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 हैलो दोस्तो आज की इस पोस्ट में हम जानेंगे कि MCB और RCCB क्या होता है और mcb or rccb me difference क्या है mcb का प्रयोग कहा किया जाता है और RCCB को किस जगह पर इस्तेमाल में लाया जाता है। इन दोनों का काम क्या होता है और किन किन चीजों से ये प्रोटेक्शन प्रदान करती है। इंटरव्यू के अन्दर भी आपसे इस पर प्रश्र पूछा जा सकता है कि mcb और rccb में क्या अंतर होता है तो इसे समझने के लिए आप इस पोस्ट बड़ी ही ध्यान पूर्वक पढ़िए तभी आप इन दोनों ही प्रोटेक्शन डिवाइस के बारे में अच्छे से समझ पायेंगे तो चलिए शुरू करते है आज के इस बहुत ही प्यारे टोपिक को।


mcb or rccb me difference


MCB क्या होता है

सबसे पहले हम mcb के बारे में बात करेंगे कि MCB क्या होता है। इस प्रोटेक्शन डिवाइस का पूरा नाम miniature circuit breaker होता है और यह केवल ओर केवल ओवर लोड और शाॅर्ट सर्किट पर ही सुरक्षा प्रदान करती है इसके अलावा यह ओर किसी चीज पर प्रोटेक्शन नहीं देती है।

चलिए इसको एक उदाहरण के द्वारा समझते है पहले ओवर लोड से प्रोटेक्शन कैसे करता है उसको समझते है। मान लीजिए आपके घर में एक 10 एम्पीयर रेटिंग की mcb लगी हुई है। यदि इसमें करंट 10 एम्पीयर तक फ्लो हो रहा है तब तक तो कोई चिंता की बात नहीं होती है लेकिन यदि किसी कारण इसमें करंट का मान दस एम्पीयर से थोडा भी ज्यादा हो जाता है यानी के 10.5 या 11 एम्पीयर हो जाता है तो आपके घर में लगी यह mcb तुरंत ही trip कर जाती है जिससे घर के अंदर लगें उपकरण और इलैक्ट्रिकल वायरिंग सुरक्षित बच जाती है तो इस तरह से एक MCB ओवर लोड से सुरक्षा प्रदान करती हैं।

अब शाॅर्ट सर्किट से प्रोटेक्शन कैसे करती है यह समझते है। मान लीजिए आपके घर में विधुत सप्लाई आ रही है और इसमें mcb लगा हुआ है इसमें से दो वायर आते है जो आगे विधुत बल्ब या विधुत मोटर तक जातें है। जिनमें से एक तार फेज का होता है और दूसरा न्यूट्रल का होता है। यदि किसी कारण इनमें से एक तार टूट कर दूसरे तार से मिल जाये यानी फेज वाला वायर टूटकर न्यूट्रल वायर से टच हो जाये तो दोनों तारों में शाॅर्ट सर्किट होने के कारण mcb तुरंत ही trip कर जाती है तो इस प्रकार यह शाॅर्ट सर्किट से भी सुरक्षा प्रदान करती हैं।

RCCB क्या होता है

इस सुरक्षा यंत्र का पूरा नाम residual current circuit breaker होता है। इसके अन्दर हमे काफी सारी सुविधाएं मिल जाती है जो कि mcb के अन्दर नहीं पाई जाती है इसका मुख्य कार्य परिपथ में विधुत धारा का बैलेंस जब बिगड़ जाता है तो उस कंडिशन में परिपथ को सप्लाई से पृथक करना होता है आसान से शब्दों में इसे ऐसे कह सकते है कि rccb का काम सर्किट में करंट को बैलेंस करना होता है।

चलिए इसको भी एक उदाहरण के द्वारा समझते है। मान लीजिए आपके पूरे घर में rccb लगा हुआ है आपका एक छोटा पांच या आठ साल का बच्चा है जिसने घर में लगें विधुत बोर्ड के सोकेट में उंगली दे दी है और उस सोकेट का स्विच भी ओन कंडिशन में है तो उस समय क्या होगा ? आपके घर की rccb तुरंत ही ट्रिप कर जायेंगी और आपका बच्चा करंट लगने से बच जायेगा। तो इस प्रकार से यह सुरक्षा प्रदान करती है। इसलिए इस प्रोटेक्शन डिवाइस को लगवाना बहुत जरूरी होता है क्योंकि बच्चों को पता नहीं होता है यदि किसी कारण वह कोई बिजली का तार पकड़ लेते है या फिर किसी विधुत बोर्ड के सोकेट में अपनी उंगली डाल देते है तो rccb उसे करंट लगने से पहले ही बचा लेगी इस तरह से आप और आपके बच्चे बिजली से सुरक्षित रहेंगे।

MCB और RCCB में अंतर

दोस्तों जैसा हमने अभी ऊपर जाना है कि mcb सिर्फ दो चीजों से सुरक्षा प्रदान करती है एक तो over load और दूसरा short circuit यानी के जब परिपथ में ओवर लोड की कंडीशन आयेगी या कहीं पर आपस में दो तारों में शाॅर्ट सर्किट हुआ हो तो इनसे ही यह प्रोटेक्शन करती है। और rccb एक ऐसी प्रोटेक्शन डिवाइस होती है जब परिपथ में करंट अनियंत्रित हो रहा हो यानी के जितना करंट फेज से आ रहा है उतना ही अगर हमें न्यूट्रल पर नहीं मिल रहा है तो उस समय यह सर्किट से सप्लाई को अलग कर देती है। यही mcb और rccb में अंतर होता है।
Er. Chand दिसंबर 02, 2021
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 On grid solar system क्या होता है

जब सोलर प्लांट पावर ग्रीड या ट्रांसफॉर्मर से आने वाली विधुत सप्लाई से जुड़ा हो तो ऐसे सिस्टम को on grid solar system कहते हैं। इसे और दूसरे नाम से भी जाना जाता है जैसे ग्रीड टाइड सोलर सिस्टम इस नाम से भी इसको जानते हैं।
हैलो फ्रेंड्स आज हम इसी के बारे में बात करेंगे कि ओन ग्रीड सोलर सिस्टम क्या होता है यह कैसे काम करता है और इस सिस्टम को लगाने से पहले हमें किन किन बातों का ध्यान रखना होता है और इस सोलर सिस्टम के क्या क्या लाभ और हानियां है। अगर आप भी on grid solar system लगवाना चाहते है तो आपको कुछ बातों का ध्यान जरूर रखना चाहिए।

अगर आप ओन ग्रीड सोलर सिस्टम लगवा रहे है यह तभी काम करेगा जब आपके घर का पावर सप्लाई किसी ग्रीड या परिणामित्र से जुडा हों। कहने का मतलब यह है कि अगर आपके घर में विधुत सप्लाई नहीं आ रही है तब आप इस सोलर सिस्टम को नहीं लगवा सकते हैं। यह सिस्टम तभी फायदेमंद होता है जब आपके क्षेत्र में बिजली सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक आती हों। इस सिस्टम को तभी लगवाना चाहिए जब आप बिजली बिल को कम करना चाहते हों।

On grid solar system कैसे काम करता है

जब सूर्य की किरणें सोलर पैनल पर गिरती है तो इन किरणों के सोलर प्लेट पर गिरने से डी सी सप्लाई जेनरेट होती है लेकिन हमारे घरों में जितने भी उपकरण लगें होते है जैसे बल्ब, फैन, कूलर, एयर कंडीशनर, फ्रिजर, हिटर और वाशींग मशींन ये सब ए सी सप्लाई के द्वारा चलते हैं। तो हमें एक ऐसा डिवाइस चाहिए होता है जो इस डी सी सप्लाई को ए सी सप्लाई में कन्वर्ट कर दें। इसके लिए एक इन्वर्टर लगाया जाता है इसमें जिस इंवर्टर का प्रयोग करते है उसे ग्रीड टाइड इंवर्टर कहते हैं। सोलर पैनल से आने वाली डी सी सप्लाई को ये इंवर्टर ए सी सप्लाई में बदल देता है और ये सप्लाई आगे लगें स्विच बोर्ड में जाती है जहां पर सेफ्टी यन्त्र जैसे सर्किट ब्रेकर वगैरा लगें होते हैं।
On grid solar system kya hai


यहां से सप्लाई दो भागों में बट जाती है। एक लाइन यहां से सप्लाई की घरों में लगे लोड की ओर जाती है और दूसरी लाइन सप्लाई की नैट मीटर से होते हुए ग्रीड की ओर जाती है। नैट मीटर के दो काम होते है पहला जो घरों के कनैक्शन होते है वह किसी न किसी ग्रीड की सप्लाई से कनैक्ट होता है तो यह नैट मीटर उस ग्रीड की घरों में कितनी बिजली खर्च होती है उसका हिसाब रखता है और दूसरा सोलर पैनल के द्वारा बनने वाली कितनी बिजली ग्रीड को सप्लाई की जा रही है उसका भी रिकॉर्ड रखता है।

On grid solar system के लाभ

• इस सोलर सिस्टम को लगवाने का सबसे बड़ा फायदा यह हो जाता है कि जो हमारा महिने का बिजली का बिल आता है वह कम हो जाता है। क्योंकि इस सिस्टम में सप्लाई को जेनरेट भी करते हैं और साथ ही साथ ग्रीड को सप्लाई भी करते हैं।

• जैसा कि हम जानते है कि इस सोलर सिस्टम में बैटरी का प्रयोग नहीं होता है जिसके कारण इस प्लांट की मरम्मत करना आसान हो जाता है।

• इस सोलर पैनल की लगवाने की किमत भी बहुत कम होती है ओफ ग्रीड सोलर सिस्टम और हाई ग्रीड सोलर सिस्टम की तुलना में।

ओन ग्रीड सोलर सिस्टम की हानियां

• हमें पता है कि on grid solar system सीधे ही ग्रीड से कनैक्ट होता है। यदि किसी कारणवश ग्रीड से आपके घर में कोई विधुत सप्लाई नहीं आ रही है तो उस कंडिशन में यह सोलर सिस्टम काम नहीं करता है चाहे आपके सोलर पैनल पर सूर्य की कितनी भी अच्छी किरणें क्यों न गिर रही हों।

• इस प्लांट में किसी भी तरह की बैटरी का इस्तेमाल नहीं करते है जिसके कारण इसमें कोई बैकअप नहीं होता है। यही इस सिस्टम की सबसे बड़ी खामियां होती हैं।

Er. Chand नवंबर 25, 2021
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 सड़क पर लगें ब्रेकरों द्वारा बिजली कैसे बनायी जाती है।

हैलो दोस्तो आज मैं आपको बिजली बनाने के नये स्त्रौत के बारे में बताने जा रहा हूं। तों इस खास स्त्रौत का नाम है सड़क पर लगें ब्रेकरों द्वारा बिजली कैसे बनयी जाती है। जी हां दोस्तों इस इलैक्ट्रिसिटी उत्पादन के नये स्त्रौत का आज बहुत देशों के अन्दर प्रयोग किया जा रहा है तो आज हम इसी तरिके के बारे में जानेंगे कि सड़क पर लगें ब्रेकरों द्वारा बिजली कैसे बनती जाती है।


यह एक बहुत ही आसान और किफायती तरिका है जिससे बिजली का उत्पादन किया जा सकता है। इस तरिके मैं सड़कों पर जहां ब्रेकर लगें होते है उनके स्थान पर घूमने वाले लौहे के पहिए लगा दिये जाते हैं और इन पहियों से जेनरेटर की साफ्ट को जोड़ दिया जाता है। जैसे ही इनके ऊपर से कार या बस गुजरती है तो ये घूमने लगते है इनके घूमने से जेनरेटर की साफ्ट भी घूमने लगती है इस प्रकार इस स्त्रौत के द्वारा विधुत बनने लगती है।

इस स्त्रौत का उपयोग ज्यादातर जहां पुल बने होते है वहां किया जाता है क्योंकि पुलों पर इस स्त्रौत के उपकरणों को लगाना आसान होता है। पुल पर इसे बिना किसी खुदाई के प्लेस किया जा सकता है और इसे ऐसी सड़कों पर लगाना अधिक फायदेमंद होता है जिन रास्तों पर वाहनों का आना जाना लगातार बना रहता है। क्योंकि जितने ज्यादा वाहन इन ब्रेकरों के ऊपर से गुजरते है बिजली का उत्पादन उतना ही अधिक होगा।

सड़कों पर ब्रेकरों द्वारा बिजली बनाने में एक बात का खास ख्याल रखा जाना चाहिए। इस स्त्रौत को हमेशा ऐसी सड़कों पर लगाना चाहिए जहां पर गाड़ीयां एक ही दिशा में चलती हों तभी इसके द्वारा बिजली का उत्पादन अच्छा होता है वरना दोनों और से चलने वाली सड़कों पर इससे बिजली बनाने में काफी कठिनाई आती है।

ब्रेकरों द्वारा बनी बिजली का उपयोग

इस स्त्रौत से विधुत का उत्पादन करना बहुत आसान होता है यह तो आपने जान लिया। लेकिन इस स्त्रौत से बिजली की पैदावार बहुत कम मात्रा में होती है इसलिए इसका उपयोग ज्यादा बड़े सैक्टरो में नहीं किया जा सकता है। इस विधुत की मात्रा कम होने के कारण इसका उपयोग, जहां इस स्त्रौत को लगाया जाता है वही पर रात के समय लाइटों को जलाने में किया जाता है।
Er. Chand नवंबर 21, 2021
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 औधौगिक क्षेत्र में प्रयोग होने वाली विधुत मोटरें (Electric motors used in industries)


(1) खराद मशींन (Lathe machine) 

खराद मशींन को स्थिर गति वाली पिंजरा प्रेरण मोटर द्वारा चलायि जाता है। इन कार्यों के लिए 50 hp तक की मोटर बनाई जाती है। कभी कभी बहु गति वाली ए सी धारा की स्लिपरिंग प्रेरण मोटरें या ध्रुव परिवर्तित मोटरें तथा दिष्ट धारा शंट मोटरें या ध्रुव परिवर्तित चलाने के लिए प्रयोग की जाती है।


(2) प्लेनर (planer) 

प्लेनर में एक तल होता है जो कि प्लेटन से जुड़ा होता है, जो तल पर आगें पीछे चलता है। कार्य को प्लेटन से बांध दिया जाता है और कार्य शिकंजे में फंसे स्थिर टूल द्वारा समतल कियि जाता है। इसमें समंजनशील गति वाली प्रतिवर्ती मोटरें प्रयोग की जाती है। 

(3) पंच और शियरस (punch and shears) 

पंच और शियरस मशीनों में गतिपाल पहिया लगा होता है, जो कटिंग के समय ऊर्जा प्रदान करता है। इन मशीनों में ए सी मोटर उपयोग में लायी जाती है, जो ढलवां गत बलाघूर्ण अभिलक्षण रखती हों, ताकि मोटर की गति कम हो जायें जब उस पर उच्च भार पड़े। 

(4) मशींन टूल्स (machine tools) 

मशीन टूल के अन्तर्गत विधुत से चलने वाली मशीनें, बरमा मशींन और स्पेनर आदि आतें हैं। इनको चलाने के लिए उच्च गति वाली मोटरें गियर सहित प्रयोग में लायी जाती है। छोटी बरमा मशीनों और स्पेनर के साथ श्रेणी प्ररूपि सार्वत्रिक मोटर प्रयोग की जाती है, जो कि प्रत्यावर्ती धारा और दिष्ट धारा दोनों पर कार्य करती है। बड़े टूल्स के लिए दिष्ट धारा सप्लाई पर कम्पाउन्ड मोटरें और ए सी धारा के लिए पिंजरा प्रेरण मोटर उपयोग की जाती है।

(5) लिफ्ट (lift) 

लिफ्ट में प्रयोग की जाने वाली मोटर सरलता से प्रारम्भ और रुकनी चाहिए, इसके लिए मोटर का आर्मेचर हल्का और साधारण गति पर चलना चाहिए। लिफ्ट के लिए दिष्ट धारा कम्पाउन्ड मोटर, ए सी धारा स्लिप रिंग मोटर, प्रेरण प्रतिकर्षण मोटर और परिवर्ती गति वाली ए सी धारा की दिकपरिवर्तक मोटर अधिक उपयुक्त रहती है। 

(6) खनन उद्योग में (minning industries) 

खनन उद्योग में काम आने वाली मोटर पूरी तरह बंद घेरे वाली और ज्वालासह होनी चाहिए। इसमें 10 hp तक के लिए पिंजरा प्रारूपि प्रेरण मोटरें या डी सी मोटर प्रयोग में लायी जाती है। दिष्ट धारा मोटरों में गति नियंत्रण के लिए शंट क्षेत्र नियंत्रण विधि प्रयोग की जाती है और स्लिप रिगं मोटर के गीत नियंत्रण के लिए सोपानी विधि इस्तेमाल की जाती है।

(7) कपड़ा मिलों में (textile mills) 

कपड़ा मिलों में समूह चालन और अर्द्ध समूह चालन प्रयोग किया जाता है, जिसमें मोटर साफ्ट पर पुलिया लगी होती है जो अनेकों मशीनों को चलाती है। कपड़ा मिलों में उपयोग की जाने वाली मोटरें पूर्ण रूप से बन्द घेरें वाली होनी चाहिए, ताकि कपड़ों की फुन्जी आदि से मोटर सुरक्षित रहें। इसके साथ मोटर का विधुत रोधन नमी सह होना चाहिए ताकि सीलन से सुरक्षा हो सकें, क्योंकि कपड़ा मिलों में सीलन वातावरण होता है। कपड़ा मिलों में ए सी सप्लाई की थ्री फेज मोटरें प्रयोग की जाती है, क्योंकि इनकी गति सप्लाई आवृत्ति द्वारा नियंत्रित और स्थिर रहती है। कपड़ा मिलों में दिष्ट धारा मोटर प्रयोग करना उचित नहीं है क्योंकि इनकी गति सप्लाई वोल्टेज और गर्मी ज्यादा ऊत्पन्न होने पर परिवर्तित हो जाती है। इनमें प्रयुक्त होने वाली मशीनों की दक्षता और प्रारम्भन बहुत उच्च होना चाहिए।


Er. Chand नवंबर 01, 2021
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 जिस प्रकार किसी विशेष कार्य के लिए विधुत मोटर का चयन करते समय उसके विधुत अभिलक्षणों को देखा जाता है, उतने ही महत्व के साथ उसकी यांत्रिक संरचना पर भी ध्यान देना चाहिए, और स्थिति के अनुसार ही विशेष यांत्रिक संरचना वाली मोटरों का चयन किया जाना चाहिए। तो यहां हम उन्ही विधुत मोटर के यांत्रिक अभिलक्षण के बारे में पढ़ेंगे। मोटर का चयन करते समय निम्न यांत्रिक अभिलक्षणों को ध्यान में रखना चाहिए।



घेरें के प्ररूप (type of enclosure)

मोटर के सभी मुख्य भाग जैसे कुण्डलन, बेयरिंग, विधुतरोधन आदि को वायुमंडल में उपस्थित दुषित वायु से बचाना अत्यन आवश्यक होता है। औधोगिक इकाइयों में मोटरों के चारों ओर धातु धूल, तेल धूल, पानी और प्रज्वलनशील धुआं इकठ्ठा हो जाता है। घेरें का काम मोटर को दूषित हवा से बचाना होता है। अगर इस प्रकार की सुरक्षा प्रदान करने के लिए किसी तरह का घेरा इस्तेमाल किया जाता है तो हम देखते है कि मोटर को ठण्डी हवा मिलनी बंद हो जाती है, जिससे मोटर का तापमान बढ़ जाता है और इससे उसी परिमाप की असुरक्षित मोटर की अपेक्षा इस मोटर की निर्गत घट जाती है। मोटर के घेरे का डिजाइन करते समय निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए।
• मोटर को लगाने का स्थान
• मोटर को ठण्डा करने का प्राविधान
• मोटर से लिया जाने वाला काम

(1) खुली प्रारूपि मोटर

इस प्रकार की मशीनों में दूषित हवा, जैसे धातु धूल, पानी, साधारण धूल आदि से कोई सुरक्षा नहीं मिलती। ये मशीनें दोनों सिरों से खुली होती है, और मशीन के बियरिंग साधारण पैडस्टल या सिरा ब्रैकट पर लगे होते है। पुराने जमाने में ऐसी ही मोटरें प्रयोग की जाती थी, लेकिन आज कल केवल बहुत बड़ी दिष्ट धारा मोटरों में इस तरह के घेरे प्रयोग किये जाते हैं।

(2) पूर्णतया बन्द घेरे वाली मोटर

यह मोटर पूरी तरह से बंद घेरे वाली होती है, इनके फ्रेम ठोस होते है और सिरा प्लेटों में हवादारी के लिए छिद्र नहीं होते। इस प्रकार की घेरें वाली मोटरे धूल, दूषित हवा और रसायन धुएं आदि से पूरी तरह सुरक्षित होती है और इन्हे ऐसे स्थानों पर लगाया जाता है, जहां वातावरण दूषित रहता हो, जैसे आरा मिल, रसायन प्लांट, कोयला हैंडलिंग प्लांट में। इन मोटरों के शीतलन में कठिनाई के कारण इनकी निर्गत सुरक्षित मशीनों की अपेक्षा 50 से 70 तक होती है। इन्हें 2 से 3 अश्व शक्ति का ही बनाया जाता है, इससे अधिक अश्व शक्ति की मोटरों के लिए साफ्ट पर पंखा लगाया जाता है

(3) पूरी तरह बंद पंखा शीतलित मोटर

इस प्रकार की मोटरों में शीतलन के लिए साफ्ट के अचालन सिरों पर एक पंखा लगा दिया जाता है और उसे एक ढक्कन द्वारा ढक दिया जाता है। साफ्ट पर लगा यह पंखा घेरे के बाहर हवि फेंकता है, जिससे मोटर को ठंडा होने में मदद मिलती है। इस तरह की मोटरें 50 अश्व शक्ति तक बनायी जा सकती है और यह आरा मिलों, आटा चक्की, सीमेंट कार्यो में प्रयोग की जाती है।

(4) सुरक्षित मोटर

इस प्रकार की मोटरों में सिरा ढक्कन लगायें जातें है और दोनों सिरों पर हवा के लिए बड़े बड़े छिद्र छोड़े जातें है। इस तरह की मोटरें आज कल औधोगिक कार्यों के लिए इस्तेमाल की जाती है

बियरिंग (Bearing)

विधुत मोटरों में निम्न दो प्रकार के बियरिंग उपयोग में लाये जाते हैं, स्लीव बियरिंग और बाॅल बियरिंग या रोलर बियरिंग। इन दोनों का नीचे बिस्तार से अध्यन करेंगे।

(1) स्लीव बियरिंग

स्लीव बियरिंग कासा धातु के बने होते हैं, लेकिन सार्वत्रिक मोटरों और पंखा शीतलित मोटरों में छिद्रित पाउडर या सरंध्र धातु के बने स्लीव बियरिंग भी प्रयोग में लाएं जा सकते हैं, क्योंकि यह कोशिश क्रिया के कारण स्वं स्नेहक गुण रखतें हैं। बहुत छोटी मोटरों में स्लीव बियरिंग को तेल बस्ती द्वारा स्नेहित किया जाता है, जो कि साफ्ट पर स्प्रिंग द्वारा दबी रहती है। तेल बत्ती हल्के तेल द्वारा भिगी रहनी चाहिए।

(2) बाॅल या रोलर बियरिंग

रोलर बियरिंग में एक आन्तरिक रेस, एक ब्राह्रा रेस और एक पिंजरा होता है, जिसमें बाल या रोलर को फंसाया जाता है। इन बियरिंगों में ग्रीस लगाकर, इन्हे मोटर की साफ्ट के दोनों ओर सिरा प्लेटों में लगाया जाता है। आजकल स्लीव बियरिंग का स्थान बाल बियरिंग लेते जा रहें हैं और ऊर्ध्वाधर साफ्ट वाली मोटरों में बाल बियरिंग ही प्रयोग कियें जाते हैं, क्योंकि यह अक्षिय प्रघात को सहन कर सकते है और इनकी लागत भी अधिक होती है। इनमें घर्सण हानियां कम और अनुरक्षण व्यय लगभग नग्नय होता है इसलिए रोटर और स्टेटर में भी कम वायु अंतराल रखा जा सकता है।

चालन को संचालित करने की विधि

मोटर के प्ररूप और संरचना के चयन के साथ साथ चालन को भी संचारित करने की विधि का उपयोग चयन करना महत्वपूर्ण होता है। मोटर की गति का चयन करना भी जरूरी होता है क्योंकि उच्च गति पर मोटर की दक्षता और शक्ति गुणांक उच्च होता है और लागत प्रति अश्व शक्ति कम होती है, इसी कारण उच्च गति वाली मोटरें बनाई जाती है। यदि काम को निम्न गति पर करना हो तो घटाव गियर्स या अन्य उपर्युक्त विधि द्वारा मोटर की गति कम कर लेते हैं। मशीनों को चलाने के लिए निम्न संचारित विधियां प्रयोग की जाती है।

(1) पट्टा चालन

इस विधि में चमड़े या नायलोन धागे का पट्टा प्रयोग किया जाता है। यह सबसे अच्छा और सबसे ज्यादा उपयोग की जाने वाली विधि है, जिसके द्वारा 300 अश्व शक्ति तक यांत्रिक शक्ति संचारित की जा सकती है, जबकि अन्य सीमा, गति अनुपात और पुली के केन्द्रो के साथ दूरी पर निर्भर करती है। इसके अतिरिक्त पट्टे की स्लिप को भी ध्यान में रखना चाहिए, जोकि 3 से 4 प्रतिशत हो सकती है।

(2) रस्सी चालन या वी पट्टा चालन

यह विधि वहां प्रयोग की जाती है, जहां पट्टा चालन इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। पुली के ऊपर बने वी प्रारूपि खाचो में कई रस्सियां, जिन्हें वी पट्टे भी कहते है चलती हैं। इस विधि का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसमें स्लिप बिल्कुल नहीं होती और यह अधिक दक्ष हैं। आजकल पट्टा चालन के स्थान पर इसी का ज्यादा इस्तेमाल किया जा रहा है।

(3) जंजीर चालन

यह विधि पट्टा चालन और रस्सी चालन की अपेक्षा अधिक खर्चीलीं है, लेकिन इस चालन की दक्षता बहुत अच्छी होती है और इसमें स्लिप भी नग्नय होती है। इसके अतिरिक्त इसके द्वारा 6:1 अनुपात में गति प्राप्त की जा सकती है और उच्च गति के लिए भी यह विधि संतोषजनक है।

आवाज या ध्वनि (Noise) 

मोटर या मशीन के चयन में उसके द्वारा उत्पन्न आवाज का एक महत्वपूर्ण स्थान है। घरेलू उपयोग में आने वाले उपकरणों जैसे हेयर ड्रायर, मिक्सर, फ्रिज और पंखों आदि में तथा चिकित्सालयों और छविग्रह में प्रयोग आने वाली मशीनों में आवाज बिल्कुल नहीं होनी चाहिए। अधिक आवाज से रोगियों एवं दर्शकों को असुविधा होंगी। इसके साथ साथ औधोगिक कार्यों में इस्तेमाल होने वाली मशीनों में भी आविज न्यूनतम होनी चाहिए, अन्यथा अधिक आवाज, काम करने वालों को थका सकती है, जिससे फैकल्टी का उत्पादन घट सकता है। इसलिए यह आवश्यक है कि मोटर निर्माता ऐसी मोटरें डिजाइन करें, जिनसे कम ध्वनि ऊत्पन्न हो। 

हैलो दोस्तो हमने आज की पोस्ट में जाना है कि विधुत मोटरों के यांत्रिक अभिलक्षण उम्मीद है आपको ये लेख अच्छा लगा होगा। अगर वाकई आपको हमारी यह जानकारी अच्छी लगी है तो हमें कमेंट करके जरूर सूचित किजियेगां।

Er. Chand अक्टूबर 28, 2021
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