुंबकीय पदार्थ में से चुम्बकीय बल रेखाओं की संख्या जितनी अधिक गुजरती है उसकी चुंबकशीलता उतनी ही अधिक कही जाती है। अतः चुम्बकीय बल रेखाओं के लिए पदार्थ की चालकता से तात्पर्य ही उसकी चुंबकशीलता से होता है।
यदि किसी पदार्थ को चुंबकन क्षेत्र H में रखने पर उसमें चुम्बकीय फ्लक्स घनत्व B हो तो पदार्थ की चुंबकशीलता, B और H के अनुपात के बराबर होती है। इसे म्यू से दर्शाया जाता है।

दूसरे शब्दों में, किसी चुम्बकन क्षेत्र में रखें किसी पदार्थ के एकांक क्षेत्रफल से लम्बवत गुजरने वाली बल रेखाओं की संख्या B और पदार्थ की अनुपस्थिति में वायु के एकांक क्षेत्रफल से गुजरने वाली चुंबकीय बल रेखाओं की संख्या H के अनुपात को पदार्थ की चुंबकशीलता कहते हैं। नर्म लौहे की चुंबकशीलता बहुत अधिक होती है।

Er. Chand नवंबर 02, 2021
Read more ...

 प्रत्यावर्ती धारा क्या है


आज की हमारी इस पोस्ट में हम पढ़ने वाले हैं, प्रत्यावर्ती धारा क्या होती है इसका वर्ग माध्य मूल मान, शिखर मान, आवर्त काल, आवृत्ति और प्रत्यावर्ती वोल्टेज के बारे में जानकारी हासिल करेंगे। अगर आप ac current in hindi से रिलेटेड ज्ञान प्राप्त करना चाहते है तो आप एक सही वेबसाइट और सही पोस्ट पर आये है। यहां पर आपको बहुत ही आसान तरीके से प्रत्यावर्ती धारा के बारे में समझाया जायेगा, जिससे आप इसको समझकर दूसरों को भी आसानी से समझा सकते हैं।तो सबसे पहले हम प्रत्यावर्ती धारा की परिभाषा को जान लेते है।


प्रत्यावर्ती धारा की परिभाषा


प्रत्यावर्ती धारा एक ऐसी धारा होती है जो समय के साथ अपने मान को आवर्त रूप से बदलतीं रहतीं हैं, और एक निश्चित समय अंतराल के बाद ( 360 डिग्री पूरा करने के बाद) दौबारा से अपने प्रारंभिक मान से चलना शुरू करती है, एसी धारा को प्रत्यावर्ती धारा कहते हैं।


प्रत्यावर्ती धारा का शिखर मान


ac current का एक चक्कर 360 डिग्री का होता है और इस एक चक्कर के अन्दर यह दो बार अपने अधिकतम मान पर पहुंचती है। पहले आधे cycle में इसका धनात्मक अधिकतम मान होता है और दूसरे आधे चक्र में इसका शिखर मान ऋणात्मक होता है। पहले आधे चक्र में शिखर मान 90 डिग्री पर प्राप्त होता है और दूसरे आधे चक्र में अधिकतम मान 270 डिग्री पर मिलता है इस प्रकार प्रत्यावर्ती धारा का हमे एक cycle में दो बार शिखर मान प्राप्त होता है।


प्रत्यावर्ती धारा का आवर्तकाल


प्रत्यावर्ती धारा एक चक्कर पूरा करने में जितना समय लेती है, उसे उसका आवर्त काल (time period) कहते हैं। इसको अंग्रेजी अक्षर कैपीटल T से प्रर्दशित किया जाता है और इसका मात्रक सेकेण्ड(sec) होता है।

प्रत्यावर्ती धारा या वोल्टेज का आवर्त काल (T)  = प्रत्यावर्ती धारा या वोल्टेज को एक चक्कर घूमने में लगा समय


     T = 2π/w 


    w = कोणीय वेग


क्योंकि प्रत्यावर्ती वोल्टेज का समीकरण V = Vm sin (wt) और प्रत्यावर्ती धारा समीकरण I = Im sin (wt) में t के स्थान पर (t+2π/w) रखने पर वोल्टेज और धारा में कोई बदलाव नहीं आता, अर्थात् प्रत्येक 2π/w समय के बाद दुबारा से पहला चक्र शुरू हो जाता है यही समय प्रत्यावर्ती धारा या वोल्टेज का आवर्त काल कहलाता है।


अब हम प्रत्यावर्ती धारा के आवर्त काल को एक कुण्डली की सहायता से समझेंगे। जितने समय में चुम्बकीय क्षेत्र में घूमती हुई कुण्डली एक चक्कर पूरा करती है, ठीक उतने ही समय में इस कुण्डली से जुड़े परिपथ में उत्पन्न विधुत वाहक बल और धारा पहले एक दिशा में शून्य से अधिकतम और अधिकतम से शून्य हो जाती है। फिर विपरित दिशा में शून्य से अधिकतम और अधिकतम से शून्य हो जाती है। यह प्रक्रिया प्रत्यावर्ती धारा का एक चक्कर कहलाती है।


प्रत्यावर्ती धारा की आवृत्ति


प्रत्यावर्ती धारा या वोल्टेज एक सेकेंड में जितने चक्कर पूरे करती है, उसे उसकी आवृत्ति कहते हैं। या फिर इसकी परिभाषा हम ऐसे भी दे सकते है कि प्रत्यावर्ती धारा के आवर्त काल के व्यूत्क्रमानुपाती को आवृत्ति कहते हैं। इसको अंग्रेजी अक्षर स्मोल f से प्रदर्शित किया जाता है और इसका मात्रक हर्टज(Hz) चक्कर प्रति सेकेण्ड होता है। यदि ac धारा या वोल्टेज का आवर्त काल T है तो, उसकी आवृत्ति


    f = 1/T

   

    f = w/2π


  w को प्रत्यावर्ती धारा या वोल्टेज की कोणीय आवृत्ति भी कहते है इसका मात्रक रेडियन प्रति सेकेण्ड होता है। 

घरेलू उपयोग में आने वाली प्रत्यावर्ती वोल्टेज या धारा की आवृत्ति 50 चक्कर प्रति सेकेण्ड या 50 हर्टज होती है और इसकी कोणीय आवृत्ति 314 रेडियन प्रति सेकेण्ड होती है।


प्रत्यावर्ती धारा का तात्क्षणिक मान


प्रत्यावर्ती धारा के समीकरण में किसी समय t पर जो धारा का मान होता है, उसे तात्क्षणिक मान कहते हैं। जैसे जैसे t का मान बदलता जाता है वैसे वैसे प्रत्यावर्ती धारा का तात्क्षणिक मान भी बदलता है। 


प्रत्यावर्ती धारा की वोल्टेज और धारा में कलान्तर


ac current circuit में वोल्टेज और धारा की आवृत्ति समान होती है, लेकिन यह जरूरी नहीं कि ये दोनों एक ही फेज में हो। यह देखा गया है कि जब परिपथ में वोल्टेज अधिक होती है तो धारा अधिक नहीं होती और उस समय हम कहते है कि दोनों के बीच कलान्तर है। इस कलान्तर का मान परिपथ की प्रकृति पर निर्भर करता है, कलान्तर इस बात पर निर्भर करता है कि परिपथ में ओमीय प्रतिरोध, प्रेरकत्व और धारिता में से कौन सा कारक मोजूद है या इनका कौन-सा संयोग उपस्थित है। कुछ परिपथों में वोल्टेज अधिकतम होने से पहले ही धारा का मान अधिकतम हो जाता है। तब यह कहा जाता है कि धारा, वोल्टेज से कला में अग्रगामी है या वोल्टेज, धारा से कला में पश्चगामी है। यह सब जानकारी हम ac current in hindi के बारे में प्राप्त कर रहे हैं।


औसत मान (avarage value) 


ac current in hindi प्रत्यावर्ती धारा पूरे एक चक्कर के अन्तर्गत पहले आधे चक्र में एक दिशा में और बचे हुए आधे चक्र में विपरित दिशा में प्रवाहित होकर अधिकतम मान को प्राप्त करती है। दोनों आधे भागों में परिवर्तन समान होता है, यानी पूरे एक चक्कर के लिए प्रत्यावर्ती धारा का औसत मान शून्य होता है, परन्तु किसी आधे चक्र के लिए इसका औसत मान शून्य नहीं होता। आधे चक्र के लिए औसत मान 2Im/π=0.637 Im होता है।


यही कारण है कि किसी चल कुण्डली धारामापी में प्रत्यावर्ती धारा प्रवाहित करने पर उसकी सुई में कोई भी हलचल नहीं होती। वास्तव में धारामापी की सुई को ac current के आधे चक्र में, बायी ओर को तथा अगले आधे चक्र में दायी ओर को धक्का लगना चाहिए। यदि धारा की आवृत्ति 50 चक्कर प्रति सेकेण्ड है तो सुई को एक सेकेंड में 100 बार बायी ओर से दायी ओर तथा दायी ओर से बायी ओर जाना होगा। सुई अपने जडत्व के कारण ऐसा नहीं कर सकती, इसलिए वह स्थिर ही बनी रहती है।


ac current in hindi का वर्ग माध्य मूल मान


प्रत्यावर्ती धारा के पूरे एक चक्कर के लिए धारा के वर्ग के औसत मान के वर्गमूल को, इसका वर्ग माध्य मूल मान कहते हैं। इसे Irms से प्रर्दशित किया जाता है।प्रत्यावर्ती धारा का वर्ग माध्य मूल मान दिष्ट धारा के उह मान के बराबर होता है जिससे किसी प्रतिरोध तार में एक सेकेंड में उतनी ही ऊष्मा ऊत्पन्न होती है जितनी ac current द्वारा उत्पन्न होती है। इसको धारा का प्रभावी मान या आभासी मान भी कहते है। 

ac current in hindi के समीकरण I = Im sin (wt) का वर्ग माध्य मूल मान Irms = Im/√2 होता है।


वर्ग माध्य मूल मान के प्रशन को हल कैसे करें- इसको हल करने के लिए सबसे पहले उस प्रशन का वर्ग करते है वर्ग करने पर जो मान प्राप्त होता है फिर उसका औसत मान निकालते हैं। अब जो मान हमे प्राप्त हुआ है इसका वर्गमूल करते है। इस तरह से हमें उस प्रशन का वर्ग माध्य मूल मान प्राप्त हो जाता है।







Er. Chand अक्टूबर 14, 2021
Read more ...

 चोक coil क्या है

प्रत्यावर्ती धारा परिपथों में विधुत ऊर्जा खर्च हुए बिना, विधुत धारा को कम करने के लिए जिस साधन का उपयोग किया जाता है उसे चोक coil कहते हैं। दिष्ट धारा परिपथ में धारा को नियंत्रित करने के लिए प्रतिरोध का प्रयोग किया जाता है, जहां पर I2R ऊर्जा प्रति सेकेण्ड खर्च होती है। डी सी परिपथों में प्रतिरोध का उपयोग इसलिए किया जाता है क्योंकि डी सी के लिए हमारे पास और कोई साधन नहीं है। चोक coil क्या है आगे इसके बारे में और अच्छे से समझेंगे।

चोक coil की संरचना


चोक कुंडली का कार्य सिद्धांत


चोक coil को बनाने के लिए एक नर्म लौहे की क्रोड पर विधुतरोधी ताॅबे के तार को लपेटा जाता है। इन तारों को पास पास लपेटा जाता है और तार का क्षेत्रफल अधिक यानी के चोक कुण्डली बनाने के लिए एक मोटे तार का प्रयोग किया जाता है ताकि इसके अन्दर भंवर धारा हानि को कम किया जा सके। 
इस चोक coil का ओमीय प्रतिरोध लगभग शून्य रहता है और इसका प्रेरकत्व काफी उच्च रहता है। तारों के अन्दर जो नर्म लौहे की क्रोड होती है इसे आगे पीछे करने के लिए इसमें एक व्यवस्था की जाती है। हम यहां पढ़ रहे है कि चोक coil क्या है कुण्डली के भीतर लौहे की क्रोड को जितनी अधिक दूरी तक प्रविष्ट करा दी जाती है, कुण्डली का प्रेरकत्व और प्रतिबाधा उतनी ही अधिक हो जाती है। कुण्डली का प्रतिरोध नगन्य होने के कारण इसमें विधुत ऊर्जा का गर्मी के रूप में क्षय बहुत ही कम होता है।

चोक का क्या कार्य है

मैंने देखा है कि बहुत से लोग इंटरनेट पर जानना चाहते है कि चोक का क्या कार्य होता है तो चलिए जान लेते है इसका क्या काम होता है, चोक का काम प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में बहने वाली धारा को नियंत्रित करना है अर्थात् उसको आवश्यकता के अनुसार जब कम धारा की जरूरत हो तो कम कर देता है और जब अधिक धारा की आवश्यकता होती है तो धारा को बढ़ा देता है। उम्मीद है कि आप सब समझ गये होगें कि असल में इसका काम होता क्या है।

चोक coil का उपयोग

घरों में प्रयोग की जाने वाली ट्यूब लाइटों, फ्लोरसेंट ट्यूबों और रेडियो में चोक का उपयोग किया जाता है। ट्यूब लाईट में इसको धारा का मान करने के लिए लगाया जाता है, इसे केवल प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में ही प्रयोग किया जा सकता है, डी सी परिपथों में नहीं, क्योंकि दिष्ट धारा की आवृत्ति शून्य होती है, जिसके कारण चोक का प्रेरण प्रतिघात और इसका प्रतिरोध लगभग शून्य ही रहता है। इसलिए डी सी परिपथ में इसका उपयोग करने का कोई फायदा नहीं होता है।

चोक coil क्या है के कुछ महत्वपूर्ण बातें- व्यवहारिक रूप में चोक कुण्डली का ओमीय प्रतिरोध कभी भी शून्य नहीं होता है। क्योंकि प्रतिरोध शून्य केवल आदर्श कुण्डली का हो सकता है, लेकिन आदर्श कुण्डली बनाना सम्भव नहीं है आदर्श चीज सिर्फ एक खयाली पुलाव होती है। कुण्डली के इस सूक्ष्म प्रतिरोध के कारण विधुत ऊर्जा का कुछ हिस्सा ऊष्मा के रूप में व्यय हो जाता है और इसके अतिरिक्त कुछ ऊर्जा क्रोड की शैथिल्य हानि एवं भंवर धारा हानि के कारक भी नष्ट होती है। भंवर धारा हानि के कारण होने वाली हानियों को चोक की क्रोड को पटलित करके कम किया जाता है।

Er. Chand अक्टूबर 09, 2021
Read more ...

 वाटहीन धारा क्या है

प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में जब ओमीय प्रतिरोध का मान शून्य होता है तो परिपथ में धारा तो प्रवाहित होती है परन्तु व्यय होने वाली औसत शक्ति शून्य होती है, यानी परिपथ में कोई भी ऊर्जा खर्च नहीं होती तो परिपथ में बहने वाली इस धारा को ही वाटहीन धारा कहते है।
जब किसी परिपथ में केवल प्रेरकत्व या संधारित्र है और प्रतिरोध का मान शून्य है तो धारा और वोल्टेज के बीच 90 डिग्री का कलान्तर होता है जिससे परिपथ का शक्ति गुणांक शून्य हो जाता है और सर्किट की पावर भी शून्य हो जाती है
Cos90 = 0
P = V rms × I rms Cos90 = 0
 
इसलिए इस सर्किट में बहने वाली धारा वाटहीन धारा होती है।

इस सिद्धांत का प्रयोग चोक कुण्डली में किया जाता है। शुद्ध प्रेरकत्व वाले प्रत्यावर्ती परिपथ के लिए तात्कालिक धारा I, वोल्टेज V और शक्ति P में वक्र को नीचे फोटो में दिखाया गया है। शक्ति समय वक्र समय अक्ष के सापेक्ष ठीक सममित आता है। इसका मतलब यह है कि एक चक्र के लिए परिपथ में व्यय औसत शक्ति शून्य होती है। एक चौथाई चक्र के दौरान प्रेरक विधुत स्त्रोत से ऊर्जा लेकर अपने अन्दर चुंबकीय क्षेत्र के रूप में संचित करता है, और अगले एक चौथाई चक्र के दौरान प्रेरक का चुंबकीय क्षेत्र शून्य हो जाता है यानी के प्रेरक स्त्रौत से ली गई ऊर्जा को वापस लोटा देता है। इस प्रकार प्रेरक विधुत स्त्रोत से कोई नेट ऊर्जा नहीं लेता है। 

शुद्ध धारिता वाले परिपथ में भी ऐसा ही होता है। संधारित्र एक चौथाई में जितनी ऊर्जा प्रत्यावर्ती स्त्रौत से विधुत क्षेत्र के रूप में लेता है। अगले एक चौथाई चक्र में वह उतनी ही ऊर्जा स्त्रौत को लोटा देता है और फिर अगले आधे चक्र में भी ऐसा ही होता है।
यही कारण है कि प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में धारा नियन्त्रण के लिए प्रेरकत्व और वोल्टेज नियन्त्रण के लिए धारिता को प्रयोग में लाया जाता है। इसके लिए प्रतिदिप्त नलिकाओं में चोक कुण्डली और पंखों में संधारित्र उपयोग में लाये जाते हैं। 
Er. Chand अक्टूबर 08, 2021
Read more ...

 चुंबकत्व क्या होता है

आज से लगभग 470 साल पहले एशिया माइनर में मैग्नेशिया नामक स्थान पर एक गहरे भूरे व काले रंग का पत्थर पाया गया था, जिसमें लौहे के छोटे-छोटे टुकड़ों को अपनी ओर आकर्षित करने का गुण था। मैग्नेशिया में पाये जाने के कारण इसका नाम मैग्नेटाइट रखा गया। इसी नाम से आधुनिक शब्द मैग्नेट की यानी चुंबक की उत्पत्ति हुई। यह पत्थर लौहे खा आक्साइड होता है, जिसका सूत्र Fe3O4 है। चुंबकत्व क्या होता है- मैग्नेटाइट के इस गुण को जिसके कारण यह लौहे के छोटे-छोटे टुकड़ों को अपनी ओर आकर्षित करता है, चुंबकत्व कहते है। 

प्राकृतिक रूप में पाये जाने के कारण मैग्नेटाइट के टुकड़ों को, प्राकृतिक चुंबक कहते है। यदि किसी प्राकृतिक चुंबक को उसके गुरुत्व केन्द्र से बांधकर लटका दिया जाए, तो वह हमेशा उत्तर-दक्षिण दिशा में ही ठहरता है। इस चुंबक के अन्दर चुंबकत्व बहुत कम होता है। इसलिए यह लौहे के टुकड़ों को अपनी ओर कम आकर्षित करती है। इन्हें प्रायोगिक कार्यो के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाता है। इसके लिए कुछ धातुओं जैसे, लौहा, फौलाद, निकिल और एलनिको जैसी मिश्र धातु से बनायें गए शक्तिशाली चुंबक प्रयोग में लायी जाती है। इस तरह की चुंबक को कृत्रिम चुंबक कहते है। आवश्यकता के अनुसार इन चुंबकों को किसी भी आकार में बनाया जा सकता है। जैसे, दण्ड चुंबक, नाल चुंबक, चुंबकीय सुई जैसी आकृतियों में ढाला जा सकता है। जिन पदार्थों में कृत्रिम रूप से चुंबकत्व ऊत्पन्न किया जा सकता है, उन्हें चुंबकीय पदार्थ कहते है।

चुंबकत्व के गुण (properties of a magnet)


चुंबक चुम्बकीय पदार्थों को अपनी ओर खिंचता है-- जब कभी किसी दण्ड चुंबक को किसी चुम्बकीय पदार्थ के बुरादे या छीलन में डाला जाता है तो वे इस पर चिपक जाते है। चिपके हुए बुरादे की मात्रा चुंबक के सिरों पर अधिकतम और चुंबक के बीच वाले हिस्से पर कम होती है। इससे यह पता लगता है कि चुंबक के किनारों के आस पास चुंबकत्व सबसे अधिक होता है और बीच वाले हिस्से में चुंबकत्व सबसे कम होता है। चुंबक के दोनों किनारों को ध्रुव कहते है। 

• स्वतन्त्रतापूर्वक लटका हुआ चुंबक सदैव उत्तर-दक्षिण दिशा में ठहरता है

यदि किसी चुंबक को एक धागे से बांधकर इस प्रकार लटकाया जाए कि वह एक क्षैतिज तल में स्वतन्त्रतापूर्वक घूम सकें। तो यह चुंबक हमेशा उत्तर-दक्षिण दिशा में ही ठहरता है। यदि हम इसको इसकी सन्तुलन की अवस्था से थोडा घुमा दे तब भी यह वापस उसी दिशा में आ जाता है। तो इस चुंबक का जो किनारा उत्तर दिशा की ओर होता है, उसे उत्तरी ध्रुव और जो किनारा दक्षिण दिशा में ठहरता है, उसे दक्षिणी ध्रुव कहते है।इन ध्रुवों को N और S से व्यक्त किया जाता है।

चुंबक चुम्बकीय पदार्थों में प्रेरण द्वारा चुंबकत्व ऊत्पन्न कर देता है- 
यदि किसी शक्ति शाली चुंबक का कोई ध्रुव नर्म लौहे की छड़ के पास लाया जाता है तो वह छड़ खुद एक चुंबक बन जाती है। इस घटना को चुंबकीय प्रेरण कहते हैं। और छड़ के द्वारा चुंबकत्व प्राप्त करने की क्रिया, चुंबकन कहलाती है। छड़ के उस सिरें पर जो चुंबक के ध्रुव के समीप होता है, विजातीय ध्रुव बनता है, दूसरे सिरें पर सजातीय ध्रुव बनता है।

• दो चुंबकों के सजातीय ध्रुवों में परस्पर प्रतिकर्षण और विजातीय ध्रुवों में परस्पर आकर्षण होता है-

यदि हम किसी स्वतन्त्रतापूर्वक लटके चुंबक से उत्तरी ध्रुव के पास एक अन्य चुंबक का उत्तरी ध्रुव लाते हैं तो हम देखते है कि लटका हुआ चुंबक दूसरे चुंबक से दूर भागता है और यदि हम इस चुंबक के उत्तरी ध्रुव के पास, दूसरी चुंबक का दक्षिणी ध्रुव लाते है, तो हम देखते है कि लककी हुई चुंबक दूसरी चुंबक के नजदीक आती है। तो इससे हमें यह पता चलता है कि एक जैसे ध्रुव एक दूसरे को प्रतिकर्षित करते है और अलग-अलग ध्रुव एक दूसरे को आकर्षित करते है।

धारावाही परिनलिका का चुंबकीय व्यवहार

परिनलिका विधुतरोधी तार की बनी एक एक बेलनाकार कुण्डली होती है जिसका व्यास उसकी लंबाई की अपेक्षा बहुत छोटा होता है। प्रायौगिक रूप में इसे कार्ड बोर्ड या मोटे कागज की कम व्यास की लम्बी खोखली नली के ऊपर ताॅबे के विधुतरोधी तार के बहुत से फेरे पास पास लपेटकर बनाया जाता है। इस परिनलिका में किसी बाहरी स्त्रोत द्वारा विधुत धारा प्रवाहित करने पर इसके चारों ओर, अन्दर ओर बाहर के स्थान में चुंबकीय क्षेत्र ऊत्पन्न हो जाता है। जिससे यह एक दण्ड चुंबक की तरह व्यवहार करने लगती है। 
यहां पर हमने जाना है कि किसी चुंबक का चुंबकत्व क्या होता है और इसके गुण क्या क्या होते है और एक धारावाही परिनलिका में चुंबकीय क्षेत्र कैसे बनता है। इन सब के बारे में हमने इस पोस्ट में जाना है पोस्ट को पढ़ने के बाद अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर दिजियेगा।

Er. Chand अक्टूबर 07, 2021
Read more ...